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Thursday, January 31, 2013

अब आप भी सुझा सकते हैं डाक टिकटों की थीम


अगर आप चाहते हैं कि आपकी पंसद का डाक टिकट जारी होना चाहिए तो इसके लिए भारतीय डाक विभाग ने एक विशेष सुविधा मुहैया करा है। इस संबंध में इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएं कृष्ण कुमार यादव कहना है कि इसके लिए डाक विभाग राष्ट्रीय स्तर पर एक पोल (मत) कर रहा है, जिसके तहत लोगों से विभिन्न विषयों पर डाक टिकट जारी करने हेतु सुझाव आमंत्रित किये गये हैं। इस संबंध में कला, संस्कृति, राष्ट्रीय विरासत, फूल और पौधे, खेल, वन्य जीवन, प्रकृति,ऐतिहासिक स्मारक, बच्चों से जुड़े विषय और विश्व स्मारकों पर सुझाव दिये जा सकते हैं। इनमें से राष्ट्रीय स्तर के तीन सर्वश्रेष्ठ सुझावों को वर्ष 2014 में जारी किये जाने वाले डाक टिकटों की सूची में शामिल किया जायेगा और विभाग द्वारा जारी की जाने वाली सूचना विवरणिका में संबंधित व्यक्ति का उल्लेख भी किया जायेगा।

डाक निदेशक कृष्ण कुमार यादव के अनुसार व्यक्तिव, संस्थान एवं इवेंट्स (घटना या वृतांत ) से जुड़े विषयों से संबंधित सुझाव मान्य नहीं होंगे। 15 फरवरी, 2013 तक चलने वाले इस ’’डाक टिकट सुझायें’’ अभियान के तहत
पर सुझाव ई-मेल द्वारा भेजे जा सकते है।
अपने सुझाव आप 15 फरवरी तक ई-मेल कर सकते हैं

Saturday, January 26, 2013

पाठकों की संख्या हुई 50000 के पार




‘मीडिया केयर ग्रुप’
पर पाठकों की संख्या आज 50000 का आंकड़ा पार कर गई है.

आपने इस ब्लॉग पर अपनी उपस्थिति निरन्तर दर्ज कराई और इसे पसंद किया, इसके लिए आपका हार्दिक आभार, धन्यवाद.

भविष्य में ‘मीडिया केयर ग्रुप’ को और बेहतर बनाने के लिए अपने अमूल्य सुझावों से अवगत कराते रहें.

भारत के संविधान की रोचक दास्तां


गणतंत्र दिवस पर विशेष

-- योगेश कुमार गोयल --

’ सर्वप्रथम सन् 1895 में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने यह मांग की थी कि अंग्रेजों के अधीनस्थ भारतवर्ष का संविधान स्वयं भारतीयों द्वारा ही बनाया जाना चाहिए लेकिन तिलक के सहयोगियों द्वारा भारत के लिए स्वराज्य विधेयक के प्रारूप को, जिसमें पहली बार भारत के लिए स्वतंत्र संविधान सभा के गठन की मांग की गई थी, ब्रिटिश सरकार द्वारा ठुकरा दिया गया था।

’ 1922 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने मांग की थी कि भारत का राजनैतिक भाग्य भारतीय स्वयं बनाएंगे। 1924 में पं. मोतीलाल नेहरू ने संविधान सभा के गठन की फिर मांग की लेकिन अंग्रेजों द्वारा उनकी मांग को भी ठुकरा दिया गया। तब से संविधान सभा के गठन की मांग लगातार उठती रही लेकिन अंग्रेजों द्वारा इसे हर बार ठुकराया जाता रहा।

’ 1939 में कांग्रेस अधिवेशन में एक प्रस्ताव पारित किया गया, जिसमें कहा गया कि स्वतंत्र देश के संविधान के निर्माण के लिए संविधान सभा ही एकमात्र उपाय है और अंततः 1940 में ब्रिटिश सरकार ने इस मांग को मान लिया कि भारत का संविधान भारत के लोगों द्वारा ही बनाया जाए।



’ 1942 में क्रिप्स कमीशन ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें कहा गया कि भारत में निर्वाचित संविधान सभा का गठन किया जाएगा, जो भारत का संविधान तैयार करेगी।

’ संविधान सभा 9 दिसम्बर 1946 को सच्चिदानंद सिन्हा की अध्यक्षता में पहली बार समवेत हुई थी लेकिन मुस्लिम लीग ने अलग पाकिस्तान बनाने की मांग को लेकर इस बैठक का बहिष्कार किया।

