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Sunday, March 28, 2010

पुस्तक समीक्षा : हमारा महानगर (दिल्ली व मुंबई)


Artiles: धूम्रपान: कुछ सनसनीखेज तथ्य

Artiles: धूम्रपान: कुछ सनसनीखेज तथ्य

धूम्रपान: कुछ सनसनीखेज तथ्य

जानकारी

. योगेश कुमार गोयल (मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स)

’ विश्वभर में इस समय एक अरब से भी अधिक व्यक्ति धूम्रपान करते हैं जो प्रतिवर्ष 5000 करोड़ से अधिक सिगरेटें फूंक डालते हैं।
’ सिगरेटों के बजाय भारत में बीड़ियों का प्रचलन अत्यधिक बढ़ा है और ऐसा अनुमान है कि देश में प्रतिवर्ष करीब सौ अरब रुपये मूल्य की बीड़ियों का सेवन किया जाता है।
’ विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार एशिया में 1988 से 1996 के बीच सिगरेटों की खपत में 20 प्रतिशत की वृद्धि हुई और भारत में इस दौरान यह वृद्धि 19 प्रतिशत दर्ज की गई।
’ भारत में प्रतिवर्ष लगभग 53 करोड़ किलोग्राम तम्बाकू का उत्पादन होता है, जिसमें से 35 करोड़ कि.ग्रा. का उपयोग सिगरेट बनाने में तथा 15 करोड़ कि.ग्रा. का उपयोग बीड़ी बनाने में किया जाता है।
’ भारत में प्रतिदिन 2.1 प्रतिशत की दर से धूम्रपान करने वालों की संख्या में वृद्धि हो रही है और प्रतिदिन 5000 स्कूली छात्र एवं आवारा बच्चे धूम्रपान करने वालों में शामिल हो रहे हैं।
’ भारत में प्रतिदिन 3000 से भी अधिक व्यक्तियों की मृत्यु तम्बाकू जनित बीमारियों के कारण हो रही हैं, जिनमें से 300 व्यक्ति ऐसे होते हैं, जो स्वयं धूम्रपान नहीं करते बल्कि धूम्रपान करने वालों के निकट होते हैं।
’ भारत में प्रतिदिन धूम्रपान से मरने वालों की संख्या सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों के मुकाबले 20 गुना है जबकि एड्स से देश में जितनी मौतें 10 वर्ष में होती हैं, उतनी मौतें धूम्रपान की वजह से मात्र एक सप्ताह में ही हो जाती हैं।
’ विश्व में करीब 1.1 अरब व्यक्ति धूम्रपान के आदी हैं, जिनमें से 80 करोड़ व्यक्ति विकासशील देशों के तथा 30 करोड़ विकसित देशों के हैं।
’ विश्व भर में धूम्रपान करने वाले पुरूषों की संख्या 90 करोड़ और महिलाओं की संख्या 20 करोड़ है।
’ चीन में धूम्रपान करने वालों की संख्या लगभग 35 करोड़ और भारत में यह संख्या करीब 30 करोड़ है।
’ विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि यदि यही स्थिति बरकरार रही तो सन् 2020 तक चीन में धूम्रपान से मरने वालों की संख्या प्रतिवर्ष 50 लाख हो जाएगी।
’ विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार प्रतिदिन 11000 लोग तम्बाकू के सेवन के कारण काल का ग्रास बनते हैं, जिनमें से लगभग 8000 व्यक्ति फेफड़ों के कैंसर के शिकार होते हैं।
’ विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार प्रतिवर्ष विश्व भर में 8000 से अधिक नवजात शिशु धूम्रपान के कारण ही असमय काल के ग्रास बन जाते हैं।
’ विभिन्न रिपोर्टों और आंकड़ों से पता चलता है कि सभी प्रकार के कैंसर में 40 फीसदी की प्रमुख वजह धूम्रपान ही होता है। धूम्रपान करने वाले व्यक्तियों को धूम्रपान न करने वालों की अपेक्षा फेफड़ों का कैसर होने की संभावना 15 गुना अधिक होती है।
’ यदि धूम्रपान की यही प्रवृत्ति जारी रही तो इससे होने वाली मौतों की संख्या 2020 तक प्रतिवर्ष एक करोड़ हो जाने की संभावना है, जिसमें से 70 लाख मौतें विकासशील देशों में ही होंगी।
’ धूम्रपान करने वालों की संख्या इसी कदर बढ़ती रही तो विश्व की कुल आबादी का 6 प्रतिशत हिस्सा तम्बाकू सेवन के कारण ही मारा जाएगा।
’ प्रतिदिन 20 सिगरेट तक पीने वाली गर्भवती महिला के बच्चे की मृत्यु होने की संभावना सामान्य से 20 प्रतिशत बढ़ जाती है जबकि 20 से अधिक सिगरेट पीने पर यह खतरा 35 प्रतिशत तक हो जाता है। (मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स)

