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Sunday, January 26, 2014

गणतंत्र की मूल भावना को कब समझेंगे हम?


- योगेश कुमार गोयल (मीडिया केयर नेटवर्क)

हर साल की भांति एक और गणतंत्र दिवस हमारी चौखट पर दस्तक दे चुका है। इसमें कोई संदेह नहीं कि यह हर राष्ट्रप्रेमी के लिए गर्व का दिन है क्योंकि देश की आजादी के बाद अपना खुद का संविधान बनाकर 26 जनवरी 1950 के दिन इसे लागू कर भारत इसी दिन प्रभुत्ता सम्पन्न सार्वभौमिक प्रजातंत्रात्मक गणराज्य बना था लेकिन यह भी सच है कि तभी से हर वर्ष 26 जनवरी का दिन ‘गणतंत्र दिवस’ के रूप में मनाए जाने की ‘रस्म अदायगी’ ही हो रही है।
26 जनवरी का दिन गणतंत्र दिवस के रूप मनाने की शुरूआत के पीछे मूल भावना यही थी कि देश का प्रत्येक नागरिक इस दिन संविधान की मर्यादा की रक्षा करने, स्वयं को देशसेवा में समर्पित करने तथा राष्ट्रीय हितों के प्रति आस्था का संकल्प ले, साथ ही इन पर अमल भी करें लेकिन विड़म्बना ही है कि गणतंत्र दिवस तथा स्वतंत्रता दिवस, साल में सिर्फ इन्हीं दो अवसरों पर इस तरह के संकल्पों को याद कर हम अपने कर्त्तव्यों और उत्तरदायित्वों की इतिश्री कर लेते हैं। सही मायनों में गणतंत्र की मूल भावना को हमने आज तक नहीं समझा है।
‘गणतंत्र’ का अर्थ है शासन तंत्र में जनता की भागीदारी। हालांकि हम कह सकते हैं कि शासन तंत्र में जनता को पूर्ण भागीदारी मिली है किन्तु क्या वाकई यह पूर्ण सत्य है? देश का संविधान लागू होने के इन 64 वर्षों में भी क्या वास्तव में शासन तंत्र में जनता की भागीदारी सुनिश्चित हुई है? जनता को यह तो अधिकार है कि वह मतदान के जरिये अपना जनप्रतिनिधि चुने किन्तु एक बार संसद अथवा विधानसभा के लिए निर्वाचित होने के बाद इन जनप्रतिनिधियों पर जनता का अगले पांच सालों तक क्या कोई अंकुश रह पाता है?
निसंदेह यही कारण है कि एयरकंडीशंड दतरों में पहुंचते ही जनप्रतिनिधियों पर अपनी जनता की समस्याओं के समाधान की अपेक्षा अपने लिए सुख-सुविधाओं के अंबार जुटाने की चिन्ता सवार रहती है और वे इसी कवायद में जुट जाते हैं कि येन-केन-प्रकारेण अगले चुनाव के लिए करोड़ों रुपये का ‘जुगाड़’ कर लिया जाए। ऐसे में जनता भूख से तिल-तिल मरती है तो मरे।
जिस राष्ट्र में जनता की भागीदारी चुनाव में सिर्फ वोट डालने और उसके बाद अपने चुने हुए जनप्रतिनिधि के आचरण पर शर्मसार होकर आंसू बहाने तक ही सीमित रह गई है, वहां ‘गणतंत्र’ का क्या महत्व माना जाए? खासतौर से ऐसी स्थिति में, जब गरीबी व भुखमरी से त्रस्त करोड़ों लोग चंद रुपयों की खातिर या लाखों लोग महज दो-चार शराब की बोतलों के लिए अपने वोट बेच डालते हों या गुंडागर्दी के बल पर वोटों पर कब्जा कर लिया जाता हो?
इस बात में कोई संशय नहीं कि हमें विशुद्ध रूप में एक प्रजातांत्रिक संविधान प्राप्त हुआ है, जिसमें हर वर्ग, हर समुदाय, हर सम्प्रदाय के लोगों के लिए बराबरी के अधिकार के साथ-साथ व्यक्तिगत एवं सामूहिक रूप से कुछ मूलभूत स्वतंत्रताओं की व्यवस्था भी की गई है, प्रत्येक नागरिक के लिए मूल अधिकारों का प्रावधान भी किया गया है किन्तु गणतांत्रिक भारत में पिछले 64 वर्षों में संविधान के कुछ प्रावधानों के लचीलेपन का अनावश्यक लाभ उठाकर हमारे कर्णधार व नौकरशाह जिस तरह कदम-कदम पर लोकतांत्रिक मूल्यों को तार-तार करते रहे हैं, उससे लोकतंत्र की गरिमा ही प्रभावित होती रही है। संविधान के विभिन्न प्रावधानों का जिस तरह खुलकर दुरूपयोग हो रहा है, उसे देख निश्चय ही संविधान निर्माताओं की आत्मा खून के आंसू रो रही होगी। संविधान निर्माताओं ने कभी कल्पना भी नहीं की होगी कि जिन लोगों के कंधों पर इसे लागू कराने की जिम्मेदारी होगी, वही इसके प्रावधानों का मखौल उड़ाएंगे।