’ 11 दिसम्बर 1946 को हुई संविधान सभा की बैठक में डा. राजेन्द्र प्रसाद को संविधान सभा का अध्यक्ष चुना गया और वे संविधान के निर्माण का कार्य पूरा होने तक इस पद पर रहे।

’ 14 अगस्त 1947 को भारत डोमिनियन की प्रभुत्ता सम्पन्न संविधान सभा पुनः समवेत हुई और 29 अगस्त 1947 को स्वतंत्र भारत में संविधान सभा द्वारा संविधान निर्मात्री समिति का गठन किया गया, जिसका अध्यक्ष सर्वसम्मति से डा. भीमराव अम्बेडकर को बनाया गया।

’ संविधान प्रारूप समिति की बैठकें 114 दिन तक चली।

’ संविधान के निर्माण में 2 वर्ष 11 माह 18 दिन का समय लगा।

’ संविधान के निर्माण कार्य पर कुल 63 लाख 96 हजार 729 रुपये का खर्च आया।

’ संविधान के निर्माण कार्य में कुल 7635 सूचनाओं पर चर्चा की गई।

’ 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू होने के बाद से अब तक हुए अनेक संशोधनों के बाद भारतीय संविधान में 440 से भी अधिक अनुच्छेद व 12 परिशिष्ट हो चुके हैं।

परखें अपना सामान्य ज्ञान


पल-पल रंग बदलते बंदर


जान है तो जहान है



   




Monday, January 21, 2013

विशेष सूचना



आपका प्रिय ब्लॉग www.mediacaregroup.co.in अगले कुछ दिनों में www.mediacaregroup.blogspot.com पर शिफ्ट हो जाएगा.


अतः यदि www.mediacaregroup.co.in न खुले तो कृपया अपने प्रिय ब्लॉग पर जाने के लिए www.mediacaregroup.blogspot.com को देखें.
धन्यवाद.

आसाराम बापू ने हड़पी सैंकड़ों एकड़ जमीन?


पिछले दिनों ‘दिल्ली रेप कांड’ को लेकर अपनी घृणास्पद टिप्पणी के बाद अपनी आलोचना से बौखलाये प्रख्यात ‘संत’ (?) आसाराम बापू अपनी बेहद घटिया टिप्पणी ‘मैं हाथी, विरोधी भौंकने वाले कुत्ते’ को लेकर चर्चा में आए थे। दरअसल आसाराम कहने को भले ही विश्वविख्यात ‘संत’ हैं और देश-विदेश में भले ही उनके करोड़ों अनुयायी हैं लेकिन किसी न किसी तरह के विवाद के चलते चर्चा में बने रहना लगता है, उनकी फितरत बन गई है।


फिलहाल वो एक अन्य मामले को लेकर मुश्किल में पड़ गए हैं। दरअसल मध्य प्रदेश में कथित रूप से 700 करोड़ रुपये की जमीन को कब्जाने के मामले में ‘सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टिगेटिंग एजेंसी’ द्वारा आसाराम बापू और उनके बेटे नारायण साईं के खिलाफ अभियोजन की स्वीकृति मांगी गई है। ‘एसएफआईओ’ चाहता है कि आईपीसी और कम्पनीज एक्ट-1965 के तहत आसाराम और उनके बेटे के खिलाफ मामला चले। इस संबंध में उसने कम्पनी मामलों के मंत्रालय को अपनी सिफारिश भेजी है।

बता दें कि यह मामला मध्य प्रदेश के रतलाम में कथित रूप से 200 एकड़ की जमीन हथियाने से जुड़ा है। यह जमीन दिल्ली-पुणे फ्रंट कॉरिडोर पर स्थित है। यह जमीन ‘जयंत विटामिन्स लिमिटेड’ से जुड़ी है, जिस पर सन् 2000 में कथित रूप से कब्जा कर लिया गया था और तभी से आसाराम बापू इसका उपयोग कर रहे हैं। जेवीएल पब्लिक लिमिटेड कम्पनी है, जिसे 2004 में बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज ने अपनी सूची से हटा दिया था। बीएससी में किसी भी कम्पनी को सूचीबद्ध कराने के लिए फीस देनी होती है लेकिन जेवीएल ने फीस नहीं दी थी। जेवीएल दूसरी फार्मा कम्पनियों को ग्लूकोज और विटामिन की आपूर्ति करने वाली अग्रणी कम्पनी मानी जाती है। जेवीएल ने मामले में शिकायत नहीं की जबकि कम्पनी के एक शेयरधारक ने मंत्रालय से सम्पर्क किया, जिसने 2010 में शिकायत की जांच एसएफआईओ को करने को कहा और एसएफआईओ ने दो साल तक मामले की जांच के बाद अब मंत्रालय को अनुशंसा भेजी है। (समाचार स्रोत: हिन्दी मीडिया)

