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Monday, August 30, 2010

6 टांगें होने पर भी चल नहीं सकते ड्रैगनफ्लाई

जीव-जन्तुओं की अनोखी दुनिया

- योगेश कुमार गोयल

‘ड्रैगनफ्लाई’, जिन्हें ‘चिऊरा’ तथा ‘व्याध पतंगा’ के नाम से भी जाना जाता है, वास्तव में इनका अस्तित्व धरती पर 30 करोड़ साल से भी ज्यादा पुराना माना जाता है और ये विश्व में लगभग हर जगह पाए जाते हैं। चिऊरा हवा में आसानी से उड़ तो सकते हैं मगर अपनी 6 टांगें होने के बावजूद जमीन पर चल नहीं सकते। मजे की बात यह कि वृक्षों के तनों पर तो चिऊरा चल लेते हैं और इन पर आसानी से बैठ भी जाते हैं मगर जमीन पर नहीं चल सकते। दरअसल इनकी टांगें आगे की ओर मुड़ी होती हैं और उनकी टांगों तथा छाती की बनावट के कारण ही ऐसा होता है। चिऊरा मनुष्यों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाते। ये कीटों तथा छोटी मछलियों का भोजन करते हैं। चिऊरा की यह विशेषता होती है कि ये उड़ते हुए ही कीटों को दबोच लेते हैं। दरअसल इनकी टांगों की बनावट एक टोकरी जैसी होती है, जिसमें उड़ते हुए कीट आसानी से फंस जाते हैं और फिर चिऊरा उन कीटों को अपने मुंह की ओर लाकर निगल जाते हैं। वायुयानों का डिजाइन बनाने वाले वैज्ञानिक तो चिऊरा की शारीरिक संरचना का खासतौर से अध्ययन कर रहे हैं क्योंकि चिऊरा जिस तरह से हवा में उड़ता है, सिर के बल गिरता है और फिर वापस उसी अवस्था में लौटता है तथा डोलता है, वैसा करना किसी भी अन्य जीव-जंतु या मशीन के लिए अभी तक तो संभव नहीं दिखाई देता। चिऊरा की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह अपनी उड़ान की दिशा एकाएक बदल सकता है, सामने से आती किसी भी वस्तु से दुबककर बच सकता है और एक सैकेंड के भी सौवें हिस्से में उड़ान भर सकता है अथवा उड़ान समाप्त कर सकता है।

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Saturday, August 21, 2010

गर्भवती महिलाओं के लिए उचित नहीं कॉफी का सेवन


कॉफी पीने के फायदे और नुकसान के बारे में कुछ समय से स्वास्थ्य विशेषज्ञों के बीच बहस छिड़ी है। कोई इसे स्वास्थ्य की दृष्टि से फायदेमंद बताता है तो कोई इसके दोष गिनवाता नहीं थकता लेकिन कुछ वैज्ञानिक अनुसंधनों ने इस बात की पुष्टि की है कि कॉफी पीने से मस्तिष्क ज्वर, पथरी, पार्किन्सन रोग आदि बीमारियों से बचाव होता है तथा इसके सेवन से शरीर को पर्याप्त ऊर्जा मिलती है किन्तु इसके साथ-साथ ज्यादा कॉफी पीने से आर्थराइटिस का खतरा भी बढ़ जाता है।

अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन का तो यहां तक कहना है कि कॉफी न पीने वाले व्यक्तियों में पार्किन्सन रोग होने का खतरा पांच गुना अधिक होता है। हालांकि यह सही है कि कॉफी में कैफीन की काफी मात्रा होती है और इसी की वजह से कॉफी पीने के बाद शरीर में चुस्ती-स्फूर्ति का संचार हो जाता है तथा नब्ज तेज हो जाती है, रक्तचाप भी बढ़ जाता है। संभवतः इसी कारण डॉक्टर निम्न रक्तचाप के रोगियों को कॉफी पीने की सलाह भी देते हैं किन्तु कुछ स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि कॉफी में कैफीन की अधिक मात्रा के कारण इसकी लत व्यक्ति को बहुत जल्दी लग जाती है और किसी भी व्यक्ति के एक बार कॉफी का पूरी तरह से आदी हो जाने पर अगर उस व्यक्ति को 12 घंटे में एक बार भी कॉफी न मिले तो उसे भयंकर सिरदर्द की शिकायत शुरू होने लगती है।

कैफीन नामक पदार्थ हालांकि चाय, कोला तथा ऊर्जा प्रदान करने वाले अन्य पेय पदार्थों में भी होता है किन्तु इन पदार्थों में कैफीन की मात्रा कॉफी के मुकाबले काफी कम होती है। वैज्ञानिकों ने यह भी पता लगाया है कि सिगरेट पीने वाले व्यक्तियों में सिगरेट के सेवन के साथ कॉफी पीने से ब्लैडर के कैंसर की संभावना भी कम हो जाती है।