संसद और विधानसभाओं के भीतर होने वाली जोर आजमाइश व गुंडागर्दी तो अब कोई नई बात रही ही नहीं। कानून बनाने वाले और देश चलाने वाले लोग ही यह सब करेंगे तो देश में अपराधों पर अंकुश लगाने की किससे अपेक्षा करें? आम जनता पर कर्णधारों के इस तरह के आचरण का क्या असर पड़ता है? संसद-विधानसभा सरीखे लोकतंत्र के सर्वोच्च मंदिरों में अपराधियों व बाहुबलियों का निर्बाध प्रवेश क्या एक स्वस्थ लोकतंत्र का संकेत है? चुनाव जीतने के लिए आज हर राजनीतिक दल में ऐसे लोगों को पार्टी में शामिल करने, चुनाव जीतने के लिए उनका इस्तेमाल करने के अलावा उन्हें ही पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़वाकर अपनी सीटें बढ़ाने के फेर में उन्हें ही लोकतंत्र के मंदिरों में प्रवेश दिलाने की होड़ सी लगी है। संसद व विधानसभाओं में धड़ाधड़ प्रवेश पाते अपराधियों का संख्या बल देखें तो यह ‘प्रजातंत्र’ या ‘गणतंत्र’ कम, ‘अपराधतंत्र’ अधिक लगने लगा है।
सुप्रीम कोर्ट जब भी संसद और विधानसभाओं में अपराधिक तत्वों के प्रवेश को रोकने की दिशा में कुछ सार्थक पहल करने की कोशिश करता है, तमाम राजनीतिक दल उसे संसद के अधिकार क्षेत्र में न्यायिक दखलंदाजी करार देते हुए हो-हल्ला मचाने लगते हैं और ‘उल्टा चोर कोतवाल को डांटे’ कहावत को चरितार्थ करते हुए सुप्रीम कोर्ट को ही नसीहतें देने लगते हैं।
एक समय था, जब संसद में राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सकारात्मक बहस होती थी लेकिन अब हर संसद सत्र हंगामे और शोरशराबे की ही भेंट चढ़ जाता है। बहुत सारे सदस्य सदन की गतिविधियों में हिस्सा ही नहीं लेते और सर्वसम्मति के अभाव में देशहित से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण मसले लंबे-लंबे समय तक लटके रहते हैं। ऐसा लगता है मानो सभी दलों के सदस्यों के लिए इन सत्रों का अर्थ ही यह रह गया है कि सदन में ज्यादा से ज्यादा हंगामा करो, टी. वी. चैनलों पर अपना मुखड़ा दिखाओ, हंगामे करके सदन की बैठकें दिनभर के लिए स्थगित कराओ और ऐश करो।
इस संबंध में यह कहना असंगत नहीं होगा कि जिस तरह किसी राष्ट्रीय नेता की मृत्यु पर स्कूल में छुट्टी घोषित होने पर छात्र खुश होते हैं, ठीक वैसे ही हमारे माननीय सांसद हंगामे के बाद सदन की बैठक स्थगित होने पर खुश होते हैं लेकिन बात-बात पर बखेड़ा खड़ा कर सदन का कामकाज ठप्प करने वाले इन्हीं जनप्रतिनिधियों के जब वेतन-भत्ते तथा ऐशोआराम की सुविधाएं बढ़ाने की बात आती है तो पलक झपकते ही सर्वसम्मति बन जाती है और पूरा सदन एकजुट हो जाता है। 
हमारे ‘माननीय’ जन प्रतिनिधियों द्वारा ‘गणतंत्र’ की जो वीभत्स तस्वीर आज पेश की जा रही है, क्या हम उस पर गर्व कर सकते हैं? गणतंत्र दिवस जैसे महत्वपूर्ण अवसर को इतनी धूमधाम से मनाने का लाभ तभी है, जब हमारे सपफेदपोश नेता और नौकरशाह भी संविधान की गरिमा को समझें और उसके अनुरूप अपने आचरण में भी पारदर्शिता लाएं। (एम सी एन)
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं ‘मीडिया केयर नेटवर्क’ के समूह सम्पादक हैं)

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