Friday, January 18, 2013

कॉन्फिडेंस ही है मेरा स्टाइल: नेहा धूपिया


‘मीडिया केयर नेटवर्क’ द्वारा दैनिक पंजाब केसरी में 17.1.13 को प्रकाशित

सफलता चाहिए तो सोच रखें सकारात्मक


‘मीडिया केयर नेटवर्क’ द्वारा दैनिक सन्मार्ग में 17.1.13 को प्रकाशित

Sunday, January 13, 2013

एक नन्हा राजदूत है डाक टिकट



इलाहाबाद डाक टिकट प्रदर्शनी ”इलाफिलेक्स-2013” में दिखी डाक-टिकटों की समृद्ध परम्परा

’’माई स्टैम्प’’ के तहत खुद की डाक टिकटें बनवाने के प्रति दिखा उत्साह 

डाक विभाग द्वारा दोदिवसीय ’’इलाहाबाद डाक टिकट प्रदर्शनी’’ इलाफिलेक्स-2013 का उद्घाटन 13 जनवरी 2013 को उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र के महात्मा गाँधी कला वीथिका में किया गया। प्रदर्शनी का उद्घाटन द्वीप प्रज्वलित कर और रिबन काटकर, इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति पंकज मिथल द्वारा पद्मश्री शम्शुर्रह्मान फारूकी, निदेशक डाक सेवाएँ कृष्ण कुमार यादव और पोस्टमास्टर जनरल ए. के. गुप्ता के संग किया गया। 
प्रदर्शनी में शहर के फिलेटलिस्टों द्वारा तमाम डाक टिकटों की प्रदर्शनी लगाई गई। कुल 59 फ्रेमों में हजारों की संख्या में डाक-टिकट प्रदर्शित किए गए, जिनमें इलाहाबाद से संबंधित विषयों पर जारी डाक-टिकट, डाक-टिकटों के माध्यम से सिनेमा के 100 वर्ष, राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी, रवीन्द्रनाथ टैगोर, नेहरु परिवार पर जारी डाक टिकट, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर जारी डाक टिकट, मस्जिदों पर जारी डाक-टिकट से लेकर से लेकर जैव विविधता, रोटरी, अग्निशमन, रेडक्रॉस और एड्स, मलेरिया इत्यादि के विरूद्ध जागरूक करते तमाम रंग-बिरंगे डाक-टिकट प्रदर्शित किए गए। इनमें सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि विदेशों द्वारा जारी दुर्लभ डाक-टिकट व डाक-स्टेशनरी भी शामिल थे। प्रदर्शनी में वरिष्ठ फिलेटलिस्टों के अलावा बच्चों ने भी अपने डाक-टिकटों का प्रदर्शन किया। गौरतलब है कि इलाहाबाद में 5 वर्ष बाद इस तरह की प्रदर्शनी का आयोजन किया गया है। इससे पूर्व वर्ष 2007 में डाक टिकट प्रदर्शनी आयोजित हुई थी। 