कुल मिलाकर देखा जाए तो कॉफी के संबंध में पिछले कुछ वर्षों में वैज्ञानिकों द्वारा जो तथ्य प्रकाशित किए जाते रहे हैं, उनकी वजह से कॉफी पीने वालों की तादाद विगत कुछ वर्षों में काफी बढ़ी है लेकिन अब एक वैज्ञानिक अनुसंधान द्वारा यह तथ्य भी सामने आया है कि गर्भवती महिलाओं को अधिक कॉफी का सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे उनमें गर्भपात की संभावना बढ़ जाती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि जो महिलाएं दिन में चार कप से अधिक कॉफी पीती हैं, उनमें यह संभावना अधिक रहती है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि या तो गर्भवती महिलाओं को अपने गर्भ की रक्षा के लिए गर्भावस्था के दिनों में कॉफी का सेवन बिल्कुल बंद कर देना चाहिए या फिर उन्हें बहुत कम मात्रा में कॉफी पीनी चाहिए। कुछ स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि एक कप में करीब 60 मिलीग्राम कॉफी होती है और एक दिन में 240-300 मिलीग्राम कॉफी नुकसान नहीं करती अर्थात् एक दिन में 4-5 कप कॉफी पी जा सकती है किन्तु गर्भवती महिलाओं के लिए ऐहतियात के तौर पर कॉफी का सेवन कम से कम किया जाना ही फायदेमंद है।
प्रस्तुति: योगेश कुमार गोयल

रंग बिरंगी दुनिया


बेतुके शोधों पर भी एक शोध

पश्चिमी देशों में हर साल विभिन्न विषयों से संबंधित सैंकड़ों शोध किए जाते हैं। आए दिन कोई न कोई नया शोध होता है, जिनमें से कई शोध तो ऐसे भी होते हैं, जिनका कोई सिर-पैर नहीं होता। मजे की बात यह है कि आए दिन होने वाले इन शोधों पर ही लंदन में एक शोध किया गया, जिसमें पाया गया कि तरह-तरह की बातों को लेकर किए जाने वाले इन बेतुके शोधों पर लाखों-करोड़ों रुपये बर्बाद कर दिए जाते हैं, जिनका नतीजा कुछ नहीं निकलता।

शोधकर्ताओं के मुताबिक बेतुकी बातों पर किए जाने वाले इन शोधों पर अनाप-शनाप खर्च किया जाता है। लंदन की ‘बाईजेयर’ नामक पत्रिका द्वारा रिसर्च प्रोजेक्टों पर कराए गए इस अनोखे शोध से पता चला कि सिर्फ ब्रिटेन में ही बहुत से हास्यास्पद विषयों पर किए जाने वाले शोधों पर हर साल लाखों पौंड बर्बाद कर दिए जाते हैं।

बिजली की चोरी पकड़ी गई 60 साल बाद

भारत में तो आज लगभग हर गली-मुहल्ले में बिजली चोरी की घटनाएं होती ही हैं और बिजली विभाग लाख कोशिशों के बाद भी बिजली चोरों पर लगाम कसने में नाकामयाब ही रहता है क्योंकि बिजली चोरी के अधिकांश मामलों में बिजली विभाग के कर्मचारियों की मिलीभगत होती है लेकिन ऐसा भी नहीं है कि बिजली चोरी की समस्या अकेले भारत की ही समस्या हो बल्कि विकसित देश भी अपने तमाम महंगे एवं अत्याधुनिक तामझाम के बावजूद इस समस्या से त्रस्त हैं।

न्यूयार्क में कुछ समय पहले पकड़ी गई बिजली चोरी की एक वारदात से तो इस बात का स्पष्ट प्रमाण भी मिला कि पश्चिमी देशों में बिजली चोरी की वारदातें कई दशकों पहले से हो रही हैं। यह बात उस समय उजागर हुई, जब लगातार 60 वर्षों से बिजली की चोरी कर रहे एक 91 वर्षीय वृद्ध व्यक्ति को उसी के द्वारा की गई शिकायत के कारण पकड़ा गया। हालांकि इस व्यक्ति ने अपने ही द्वारा की जा रही बिजली की चोरी की शिकायत नहीं की थी बल्कि अपने घर की बिजली एक दिन अचानक बंद हो जाने पर उसने पावर कम्पनी को इसकी शिकायत की थी।

वृद्ध द्वारा शिकायत दर्ज कराए जाने के बाद जब बिजली कर्मचारी उसके घर फाल्ट ढूंढ़ने आए तो उनकी नजर क्लैंरस स्टकी नामक इस वृद्ध व्यक्ति द्वारा लिए गए फर्जी कनैक्शन पर पड़ गई और इस तरह अनजाने में ही बिजली चोरी की इस बहुत पुरानी घटना का अंत हो गया।

फर्जी कनैक्शन पकड़े जाने के बाद स्टकी ने स्वीकार भी किया कि उसने अपने घर के सामने से गुजरने वाली बिजली की लाइन में बीच से तार डालकर अपने घर में बिजली का कनैक्शन ले रखा था। उसने यह भी माना कि वह पिछले 60 सालों से इसी तरह फर्जी कनैक्शन के जरिये बिजली का इस्तेमाल कर रहा है।

