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Thursday, March 31, 2011

जगन्नाथ आर्य विद्या मंदिर बादली का वार्षिकोत्सव



 बादली में 31 मार्च को श्री जगन्नाथ आर्य विद्या मंदिर विद्यालय का 17वां वार्षिक पारितोषिक वितरण समारोह धूमधाम से मनाया गया। समारोह का शुभारंभ सरस्वती वंदना व दीप प्रज्जवलित कर मुख्य अतिथि कांग्रेस नेता बिजेन्द्र माजरा ने किया व समारोह की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार एवं ‘मीडिया केयर ग्रुप’ के प्रधान सम्पादक योगेश कुमार गोयल ने की। समारोह के उद्घाटन के पश्चात विद्यालय में बच्चों ने योग आसन, भाषण प्रतियोगिता, कविता एवं गीत प्रतियोगिता में हिस्सा लिया व सामाजिक बुराईयों पर आधारित अनेक नाटक प्रस्तुत कर उपस्थित लोगों का मन मोह लिया। सभी कक्षाओं में प्रथम, द्वितीय व तृतीय स्थान प्राप्त विद्यार्थियों को व अनेक प्रतियोगिताओं में प्रथम व द्वितीय स्थान प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों को मुख्य अतिथि बिजेन्द्र माजरा व श्री योगेश कुमार गोयल ने संयुक्त रूप से पुरस्कृत किया।






Monday, March 21, 2011

जरा पहचानिए ... कौनसा है ये प्राणी? का सही जवाब


जी हां, इस फोटो में दिखाई दे रहा प्राणी तो एक नन्हीं गिलहरी ही है लेकिन क्या आपको यह गिलहरी थोड़ी अजीब नहीं लग रही?

 
यह चित्र है दक्षिण अफ्रीका के क्रूगर नेशनल पार्क का, जहां इस चित्र को एक फोटोग्राफर मोर्कल इरासमस ने अपने कैमरे में कैद किया.

इस फोटो में यह गिलहरी अपने बच्चे को मुंह में सुरक्षित ढ़ंग से दबाये हुए अपने नए घर में जा रही है.


Sunday, March 20, 2011

क्या आप जानते हैं?


लड़कियों से अधिक संवेदनशील होते हैं लड़के

एक अध्ययन के बाद यह बात सामने आई है कि लड़कियों के मुकाबले लड़के अधिक संवेदनशील होते हैं। अध्ययनकर्ता मनोवैज्ञानिक सेबेस्टिन क्रैमर का कहना है कि पुरूषों पर समाज द्वारा दबाव डाला जाता है कि वे कठोर बनें और भावुकता से दूर रहें। पैदा होने के बाद भी लड़के लड़कियों के मुकाबले अधिक कमजोर होते हैं और बचपन तथा किशोरावस्था में भी लड़कों को लड़कियों से अधिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। क्रैमर कहते हैं कि लड़कों को शुरू से ही कठोर समझा जाता है और उनके मनोवैज्ञानिक विकास की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाता। समाज लड़कों को कोमल हृदय एवं संवेदनशील नहीं बनने देता। यदि कोई लड़का शांत स्वभाव का है अथवा भावुक होकर रोने लगता है तो लोग उसका मजाक उड़ाने लगते हैं। क्रैमर के अनुसार संभवतः यही कारण है कि लड़कियां परीक्षाओं में लड़कों के मुकाबले अच्छे नंबर लाती हैं क्योंकि लड़कियों पर अक्सर कोई दबाव नहीं डाला जाता। किशोरावस्था में लड़कों द्वारा आत्महत्या करने की प्रवृत्ति भी लड़कियों के मुकाबले अधिक होती है क्योंकि वे भावनाओं और दबावों के बीच फंस जाते हैं। (मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स)

होली के रंग, राशियों के संग

होली पर विशेष

-- एम. कृष्णाराव राज (मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स)

रंग सबसे बड़े मूड्स लिफ्टर होते हैं। ऐसे में अगर होली राशियों के अनुकूल रंगों से खेली जाए तो यह सोने पे सुहागा वाली बात होगी। होली के पावन अवसर पर ‘मीडिया केयर ग्रुप’ की इस विशेष प्रस्तुति में आइए जानें होली वाले दिन किस राशि के जातक को किस रंग से रंगें:-

