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Sunday, October 31, 2010

व्यंग्य: लड्डू महिमा


दैनिक पंजाब केसरी में 27.10.2010 को प्रकाशित

(मीडिया केयर नेटवर्क द्वारा प्रसारित)

लघुकथा : रहम


दैनिक पंजाब केसरी में 27.10.2010 को प्रकाशित

(मीडिया केयर नेटवर्क द्वारा प्रसारित)

अब झूठ पकड़ेगा थर्मल कैमरा

दैनिक हमारा महानगर (मुम्बई) में 31.10.2010 को प्रकाशित

10 लाख वर्षों तक कीड़े-मकोड़े खाता इंसान

दैनिक सन्मार्ग (कोलकाता) में 31.10.2010 को प्रकाशित

Saturday, October 30, 2010

‘अहोई अष्टमी व्रत’ पर विशेष

इनकी … उनकी … सबकी दीवाली


दीवाली आ रही है, चारों ओर तैयारियां जोरों पर चल रही हैं, जैसे कॉमनवैल्थ गेम्स के आयोजन की तैयारियां। घर-आंगन, इमारतें सब नए-नए रंगों में रंगे जा रहे हैं। शारदीय माहौल में धूप भी कुनकुनी हो चली है। दीवाली आने पर सबकी खुशी अलग ही नजर आती है। इस बार हमने सोचा कि इस महंगाई के माहौल में दीवाली के प्रति लोगों का नजरिया जान लिया जाए। कारण कि अन्य त्योहार तो फीके हो चले हैं।

सबसे पहले हम रमुआ मजदूर से मिले। वह कहता है, ”इस बार तो बीते सालों की अपेक्षा जानदार दीवाली होगी अपनी!”

”ऐसा कौन-सा गड़ा धन मिल गया तुझे, जो तेरा दीवाला निकालने वाली दीवाली इस बार अपार खुशी प्रदान कर रही है, ‘लक्ष्मी जी सदा सहाय करें’ की तर्ज पर?”

हमने कहा तो वह हमारी बातों पर खिलखिलाकर हंस पड़ा, ”भैया, ग्राम पंचायत में अपना भी रोजगार गारंटी योजना के तहत जॉब कार्ड बन गया है पर अपन वहां की मजदूरी में नहीं जाते।”

”काहे?”

”अपन सेठ के यहां अनाज तोलकर ज्यादा कमा लेते हैं।”

”फिर मुझे जॉब कार्ड की बात क्यों बता रहा था?”

”भैया, हमने एक चालाकी अपना ली है। वह यह कि हमारे कार्ड में सरपंच सचिव से सांठगांठ के तहत हमारी मजदूरी भर देते हैं। बदले में वह 60 परसेंट रकम अपने पास रख लेते हैं। अब आप ही बताओ, हमारे तो दोनों हाथों में लड्डू हैं न! फिर अबकी दीवाली काहे न दीवाली जैसी लगेगी?”

इधर सेठ रायचंद जी की राय है, ”देखो भाई, अपन ठहरे व्यापारी। लाभ का धंधा तो करेंगे ही। इसलिए इस बार हमने गरीब आदिवासी किसानों को पूरी बरसात नमक व मार्किटिंग सोसायटी से जुगाड़ किया हुआ नंबर दो का चावल पूरा किया। अब उनकी फसल आई तो कर्ज चुकाने के एवज में उनकी कीमती फसल काटकर अपने गोदाम में ले आए। अब सोच रहे हैं कि इस फसल को बेचकर अपनी कॉलेज जाती बिटिया के लिए धनतेरस के दिन कार खरीद दें।”

क्षेत्र के अधिकांश किसान खुश हैं। उन्होंने इस बार अच्छी बरसात होने से अच्छी फसल काटी है। साथ ही एक-दो बार आई बाढ़ से हुई न के बराबर क्षति का पटवारी से सांठगांठ कर सरकार से मुआवजा भी घोषित करवा लिया है। पटवारी जी भी खुश हैं। अपनी अनाज की कोठी की तरह किसानों ने इस दीवाली में उनकी जेब की कोठी भी भर दी है।

ठेकेदार रामदीन कहते हैं, ”भैया दीवाली आई तो ‘लक्ष्मी कृपा’ बनकर आई। हमारा मतलब आखिरी बरसात पुलिया में लगाए ‘चूना-रेत’ को बहाकर ले गई। इस तरह अपनी अमावसी करतूत दीवाली जैसी जगमग ईमानदारी में बदल गई। अफसर तो पहले से ही पटे-पटाये हैं। नोटों की गड्डी देखकर वे हमारे पक्ष में बीन बजाने लगते हैं।”

बाढ़ पीडि़त जनता भले ही दर्द व भूख से कराह रही है मगर नेता, अफसर, कर्मचारी बाढ़ राहत पैकेज से कमीशन काटकर दीवाली की तैयारी में जुटे हैं। वे यह गुणा-भाग लगा रहे हैं कि ‘ब्लैक मनी’ को इस दीवाली में ‘व्हाइट मनी’ कैसे बनाया जाए।

इधर हमारे कुछ लेखक मित्र पिछले 10 वर्षों में ‘सखेद वापिस’ दीपावली से जुड़ी रचनाओं में से चुनिंदा रचना खंगालने में लगे हैं। कुछ तो सारी रचनाओंं का मुख्य अंश जोड़कर एक-दो रचना बनाने में जुटे हैं ताकि अब की बार सम्पादक जी की इनायत उन पर हो जाए और ‘दीप अंक’ में उनकी रचना ‘दीप’ की भांति टिमटिमाये।

हमने अरमान जी से पूछा, ”आप ‘दीप अंक’ पर क्या लिख रहे हैं?”

”क्या लिखेंगे? पांच साल पहले लौटकर आई रचनाओं को पुन: भेज रहे हैं।” उन्होंंने कहा।

”पुराना मैटर क्यों?”

”तिजोरी में बंद सोने की तरह बेकार पड़ी रचनाएं कब काम आएंगी?”

”अगर पुन: वापस हो गई तो?”

”अब लौटकर नहीं आएंगी।” उन्होंने पूरे आत्मविश्वास से उत्तर दिया।

”क्यों? वापसी के लिए लिफाफा नहीं भेज रहे क्या?” हमने प्रश्न का आतिशबाजी रॉकेट उनकी ओर छोड़ा तो वे थोड़ा फुलझड़ी की तरह चिढ़कर बोले, ”ऐसा नहीं यार, अब अपन नामी लेखक हो गए हैं। जो भी लिखते हैं, सब छपता है।”

”लेकिन महाशय! ‘स्तर’ भी तो कोई चीज है। बिना उच्च स्तर वाली रचनाएं भला छप सकती हैं?”