इस रहस्योद्घाटन के बाद संबंधित पावर कम्पनी ‘द लोगन लाइट एंड पावर कम्पनी’ का कहना था कि कानून के अनुसार हालांकि स्टकी से पूरे 60 साल का पैसा तो नहीं लिया जा सकता लेकिन फिर भी उसे सात सालों के दौरान इस्तेमाल की गई बिजली के पैसे तो भरने ही पड़ेंगे, जो भारतीय मुद्रा में करीब 38 लाख 54 हजार रुपये बनते हैं। बिजली कम्पनी के वरिष्ठ अधिकारियों का यह भी कहना था कि वह स्टकी की उसकी वृद्धावस्था का ख्याल करते हुए उसे जेल में तो बंद नहीं कराना चाहते लेकिन उसके द्वारा इस्तेमाल की गई बिजली का पूरा पैसा तो कम्पनी वसूल करेगी ही।
प्रस्तुति: योगेश कुमार गोयल

नर के प्रति क्यों आकर्षित होती हैं मादाएं?


अक्सर देखा गया है कि खूबसूरत महिलाएं अपने से कम बुद्धिमान और कम आकर्षक पुरूषों पर भी मर मिटती हैं। इतिहास गवाह है कि कितनी ही नामीगिरामी महिलाओं ने अपने से बहुत ‘फीके’ पुरूषों के साथ विवाह रचाया पर इस रहस्य को कोई नहीं जान पाया कि आखिर ऐसा क्यों होता है कि अधिकांश आकर्षक एवं खूबसूरत महिलाएं बेवकूफ पुरूषों को ही पसंद करती हैं। खैर, ‘गपीज’ नामक मछलियों ने इस रहस्यमय पहेली को सुलझा दिया है। दरअसल वैज्ञानिकों ने गपीज नामक मछलियों में ‘मेट कापिंग’ जैसी प्रवृत्ति पाई है। ये इस तरह की पहली मछलियां हैं, जिनमें इस प्रकार की प्रवृत्ति स्पष्ट देखी गई है। इस प्रजाति की मछलियों में मादा मछली ऐसी नर मछली को ज्यादा पसंद करती हैं, जो अन्य मादा मछलियों में भी लोकप्रिय हो और करीब-करीब ऐसा ही आकर्षण महिलाओं में भी देखा जाता रहा है।

अमेरिका में एक अध्ययन के दौरान मनोवैज्ञानिकों द्वारा किए गए सर्वेक्षण में उन्होंने 60 पुरूषों और 74 महिलाओं को विपरीत लिंगी अजनबियों की तस्वीरें दिखाई, साथ ही उन्हें यह जानकारी भी दी गई कि दूसरे लोगों को भी वे पसंद थे अथवा नहीं। इसके बाद सभी से अलग-अलग यह पूछा गया कि वे इन अपरिचितों के साथ दोस्ती करना पसंद करेंगे या नहीं? सर्वेक्षण के दौरान जो तथ्य प्रमुख रूप से उभरकर सामने आया, उसके अनुसार हालांकि पुरूष और महिलाओं दोनों ने ही आकर्षक लोगों को पसंद किया लेकिन महिलाओं ने इसके साथ-साथ दूसरी औरतों द्वारा काफी पसंद किए गए पुरूषों में ज्यादा दिलचस्पी दिखाई और उन्हीं को अधिक महत्व दिया। इस अध्ययन से यह भी पता चला कि महिलाएं ऐसे पुरूषों की ओर इसलिए अधिक आकर्षित होती हैं क्योंकि दूसरे लोगों का नजरिया भी उन्हें प्रभावित करता है और उनके मन में उस व्यक्ति के प्रति विशेष रूचि जागृत हो जाती है। ‘गपीज’ मछलियों में मादा के नर के प्रति आकर्षण के तौर-तरीकों को देखकर ही वैज्ञानिक इस रहस्य को समझ पाए हैं।
प्रस्तुति: योगेश कुमार गोयल

हैल्थ अपडेट


बीमारियों पर नजर रखना भी है जरूरी

विशेषज्ञों की चेतावनी के बावजूद अक्सर होता यह है कि देखते ही देखते कोई महामारी फैल जाती है और फिर कुछ ही समय में हजारों जिन्दगियां निगल जाती है। हो सकता है कि आने वाले समय में फिर से ‘सार्स’ का संक्रमण फैल जाए, मंकीपॉक्स और फ्लू के नए रूप फिर से दुनिया को डराने लगें या ऐसी अजीबोगरीब बीमारियां ही दुनिया को अपनी चपेट में ले लें, जिनका हमने कभी नाम भी न सुना हो।