मेष

इस राशि के जातकों के लिए गुलाबी, भूरा और मैरून रंग होली खेलने के लिए सबसे उत्तम हैं। गुलाबी रंग हमारी भावनाओं को सक्रिय करता है। इसे प्रेम का प्रतीक माना जाता है, साथ ही यह रंग आजादी, खुशी, रचनात्मकता और भरपूर ऊर्जा का भी प्रतीक है। इसलिए गुलाबी रंग अधिकांश लोगों को पसंद आता है। रंग-मनोविज्ञान की समझ रखने वालों के मुताबिक दोस्तों, प्रेमी-प्रेमिकाओं के साथ होली खेलते समय इस रंग को तरजीह देनी चाहिए, भले ही वे मेष राशि के न हों।

वृष

इस राशि के लिए शुभ रंग है भूरा, पीला, क्रीम और काला। हालांकि काले रंग को हिन्दू संस्कृति में शुभ नहीं माना जाता लेकिन बिना काले रंग के रंगों की महफिल ही नहीं सजती। काला रंग अधिकार, ऊर्जा, औपचारिकता और समर्पण की भावना को भी दर्शाता है। यही कारण है कि इस रंग की होली में धूम रहती है। मगर वृष राशि वाले आमतौर पर होली खेलने में संकोच करते हैं लेकिन एक बार शुरू हो जाएं तो रंग जमा देते हैं।

मिथुन

इस राशि का मुख्य रंग है नीला मगर क्रीम और गुलाबी भी उन्हें लाभ देता है। मिथुन राशि के लोगों को नीला रंग मानसिक शांति देता है। नीला रंग एकता, शांति, ठंडक, वफादारी और सतर्कता का भी प्रतीक है। मिथुन राशि के अलावा दूसरी राशि के लोग भी इसे इस्तेमाल कर सकते हैं।

कर्क

इस राशि के जातक समय का अपने हित में बेहतर इस्तेमाल करने वाले होते हैं। उनकी यह आदत होली का आनंद उठाते समय भी बनी रहती है, इसलिए ये ऐसा कोई भी भड़कीला रंग नहीं चुनते। इनके लिए शुभ रंगों में मुख्य है हरा और दूसरे स्थान पर आता है नीला। हरा संतुलित रंग है, यह आंखों को सुकून देता है क्योंकि यह प्रकृति का रंग है। यह मानसिक ही नहीं, शारीरिक रूप से भी लाभकारी रंग है, जहां तक इस रंग की शख्सियतों के मनोविज्ञान की बात है तो हरा रंग पसंद करने वाले आत्मसंयमी, ताजगी पसंद, भावुक और सुरक्षा को पसंद करने वाले होते हैं।

सिंह

इस राशि के जातक होली खेलते समय पीले रंग को प्राथमिकता दें। पीला रंग खुशी, चतुराई और दोस्ती का रंग है। इससे हमारे विचारों में प्रखरता आती है और मन में सतर्कता बढ़ती है। पीला रंग भरोसा देता है। सिंह राशि के लोग नई चीजों से बड़ी सहजता से सामंजस्य बैठा लेते हैं और अपने व्यवहार में लचीलापन दर्शाते हैं। ये किसी के साथ भी सहजता से होली खेल लेते हैं।

कन्या

इस राशि के जातक को होली खेलते समय लाल रंग को प्रमुखता देनी चाहिए। लाल रंग जीवंतता का प्रतीक है। यह उल्लास और आत्मविश्वास को दर्शाता है। हालांकि यह गुस्से और आक्रामकता का भाव भी लिए रहता है मगर होली की मस्ती में यह रंग हमारी प्रतिरोधक क्षमता का सबूत होता है।

तुला

इस राशि के जातकों को नारंगी रंग को होली खेलनी में प्राथमिकता देनी चाहिए क्योंकि उनका प्रमुख शुभ रंग यही है। नारंगी रंग भी हमारी भावनाओं को सक्रिय करता है और समाज में हमारे मान-सम्मान को बढ़ाने वाला होता है। खुशी और ऊर्जा इसके सहज नतीजे होते हैं।

वृश्चिक

इस राशि से संबंधित लोगों को चॉकलेटी भूरे रंग को प्राथमिकता देनी चाहिए। यह त्याग और कला का रंग है। वृश्चिक राशि वाले अपने प्रियजनों के लिए त्याग करने में सबसे आगे रहते हैं। होली खेलते समय भी ये इस स्वभाव को दर्शाते हैं।