वे हमारे जवाब से तुनक सा गए, ”देखिये, अपना काम है रचनाएं भेजना, छापना न छापना उनकी मर्जी।”

हमने उनकी खीझ देखकर बातों का रुख बदल दिया।

अबकी बार हम भी अपनी पत्नी के मुख से दीवाली पर ‘टीचर बनाम फटीचर’ जैसा अपमानजनक शब्द सुनने से वंचित रहेंगे। इसका कारण यह है कि हम ‘गऊ’ कहलाने वाले मास्टरों ने छात्र-छात्राओं में बांटी जाने वाली साइकिलें, ड्रैस, मिड-डे मील व स्टेशनरी खरीदी से ‘कमीशन’ निकालना सीख लिया है। अभी तक हमारी जिंदगी ईमानदारी की उबड़-खाबड़ पगडंडी पर ही दौड़ रही थी मगर अब भ्रष्ट कारनामों की काली पक्की सड़कों पर दौडऩा शुरू कर चुकी है। इस बात का अंदाजा आप दीवाली पर किए जाने वाले खर्च से लगा सकते हैं।

अंत में, दीवाली की शुभकामनायें देते हुए हम तो यही कहेंगे कि अगर आप भी पूरे जश्न से दीवाली मनाना चाहते हैं तो हमारे अपनाये तौर-तरीके पर आ जाइए, फिर देखिये, हर काली रात भी लगेगी दीवाली।
-- सुनील कुमार ‘सजल’

Friday, October 29, 2010

असली सुंदरता सादगी में: सेलिना जेतली

पंजाब केसरी (जालंधर, लुधियाना, अम्बाला, जम्मू इत्यादि) में 28.10.2010 को प्रकाशित

अब आसानी से पाया जा सकेगा मोटापे से छुटकारा

पंजाब केसरी (जालंधर, लुधियाना, अम्बाला, जम्मू इत्यादि) में 28.10.2010 को प्रकाशित

दीपिका पादुकोण के संग हसीनाओं का मेला

Wednesday, October 27, 2010

एक जैसे ही होते हैं अधिकांश मर्द: सेलिना जेतली

‘हमारा महानगर’ में 24.10.2010 को प्रकाशित

सवारी: वो भी अजगर की!

क्यों किया जाता है ‘अहोई अष्टमी’ व्रत?

पंजाब केसरी (जालंधर, लुधियाना, जम्मू, अम्बाला इत्यादि) में 25.10.2010 को प्रकाशित

मिली एनाकोंडा की एक नई प्रजाति

कड़वे सच का एक विश्वसनीय दस्तावेज


चर्चित पुस्तक

कड़वे सच का एक विश्वसनीय दस्तावेज

‘तीखे तेवर’

लेखक ने जो कुछ कहा है, वह पूरी वैचारिक ऊर्जा के साथ कहा है, जिसके कारण चिंतन की निष्पक्षता एवं स्वतंत्रता का ग्रंथ के हर पृष्ठ पर आस्वादन किया जा सकता है।

चर्चित पुस्तक: तीखे तेवर

लेखक: योगेश कुमार गोयल

पृष्ठ संख्या: 160 (सजिल्द)

प्रकाशन वर्ष: नवम्बर, 2009

मूल्य: 150 रुपये

प्रकाशक: मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स, बादली, जिला झज्जर (हरियाणा)-124105.

भूमिका लेखन: डा. राधेश्याम शुक्ल, सम्पादक दैनिक स्वतंत्र वार्ता, हैदराबाद

देश के प्रतिष्ठित पत्रकार एवं लेखक श्री योगेश कुमार गोयल, जो एक प्रख्यात समाचार-वृत्त एवं लेख सेवा के समूह सम्पादक भी हैं, सामाजिक तथा अनेक सामयिक विषयों पर विश्लेषणात्मक टिप्पणियों एवं सृजनात्मक लेखन के लिए पाठकों के हृदय में एक विशिष्ट स्थान बना चुके हैं। ‘तीखे तेवर’ में संकलित किए गए उनके 25 आलेखों का फलक विस्तृत है व उनमें एक स्वस्थ तथा संवेदनशील समाज की संरचना के प्रति एक अनूठी जागरूकता प्रदर्शित की गई है, जो लेखों के साभिप्राय शीर्षक स्वयं भली-भांति व्याख्यायित करते हैं। उनकी अभिव्यक्ति की एक विशिष्टता यह है कि चाहे जातीय या धार्मिक हिंसा का प्रश्न हो या कोई दूसरा सामाजिक सरोकार, वे अपने शब्दों और विचारों को संवेदनशीलता के साथ-साथ एक सहज तटस्थता के साथ पाठकों के समक्ष रखते हैं।

राष्ट्रीय अखण्डता और मीडिया की भूमिका से लेकर चाहे अंधविश्वासों या मादक पदार्थों का प्रश्न हो अथवा जल के लिए अगले सम्भावित युद्ध पर विमर्श हो, श्री गोयल जिस सदाशयता और व्यापक दृष्टि से हल की तलाश करते हैं, वह बहुधा विस्मयजनक प्रतीत होता है। समाज में व्याप्त अनेक विसंगतियां एवं अंतर्विरोध श्री गोयल के तीखे कटाक्षों से नहीं बच सके हैं। अपनी व्यापक दृष्टि के साथ जहां एक ओर वे अपनी बेबाक टिप्पणियों में विचारधारा की कट्टरता को चुनौती देने से नहीं चूकते हैं, वहीं अनेक ज्वलंत मुद्दों पर उनका प्रखर चिंतन पाठकों को कुछ नया सोचने को विवश करता है।

ऐसा लगता है कि लेखक के अपने चिंतन की विचारोत्तेजक प्राथमिकताओं में जिन विषयों को गहराई से छुआ गया है, उसमें पर्यावरण, देश की जैव सम्पदा का संरक्षण, बिगड़ता वातावरण, प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ती संख्या, ग्लोबल वार्मिंग आदि प्रमुख हैं। इनका आज के सामाजिक परिवेश में अपना महत्व है। निर्विवाद रूप से श्री गोयल के यशस्वी लेखन में पारदर्शिता और सामाजिक चेतना के स्वर इस ग्रंथ के हर पृष्ठ पर अंकित दिखते हैं।