दरअसल इसका कारण यह है कि दुनियाभर में ऐसा कोई तंत्र ही मौजूद नहीं है, जो बीमारियों की जन्मस्थली पर ही उन्हें पकड़ने में सक्षम हो। हर साल दुनिया में फैलने वाली महामारियां दुनिया में इतने लोगों को मार देती हैं, जितने युद्ध के कारण भी नहीं मरते। इसके बावजूद युद्ध और उसकी तैयारियों पर किया जाने वाला खर्च तो जारी है लेकिन विश्व स्तर पर बीमारियों के खिलाफ लड़ने वाली संस्था ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ का बजट उस अनुपात में नहीं बढ़ता। अकेले ‘सीआईए’ पर ही जितना खर्च एक साल में किया जाता है, अगर उसका आधा भी विश्व स्वास्थ्य संगठन को मिल सके तो पता नहीं, कितने लोग असमय काल के गाल में समाने से बच जाएं। इसका प्रमुख कारण यही है कि दुनिया के बदलते सैनिक और राजनैतिक माहौल पर तो नजर रखी जा सकती है लेकिन बीमारियों पर नजर रखना बहुत मुश्किल है क्योंकि अधिकांश बीमारियों की शुरूआत उन शहरों से बहुत दूर होती है, जहां वे हजारों लोगों को मार देती हैं। अफ्रीका के जंगलों, बांग्ला देश की घनी आबादी, चीन के ग्रामीण इलाकों और गंगा के तट से फैलने वाली बीमारियां सारी दुनिया को अपनी चपेट में ले लेती हैं।

आपका बच्चा डिप्रैशन का शिकार तो नहीं?

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने चेतावनी दी है कि 2020 तक डिप्रैशन सबसे बड़ी बीमारी के रूप में उभरने वाला है। कुछ समय पूर्व मुम्बई में 400 बच्चों पर किए गए एक अध्ययन के बाद यह निष्कर्ष सामने आया। इस अध्ययन से यह पता चला कि प्रत्येक पांचवा बच्चा क्रोध, आत्मविश्वास की कमी और लैंगिक परेशानी का शिकार है जबकि हर दूसरा बच्चा शिक्षा और कैरियर को लेकर अवसाद का शिकार है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानना है कि किशोरों में आत्महत्या का सबसे प्रमुख कारण अवसाद ही है और इन सबसे मां-बाप का चिंतित होना स्वाभाविक है लेकिन कई बार अवसाद को तनाव समझकर उसकी अनदेखी कर दी जाती है।

संगठन का मानना है कि तनाव तो प्यार-दुलार, अच्छे भोजन और पर्याप्त नींद लेने से ठीक हो सकता है किन्तु अवसाद प्रत्यक्ष तौर पर दिखाई नहीं देता, इसलिए इसके लिए विशेष इलाज की आवश्यकता होती है। इन परिस्थितियों को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन का यह भी मानना है कि सन् 2020 में छात्रों द्वारा सबसे ज्यादा पढ़ा जाने वाला विषय मनोविज्ञान ही होगा। (मीडिया केयर नेटवर्क)

वाकई खतरनाक हैं मोबाइल फोन

मोबाइल फोन स्वास्थ्य के लिए किस हद तक खतरनाक हैं, यह जानने के लिए दुनिया भर में लंबे समय से अध्ययन हो रहे हैं। ब्रिटिश सरकार के वैज्ञानिकों ने भी कुछ समय पूर्व ऐसे ही अध्ययनों के आधार पर मोबाइल फोन से होने वाले खतरों पर एक रिपोर्ट जारी की थी। सरकारी समूह ‘एडवायजरी ग्रुप ऑफ नॉन ऑयनाइजिंग रेडिएशन’ में सर विलियम स्टीवर्ट द्वारा किए गए अध्ययन को भी अपनी रिपोर्ट में शामिल किया। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस बात के साक्ष्य नहीं हैं कि मोबाइल फोन स्वास्थ्य के लिए खतरनाक होता है लेकिन साथ ही रिपोर्ट में यह बात स्वीकार की गई है कि विकिरण स्तर में परिवर्तन होने पर जैविक प्रभाव हो सकते हैं। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि वे मोबाइल फोन पर अपनी बातचीत को सीमित रखें तथा बच्चों को इसके उपयोग से बचने के लिए प्रोत्साहित करें। विशेषज्ञों का कहना है कि मोबाइल फोन के उपयोग के कारण सिरदर्द, अनिद्रा तथा याद्दाश्त कम होने का खतरा होता है। आज सबसे बड़ा खतरा यह भी है कि बहुत बड़ी संख्या में बच्चे मोबाइल का उपयोग कर रहे हैं। चूंकि बच्चों की खोपड़ी पतली, सिर छोटा और तंत्रिका तंत्र विकसित हो रहा होता है, इसलिए उन पर इसका प्रभाव बहुत अधिक होता है। (मीडिया केयर नेटवर्क)

असुरक्षित सैक्स है मानसिक बीमारियों का प्रमुख कारण

न्यूजीलैंड के शोधकर्ताओं ने 21 वर्ष आयु के करीब 1000 युवकों पर एक अध्ययन करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला है कि जो युवा यौन रोगों से ग्रस्त रहते हैं तथा कम आयु में असुरक्षित सैक्स करते हैं, उनमें सिजोफ्रेनिया, डिप्रैशन तथा खान-पान संबंधी समस्याएं अधिक देखी गई हैं। अध्ययन के दौरान यह पाया गया कि युवकों में मादक द्रव्यों की लत और डिप्रैशन आम समस्याएं हैं, जिनका असुरक्षित सैक्स संबंधों से सीधा संबंध है। इस अध्ययन के निष्कर्षों में बताया गया है कि असुरक्षित सैक्स और मनोवैज्ञानिक रोगों के बीच सीधा संबंध है। (मीडिया केयर नेटवर्क)
प्रस्तुति: योगेश कुमार गोयल