धनु

इस राशि के जातकों को ग्रे रंग और नीले रंग को प्राथमिकता देनी चाहिए। दरअसल धनु राशि वाले क्षमताओं से परिपूर्ण होते हैं लेकिन वे समय पर अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन नहीं कर पाते। इसलिए कुछ लोगों की नजरों में वे पीछे चलने वाले साबित होते हैं जबकि ऐसा नहीं है। वे अच्छे दोस्त होते हैं। खुशी को गहराई से एन्ज्वॉय करते हैं। इसलिए होली इनके लिए खास मायने रखती हैं।

मकर

इस राशि के जातकों को स्वाभाविक बुद्धिमान माना जाता है। इनका शुभ रंग है गुलाबी, ग्रे और बैंगनी मगर बैंगनी रंग को इन्हें अपने प्रमुख रंग के रूप में लेना चाहिए, खासतौर पर होली खेलते समय ये आध्यात्मिक पसंद होते हैं। इसलिए बैंगनी रंग से होली खेलते हुए ये अभिभूत रहते हैं।

कुंभ

इस राशि के तीन शुभ रंग हैं क्रीम, लाल और नीला। इन्हें छूट होती है कि ये तीनों में से किसी को भी प्राथमिकता दें क्योंकि इनके लिए तीनों रंगों का समान महत्व है। कुंभ राशि वाले अपनी मनपसंद राह से ही आगे बढ़ते हैं और दुनिया कुछ भी कहे, वो जिसे अपने लिए अच्छा मानते हैं, उससे कोई समझौता नहीं करते, इसीलिए इनके लिए सभी तीनों रंगों का एक सा महत्व है।

मीन

इस राशि के जातकों के लिए शुभ रंग है गहरा लाल, हल्का क्रीम, मैरून, गुलाबी और सफेद। आमतौर पर होली के धमाल के समय सफेद रंग गायब हो जाता है मगर यदि रंगों के मनोविज्ञान के नजरिये से देखें तो सफेद रंग बहुत महत्वपूर्ण है। यह स्वच्छता, शांति, सरलता और भोलेपन का प्रतीक रंग है। मीन राशि वाले आमतौर पर ऐसे ही होते हैं। यही वजह है कि इनसे हर कोई होली खेलना चाहता है और ये किसी का भी दिल नहीं दुखाते। (मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स)

Saturday, March 19, 2011

होली भर दे आपके जीवन में खुशियों के रंग

‘मीडिया केयर ग्रुप’

के सभी शुभचिंतकों को

होली के रंगारंग पर्व

की हार्दिक शुभकामनाएं.

होली का यह पर्व आप सभी के जीवन में खुशियों के रंग भर दे, यही कामना है.

जरा पहचानिए ... कौनसा है ये प्राणी?


जी हां, अपने दिमाग पर थोड़ा जोर लगाइए और इस चित्र में दिखाई दे रहे प्राणी को पहचानने की कोशिश कीजिए.

कहां का है ये दृश्य?



यदि आप यह भी बता सकें तो और भी अच्छा.




आपके पास दो दिन का समय है.

इसका सही जवाब हम आपको 21 मार्च को बताएंगे.

तो कोशिश कीजिए और दीजिए अपना जवाब.
प्राप्त होने वाले सभी जवाबों को टिप्पणी के रूप में प्रकाशित किया जाएगा.

आई रे, आई रे, होली आई रे



. जौली अंकल (मीडिया केयर नेटवर्क)

होली

गिले-शिकवे मिटाने का त्यौहार है, होली

मिलने-मिलाने का त्यौहार है,

जो खुद को

होली के रंगो में नही रंगता,

उसका तो जीवन ही बेकार है।

नत्थूराम जी ने अपनी पत्नी को प्यार से समझाते हुए कहा कि गली-मुहल्ले के सभी बच्चे होली खेल रहे है तो अपने चिन्टू को भी होली खेलने दो। उनकी पत्नी ने न आव देखा न ताव और चिल्लाते हुए बोली, ‘‘आप तो चुप ही रहो तो अच्छा है। तुम क्या जानो कि मुझे इसके होली खेलने से कितनी दिक्कत होती है?’’

नत्थूराम जी ने हैरान होते हुए पूछा, ‘‘ंिचन्टू के होली खेलने से भला तुम्हें क्या परेशानी हो सकती है?’’