अगर खरीदें पुराना कम्प्यूटर

परामर्श

. योगेश कुमार गोयल (मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स)

प्रायः वो लोग, जिन्हें प्रोफैशनल कार्य के लिए कम्प्यूटर की आवश्यकता नहीं होती पर कुछ अन्य कार्यों के लिए कम्प्यूटर खरीदना चाहते हैं, वे अक्सर पुराने कम्प्यूटर की तलाश में रहते हैं क्योंकि नए कम्प्यूटर के मुकाबले यह उन्हें काफी कम मूल्य में उपलब्ध हो जाता है लेकिन आप भले ही किसी भी उद्देश्य से पुराना कम्प्यूटर खरीद रहे हों, कम्प्यूटर खरीदते समय आपको कम्प्यूटर की क्वालिटी और उसकी कार्यक्षमता के बारे में कई अहम बातों का ध्यान अवश्य रखना चाहिए क्योंकि हो सकता है कि इस मामले में थोड़ी सी लापरवाही बरतने के कारण आपको बाद में अपने निर्णय को लेकर कोई पछतावा हो और ऐसा लगे कि आपके साथ धोखा हुआ है। इसलिए यदि आप पुराना कम्प्यूटर खरीद रहे हैं तो इन बातों का विशेष ध्यान रखें:-
’ पुराना कम्प्यूटर खरीदने से पहले एक सूची बना लें, जिसमें उन सब चीजों का विवरण लिख लें, जो-जो आप अपने कम्प्यूटर में चाहते हैं।
’ कम्प्यूटर खरीदते समय सबसे पहले यह जान लेना आपके लिए बहुत जरूरी है कि जो कम्प्यूटर आप खरीद रहे हैं, वह कितना पुराना है, वह अभी वारंटी अथवा गारंटी पीरियड में है या नहीं। यदि खरीदे जा रहे कम्प्यूटर सैट की वारंटी अवधि समाप्त हो चुकी है तो क्या इसके कुछ महत्वपूर्ण पार्ट्स की वारंटी अभी बाकी है और यदि है तो कितनी? प्रायः अधिकांश कम्प्यूटरों की वारंटी एक वर्ष की ही होती है लेकिन मॉनीटर, मदरबोर्ड, सीपीयू इत्यादि कुछ महंगे पार्ट्स की वारंटी 3 साल तक की भी होती है तथा हार्ड डिस्क की वारंटी पांच वर्ष तक भी होती है। यदि कम्प्यूटर या इसके किसी भी पार्ट की वारंटी शेष है तो विक्रेता से सभी वारंटी पेपर लेना हरगिज न भूलें।
’ यदि कोई भी पार्ट वारंटी में नहीं है तो ऐसा कम्प्यूटर खरीदते समय आप विक्रेता पर इस बात का हवाला देते हुए कीमत और कम करने के लिए दबाव डाल सकते हैं क्योंकि ऐसा कम्प्यूटर खरीदने के बाद कोई भी खराबी आने पर आपको फिर से उस पर खर्च करना होगा।
’ कम्प्यूटर खरीदते समय विक्रेता से उसकी सर्विस इत्यादि के बारे में भी विस्तार से जानकारी ले लें ताकि बाद में कम्प्यूटर में किसी भी प्रकार की खराबी आने पर आपको उसकी रिपेयर अथवा सर्विस के लिए नाहक परेशानी न झेलनी पड़े।
’ अब कम्प्यूटर के हार्डवेयर की जांच करें कि इसके साथ कौन-कौनसे हार्डवेयर पार्ट्स (फ्लॉपी ड्राइव, सी.डी. राइटर अथवा डीवीडी राइटर, साउंड कार्ड, मॉडम इत्यादि) जुड़े हैं।
’ यह भली-भांति जांच लें कि जिस कॉन्फीगरेशन के कम्प्यूटर के लिए आप कीमत अदा कर रहे हैं, वास्तव में आप वही सब पा भी रहे हैं। मसलन, हार्ड डिस्क का साइज, रैम की मात्रा, सी. पी. यू. की स्पीड, सीडी अथवा डीवीडी राइटर की कार्यक्षमता इत्यादि अच्छी तरह जांच लें।