मानें या न मानें यह सच है


‘सिक बिल्डिंग सिंड्रोम’ का खतरा कम करती हैं अल्ट्रावायलेट किरणें

अल्ट्रावायलेट किरणों को सेहत के लिए अच्छा नहीं माना जाता लेकिन एक अनुसंधान में कनाडा के वैज्ञानिकों ने पाया है कि अल्ट्रावायलेट किरणें ‘सिक बिल्डिंग सिंड्रोम’ का खतरा कम कर देती हैं। सिक बिल्डिंग सिंड्रोम एक व्यापक शब्द है, जो यह उस घटना के लिए प्रयुक्त किया जाता है, जब किसी कार्यस्थल में पाए जाने वाले किसी खास पदार्थ, रसायन, बैक्टीरिया, वायरस या फंगी के कारण उस बिल्डिंग या ऑफिस में कार्यरत कर्मचारी बीमार हो जाएं। सिक बिल्डिंग सिंड्रोम की आशंका उन बिल्डिंग्स में अधिक होती है, जिन्हें ऊर्जा की बचत के लिए एयरटाइट कर दिया जाता है।

कनाडा की मैक्गिल यूनिवर्सिटी में मांट्रियल चेस्ट इंस्टीच्यूट में मेडिसन के प्रो. डा. डिक मेंजाइस और उनके सहयोगियों ने ऐसे ही एक अनुसंधान में पाया है कि यदि बड़ी बिल्डिंग्स के वेंटीलेशन सिस्टम में अल्ट्रावायलेट प्रकाश पैदा कर दिया जाए तो इससे सिक बिल्डिंग सिंड्रोम का खतरा काफी कम हो जाता है। इसकी वजह यह है कि वेंटीलेशन सिस्टम के एयरकंडीशनर ही वह जगह होती है, जहां ज्यादातर बैक्टीरिया, वायरस या फंगी रहते हैं। इस अनुसंधान के लिए डा. मेंजाइस ने मांट्रियल की तीन बड़ी ऑफिस बिल्डिंग्स के एयरकंडीशनिंग सिस्टम में अल्ट्रावायलेट जर्मीसाइडल इर्रेडिएशन सिस्टम लगाया। यह सिस्टम अल्ट्रावायलेट किरणें उत्पन्न करता है। एक साल की अवधि में इस सिस्टम को इस तरह से चलाया गया कि यह एक महीने चालू रहता था, फिर इसे तीन महीनों के लिए बंद कर दिया जाता था। इन तीनों बिल्डिंग्स में कार्यरत 771 कर्मचारियों का सालभर तक स्वास्थ्य परीक्षण किया जाता रहा। डा. मेंजाइस ने पाया कि जिस समय अल्ट्रावायलेट जर्मीसाइडल इर्रेडिएशन सिस्टम चालू रहता था, उस समय कर्मचारियों को होने वाली सामान्य बीमारियों में 20 प्रतिशत की कमी हो जाती थी। इसके अलावा इस दौरान कर्मचारियों को होने वाली एलर्जी और कान, नाक व गले से संबंधित बीमारियों में भी 30 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई।

डा. मेंजाइस के अनुसार इसकी वजह यह थी कि इन बिल्डिंग्स के एयरकंडीशनिंग सिस्टम में ही वे 99 प्रतिशत बैक्टीरिया या फंगी रहते हैं, जो सर्दी, जुकाम, एलर्जी या श्वसन तंत्र से संबंधित समस्याएं पैदा करते हैं। जब अल्ट्रावायलेट जर्मीसाइडल इरेडिएशन सिस्टम को चालू किया जाता था तो उससे निकलने वाले अल्ट्रावायलेट प्रकाश के कारण ये बैक्टीरिया या फंगी मर जाते थे। एक हजार कर्मचारियों वाली किसी बिल्डिंग के लिए एक अल्ट्रावायलेट जर्मीसाइडल इर्रेडिएशन सिस्टम लगाने में करीब 52 हजार डालर का खर्च आता है जबकि इस सिस्टम को सालभर चलाने में 14 हजार डालर का खर्च आता है लेकिन यदि इसकी वजह से हर कर्मचारी द्वारा सेहत खराब होकर ली जाने वाली एक दिन की छुट्टी भी बचा ली जाए तो इस खर्च की पूर्ति हो जाती है। (मीडिया केयर नेटवर्क)