‘‘आप कुछ नहीं जानते, पिछले साल जब यह होली खेलकर आया था तो मुझे कम से कम 10 बच्चों को नहलाकर यह अपना चिन्टू मिला था।’’

एक तरफ जहां होली का त्यौहार हम सभी के लिए ढ़ेरों खुशियां लेकर आता है, वहीं दूसरी ओर कुछ लोग अपनी गलतियों के कारण इस पवित्र त्यौहार में रंग में भंग डाल देते हैं। होली का त्यौहार आज न सिर्फ हमारे देश में बल्कि विदेशों में भी बड़ी खुशी, प्रेम, प्यार व सद्भावनापूर्ण तरीके से मनाया जाता है। यह त्यौहार हमेशा आपसी भाईचारा, मैत्री, सद्भावना और एकता बनाए रखने का संदेश देता आया है। इस अवसर पर लोग अक्सर पुराने गिले-शिकवे भूलकर एक दूसरे को गले लगा लेते हैं।

होली का नाम सुनते ही हर किसी के चेहरे पर एक मंद सी शरारत भरी मुस्कान आ जाती है। बसंत के मौसम में ढ़ोल, नगाड़ों और रंगों के इस बहुत ही पुराने त्यौहार की धूम सारे देश में देखने लायक होती है। इस त्यौहार के साथ बहुत सी प्रथाएं और कहानियां भी जुड़ी हुई हैं। सबसे लोकप्रिय और प्रचलित कहानी होलिका दहन की मानी जाती है। भगत प्रह्लाद को उसकी बहन होलिका द्वारा आग से बचाने की खुशी में इस त्यौहार को बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक भी माना जाता है।

भगवान कृष्ण एवं राधिका के अनेक किस्से-कहानियां भी इस त्यौहार से जुड़े हुए हैं। देश के कई हिस्सांे में इस मौके पर मंदिरों को बहुत ही खूबसूरती से सजाकर भजन-कीर्तन का भव्य आयोजन भी किया जाता है। राधा के जन्म स्थान मथुरा के नजदीक बरसाना की होली तो सदा ही हम सब के लिए कुछ खास होती है। यहां होली अत्यधिक श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई जाती है। नंद गांव के सभी लड़के बरसाना की लड़कियों के साथ होली मनाने आते हैं। दिलचस्प बात तो यह है कि यहां पर इन सभी का स्वागत रंग और गुलाल के साथ बड़े-बड़े डंडों से भी किया जाता है। यह होली लट्ठमार होली के नाम से भी खासी प्रसिद्ध है। यह सारा माहौल उस समय और भी रंगीन हो जाता है, जब कोई मर्द डंडों की मार से डरकर अपनी हार मान लेता है, उस समय सभी लड़कियां उसे औरतों के कपड़े पहनाकर सभी लोगों के बीच में नृत्य करने की सजा देती हैं।

हर कोई गुलाल और पिचकारियों से एक दूसरे के ऊपर अधिक से अधिक रंग डालने की फिराक में रहता है। युवा प्रेमी तो आपस में होली खेलने का महीनों पहले से ही बेसब्री से इंतजार करते है। टोलियां बनाकर रंग के साथ-साथ वो अपना प्यार भी एक दूसरे पर लुटाते दिखाई देते हैं। हर किसी की जुबां पर बस एक ही बात होती है कि बुरा मत मानो होली है। इसके बाद सभी लोग हलवा, पूरी और गुझियां से एक दूसरे का मुंह मीठा करवाते हुए एक दूसरे के गले मिलते हैं।

इतना सब कुछ होते हुए भी अक्सर इस त्यौहार पर कुछ लोग कुछ बातों को लेकर आपस में अत्यधिक नाराज हो जाते हैं। उसका कारण यह है कि कुछ लोग मस्ती के मूड में गलत किस्म के रंग एक दूसरे के चेहरे पर लगा देते हैं। यहां तक कि कई बार तो एक दूसरे के ऊपर कीचड़ तक डाल दिया जाता है, जिससे होली खेलने वालों के चेहरे और आखों पर बुरा असर पड़ता है। कुछ रंगों की प्रतिक्रिया होने के कारण हमारी चमड़ी सदा के लिए बदसूरत हो जाती है। समाज के चंद शरारती तत्व ऐसे मौके पर खुलकर भांग और अन्य कई प्रकार के नशे करने से भी नहीं चूकते, जिससे इस पवित्र त्यौहार का सारा महौल खराब होने का भय बना रहता है।

