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आखिर 26 जनवरी को ही क्यों मनाया जाता है ‘गणतंत्र दिवस’?

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  - योगेश कुमार गोयल देश की स्वतंत्रता के इतिहास में 26 जनवरी का स्थान कितना महत्वपूर्ण रहा, इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में 26 जनवरी को ही सदैव स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया था लेकिन 15 अगस्त 1947 को देश के स्वतंत्र होने के बाद 26 जनवरी को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाए जाने के बजाय इसका इतिहास भारतीय संविधान से जुड़ गया और यह भारतवर्ष का एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय पर्व बन गया। 26 जनवरी 1950 को भारत के नए संविधान की स्थापना के बाद प्रतिवर्ष इसी तिथि को गणतंत्र दिवस के रूप में मनाए जाने की परम्परा आरंभ हुई क्योंकि देश की आजादी के बाद सही मायनों में इसी दिन से भारत प्रभुत्व सम्पन्न प्रजातंत्रात्मक गणराज्य बना था। भारत का संविधान 26 जनवरी 1949 को अंगीकृत किया गया था और कुछ उपबंध तुरंत प्रभाव से लागू कर दिए गए थे लेकिन संविधान का मुख्य भाग 26 जनवरी 1950 को ही लागू किया गया, इसीलिए इस तारीख को संविधान के ‘प्रारंभ की तारीख’ भी कहा जाता है और यही वजह थी कि 26 जनवरी को ही ‘गणतंत्र दिवस’ के रूप में मनाया जाने लगा। 26 जनवरी को ही गण...

बेटियों के लिए हमें ही बनाना होगा भयमुक्त समाज

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- योगेश कुमार गोयल देश की बालिकाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने तथा समाज में बालिकाओं के साथ होने वाले भेदभाव के बारे में बालिकाओं के साथ-साथ समस्त देशवासियों को भी जागरूक करने के उ्देश्य से प्रतिवर्ष 24 जनवरी को ‘राष्ट्रीय बालिका दिवस’ मनाया जाता है। परिवारों में बेटा-बेटी के बीच भेदभाव और बेटियों के साथ परिवार में प्रायः होने वाले अत्याचारों के खिलाफ समाज को जागरूक करने के लिए देश की आजादी के बाद से ही प्रयास होते रहे हैं। हालांकि एक समय ऐसा था, जब अधिसंख्य परिवारों में बेटी को परिवार पर बोझ समझा जाता था और इसीलिए बहुत सी जगहों पर तो बेटियों को जन्म लेने से पहले ही कोख में ही मार दिया जाता था। यही कारण था कि बहुत लंबे अरसे तक लिंगानुपात बुरी तरह गड़बड़ाया रहा। अगर बेटी का जन्म हो भी जाता था तो उसका बाल विवाह कराकर उसकी जिम्मेदारी से मुक्ति पाने की सोच समाज में समायी थी। आजादी के बाद से बेटियों के प्रति समाज की इस सोच को बदलने और बेटियों को आत्मनिर्भर बनाकर देश के प्रथम पायदान पर लाने के लिए अनेक योजनाएं बनाई गई और कानून लागू किए गए। उसी का नतीजा है कि अब बालिकाएं भी हर क्षेत...

राष्ट्रीय बालिका दिवस पर विशेष लेख

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  - योगेश कुमार गोयल देश की बालिकाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने तथा समाज में बालिकाओं के साथ होने वाले भेदभाव के बारे में बालिकाओं के साथ-साथ समस्त देशवासियों को भी जागरूक करने के उ्देश्य से प्रतिवर्ष 24 जनवरी को ‘राष्ट्रीय बालिका दिवस’ मनाया जाता है। परिवारों में बेटा-बेटी के बीच भेदभाव और बेटियों के साथ परिवार में प्रायः होने वाले अत्याचारों के खिलाफ समाज को जागरूक करने के लिए देश की आजादी के बाद से ही प्रयास होते रहे हैं। हालांकि एक समय ऐसा था, जब अधिसंख्य परिवारों में बेटी को परिवार पर बोझ समझा जाता था और इसीलिए बहुत सी जगहों पर तो बेटियों को जन्म लेने से पहले ही कोख में ही मार दिया जाता था। यही कारण था कि बहुत लंबे अरसे तक लिंगानुपात बुरी तरह गड़बड़ाया रहा। अगर बेटी का जन्म हो भी जाता था तो उसका बाल विवाह कराकर उसकी जिम्मेदारी से मुक्ति पाने की सोच समाज में समायी थी। आजादी के बाद से बेटियों के प्रति समाज की इस सोच को बदलने और बेटियों को आत्मनिर्भर बनाकर देश के प्रथम पायदान पर लाने के लिए अनेक योजनाएं बनाई गई और कानून लागू किए गए। उसी का नतीजा है कि अब बालिकाएं भी हर...