’ कम्प्यूटर के साथ जो-जो हार्डवेयर अथवा उपकरण (मदरबोर्ड, डिस्प्ले कार्ड, साउंड कार्ड, मॉडम इत्यादि) जुड़े हैं, उन सभी के ‘ड्राइवर’ की फ्लॉपी, सी.डी. या डीवीडी विक्रेता से अवश्य मांग लें क्योंकि यदि आपको भविष्य में कभी भी ये सभी दोबारा ‘इन्स्टाल’ करने की जरूरत हुई तो आपको इनके ‘ड्राइवर’ की आवश्यकता पड़ेगी या फिर आप भविष्य में कभी अपने कम्प्यूटर को अपग्रेड कराना चाहेंगे अथवा विन्डो दोबारा लोड कराना चाहेंगे, तब तो इनकी जरूरत पड़ेगी ही।
’ कम्प्यूटर में सबसे ज्यादा उपयोग में आने वाले मैकेनिकल पाटर््स हैं की-बोर्ड तथा माउस। इसलिए इनकी खासतौर से जांच कर लें कि ये दोनों सही ढ़ंग से कार्य कर रहे हैं या नहीं। की-बोर्ड का कोई बटन अटक तो नहीं रहा है और माउस का प्वाइंटर भी कहीं अटक तो नहीं रहा।
’ जो कम्प्यूटर आप खरीद रहे हैं, यदि उसके एक्सपॉशन स्लॉट की कवर प्लेट या अन्य हिस्सों पर जंग लगा दिखाई देता है तो इसका अर्थ है कि या तो इसका काफी समय से इस्तेमाल ही नहीं हुआ है या फिर इसकी सही ढ़ंग से देखभाल नहीं की गई है, ऐसे कम्प्यूटर में खराबी आने की संभावना ज्यादा रहती है, इसलिए सोच-समझकर ही ऐसे कम्प्यूटर को खरीदने का निर्णय लें।
’ यदि कम्प्यूटर को ‘ऑन’ करने के बाद आपको इसमें कोई असामान्य सी आवाज सुनाई देती है तो इसका अर्थ है कि इसके किसी पार्ट में कोई खराबी है। प्रायः हार्ड डिस्क, सीडी अथवा डीवीडी रोम, फ्लॉपी ड्राइव इत्यादि खराब होने पर इस प्रकार की असामान्य आवाज करते हैं।
’ यह भी देख लें कि सिस्टम फैन तथा सीपीयू फैन सही प्रकार से कार्य कर रहे हैं या नहीं। कई बार धूल जमा होने के कारण ये फैन कार्य करना बंद कर देते हैं और ऐसे में कम्प्यूटर का तापमान बढ़ने के कारण कम्प्यूटर में गड़बड़ी आने की संभावना अधिक हो जाती है।
’ कई बार कम्प्यूटर खरीदने के कुछ समय बाद ही लोग इसे अपग्रेड कराने की जरूरत महसूस करने लगते हैं। जैसे कि अधिक डाटा स्टोर करने के लिए और बड़ी हार्ड डिस्क लगवाना, रैम की मात्रा बढ़वाना, अधिक स्पीड वाला प्रोसेसर (सीपीयू) लगवाना इत्यादि। इसलिए पुराना कम्प्यूटर खरीदते समय इसके अपग्रेड हो सकने की क्षमता संबंधी समुचित जानकारी अवश्य हासिल कर लें क्योंकि कुछ पुराने कम्प्यूटरों में इन सब चीजों को अपग्रेड कराना संभव नहीं होता।
’ कम्प्यूटर लेते समय उसकी विशेषतः सभी बाहरी केबल्स (तारों) की अच्छी तरह जांच कर लें कि कहीं कोई केबल कटी-फटी तो नहीं।
यदि आप इन सभी बातों को ध्यान में रखकर पुराना कम्प्यूटर खरीदते हैं तो हम दावे के साथ कह सकते हैं कि आपको पुराना कम्प्यूटर खरीदने के अपने फैसले पर भविष्य में कभी पछताना नहीं पड़ेगा। (मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स)

मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स, मेन बाजार बादली, जिला झज्जर (हरियाणा)-124105.