होली के मधुर-मिलन और प्यार के इस मौके पर हम तो भगवान से आप सभी के लिए यही दुआ मांगते है कि:-

रंगों के त्यौहार में,

सभी रंगों की हो बहार,

ढ़ेरांे खुशियों से,

भरा रहे आपका घर-संसार।

यही दुआ है हमारी उस मालिक से,

बार-बार, बार-बार, लाखों बार। (एम सी एन)

कहीं बरसें अंगार तो कहीं रंगों की बौछार

होली पर विशेष

. डा. अनिल शर्मा ‘अनिल’ (मीडिया केयर नेटवर्क)

फाल्गुन की मदमाती मस्त बयार और होली का रंगीला त्यौहार। वास्तव में इनके संगम में ऐसा उल्लास होता है, जिसकी मस्ती हर प्राणी के सिर चढ़कर बोलती है। भारतीय संस्कृति के अभिन्न अंग होली को मनाने की रोचक परम्पराएं भारत के हर प्रांत एवं क्षेत्र में अलग-अलग हैं। राजस्थान के हाड़ौती क्षेत्र की कोड़ामार होली, बादशाही होली, ब्रज क्षेत्र की लट्ठमार होली, बंगाल की डोल पूर्णिमा, धामपुर का होली हवन जुलूस और जयपुर की हाथियों पर बैठकर खेली जाने वाली होली की तो जगत प्रसिद्ध परम्पराएं हैं। होली के रंगीले अवसर पर मीडिया केयर नेटवर्क की खास पेशकश में ऐसी ही कुछ रोचक परम्पराओं की ऐसी झलक प्रस्तुत हैं, जिनसे होली की मस्ती-उमंग कई गुना बढ़ जाती हैं।

’ ब्रज क्षेत्र (उत्तर प्रदेश) की होली राधा-कृष्ण की होली मानी जाती है। नंदगांव बरसाने की लट्ठमार होली तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हो चुकी है।

’ इसी क्षेत्र के फालैन गांव की होली में पण्डा जलता होली के बीच से गुजरता है। इस दृश्य को देखने के लिए वहां भारी भीड़ जमा होती है।

’ राजस्थान के हाड़ौती क्षेत्र में कोड़ामार होली व बादशाही होली मनाई जाती है तो बाड़मेर क्षेत्र में पत्थरमार होली। यहां के महावीर मंदिर में भी लट्ठमार होली का आयोजन होता है।

’ जयपुर में होली पर हाथियों पर बैठकर खेली जाने वाली होली को देखने के लिए देश-विदेश से बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं।

’ गुजरात में होली को बुआ कहते हुए उसके पुतले जलाने के बाद प्रसाद भी बांटा जाता है। यहां इस त्यौहार को ‘हुलोसनी’ भी कहा जाता है।

’ महाराष्ट्र में जलती होली के चारों ओर नाच होता है। दिन में घर में झाडू की पूजा करने के बाद इन्हें जला देते हैं। इसे ‘शिमगा’ भी कहा जाता है। मान्यता है कि झाडू जला देने से आपदाएं नहीं आती।

’ असम, उड़ीसा, मणिपुर व बंगाल में होली पर्व पर राधा-कृष्ण संबंधी नृत्यों का आयोजन किया जाता है। इनमें इस पर्व को ‘डोलयात्रा’ के रूप में मनाते हुए राधा-कृष्ण की झांकी सजाकर शोभायात्रा निकालने की भी परम्परा है। उड़ीसा में इसे ‘तिग्या’ भी कहा जाता है।

’ गुजरात में मामा अपने नवजात भांजे को गोदी लेकर होली की परिक्रमा करता है। कहीं-कहीं नवविवाहित जोड़ा भी होली की फेरी (परिक्रमा) लेता है।

’ महाराष्ट्र में होलिका दहन की राख से कुवांरी कन्याएं दूसरे दिन गौरी मैया की तस्वीर बनाती हैं। ऐसा माना जाता है कि इस पूजा से प्रसन्न गौरी माता उन्हें मनचाहा वर प्राप्त करने का आशीर्वाद देती हैं।

’ धामपुर (उत्तर प्रदेश) में तो फागुन शुक्ल एकादशी से ही रंगों की बौछार शुरू हो जाती है, जो होलिका दहन के बाद निकलने वाले होली हवन जुलूस और रंगों की बौछार के साथ ही सम्पन्न होती है। इस बीच अन्य विविध आयोजन भी होते हैं।