यह कहने का लोभ संवरण नहीं किया जा सकता है कि यह कृति अध्येताओं और शोध से जुड़े स्नातकोत्तर छात्रों के लिए भी उतनी ही उपयोगी साबित होगी, जितना सामान्य प्रबुद्ध पाठक को लाभ दे सकती है। लेखक ने जो कुछ कहा है, वह पूरी वैचारिक ऊर्जा के साथ कहा है, जिसके कारण चिंतन की निष्पक्षता एवं स्वतंत्रता का ग्रंथ के हर पृष्ठ पर आस्वादन किया जा सकता है। यह सिर्फ दोहराने की बात है कि सुधारवादी चिंतन और पत्रकारिता, व्यावसायिकता से दूर, श्री गोयल की दिनचर्या के दो असली मोर्चे प्रतीत होते हैं। डा. राधेश्याम शुक्ल ने अपनी विद्वतापूर्ण भूमिका में कदाचित इसी आग्रह-मुक्त विश्लेषण के संतुलन को संघर्षशील पत्रकारिता की संज्ञा दी है, जिसके श्री गोयल सक्षम एवं समर्थ पात्र माने गए हैं। क्योंकि इस ग्रंथ में लेखक की पीड़ा, क्षोभ और सामाजिक विकृतियों के निराकरण की तीव्र आकांक्षा व्याप्त है, पाठकों के मन की बहुत सी उलझनों के सही और स्पष्ट उत्तर मिल सकते हैं, ऐसी आशा है। यद्यपि आज के परिदृश्य में श्रव्य, दृश्य और मुद्रित मीडिया किस तरह बाजारवाद का शिकार हो चुका है पर फिर भी लोकतांत्रिक परम्पराओं की रक्षा का उत्तरदायित्व सजग, सचेत और निर्भीक पत्रकारिता के लिए प्रतिबद्ध व्यक्तियों पर ही है।

गत वर्ष सन् 2009 में ही श्री गोयल की एक पुस्तक ‘जीव-जंतुओं की अनोखी दुनिया’ शीर्षक से प्रकाशित हुई थी, जिसमें जैविक विविधता के नए खतरों व प्राणियों तथा वनस्पतियों की अनेक प्रजातियों के लुप्त होने तथा पर्यावरण की क्षति के अनेक आयामों पर प्रकाश डाला गया था। हमारे देश में तो जीव-जंतुओं को सम्पदा के रूप में ही नहीं बल्कि सहजीवी प्राणियों के रूप में प्राचीन काल से देखा जाता है। लेखक की उपर्युक्त पुस्तक और समीक्षित ग्रंथ, दोनों में ही होने वाले बदलावों के विरूद्ध चेतावनी भी दी गई हैं।

इसी कड़ी में श्री गोयल की 1993 में प्रकाशित पुस्तक ‘मौत को खुला निमंत्रण’ नशे के दुष्प्रभावों पर थी, जिसे पांच विभिन्न संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत किया गया था। पत्रकारिता व साहित्य के क्षेत्र में श्री गोयल को अनेक संगठनों द्वारा पुरस्कृत व सम्मानित किया जा चुका है। वे मीडिया केयर ग्रुप, बादली, झज्जर (हरियाणा) में प्रधान सम्पादक हैं।

कुल मिलाकर ‘तीखे तेवर’ एक बहुमूल्य कृति है, जो हर हिन्दी भाषी के लिए पठनीय एवं संग्रहणीय भी है, मात्र पुस्तकालयों की शोभा बढ़ाने के लिए नहीं!

- हरिकृष्ण निगम
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं समीक्षक हैं)

Monday, October 18, 2010

कड़वे सच का एक विश्वसनीय दस्तावेज

दैनिक रांची एक्सप्रेस में 9 अक्तूबर 2010 को प्रकाशित

मैं चाहे इधर करूं, मैं चाहे उधर करूं, मेरी मर्जी ...

Photo by : Anand Verma

क्या पत्रकार का असहाय होना जुर्म है?


आज ना जाने क्यों अपने पत्रकार और ईमानदार होने पर पहली बार शर्म आ रही है। आज दिल चाह रहा है कि अपने सीनियर्स जिन्होंने हमको ईमानदार रहने के लिए शिक्षा दी उन पर मुकदमा कर दूं। साथ ही ये भी दिल चाह रहा है कि नई जनरेशन को बोल दूं कि ख़बर हो या ना हो, मगर ख़ुद को मजबूत करो।

कम से कम इतना मज़बूत तो कर ही लो कि अगर तु्म्हारी बेगुनाह माता जी को ही पुलिस किसी निजी द्वेश की वजह से ब्लैकमेल करते हुए थाने में बिठा ले तो मजबूर ना होना। थानेदार से लेकर सीओ, एसएसपी, डीआईजी, आईजी, डीजी समेत सूबे की मुखिया तक को उसकी औक़ात के हिसाब से ख़रीदते चले जाना। मगर मां के एक आंसू को भी थाने में मत गिरने देना। ये मैं इसलिए नहीं कह रहा कि तुम्हारी बेबसी से तुम्हारा अपमान हो जाएगा। बल्कि अगर अपमान की वजह से किसी बदनसीब की बेगुनाह की मां की आंख का एक क़तरा भी थाने में गिर गया तो यक़ीन मानना उस एक कतरे के सैलाब में कोई भी व्यवस्था बह जाएगी।

आज मेरे एक दोस्त की, बल्कि मेरी ही माता जी के उत्तर प्रदेश पुलिस के हाथों होने वाले अपमान की ख़बर मिली। ना जाने क्यों ऐसा लगा कि किसी ने मेरे पूरे बदन से कपड़े ही नोंच लिए हों । उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ीपुर की इस घटना के बारे में मैं सिर्फ इतना ही कहूंगा कि भले ही हर पत्रकार का अपना एक दायरा हो। उसकी जान पहचान बहुत लम्बी हो। उसके एक फोन पर लोग छोड़े और पक़डे जाते हों। मगर जिसकी मैं बात कर रहा हूं उसको देश का कोई ऐसा पत्रकार नहीं जो ना जानता हो। कई बड़े अखबारों में रह कर आज वो एक ऐसी संस्था चला रहा है जिसने देश की पत्रकारिता को एक नए अध्याय से जोडा है। सबसे ख़ास बात ये कि आज अगर भारत के पत्रकारों का कोई एक मंच है, तो वो उसका जनक है।