हिंसा देखने व भोगने वाले बच्चों को अधिक होती हैं व्यवहारगत समस्याएं

अमेरिका में किए गए एक अध्ययन से पता चला है कि जो बच्चे हिंसा होते देखते या भोगते हैं, बड़े होने पर उन्हें व्यवहारगत समस्याएं अन्य बच्चों की अपेक्षा अधिक होती हैं। अल्बर्ट आइंसटीन कॉलेज ऑफ मेडिसन के चिल्ड्रंस हॉस्पिटल के ऑस्कर एच पुरूगनन के अनुसार स्कूल जाने वाले छात्रों द्वारा हिंसा देखने या भोगने और उनके मनोवैज्ञानिक असर में काफी गहरा रिश्ता होता है। इस अध्ययन में 9 से 12 वर्ष के 175 बच्चों को शामिल किया गया था। अध्ययन से यह भी पता चला कि हिंसा का शिकार होने वाले किसी व्यक्ति के साथ बच्चे की निकटता या दूरी का उसकी मानसिक स्थिति और व्यवहारगत मानसिकता पर कोई विशेष असर नहीं पड़ता है। शोधकर्ताओं ने इस अध्ययन के लिए इन बच्चों का साक्षात्कार किया तो पाया कि जो बच्चे स्वयं हिंसा का शिकार हुए थे, उनको सबसे ज्यादा व्यवहारगत समस्याएं हुई थी। उनकी अपेक्षा ऐसे बच्चों की स्थिति थोड़ी अच्छी थी, जो हिंसा के साक्षी बने थे। डा. पुरूगनन के अनुसार हिंसा भोगने वाले 86 बच्चों में से 16 की दशा काफी दयनीय थी जबकि हिंसा देखने वाले 60 बच्चों में से 7 ही व्यवहारगत समस्या के शिकार हुए थे। उनके अनुसार अब जबकि हिंसा की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं, बाल चिकित्सकों की ऐसे में यह जिम्मेदारी बनती है कि वे बच्चों में ऐसी समस्याएं विकसित होने से रोकने का प्रयास करें। (मीडिया केयर नेटवर्क)
प्रस्तुति: योगेश कुमार गोयल

कुछ रसोईघर से


बनाइए-खिलाइए

स्वादिष्ट आलू रोल

सामग्री:- आलू एक किलो, बेसन 2 बड़े चम्मच, अरारोट 2 छोटे चम्मच, पिसी हुई लाल मिर्च 1 छोटा चम्मच, जीरा एक छोटा चम्मच, एक छोटा चम्मच नींबू का रस, 8-10 हरी मिर्च बारीक कटी हुई, थोड़ी सी अजवायन, थोड़ी सी अदरक बारीक कसी हुई, थोड़ा सा हरा ध्निया, चुटकी भर हींग, 4 पीस ब्रैड, स्वादानुसार नमक, 4 बड़े चम्मच घी।

बनाने की विधि:- सबसे पहले आलुओं को उबालें और अब इन्हें कस लें। अब इसमें अरारोट तथा बेसन डालकर थोड़ा पानी मिलाकर मथें। इस मिश्रण में हरा ध्निया, हरी मिर्च, अदरक, अजवायन, नींबू का रस तथा नमक व मिर्च मिलाएं। पानी में चुटकी भर हींग मिलाकर उसमें ब्रैड को अच्छी तरह भिगो लें और कुछ देर बाद इन्हें निचोड़कर मिश्रण में मिला दें। अब हाथ पर थोड़ा सा घी लगाएं और इस मिश्रण के रोल बनाएं। कड़ाही में घी गर्म करके इन्हें सुनहरा रंग होने तक तलें। अब इन्हें धनिये की चटनी अथवा सॉस के साथ गर्मागर्म सर्व करें।

वेजिटेबल मशरूम आमलेट

सामग्री:- बारीक कटे हुए 100 ग्राम मशरूम, बेसन 200 ग्राम, बारीक कटे हुए दो प्याज, हरा धनिया, सूजी तीन बड़े चम्मच, दही एक बड़ा चम्मच, नमक स्वादानुसार, गर्म मसाला (पिसा हुआ) एक छोटा चम्मच, लाल मिर्च इच्छानुसार, घी दो बड़े चम्मच।

विधि:- बेसन और सूजी को मिलाकर गाढ़ा घोल बना लें। उसमें दही, नमक, गर्म मसाला, लाल मिर्च, हरी मिर्च मिलाकर एक घंटे के लिए छोड़ दें। बारीक कटे मशरूम को घी में गल जाने तक भून लें। बेसन का घोल इतना गाढ़ा हो कि तवे पर आसानी से फैल जाए। अब तवा अच्छी तरह गर्म करके घोल डालें, आमलेट पतला न हो, इसलिए आंच धीमी ही रखें और धीरे-धीरे पकने दें। अब आमलेट की ऊपरी तह पर मशरूम, प्याज और हरा धनिया डाल दें। थोड़ी देर बाद चम्मच से प्याज और मशरूम को दबाएं ताकि यह बेसन के साथ अच्छी तरह चिपक जाए। आमलेट को थोड़ी देर बाद दूसरी तरफ से भी सेकें। आप चाहें तो मशरूम के साथ पनीर भी डाल सकती हैं। सॉस या चटनी के साथ वेजिटेबल मशरूम आमलेट गर्म-गर्म ही पेश करें।