जीव जंतुओं की अनोखी दुनिया-44




सबसे उग्र मछली ‘ब्लू फिश’
भूमध्य रेखा से कर्क रेखा तथा मकर रेखा के निकटवर्ती समुद्रों में पाई जाने वाली शारीरिक रूप से बलिष्ठ ‘ब्लू फिश’ दुनिया की सबसे उग्र मछली मानी जाती है। इस मछली के शंक्वाकार दांत बेहद नुकीले और मजबूत होते हैं। गहरे समुद्र में विशाल समूहों में रहने वाली ये मछलियां अन्य मछलियों तथा समुद्रफेनी का भोजन करती हैं। ये कितनी खतरनाक और उग्र प्रवृत्ति की मछलियां हैं, इसका अनुमान आप इसी से लगा सकते हैं कि गहरे पानी के भीतर ये छोटी मछलियों के समूहों पर इस प्रकार धावा बोलती हैं कि उनके पूरे-पूरे समूह का नामोनिशान तक मिट जाता है और वहां बच जाता है उन मछलियों के पूरे समूह की हड्डियों का ढ़ेर। हर साल ये ब्लूफिश करीब सवा अरब मछलियों को अपना भोजन बना डालती हैं। मछुआरे इन मछलियों को हर साल बहुत बड़ी तादाद में पकड़ते हैं किन्तु कई बार ये मछलियां अपने नुकीले तेज दांतों से मछुआरे के जाल को भी काट डालती हैं। ब्लूफिश प्रायः अमेरिका के तटवर्ती क्षेत्रों में तो बहुतायत मेें पाई जाती हैं, जो विशाल समूहों में गहरे समुद्र में रहती हैं और केवल गर्मियों में ही तटीय क्षेत्रों के छिछले पानी में आ जाती हैं। ब्लूफिश बहुत तेज गति से तैरने में सक्षम होती है, यहां तक कि इसके छोटे बच्चे भी तेज गति से तैरने में सक्षम होते हैं और बहुत छोटे-छोटे बच्चों के भी पूर्ण विकसित तीखे दांत होते हैं। (एम सी एन)
खतरा भांपते ही शरीर गुब्बारे की तरह फुला लेती है ‘पफ्फर’ मछली
भारतीय महासागर में पूर्वी अफ्रीका के तट से लेकर आस्ट्रेलिया तक तथा प्रशांत महासागर में हवाई से लेकर जापान तक पाई जाने वाली पफ्फर मछली मछलियों की एक ऐसी विशेष प्रजाति है, जो जरा सा खतरे का आभास होते ही अपने शरीर को पफ्फ कर लेती है यानी गुब्बारे की तरह फुला लेती है और इसकी इसी विशेषता के कारण ही इस मछली को ‘पफ्फर’ के नाम से जाना जाता है। इसके शरीर पर छोटे-छोटे कांटे होते हैं, जो इसका शरीर फूलते ही खड़े हो जाते हैं। अपने शरीर को गुब्बारे की भांति फुलाने की क्रिया पफ्फर मछली अत्यधिक मात्रा में पानी पीकर करती है। टोड मछली, टोबीज तथा फूगू मछली इसी प्रजाति में आने वाली मछलियां हैं। हालांकि पफ्फर मछलियों को विश्व के कई भागों और खासकर जापान में बड़े चाव से खाया जाता है लेकिन इस मछली के शरीर के कई अंग जैसे जिगर, आंतें, रक्त इत्यादि बेहद विषैले होते हैं, जिसके कारण हर साल जापान में कई लोग इस मछली के सेवन के कारण मौत के मुंह में समा जाते हैं। इस मछली का विष मनुष्य के शरीर में जाने के बाद उसके स्नायुतंत्र को निष्क्रिय बना सकता है, जिससे व्यक्ति को पक्षाघात भी हो सकता है और इस विष का प्रभाव खत्म करने वाली कोई दवाई भी अब तक नहीं बनी है। यही वजह है कि इस मछली को केवल विशेषज्ञ बावर्ची ही पका सकते हैं। (एम सी एन)
मछुआरों के लिए सोने के अण्डे के समान होती है ‘पोरक्यूपाइन’ मछली
हिन्द महासागर, प्रशांत महासागर तथा अटलांटिक महासागर के उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पाई जाने वाली ‘पोरक्यूपाइन’ मछली एक प्रकार की साही मछली ही है, जो पफ्फर मछली के परिवार से ही संबंध रखती है। साही की तरह ही इसके शरीर पर मौजूद कंटीले स्केल्स के कारण ही इस मछली का नाम पोरक्यूपाइन (साही) मछली पड़ा। इसके शरीर पर मौजूद ये कांटे हालांकि शरीर के साथ सटे हुए होते हैं मगर खतरा भांपते ही जब यह मछली अपने शरीर को फुलाती है तो ये कांटे भी सुरक्षा कवच की तरह खड़े हो जाते हैं। पफ्फर मछली की ही भांति यह मछली भी अपने शरीर को फुलाने की क्षमता रखती है। पोरक्यूपाइन मछली का छोटा सा चोंचनुमा मुंह होता है। दरअसल इसके दोनों जबड़ों के दांत आपस में जुड़े होते हैं, जो इस चोंच की तरह दिखते हैं। घोंघे, केकड़े, अर्चिन्स आदि इस मछली का पसंदीदा भोजन हैं और इन जीवों को खाने में यह कठोर चोंच इसकी बहुत मददगार साबित होती है। अगर किसी मछुआरे के जाल में कोई शरीर फुलाए हुए पोरक्यूपाइन मछली उस अवस्था में फंस जाए, जब उसके शरीर पर कांटे खड़े हों तो यह उसके लिए सोने के अण्डे के समान बेशकीमती साबित होती है। दरअसल ऐसी मछली को मछुआरों को मुंहमांगी कीमत मिल जाती है। (एम सी एन)