मैं निसंकोच बात कर रहा हूं यशवंत की। यानि मैं भ़ड़ास4मीडिया के सर्वेसर्वा की बात कर रहा हूं। अक्सर कई पत्रकार साथियों के साथ हुए मामलों पर यशवंत की बेबाकी और उसकी जुर्रत ने ये साबित किया कि कोई आवाज़ तो है जो पत्रकारों की बात करती है। मगर अफसोस उत्तर प्रदेश में उसी यशवंत की माता और पूरे परिवार को बंधक बना लिया गया। पुलिस के हाथो बंधक बनाये जाने के पीछे तर्क ये था कि तुम्हारे परिवार के कुछ लोगों ने गम्भीर अपराध किया है। उनको ले आओ और परिजनों को ले जाओ। तकरीबन 12 घंटे तक एक बेटा जो रोजी रोटी की तलाश मे देश की राजधानी में आया था, सैंकड़ों मील दूर थाने में बैठे अपने परिवार और माता जी को छुड़ाने के लिए अधिकारियों से लेकर अपने पत्रकार साथियों से गुहार लगाता रहा। आखिर वही हुआ। यानि आरोपी जब तक पुलिस के हत्थे नहीं लगे ये बेचारे वहां पर अपमान का घूंट पीते रहे।

ख़ास बात ये है कि एक दलित और महिला के राज में किसी बेबस महिला का पुलिस अपमान किस बूते पर कर सकती है। कौन सा क़ानून है जिसकी दम पर किसी दूसरे व्यक्ति के अपराध के लिए किसी दूसरे को बंधक बना कर ब्लैकमेल किया जा सके। पुलिस का तर्क था कि ऊपर से दबाव था। उत्तर प्रदेश प्रशासन के इस कारनामे को देख कर अनायास ही ख़्याल आया कि अगर कोई ये पूछे कि उत्तर प्रदेश भी भारत का ही हिस्सा है। तो आप या तो उसको पागल कहोगे या फिर सिर फिरा। लेकिन मुझे आपके इस पागल और सिरफिरे के सवाल में दम नज़र आ रहा है। उत्तर प्रदेश जहां के बारे में सिर्फ ख़बरे पढ़ कर ही नहीं बल्कि ख़ुद ख़बरें करके कई बार देखा है कि आजकल दिल्ली से चंद किलोमीटर दूर यहां की सीमाओं में घुसते ही ना जाने क्यों लगने लगता है कि कुछ बदला बदला सा है। कानून के रखवालों के नाम पर मानो खुद लुटेरों ने कमान सम्भाल ली हो। टूटी सड़के बता रही हैं कि ठेकेदार से लेकर अफसरों और बहन जी तक ठीक ठाक बंटवारा पहुचा दिया गया है। भले ही दलित भूख से मर जाएं मगर मूर्ति का साइज़ छोटा नहीं हो सकता।

इतना ही नहीं सूचना के अधिकार अधिनियम में भी कांट छांट की अगर किसी ने हिम्मत की है तो सिर्फ उत्तर प्रदेश की मौजूदा सरकार ने। इतना ही नहीं मेरे पास मौजूद दर्जनों फाइलों में कैद दस्तावेज ये साबित करने के लिए काफी हैं कि यहां क़ानून तक का मज़ाक़ उड़ाना प्रशासन के बाएं हाथ का खेल है। यानि कुल मिला कर अगर कहा जाए कि जो क़ानून देस भर में या किसी भी अन्य प्रदेश मे पूरी तरह से प्रभावी है तो वो उत्तर प्रदेश में बेबस सा नज़र आता है। ऐसे में किसी कमज़ोर पत्रकार की माता जी और परिवार को पुलिस 12 घंटे तक मानसिक प्रताड़ना देती रहे तो कोई ताज्जुब नहीं।

लेकिन धन्य है वो माता जिसने अपने पत्रकार बेटे को एक ऐसी स्टोरी मुहय्या करा दी जिससे उत्तर प्रदेश के पूरे तंत्र को ही नहीं बल्कि उन तमाम लोगों को भी बेनक़ाब कर दिया है जो बात तो करते हैं जनता की मगर महज़ वोटों की हद तक। उत्तर प्रदेश सरकार की आलोचना करने वाले कांग्रेसियों को बुरा ना लगे तो एक बात कहूं। वो महज़ राजनीति में बीच वाले की हैसियत से सिर्फ हथेलियां बजा कर काम चलाना चाहते हैं। काग्रेस के रंग रूप को देखकर किन्नर और भी सम्मानित नज़र आने लगते हैं। जनता को बयानों से बहकाने वाली काग्रेस अगर सूबे की सत्ता में नहीं है तो क्या वो जनता को बेबस तड़पते देखने को ही राजनीति मानती है। या फिर राजनीतिक अवसर वाद के तहत किसी समझौते पर अमल किया जा रहा है।

उधर लोहिया के क़ाग़ज़ी शेर भी बहन जी के नाम से दुम दबा कर बैठे हैं। जनता की कमाई लुट रही है। और नेता जी को परिवार वाद से ही फुरसत नहीं। और केंद्र में विपक्ष के नाम पर राजनीतिक बुज़दिली का प्रतीक बन चुकी बीजेपी भले ही भगवानों के नाम पर बगले बजाती फिरे मगर आम जनता के हितों को लेकर शायद उसको किसी समझौता का आज भी इंतज़ार है। एक असहाय पत्रकार की माता जी का उत्तर प्रदेश पुलिस के हाथों अपमान भले ही टीआरपी के सौदागरों के लिए कोई बड़ी ख़बर ना हो मगर ये सवाल है उन लोगों से जो बाते तो करते हैं बड़ी बड़ी मगर उनकी सोच है बहुत ही छोटी। अगर आज इस सवाल पर बात ना की गई तो फिर मत कहना कि कोई पत्रकार किसी की लाश को महज़ इस डर से बेच रहा है कि पुलिस को देने के लिए पैसा ना हुए तो उसके साथ भी......!!!!!!!!!!!!!