’ काशी व वाराणसी की होली तो ठंडाई के बिना पूरी ही नहीं होती। यहां विभिन्न हास्य कवि गोष्ठियों व कार्यक्रमों के अलावा विशेष होली साहित्य के प्रकाशन की भी परम्परा है।

’ पंजाब में आनंदपुर का ‘होला मोहल्ला’ तो जगत प्रसिद्ध है। यहां कुश्तियों के दंगल होने के अलावा रंगों की बौछार भी जमकर होती है।

’ हिमाचल प्रदेश में होली पर ‘दंदोध’ नामक पौधे की पूजा की परम्परा है। होली की राख इस विश्वास के साथ खेतों में बिखेरी जाती है कि इस वर्ष फसल अच्छी होगी।

’ मालवा के लोग होली दहन के बाद एक दूसरे पर जलते अंगारे फैंकते हैं। ऐसी मान्यता है कि जलते अंगारों के डर से बुरी हवा / आत्मा भाग जाती है।

’ पश्चिम बंगाल में गधे पर एक व्यक्ति को बिठाकर ‘होली का राजा’ बनाने और हंसी-मजाक करने की परम्परा है।

’ कर्नाटक में तो ‘मदन दहन’ यानी ‘काम दहन’ के रूप में होली मनाने की परम्परा है। यहां एक सुंदर युवक को कामदेव बनाया जाता है और उसे लोग खूब दौड़ाते हैं, उसके पीछे भागते हैं। यह प्रथा कामदेव को भस्म करने का प्रतीक है।

’ बुन्देलखण्ड की गुड़ पाने की होली की प्रथा बहुत रोचक है। इसमें एक ऊंचे खम्भे पर गुड़ रखा जाता है। लोग गुड़ पाने के लिए खम्भे पर चढ़ते हैं और महिलाएं लाठी के वार करते हुए उन्हें खम्भे पर चढ़ने से रोकती हैं।

’ लबांदि जाति (तमिलनाडु) में तो होली के दिन पुरूष महिलाओं के हाथ से भोजन को छीनने का प्रयास करते हैं। छीना-झपटी के दौरान हंसी-मजाक चलता है और बाद में सहभोज होता है।

बहरहाल, प्रथाएं तो हर जगह की भिन्न-भिन्न हैं परन्तु उद्देश्य एक ही है - होली की मस्ती में मस्त होना। (एम सी एन)

Monday, March 14, 2011

हैल्थ इज वैल्थ

विश्व का सबसे बदबूदार पौधा


जी हां, ये है विश्व का सबसे बदबूदार पौधा, जो सड़े हुए मांस जैसी अत्यंत तीखी दुर्गन्ध छोड़ता है। इस पौधे के संबंध में सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह पौधा मात्र तीन दिन ही जीवित रहता है। ‘एमोरफोफालस टाइटानम’ नामक इस पौधे की गिनती विश्व के सबसे बड़े पौधों में भी होती है। यह दृश्य है बेल्जियम के नेशनल बौटेनिक गार्डन का, जहां पर्यटक बड़े कौतूहल से इस पौधे को निहार रहे हैं।

हाथियों की विशाल दावत


इंसानों की दावत तो आप अक्सर देखते ही रहते होंगे लेकिन क्या आपने कभी जानवरों की दावत भी देखी है और वो भी विश्व के सबसे बड़े प्राणी हाथियों की? तो लीजिए प्रस्तुत की हाथियों की विशाल दावत की एक झलक।

यह दृश्य है उत्तरी थाईलैंड के चियांग माई में ‘माए सा एलिफैंट कैम्प’ में ‘थाईलैंड एलिफैंट्स डे’ समारोह का। समारोह के दौरान विशेष रूप से हाथियों के लिए ही परोसे गए फलों की दावत खाता हाथियों का समूह।

केंचुए ढूंढ़ती वुडकॉक

Tuesday, March 08, 2011

लीजिए प्रस्तुत है ‘कौन है ये हसीना’ का सही जवाब


हमने कल आपसे पूछा था कि यह फोटो किस हसीना का है?