Friday, August 13, 2010

यदि पाना चाहें इंटरव्यू में सफलता

कैरियर मार्गदर्शन


- योगेश कुमार गोयल -

रोजगार के हर क्षेत्र में आज जबरदस्त प्रतिस्पर्द्धा है। हर छोटी-बड़ी नौकरी के लिए इंटरव्यू रूपी बाधा को पार करना बहुत जरूरी हो गया है। एक पद के लिए भी आज हजारों की संख्या में उम्मीदवार होते हैं, इसलिए या तो लिखित परीक्षा के आधार पर परीक्षा में उत्तीर्ण युवाओं को ही इंटरव्यू के लिए बुलाया जाता है या फिर चयनकर्ता सभी युवाओं के बायोडाटा के आधार पर ही उनमें से कुछ चुनिंदा युवाओं को इंटरव्यू के लिए आमंत्रित करते हैं। इसलिए आपके पास भी किसी इंटरव्यू के लिए बुलावा आया है तो इसका अर्थ है कि आपमें उन्हें कोई तो ऐसी खासियत नजर आई है, जिसकी बदौलत उन्होंने आपको खुद को साबित करने का मौका दिया है। अब यह आप पर निर्भर है कि आप उनकी कसौटी पर किस हद तक खरे उतर पाते हैं। किसी भी प्रतियोगी परीक्षा में लिखित परीक्षा में सफलता पाने के उपरांत भी इंटरव्यू के आधार पर ही अंतिम चयन होता है।

आपको बहुत से युवा ऐसे भी मिलेंगे, जो तमाम योग्यताओं और बड़ी-बड़ी डिग्रियां होने के बाद भी इंटरव्यू में सफलता प्राप्त नहीं कर पाते और लिहाजा छोटे-छोटे दफ्तरों में ही घिसटते रहने को मजबूर होते हैं। कारण, ऐसे युवा इंटरव्यू के दौरान अपने व्यक्तित्व पर ध्यान देने के बजाय सिर्फ अपने किताबी ज्ञान को ही महत्व देते हैं। अतः यदि आप भी किसी इंटरव्यू के लिए जा रहे हैं तो इस बात का ध्यान रखें कि इंटरव्यू के दौरान चयनकर्ता सिर्फ दिमागी क्षमता का ही आकलन नहीं करते हैं बल्कि इंटरव्यू के दौरान आपके व्यक्तित्व, आपके हावभाव, आपकी सजगता और आपकी सूझबूझ की भी परीक्षा होनी होती है और योजनाबद्ध तरीके से इंटरव्यू की तैयारी करके आप निश्चित रूप से सफलता पा सकते हैं। इंटरव्यू में सफलता प्राप्त करने के लिए इन बातों का ध्यान अवश्य रखें:-

” सबसे पहले तो यह सुनिश्चित करें कि जिस नौकरी के लिए आप इंटरव्यू देने जा रहे हैं, क्या आप उसके लिए आवश्यक योग्यता रखते हैं?

” अपने सभी प्रमाण पत्रों की मूल प्रतियां तथा एक-एक सत्यापित प्रतियां (कम्पनी अथवा चयनकर्ताओं द्वारा न भी मांगी गई हों तो भी) फाइल में करीने से संजोकर ले जाएं ताकि इंटरव्यू के दौरान किसी भी कागजात की जरूरत पड़ने पर आप बिना किसी हड़बड़ाहट के तुरंत निकालकर दे सकें। अपना एक पासपोर्ट आकार का फोटो, पैन तथा इंटरव्यू लैटर भी रख लें।

” यदि आप दाढ़ी नहीं रखते हैं तो इंटरव्यू वाले दिन शेव अवश्य कर लें और आपके सिर के बाल भी जरूरत से ज्यादा बड़े हैं तो हेयर कटिंग अवश्य करवाएं क्योंकि ज्यादा लंबे बाल और बढ़ी हुई दाढ़ी आपके व्यक्तित्व पर बुरा प्रभाव डाल सकते हैं। यदि चमड़े के जूते पहनते हैं तो जूते पॉलिश करना भी न भूलें।

” किसी प्रकार की असुविधा न हो, इसके लिए निर्धारित समय से कुछ समय पहले ही साक्षात्कार स्थल पर पहुंच जाएं।

” जिस पद हेतु इंटरव्यू देने जा रहे हैं, उसकी पूरी जानकारी आपको होनी चाहिए। कम से कम अपने अध्ययन के विषयों पर तो आपका अधिकार होना अपेक्षित ही है। इसके अलावा यदि आपने किसी विषय में विशेषज्ञता हासिल की है तो उसके बारे में भी आपको पूरा ज्ञान होना जरूरी है क्योंकि इंटरव्यू के दौरान आपसे उस विषय से संबंधित प्रश्न भी पूछे जा सकते हैं।

” जिस संस्था या कम्पनी में इंटरव्यू देने जा रहे हैं, आपको उसके बारे में भी पर्याप्त जानकारी होनी चाहिए।

” जनरल नॉलेज बढ़ाने के लिए सामान्य ज्ञान की पुस्तकों का अध्ययन करें। साथ ही प्रमुख समाचारपत्र व पत्रिकाएं पढ़ने के अलावा टीवी पर समसामयिक कार्यक्रम भी जरूर देखें ताकि आप अपने चारों ओर घटित हो रही घटनाओं के अलावा देश-विदेश की ताजा गतिविधियों से भी परिचित रहें। इंटरव्यू के दौरान आपके सामान्य ज्ञान को भी परखा जा सकता है।