--- आज़ाद ख़ालिद

(लेखक आज़ाद ख़ालिद चैनल 1 में बतौर न्यूज़ हैड जुड़े रहे और इस चैनल को लांच कराया. डीडी, आंखों देखी से होते हुए तकरीबन 6 साल तक सहारा टीवी में रहे. एक साप्ताहिक क्राइम शो तफ्तीश को बतौर एंकर और प्रोड्यूसर प्रस्तुत किया. इंडिया टीवी, एस1, आज़ाद न्यूज़ के बाद वीओआई बतौर एसआईटी हेड काम किया. इन दिनों खुद का एक साप्ताहिक हिंदी अख़बार 'दि मैन इ अपोज़िशन' और न्यूज वेबसाइट oppositionnews.com चला रहे हैं. )

गूंगी-बहरी-अंधी मायावती सरकार के लिए

 

मेरी मां यूपी के गाजीपुर जिले के नंदगंज थाने में पूरी रात बंधक बनाकर रखी गईं. साथ में विकलांग चाची को भी रखा गया. चाची की बहू को भी. इन लोगों ने थाने के अंदर मीडियाकर्मियों को अपना बयान दिया. इसमें सब कुछ बताया. इसमें साफ-साफ बताया कि पुलिस ने घर में किसी पुरुष को न पाकर इन लोगों को जबरन गाड़ी में बिठा लिया. कई घंटे इधर-उधर घुमाने के बाद थाने में लाकर डाल दिया. ये यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि किस तरह उत्तर प्रदेश की पुलिस बेलगाम हो चुकी है और किसी परिवार के आत्मसम्मान और इज्जत कौ रौंदने पर आमादा है. क्या इन प्रमाणों के बाद भी यूपी सरकार को कोई सुबूत चाहिए? लेकिन मायावती सत्ता के मद में चूर हैं. मायावती सरकार गूंगी-बहरी और अंधी हो चुकी है. उनके अफसर बुद्धि और विवेक हीन प्यादों की तरह कुर्सियां पर आसीन हैं और जी सर जी सर करते हुए लोकतंत्र की आत्मा के साथ बलात्कार कर रहे हैं.
मेरी इस निजी लड़ाई, जिसे मैं खुद निजी नहीं मानता क्योंकि कल तक यह सब दूसरों के घरों में हुआ करता था, आज मेरे घर में हुआ है और परसों आपके भी घर में हो सकता है, में जो साथी अपना समर्थन और सहयोग दे रहे हैं, उनका मैं आभार व्यक्त करूंगा तो शायद यह औपचारिकता होगी और उनके सहयोग की तौहीन होगी. मेरी इच्छा इस मसले को आगे बढ़ाने की है ताकि दोषी पुलिसकर्मियों, पुलिस अधिकारियों और सत्ताधीशों को सजा मिल सके, सबक मिल सके. मुझे कुछ ऐसे लोग चाहिए जो इस मुद्दे को खुद के स्तर से उन सभी जगहों तक पहुंचा सकें जहां जहां न्याय देने-दिलाने के दावे किये जाते हैं. मैं वेब मीडिया और प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रानिक मीडिया के सभी साथियों से अनुरोध कर रहा हूं कि वे इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाएं. खासकर लखनऊ व दिल्ली की मीडिया के साथी इस मुद्दे को एक अभियान के तौर पर लें, इसे प्रचारित-प्रसारित करें ताकि इस प्रकरण की आवाज हर कहीं पहुंचे और न्याय की इस मुहिम को गति मिल सके. अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता, इसी कारण आप लोगों के साथ की दरकार है.

-- यशवंत
एडिटर, भड़ास4मीडिया

Saturday, October 16, 2010

बड़ी चालाक होती है कोयल


16 अक्तूबर 2010 को दैनिक पंजाब केसरी (जालंधर/लुधियाना/अम्बाला/जम्मू) में

अनोखा फोटो सैशन!



एक फोटो सैशन के दौरान पहले चित्र में एक पार्क में घोड़े पर तथा दूसरे चित्र में पेड़ों के बीच अपनी कला का अद्भुत नजारा पेश करती सुंदरी बैलेरिनास

Friday, October 01, 2010

जीव-जंतुओं की अनोखी दुनिया


काला कोट और सफेद कमीज पहने अनोखा समुद्री पक्षी पेंग्विन

ठंडे इलाकों में रहने वाले समुद्री पक्षी पेंग्विन की यूं तो दुनिया भर में इस समय 17 प्रजातियां हैं पर सभी में एक समानता यह है कि ये सीधे खड़े होते हैं और चपटे पैरों से चलते हैं। छोटे-छोटे परों से ढ़का इनका बदन ऐसा लगता है जैसे इन्होंने पीछे काला कोट और आगे सफेद कमीज पहन रखी हो। हालांकि पेंग्विन्स के प्राचीन अवशेषों से यह जानकारी मिलती है कि प्राचीन समय में पेंग्विन की ऊंचाई खड़े होने पर 70-72 इंच तक होती थी मगर अब सबसे बड़े आकार वाले पेंग्विन्स की ऊंचाई अधिकतम 44-45 इंच तक ही मिलती है जबकि सबसे छोटे पेंग्विन्स की ऊंचाई 16 इंच के करीब होती है। सबसे बड़े पेंग्विन ‘एम्पेर्र पैंग्यून्स’ प्रजाति के हैं, जिनका वजन 27 से 42 किलो तक होता है जबकि सबसे छोटी प्रजाति ‘फेरी पैंग्यून्स’ है, जिनका वजन करीब एक किलो होता है। पेंग्विन्स भूमध्य रेखा के बर्फीले पानी में ही जीवन बिताते हैं। 75 फीसदी पेंग्विन्स समुद्र के किनारों पर ही अपना जीवन व्यतीत करते हैं। ये दक्षिण-पश्चिम अफ्रीका, न्यूजीलैंड, पेरू, दक्षिण आस्ट्रेलिया तथा दक्षिण ब्राजील में ही बहुतायत में देखने को मिलते हैं। ऐसा माना जाता है कि प्राचीन समय में पेंग्विन्स उड़ भी सकते थे लेकिन अब इनके दोनों पंख सिर्फ इनके तैरने में ही सहायक हैं, उड़ने में नहीं। वैसे पेंग्विन अच्छे तैराक होने के साथ-साथ अच्छे गोताखोर भी होते हैं। चूंकि पेंग्विन बर्फीले पानी में ही रहते हैं, इसलिए प्रकृति ने इनके शरीर पर फैट की मोटी चादर विकसित की है, जिससे ये बर्फीली ठंड का आसानी से मुकाबला कर सके लेकिन फैट की यही मोटी चादर अब इनकी दुश्मन बनने लगी है क्योंकि इसी फैट के लिए पेंग्विन्स का शिकार बड़ी तादाद में होने लगा है, जिससे इनके अस्तित्व पर ही संकट के बादल मंडराने का खतरा भी उत्पन्न हो गया है।

खेलप्रिय प्राणी है ‘ऑटर’