प्रदर्शनी के उद्घाटन पश्चात् आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्य अतिथि न्यायमूर्ति पंकज मिथल ने अपने डाक-टिकट संग्रह के शौक के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि हर डाक टिकट की अपनी एक कहानी है और इस कहानी को वर्तमान पीढ़ी के साथ जोड़ने की जरुरत है। उन्होंने डाक टिकटों को संवेदना का संवाहक बताया, जो पत्र के माध्यम से भावनाओं को एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुंचाते हैं। न्यायमूर्ति मिथल ने इस प्रकार की प्रदर्शनियों को हर साल करने पर जोर दिया ताकि अभिरुचि के रूप में फिलेटली का विकास हो सके। पद्मश्री शम्शुर्रह्मान फारूकी ने कहा कि इन प्रदर्शनियों के द्वारा जहाँ अनेकों समृद्ध संस्कृतियों वाले भारत राष्ट्र की गौरवशाली परम्परा को डाक टिकटों के द्वारा चित्रित करके विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक सन्देशों को प्रसारित किया जाता है, वहीं दूसरी तरफ यह विभिन्न लोगों के मध्य सद्भावना एवम् मित्रता में उत्साहजनक वृद्धि का परिचायक है।
पोस्टमास्टर जनरल ए. के. गुप्ता ने कहा कि डाक टिकटों के द्वारा ज्ञान भी अर्जित किया जा सकता है। यह हमारी शिक्षा प्रणाली को और भी मजबूत बना सकते हैं। 
इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवायें कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि सामान्यतः डाक टिकट एक छोटा सा कागज का टुकड़ा दिखता है पर इसका महत्व और कीमत दोनों ही इससे काफी ज्यादा है। डाक टिकट वास्तव में एक नन्हा राजदूत है, जो विभिन्न देशों का भ्रमण करता है एवं उन्हें अपनी सभ्यता, संस्कृति और विरासत से अवगत कराता है। यह किसी भी राष्ट्र के लोगों, उनकी आस्था व दर्शन, ऐतिहासिकता, संस्कृति, विरासत एवं उनकी आकांक्षाओं व आशाओं का प्रतीक है। यह मन को मोह लेने वाली जीवन शक्ति से भरपूर है। निदेशक कृष्ण कुमार यादव ने डाक-टिकटों के संग्रह की दिलचस्प कहानी के बारे में बताया कि उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में यूरोप में एक अंग्रेज महिला को अपने श्रृंगार-कक्ष की दीवारों को डाक टिकटों से सजाने की सूझी और इस हेतु उसने सोलह हजार डाक-टिकट परिचितों से एकत्र किए और शेष हेतु सन् 1841 में ‘टाइम्स आफ लंदन’ समाचार पत्र में विज्ञापन देकर पाठकों से इस्तेमाल किए जा चुके डाक टिकटों को भेजने की प्रार्थना की। इसके बाद धीमे-धीमे पूरे विश्व में डाक-टिकटों का संग्रह एक शौक के रूप में परवान चढ़ता गया।
इस अवसर पर डाक विभाग की बहुप्रतीक्षित माई स्टैम्प सेवा का भी शुभांरभ किया गया। न्यायमूर्ति पंकज मिथल सहित तमाम लोगों ने इसके तहत अपनी फोटो डाक टिकटों पर अंकित करायी। युवाओं में इसके तहत काफी उत्साह देखा गया। निदेशक डाक सेवायें कृष्ण कुमार यादव ने बताया कि इसकी लोकप्रियता के चलते माई स्टैम्प सेवा को कुंभ में भी कुछेक दिनों के लिए आरंभ किया जाएगा। इस अवसर पर बच्चों हेतु फिलेटलिक वर्कशाप व डिजाइन ए स्टैम्प प्रतियोगिता का भी आयोजन किया गया। बच्चों ने जहां डाक टिकट प्रदर्शनी का आनंद लिया, वहीं फिलेटलिक डिपाजिट अकाउंट भी खोले गए। (एम सी एन)
प्रस्तुति: रहमतुल्ला
प्रवर डाक अधीक्षक, इलाहाबाद मंडल, इलाहाबाद

गर्भाशय के बाहर कैसे विकसित होगा भ्रूण?


नींद: कुछ रोचक एवं आश्चर्यजनक तथ्य


सर्दी-जुकाम से बचाते हैं नाक के बाल


नुकसानदायक है ज्यादा च्यूइंगम चबाना


Friday, January 11, 2013

क्या ऐसे ही होते हैं ‘संत’?

‘दिल्ली रेप कांड’ पर अपनी बेहद बचकानी प्रतिक्रिया को लेकर चौतरफा आलोचना झेलने के बाद गत दिनों विश्वविख्यात ‘संत’ (?) आसाराम बापू ने बौखलाहट भरा बयान दिया। उन्होंने कहा,
"मैं हाथी, विरोधी भौंकने वाले कुत्ते ...!"

ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक ही है कि :-

क्या यही है ‘संत वाणी’?

क्या ऐसे ही होते हैं ‘संत’?

क्या ऐसे ‘संत’ ही इस देश का दुर्भाग्य नहीं हैं ...?

आप इस बारे में क्या कहेंगे...?

Sunday, January 06, 2013

अनोखे जीव-जंतु


पक्षियों की कुछ मजेदार बातें


‘मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स’ द्वारा ‘पंजाब केसरी’ में 6.1.2013 को प्रकाशित

खबरें सेहत भरी


‘मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स’ द्वारा
‘दैनिक सन्मार्ग’ में 27.12.2012 को प्रकाशित

जानिए, कितना खतरनाक है पान मसाला


अपने आप करीने से जम जाएंगी मेज पर बिखरी चीजें


दैनिक सन्मार्ग में 3 जनवरी 2013 को प्रकाशित

समय बहुमूल्य है, अतः एक-एक पल का सदुपयोग सार्थक कार्यों में करें.