” यदि आप पहली बार किसी इंटरव्यू के लिए जा रहे हैं तो इंटरव्यू में पहले ही सफलता प्राप्त कर चुके युवाओं का मार्गदर्शन प्राप्त कर उनके अनुभवों का लाभ उठा सकते हैं।

” इंटरव्यू देने जाते समय अपने पहनावे पर खास ध्यान दें। आपका पहनावा न तो ज्यादा तड़क-भड़क वाला और न ही ज्यादा फैशनेबल हो। सादगीपूर्ण कपड़ों का ही चयन करें।

” जिस दिन इंटरव्यू देने जाएं, उस दिन किसी भी प्रकार के नशीले पदार्थों का सेवन न करें।

” पूछे जाने वाले सभी सवालों के जवाब बिना हिचकिचाहट और घबराहट के शालीनता से और संयमित लहजे में स्पष्ट भाषा में दें।

” प्रश्न पूरा होने से पहले ही बीच में न बोलें। पहले पूरा प्रश्न ध्यान से सुनें, उसके बाद सोच-समझकर उत्तर दें। प्रश्न पूरा होने से पहले ही उत्तर देना प्रारंभ करना सभ्यता के तो विपरीत है ही, यह भी हो सकता है कि आधा-अधूरा प्रश्न सुनकर आप जो उत्तर देने लगें, उसका उस मूल प्रश्न से कोई ताल्लुक ही न हो।

” यदि आपको किसी प्रश्न का उत्तर मालूम न हो तो न तो गलत जवाब दें और न ही यह सोचकर घबराएं कि यह नौकरी आपके हाथ से गई बल्कि पूरे आत्मविश्वास के साथ अगले प्रश्न का उत्तर दें तथा प्रश्नों का उत्तर देते समय सकारात्मक शब्दों का ही इस्तेमाल करें। यदि आपको किसी प्रश्न का उत्तर मालूम न हो तो विनम्रतापूर्वक कह दें कि आपको इसका उत्तर मालूम नहीं है क्योंकि अगर आप घुमा-फिराकर या ऊटपटांग जवाब देने की कोशिश करेंगे तो इसका बोर्ड के सदस्यों पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है।

” यदि किसी विषय पर बोर्ड के सदस्य आपकी प्रतिक्रिया जानना चाहें तो लंबी-चौड़ी डींग न हांकें बल्कि नम्रतापूर्वक स्पष्ट शब्दों में अपने सकारात्मक दृष्टिकोण से उन्हें अवगत कराएं।

” इंटरव्यू कक्ष में कुर्सी पर शांत भाव से बैठें। अपने चेहरे पर तनाव, चिन्ता अथवा परेशानी की झलक न आने दें।

” अपने हाथ मेज पर टिकाकर न बैठें और न ही मेज पर हाथ रखकर अपनी उंगलियां नचाते रहें।

” इंटरव्यू के दौरान अपने हाव-भावों पर नियंत्रण रखें। हाव-भाव ऐसे हों, जिससे आपके चेहरे से आत्मविश्वास स्पष्ट झलके और आप जो भी बात करें, आपकी आवाज में आत्मविश्वास का पुट साफ झलके।

” यदि आप प्रश्नकर्ता की किसी बात से सहमत न हों तो भी उससे बहसबाजी न करें लेकिन यदि आप उनसे कुछ पूछना चाहते हैं तो उनकी अनुमति लेकर नम्रतापूर्वक संक्षेप में पूछ सकते हैं।

” यदि आप पुरानी नौकरी छोड़कर नई नौकरी के लिए इंटरव्यू दे रहे हैं तो आपसे यह प्रश्न जरूर पूछा जा सकता है कि आप अपनी वर्तमान नौकरी क्यों छोड़ रहे हैं लेकिन इसके जवाब में आप भूलकर भी कम्पनी या मालिकों अथवा वरिष्ठों की बुराई न करें बल्कि आप कह सकते हैं कि उस कम्पनी में आगे बढ़ने के अवसर पर्याप्त नहीं हैं, इसलिए आप नौकरी बदलना चाहते हैं।

” इंटरव्यू के दौरान जहां तक संभव हो, वेतन और छुट्टियों जैसे मुद्दे आप स्वयं न उठाएं।

” इंटरव्यू के दौरान यह दर्शाएं कि इस नौकरी का आपकी नजर में कितना महत्व है और आप यह कार्य करने के लिए कितने उत्सुक हैं।

” यदि बोर्ड के किसी सदस्य को आप पहले से ही जानते हैं तो भी इंटरव्यू के दौरान उससे जान-पहचान निकालने की भूल हरगिज न करें।

” इंटरव्यू समाप्त होने के बाद बोर्ड के सभी सदस्यों का धन्यवाद करें और उनकी आज्ञा लेकर ही इंटरव्यू कक्ष से बाहर आएं।

व्यंग्य: रेलवे प्लेटफॉर्म पर कटी जेब

समय बहुमूल्य है, अतः एक-एक पल का सदुपयोग सार्थक कार्यों में करें.