‘ऑटर’ है तो लकड़बग्घे और बिज्जू की प्रजाति का प्राणी किन्तु लकड़बग्घे, बिज्जू और ‘ऑटर’ में भिन्नता यह है कि जहां ये दोनों प्राणी जमीन पर रहते हैं, वहीं ऑटर ने खुद को जलीय वातावरण के अनुरूप ढ़ाल लिया है और अब जलीय वातावरण में ही रहता है। ऑटर कुछ और नहीं बल्कि जलबिलाव है, जो मेंढ़क, छोटे चूहों और जलीय पक्षियों का शिकार करता है। आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड तथा ध््राुवीय क्षेत्रों को छोड़कर ऑटर विश्व भर में हर जगह पाए जाते हैं। दुनिया भर में जलबिलाव की कुल 19 प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें से केवल एक ही विशेष रूप से जलीय प्राणी है, जिसे समुद्रीय ऊदबिलाव कहते हैं। भारत में मुलायम बालों वाले, सामान्य और पंजे रहित ऑटर पाए जाते हैं, जो सबसे छोटी प्रजाति के जलबिलाव होते हैं। इनका शरीर सिर्फ 20-22 इंच लंबा होता है। ऑटर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह एक खेलप्रिय प्राणी भी है, जिसे तरह-तरह के खेल खेलना बहुत अच्छा लगता है। ये अक्सर कीचड़ से बने किनारों को गिराते और बर्फ में सुरंगे बनाते हुए खेलते देखे जा सकते हैं।

खरगोश और हिरण का मिला-जुला रूप ‘अगौटी’

वेस्टइंडीज तथा दक्षिण व मध्य अमेरिका में पाया जाने वाला ‘अगौटी’ खरगोश और हिरण का मिला-जुला जीव लगता है, जिसके कान छोटे-छोटे होते हैं और लालिमा लिए हुए भूरी फर होती है। यह एक निशाचर और शर्मीला जीव है, जो मनुष्यों के रिहायशी इलाकों से दूर रहना पसंद करता है। अगौटी प्रायः छोटे समूहों में विचरते हैं और इनकी एक विशेष आदत यह होती है कि जब भी इन्हें आसानी से भोजन उपलब्ध होता है, ये अपने बिलों में भोजन इकट्ठा करते रहते हैं। पत्ते, जड़ें तथा फल इनका पसंदीदा भोजन है। अगौटी के अगले दांत काफी मजबूत होते हैं, जिनसे ये कठोर फलों की छालों को भी सरलता से तोड़ लेते हैं। इनकी टांगें पतली किन्तु लंबी होती हैं, जिनकी बदौलत ये बहुत तेज दौड़ सकते हैं। पिछले पैरों के पंजे बड़े तथा मजबूत होते हैं, जो उछलने में इनकी मदद करते हैें। खतरा भांपते ही अगौटी तेजी से भागकर छिप जाता है तथा खतरे की स्थिति में उसके पुट्ठों पर पीलापन झलकने लगता है, जिससे समूह के अन्य सदस्य भी सचेत हो जाते हैं। मादा अगौटी हर मौसम में 2-4 बच्चों को जन्म देती है।
 
प्रस्तुति: योगेश कुमार गोयल

गर्भ में ही ठीक हो सकेगी शिशु के फेफड़ों की विकृति?


गर्भस्थ शिशुओं में होने वाली एक अज्ञात विकृति की वजह से उनके फेफड़ों का विकास अवरूद्ध हो जाता है और उनके जीवित बचने की संभावना भी कम हो जाती है। गर्भस्थ शिशुओं की इस बीमारी को ‘कॉन्जेनिटल डायफ्राम हर्निया’ (सीडीएच) कहा जाता है। अब ऐसे शिशुओं को बचाने के लिए ल्यूवेन के अलावा लंदन तथा बार्सिलोना में भी गर्भ में ही एक ऐसा ऑपरेशन किया जाने लगा है, जिससे फेफड़ों का सही विकास सुनिश्चित हो सके। डॉक्टर इस ऑपरेशन के जरिये इस विकृति से पीड़ित करीब 60 फीसदी बच्चों को बचाने में सफल भी रहे हैं, जिनकी मौत सुनिश्चित मानी जा रही थी।

यह ऑपरेशन करने वाले डा. काइप्रोस निकोलैड्स का कहना है कि प्रतिवर्ष करीब 3000 गर्भस्थ बच्चों के फेफड़ों का विकास नहीं हो पाता और ऐसा क्यों होता है, इसका कारण अभी तक पता नहीं चल सका है। रूटीन स्क्रीनिंग के दौरान जिन शिशुओं में इसकी पहचान हो जाती है, उनमें से आधे ही जीवित बच पाते हैं। इस बीमारी में गर्भस्थ शिशु के डायफ्राम, जो कि पेट के क्षेत्र को सीने के क्षेत्र से अलग करता है, में एक छेद होता है। इस छेद के कारण पेट के क्षेत्र के अंग सीने के क्षेत्र की तरफ आने लगते हैं और फेफड़ों को दबा देते हैं, जिससे इनका विकास रूक जाता है।

इस बीमारी के इलाज के लिए गर्भावस्था के 26वें सप्ताह में एक की-होल ऑपरेशन करके शिशु के मुंह के जरिये एक गुब्बारा उसके फेफड़े में डाला जाता है ताकि विण्ड पाइप को अवरूद्ध किया जा सके। इस गुब्बारे को फेफड़े में फुलाकर वहीं छोड़ दिया जाता है, जिससे फेफड़े में होने वाला स्राव विण्ड पाइप के जरिये बाहर नहीं निकल पाता और इससे फेफड़ों को विकसित करने का पूरा अवसर मिलता है। बच्चे के जन्म के तुरंत बाद इस गुब्बारे को फोड़ दिया जाता है या इसे निकाल दिया जाता है और कुछ दिनों बाद एक छोटा सा ऑपरेशन करके डायफ्राम का छेद बंद कर दिया जाता है।

डा. निकोलैड्स के मुताबिक फेफड़े में होने वाले स्राव में विकास हारमोन होते हैं, जो मुंह और नाक के जरिये बाहर निकल जाते हैं, इसलिए हम लोगों ने इस स्राव को फेफड़े में ही रोकने का प्रयास करने का फैसला किया। डा. निकोलैड्स बताते हैं कि पहले 10 ऑपरेशनों में सफलता का प्रतिशत महज 30 था, जो बाद में बढ़कर 63.6 हो गया।
 