जी हां, यह हसीना है बॉलीवुड की सिजलिंग ब्यूटी प्रियंका चोपड़ा की चचेरी बहन परिणीति चोपड़ा, जो यशराज फिल्मस की आने वाली फिल्म से बतौर हीरोइन अपने ग्लैमरस कैरियर का आगाज कर रही हैं। वैसे तो यशराज फिल्मस के साथ परिणीता का पुराना रिश्ता है, वह पहले से ही बतौर मार्किटिंग एक्जिक्यूटिव यशराज फिल्मस के साथ जुड़ी हुई थी और अब यशराज की मनीष शर्मा के निर्देशन में बन रही फिल्म ‘लेडीज वर्सेज रिकी बहल’ में महत्वपूर्ण किरदार निभा रही हैं। इस फिल्म में रणवीर सिंह तथा अनुष्का शर्मा लीड रोल कर रहे हैं।

Monday, March 07, 2011

पहचानिए ... कौन है ये हसीना?


जरा दिमाग के घोड़े दौड़ाइए और बताइए कि कौन है ये हसीना?

चलिए आपको इतना हिंट तो दे ही देते हैं कि इस हसीना के दर्शन आपको बहुत जल्द बॉलीवुड की एक फिल्म में होंगे.

तो जरा सोचिये और बताइए.

हम इसका सही जवाब आपको कल देंगे।

Sunday, March 06, 2011

क्षितिज के पार झांकती लड़की


अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस (8 मार्च) पर विशेष

-- घनश्याम बादल (मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स)

अब उसे आप ‘देवी’ कहें या वेदी पर चढ़ा दें, उसे भाई की दोयम ‘बाई’ (‘बहन’ का राजस्थानी पर्याय) बनाकर उसकी प्रतिभा का गला घोंट दें या गमले में सजे बोनसाई के पौधे की तरह सजावट की वस्तु बनाकर धूप, गर्मी, पानी में मरने-खपने के लिए भाग्य के भरोसे छोड़ बेफिक्र होकर बैठ जाएं, उसे छुई-मुई बनाकर घर में छुपाकर रखें या फिर जो कुछ जी में आए, करें। हर बार अपनी मर्दानगी, पौरूष या नर होने के गर्व की तुष्टि-पुष्टि ही ज्यादा सामने आती रही है। और यह सब कोई आज, कल या परसों की नहीं बल्कि बरसों की मनोवृत्ति का यथार्थ है तथा इसकी भुक्तभोगी रही है लड़की।

आदम की हव्वा रही हो या महाभारत की द्रौपदी, मुगलकाल की अनारकली या राजपूत काल की पद्मिनी, उसे बचपन से ही ऐसे पाला-पोसा, सिखाया-पढ़ाया गया कि बड़ी होकर भी दासता या आत्मबलिदान, बलि की पात्र, त्याग की मूर्ति जैसे मूल्य बस उसी के हिस्से आए। बचपन में भाई, युवावस्था में पति के नाम पर पुरूष प्रधानता को उस पर न केवल लादा गया अपितु दबने पर उसे ‘आदर्श’ और विरोध करने पर ‘पतिता’ ‘पथभ्रष्टा’ जैसी संज्ञाएं भी मिली यानी उसे मिला ‘अंधकार’ और ‘उजाले’ पर रखा गया कब्जा।

मगर फिर भी लड़की पूरी ‘लड़का’ निकली। कैक्ट्स की तरह कहीं भी उगने का माद्दा उसने खुद में पैदा किया, वह भी कांटे न उगाते हुए, फूल खिलाते हुए। वही है, जो इन तमाम विपरीत परिस्थितियों व मूल्यों के अवमूल्यन के दौर में न केवल ‘पीपल’ सी पवित्र रही, सृजना की ऑक्सीजन लुटाती, संजोती, बांटती रही और किसी भी रूखे से रूखे ‘बरगदों’, ‘नीमों’ पर पूरे जज्बे के साथ उगती रही है।

बेशक आज की लड़की अग्नि परीक्षा देने को उद्यत सीता नहीं रही वरन् सिर उतारने को तत्पर सैनिक की भूमिका तक आ चुकी है। उसने बावजूद दैहिक, भौतिक सीमाओं के, बावजूद कोमलांगी होने के और संवेदना से परिपूर्ण रहकर भी अपराजेय पराक्रम का प्रदर्शन किया है। जीवन के हर क्षेत्र के चूल्हे-चौके के आंख फोडू धुएं से बाहर निकल लड़की ने उजास बांटी है, प्रकाश दिया है। सहज शब्दों में ही नहीं, आंकड़ों के गवाक्ष से देखने पर भी आज लड़की बहुत बड़ी और बहुत आगे निकल आई साफ नजर आने लगी है।