जब नेताजी को हो गया था 22 वर्षीया एमिली से प्यार

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  - श्वेता गोयल नेताजी सुभाष चंद्र बोस की प्रेम कहानी काफी दिलचस्प रही। फरवरी 1932 में सविनय अवज्ञा आन्दोलन के दौरान जेल में बंद नेताजी की तबीयत खराब होने लगी थी, जिसे देखते हुए ब्रिटिश सरकार इलाज के लिए उन्हें यूरोप भेजने पर सहमत हो गई थी। विएना में सुभाष चंद्र बोस के इलाज के दौरान एक यूरोपीय प्रकाशक ने उन्हें एक किताब ‘द इंडियन स्ट्रगल’ लिखने की जिम्मेदारी सौंपी। सुभाष बाबू ने यह महत्वपूर्ण जिम्मेदारी स्वीकार तो कर ली लेकिन इसे पूरा करने के लिए उन्हें एक ऐसे सहयोगी की जरूरत महसूस हुई, जिसे अच्छी अंग्रेजी और टाइपिंग आती हो। सुभाष चंद्र बोस के एक दोस्त थे डा. माथुर, जिन्होंने उन्हें दो ऐसे लोगों के बारे में बताया। नेताजी द्वारा इंटरव्यू के दौरान पहले को रिजेक्ट कर दिए जाने के बाद दूसरे उम्मीदवार को बुलाया गया। दूसरा उम्मीदवार था 26 जनवरी 1910 को ऑस्ट्रिया के एक कैथोलिक परिवार में जन्मी 22 वर्षीया खूबसूरत युवती एमिली शेंकल, जिसके पिता एक प्रसिद्ध पशु चिकित्सक थे। सुभाष बाबू उससे बहुत प्रभावित हुए और जून 1934 में एमिली ने नेताजी के साथ काम करना शुरू कर दिया। एमिली से मुलाकात के बाद स...

भुलाये नहीं भूलेगी नेताजी सुभाष की स्मृति

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  - योगेश कुमार गोयल 23 जनवरी 1897 की उस अनुपम बेला को भला कौन भुला सकता है, जब उड़ीसा के कटक शहर में एक बंगाली परिवार में नामी वकील जानकी दास बोस के घर भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में चमकने वाला एक ऐसा वीर योद्धा जन्मा था, जिसे पूरी दुनिया ने नेताजी के नाम से जाना और जिसने अंग्रेजी सत्ता की ईंट से ईंट बजाने में कोई-कसर नहीं छोड़ी। जानकीनाथ और प्रभावती की कुल 14 संतानें थी, जिनमें 6 बेटियां और 8 बेटे थे। सुभाष चंद्र उनकी नौवीं संतान और पांचवें बेटे थे। सुभाष को अपने सभी भाइयों में से सर्वाधिक लगाव शरदचंद्र से था। बचपन से ही कुशाग्र, निडर, किसी भी तरह का अन्याय व अत्याचार सहन न करने वाले तथा अपनी बात पूरी दबंगता के साथ कहने वाले सुभाष ने मैट्रिक की परीक्षा 1913 में कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण की। एक बार कॉलेज में एक प्रोफैसर द्वारा बार-बार भारतीयों की खिल्ली उड़ाए जाने और भारतीयों के बारे में अपमानजनक बातें कहने पर सुभाष को इतना गुस्सा आया कि उन्होंने कक्षा में ही उस प्रोफैसर के मुंह पर तमाचा जड़ दिया, जिसके चलते उन्हें कॉलेज से निकाल दिया गय...

एयरफोर्स के लिए ड्रॉबैक बन रहे हैं पुराने मिग विमान

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रेल यात्रा कब होगी सुरक्षित और भरोसेमंद ?

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योगेश कुमार गोयल   13 जनवरी को पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के दोमोहानी इलाके में हुई रेल दुर्घटना में बीकानेर-गुवाहाटी एक्सप्रेस के 12 डिब्बे पटरी से उतरने के कारण नौ लोगों की मौत हो गई जबकि अनेक गंभीर रूप से घायल हुए। रेलवे बोर्ड के मुताबिक शुरुआती जांच में जो जानकारी सामने आई है, उसके अनुसार इंजन के नीचे लगे ट्रैक्शन मोटर के गिरने के कारण यह हादसा हुआ। यह हादसा रेल तंत्र की लापरवाही को लेकर माथे पर चिंता की लकीरें इसलिए भी खींचता है क्योंकि विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि रोलिंग स्टॉक की समयबद्ध फिटनेस जांच होती है लेकिन इस ट्रेन के इंजन की संबंधित लोको शेड की ठीक प्रकार से फिटनेस जांच नहीं हुई, जिसके चलते यह दुर्घटना हुई। दुर्घटना के समय ट्रेन में 1200 से भी ज्यादा यात्री सवार थे लेकिन चूंकि हादसे के समय ट्रेन की गति कम थी अन्यथा रेल तंत्र की लापरवाही के कारण यह दुर्घटना बहुत बड़ी हो सकती थी। ऐसे हादसों में हर बार हताहतों की चीखें खोखले रेल तंत्र की कमियों को उजागर करते हुए समूचे रेल तंत्र को कटघरे में खड़ा करती रही हैं लेकिन उसके बावजूद रेल हादसों पर लगाम नहीं कसी जा रही। हाला...