प्रस्तुति: योगेश कुमार गोयल

पाचन शक्ति बढ़ाने के कारगर उपाय


एक कहावत है ‘पहला सुख निरोगी काया’। स्वस्थ शरीर स्वस्थ दिमाग के निर्माण में सहायक होता है। स्वस्थ रहने की पहली शर्त है आपकी पाचन शक्ति का सुदृढ़ होना। भोजन के उचित पाचन के अभाव में शरीर अस्वस्थ हो जाता है, मस्तिष्क शिथिल हो जाता है और कार्यक्षमता को प्रभावित करता है। जिस प्रकार व्यायाम में अनुशासन की आवश्यकता होती है, ठीक उसी प्रकार भोजन में भी अनुशासन महत्वपूर्ण है। अधिक खाना, अनियमित खाना, देर रात तक जागना, ये सारी स्थितियां आपके पाचन तंत्र को प्रभावित करती हैं। अतः यह आवश्यक हो जाता है कि पाचन शक्ति को दुर्बल होने से बचाएं। पाचन तंत्र की दुर्बलता दूर करने के कुछ घरेलू उपाय यहां दिए जा रहे हैं, जिनके प्रयोग से निश्चय ही काफी लाभ होगा।

-- पके अनार के 10 ग्राम रस में भुना हुआ जीरा और गुड़ समभाग मिलाकर दिन में दो या तीन बार लें। पाचन शक्ति की दुर्बलता दूर होगी।

-- काली राई 2-4 ग्राम फांकी लेने से कब्ज से होने वाली बदहजमी मिट जाती है।

-- अनानास के पके फल के बारीक टुकड़ों में सेंधा नमक और काली मिर्च मिलाकर खाने से पाचन शक्ति बढ़ती है।

-- भोजन के बाद पेट झूल जाए, बेचैनी महसूस हो तो 20-50 ग्राम अनानास का रस पीएं।

-- पकाए हुए आंवले को घीयाकस करके स्वादानुसार काली मिर्च, सौंठ, सेंधा नमक, भुना जीरा और हींग मिलाकर बड़ी बनाकर छाया में सुखा लें। इसके सेवन से पाचन विकार दूर हो जाता है तथा भूख बढ़ती है। मन भी प्रसन्न रहता है।

-- अमरूद के कोमल पत्तों के 10 ग्राम रस में थोड़ी शक्कर मिलाकर प्रतिदिन केवल एक बार प्रातःकाल सेवन करने से बदहजमी दूर होकर पाचन शक्ति बढ़ती है।

-- खट्टे-मीठे अनार का रस एक ग्राम मुंह में लेकर धीरे-धीरे पीएं। इस प्रकार 8-10 बार करने से मुख का स्वाद ठीक होकर आंत्र दोष दूर होता है और ज्वर के कारण हुई अरूचि दूर होती है तथा पाचन शक्ति बढ़ जाती है।

-- हरड़ एवं गुड़ के 6 ग्राम चूर्ण को गर्म पानी से या हरड़ के चूर्ण में सेंधा नमक मिलाकर सेवन करने से पाचन शक्ति तेज होती है।

-- हरड़ का मुरब्बा खाने से पाचन शक्ति सबल होती है।

-- 1-2 ग्राम लौंग को जौकूट करके 100 ग्राम पानी में उबालें। 20-25 ग्राम शेष बचने पर छान लें और ठंडा होने पर पीएं। इससे पाचन संबंधी विकार दूर होते हैं। हैजे में भी यह लाभकारी है।

-- इलायची के बीजों के चूर्ण में बराबर मात्रा में मिश्री मिलाकर दिन में 2-3 बार 3 ग्राम की मात्रा में सेवन करने से गर्भवती स्त्री के पाचन विकार दूर हो जाते हैं तथा खुलकर भूख लगती है।

-- एक कप पानी में आधा नींबू निचोड़कर 5-6 काली मिर्च का चूर्ण मिलाकर सुबह-शाम भोजन के बाद पीने से पेट की वायु, उर्द्धवात, बदहजमी, विषमाग्नि जैसी शिकायतें दूर होकर पाचन शक्ति प्रबल होती है।

-- नींबू काटकर काला नमक लगाकर चाटने से बदहजमी और भोजन के प्रति अरूचि दूर होती है।
 
प्रस्तुति: मीडिया केयर नेटवर्क

छोटे बच्चों में एंटीबायोटिक्स की अधिकता बढ़ाती है दमे का खतरा


छोटे-छोटे बच्चों को भी उनकी छोटी-बड़ी हर बीमारी में एंटीबायोटिक्स दिया जाना एक आम बात हो गई है लेकिन बच्चों को कुछेक बीमारियों में उन्हें एंटीबायोटिक दवाओं की अधिक डोज भी देनी पड़ती है मगर एक शोध रिपोर्ट में बताया गया है कि छोटे बच्चों को अधिक मात्रा में एंटीबायोटिक्स देने से उनमें कम उम्र में ही दमा होने का खतरा बढ़ जाता है। एक हैल्थ मैग्जीन में प्रकाशित इस रिपोर्ट के मुताबिक बच्चों को काफी कम उम्र में ही अधिक मात्रा में एंटीबायोटिक दवाएं दिए जाने से बच्चे दमे के शिकार हो सकते हैं। ज्यादा छोटे बच्चों को प्रायः आहारनाल में संक्रमण होने पर अधिक मात्रा में एंटीबायोटिक दवाएं दी जाती हैं किन्तु शोध के मुताबिक इन दवाओं के असर से ऐसे बच्चों में भविष्य में दमा होने का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे बच्चों में बचपन में दमे का शिकार होने का खतरा 46 फीसदी तक बढ़ जाता है। सात साल की उम्र तक इन दवाओं के असर से बच्चों में दमा हो सकता है।

प्रस्तुति: योगेश कुमार गोयल

क्यों बढ़ रहा है हार्ट अटैक का खतरा?


विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट पर यकीन करें तो सन् 2020 तक भारत में हार्ट अटैक से मरने वालों की संख्या 70 लाख तक हो जाएगी। अमेरिका के ‘फिजिशियन्स कमिटी फॉर रिस्पॉन्सिबल मेडिसन’ (पीसीआरएम) के मुताबिक भारत में प्रतिवर्ष करीब 30 लाख लोग हार्ट अटैक के शिकार होते हैं, जिसके लिए वे स्वयं ही जिम्मेदार होते हैं।

एक अंतर्राष्ट्रीय सर्वेक्षण के मुताबिक विश्व के अन्य लोगों की तुलना में भारतीयों में हृदय रोग की दर काफी ज्यादा पाई जाती है। भारतीयों में हृदय रोग की संभावना अमेरिकियों, यूरोपियनों, चीनियों तथा जापानियों की तुलना में 2-3 गुना अधिक पाई जाती है। इस अध्ययन के मुताबिक भारतीयों में मांस-मछली, अण्डा, घी, दूध, आलू चिप्स, दही तथा अन्य वसायुक्त भोजन की अधिकता हार्ट अटैक की संभावनाओं को बढ़ाती है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक मांस, अंडे और डेयरी पदार्थों में पाया जाने वाला सैचुरेटेड फैट और भोज्य सामग्री में पाया जाने वाला कोलेस्ट्रॉल शरीर में स्ट्रोक्स, मधुमेह तथा अन्य कई प्रकार के कैंसर के खतरे के साथ-साथ हार्ट अटैक का खतरा भी बढ़ाते हैं। मैसाच्युएट्स में हुए एक अध्ययन के अनुसार दैनिक खुराक में प्रत्येक 100 मि.ग्रा. कोलेस्ट्रॉल या मांस अथवा मुर्गी की एक बार में ली जाने वाली औसत मात्रा किसी भी व्यक्ति के कोलेस्ट्रॉल के स्तर को सामान्य रूप से 5 प्वाइंट तक बढ़ा देती है।

विश्व प्रसिद्ध हृदय रोग विशेषज्ञ डा. डीन ऑर्निश के मुताबिक शाकाहरी बनने से हृदय चुस्त और फुर्तीला रहता है और कम वसा वाली शाकाहारी खुराक के साथ तनाव घटाने वाली तकनीकों को अपनाने से धमनियों को सख्त होने से रोका जा सकता है।
 
प्रस्तुति: योगेश कुमार गोयल

बच्चों को संस्कारहीन बनाते अभद्र नामों वाले पाउच


एक ओर जहां हम अपने बच्चों को महंगे इंग्लिश मीडियम स्कूलों में शिक्षा दिलाकर उन्हें सभ्य बनाना चाहते हैं और भविष्य में उन्हें ऊंचे-ऊंचे पदों पर आसीन देखना चाहते हैं, वहीं हमारे इन्हीं नौनिहालों के कोमल मन को न केवल हमारी टीवी संस्कृति दूषित कर रही है बल्कि सूबे के अनेक इलाकों में अभद्र नामों से बिक रहे मीठी गोलियों के एक-एक रुपये के छोटे पाउच भी उन्हें संस्कारहीन बनाने में अहम भूमिका निभाते हुए भारतीय संस्कृति का भी सरेआम मजाक उड़ा रहे हैं।

बच्चों के लिए मात्र एक रुपये कीमत में उपलब्ध कराए गए तरह-तरह के पाउचों को ऐसे ऊटपटांग नामों से बाजार में उतारा गया है, जिनके नाम आम भाषा में गाली के समान लगते हैं। ऐसे ही अभद्र व असभ्य नामों वाले पाउच राजस्थान के विभिन्न इलाकों में दिल्ली से बहुतायत में सप्लाई हो रहे हैं।

ऐसा ही एक पाउच, जिस पर नाम अंकित था ‘ओए भूतनी के’ जब हमारी नजरों के सामने आया तो हम चौंके बिना नहीं रह सके। यह तो सिर्फ एक बानगी थी, ऐसे ही न जाने कितने ही असभ्य नामों वाले पाउचों से बाजार भरा पड़ा है, जो बालमन को दूषित करते हुए हमारे संस्कारों से भी खिलवाड़ कर रहे हैं। कल्पना करें, अगर कोई किसी अन्य शख्स को इसी नाम से पुकारे तो शायद कोई इसे सहन नहीं करेगा क्योंकि आमतौर पर ऐसे शब्दों को गाली के समान समझा जाता है लेकिन हद तो यह है कि छोटे-छोटे बच्चे भी अब दुकानदार से ऐसे ही नाम बोलकर पाउच मांगते हैं और दुकानदार चंद रुपये कमाने के लालच में इस भाषा की ओर ध्यान न देकर (गालीनुमा शब्दों को नजरअंदाज करते हुए) उन्हें एक रुपये के बदले चुपचाप यह पाउच थमा देते हैं।

हालांकि कुछ दुकानदारों का कहना है कि जब छोटे-छोटे बच्चे उनसे अभद्र और गालीनुमा शब्दों वाले ये पाउच यही शब्द बोलकर मांगते हैं तो उन्हें खुद को शर्म तो जरूर महसूस होती है किन्तु ऐसे पाउच बेचना उनकी मजबूरी है क्योंकि बच्चे ऐसे पाउचों के साथ-साथ उनकी दुकान से कुछ न कुछ अन्य सामान भी खरीदते हैं और अगर वो ये पाउच नहीं बेचते तो बच्चे दूसरी दुकानों से यही पाउच खरीद लेते हैं और वहीं से अन्य सामान भी खरीदते हैं, जिससे उनकी दुकानदारी प्रभावित होती है। एक पैकेट में इस तरह के करीब 40 पाउच होते हैं और दुकानदार को पूरे पैकेट पर अधिकतम 10 रुपये की ही बचत होती है लेकिन एक-दूसरे की देखा-देखी इस तरह के पाउच बेचना उनकी मजबूरी बन गई है।

सवाल यह है कि बच्चे, जिन्हें इन पाउचों पर अंकित अभद्र और असम्मानजनक शब्दों के अर्थ का ज्ञान तक नहीं होता, जब आपस में एक-दूसरे को ही इन पाउचों पर लिखे शब्दों का उच्चारण करके बुलाते हैं तो इसका हमारी गौरवशाली संस्कृति के साथ-साथ बच्चों की मानसिकता पर भी किस तरह का प्रभाव पड़ता है, यह विस्तार से बताने की आवश्यकता नहीं है। छोटे बच्चे, जिन्हें संस्कारों के नाम पर अभी बहुत कुछ सीखना बाकी है, इस तरह के पाउच खरीदकर जब दुकानदार या अपने साथियों अथवा अभिभावकों को ही इन नामों से पुकारने लगते हैं तो उनके भविष्य के संस्कार कैसे होंगे, इसका अनुमान लगाना भी कठिन नहीं है। इसलिए जरूरत इस बात की है कि अभिभावक तो संस्कृति को बिगाड़ने और उनके बच्चों की मानसिकता को दूषित करने के इस कुत्सित षड्यंत्र के प्रति जागरूक हों ही, प्रशासन भी इस दिशा में समय रहते चेते और ऐसे निर्माताओं पर सख्ती से अंकुश लगाए।

समय बहुमूल्य है, अतः एक-एक पल का सदुपयोग सार्थक कार्यों में करें.