प्राथमिक शिक्षा से कभी वंचित रहने वाली लड़की ने महज दो दशक में ही शिक्षा के क्षेत्र में अपना वर्चस्व कायम कर लिया है। परीक्षा में तो ऐसे लगने लगा है कि मानो पहले उच्च स्थानों को उसने अपने नाम आरक्षित ही कर लिया है। पाठ्य सहगामी गतिविधियों में सांस्कृतिक क्षेत्र से आगे बढ़ अब ताकत के खेलों, मार्शल आर्ट्स, जूडो कराटे, कुंग-फू, ताईक्वांडो जैसे खेलों में अपने कौशल के द्वारा महारत हासिल कर गुंडों, मवालियों और बलात्कारियों से लड़ने की शुरूआत भी कर दी है। इसलिए सावधान! लड़की बढ़ रही है, लड़ रही है और पूरी तरह अड़ रही है। अब वह ‘बोनसाई’ बन बालकनी में सजने को तैयार नहीं है वरन् उसने अपनी जड़ें जमाने के लिए जमीन पाने की जंग का ऐलान पूरी शिद्दत से कर भी दिया है।

लड़की अब न तो ‘बालिका वधू’ बन लुटने, पिटने, पिसने को तैयार है और न ही सात फेरों के चक्कर में उलझ अपने कैरियर का बलिदान देने वाली रही है वरन् उसने खुद को खुद के लिए जीने व अपना श्रेष्ठ पाने, देने की मानसिकता में ढ़ाल लिया है। अब वह हाथ पसारकर लेने या भाग्य से मिल जाने की स्थिति से निकल अपना हक छीनने की सोचने ही नहीं लगी है बल्कि वैसा ही आचरण करने में संकोच भी नहीं करती है। भले ही मादा भ्रूण हत्या कर पुरूष उसे संख्यात्मक दृष्टि से दबोचने पछाड़ने में जुटा हो पर लड़की है कि काबू में रहने को तैयार नहीं है अपितु उसने प्रछन्न चेतावनी भी दे दी है कि यदि मादा भ्रूण हत्या न रूकी तो भी पछताना ‘नर’ को ही है क्योंकि सृष्टि के असंतुलन में वह अकेला लड़ नहीं, मात्र भटक सकता है और सच में, इस भटकाव से बचने की जरूरत भी है आज।

आज के ‘सरवाइवल ऑफ द फिटेस्ट’ के इस युग में ‘लड़की’ ने लड़कर खुद को ‘फिट टु फिटेस्ट’ की पोजीशन में तो पहुंचा ही दिया है पर अभी भी समाज के चिंतन को बदलने में वह कामयाब नहीं हुई है। हालांकि टी. वी. के गांव-गांव तक लड़की केन्द्रित विज्ञापन पहुंचे जरूर हैं पर अभी भी वे गहन चिंतन की रेखा खींचने में कामयाब नहीं हो पाए हैं, दूरदराज के गांवों की गोरियां आज भी आत्म निर्णय की स्थिति से कोसों दूर हैं, शिक्षा का मतलब आज भी वहां साक्षरता या फिर ज्यादा से ज्यादा प्रमाण पत्र पाकर अच्छा घर व वर पाने का साधन मात्र है।

अब सीधी सी बात है कि यदि एक हजार नर शिशुओं पर सिर्फ नौ सौ के आसपास लड़कियां ही होंगी तो आने वाले समय में बहनों, मांओं, भाभियों, चाची, ताईयों, आंटियों व दुल्हनों का अकाल तो पड़ेगा ही न और तब कहीं रिश्तों की मर्यादा पूर्णतः ध्वस्त न हो जाए, जीवनसाथी की तलाश और चाह संघर्ष एवं खूनखराबे में न बदल जाए, इस पर आज ही गंभीरतापूर्वक सोचने एवं निर्णयात्मक कदम बढ़ाने की सख्त जरूरत है और जरूरत को अपनी क्षमता, योग्यता, कर्मठता, जिजीविषा व कौशल से रेखांकित कर रही है आज की लड़की। (मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स)

(लेखक ‘मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स’ के लिए लिखते रहे हैं)

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Friday, March 04, 2011

शमिता को नहीं मिला पहला प्यार


‘मीडिया केयर नेटवर्क’ द्वारा
‘पंजाब केसरी’ (पंजाब, हरियाणा एवं हिमाचल)
में 04.03.2011 को प्रकाशित

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