जीव जंतुओं की अनोखी दुनिया-43


विश्व की सबसे महंगी मछली ‘बेलूगा’
दुनियाभर में गहरे साफ पानी में पाई जाने वाली व्हेल प्रजाति की एक विशेष प्रकार की मछली है ‘बेलूगा’, जो विश्व की सबसे कीमती मछली मानी जाती है। दरअसल करीब पांच मीटर लंबी और औसतन डेढ़ टन से भी अधिक वजनी यह मछली भोजन के स्वादिष्ट व्यंजन के रूप में दुनियाभर में खाई जाने वाली सबसे महंगी मछली है। इस मछली से विविध प्रकार के व्यंजन बनाने के लिए इसे साधारण पानी से ही नहीं धोया जाता बल्कि इसे धोने के लिए शराब अथवा सिरके का प्रयोग किया जाता है और उसके बाद इसे सुखाकर इस पर नमक लगाया जाता है। इसके अण्डों से तो एक बहुत ही स्वादिष्ट व्यंजन बनाया जाता है, जो ‘कैवियार’ के नाम से जाना जाता है। इसी व्यंजन के लिए अण्डे प्राप्त करने के लिए ही कुछ समय पूर्व तक बड़ी तादाद में बेलूगा मछलियों को मारा जाता रहा है क्योंकि एक बेलूगा मछली के शरीर में करीब 150 किलोग्राम तक अण्डे होते हैं और यही वजह रही कि यह अनोखी मछली ऐसे जीवों की श्रेणी में पहुंच गई, जिन पर विलुप्तता का खतरा मंडरा रहा है लेकिन अब इस अद्भुत प्रजाति की मछली को मछली फार्मों में बड़ी तादाद में पाला जा रहा है और इससे अण्डे प्राप्त करने के लिए इसे मारे बिना ही इसके शरीर से अण्डे निकालने की तरकीब भी खोज ली गई है। बेलूगा मछली सर्दी के मौसम में तथा वसंत ऋतु में प्रायः नदियों में रहती हैं जबकि गर्मी का सीजन शुरू होते ही गहरे समुद्र में चली जाती हैं। (एम सी एन)
प्रकृति का बल्ब ‘जुगनू’
खासकर बारिश के मौसम में रात के समय पेड़-पौधों तथा वनस्पतियों पर या उनके आसपास जगमग-जगमग करते नन्हे-नन्हे जुगनू भला किसे अच्छे नहीं लगते। आसमान के तारों की भांति हमारे आसपास टिमटिमाते जुगनूओं को ‘प्रकृति का बल्ब’ भी कहा जा सकता है। दक्षिण अमेरिका के हरे-भरे जंगलों में जब जुगनू किसी वृक्ष पर अपने विशाल समूह के साथ आराम करते हैं तो दूर से देखने पर ऐसा लगता है मानो किसी ने उस वृक्ष पर हजारों-लाखों बल्ब जलाकर लटका दिए हों। जुगनू यूं तो हर जगह मिल जाते हैं लेकिन प्रायः ऐसे स्थानों पर ही बहुतायत में मिलते हैं, जहां का भौगोलिक पर्यावरण नम होता है, जहां प्रचुर मात्रा में वर्षा होती है और हरी-भरी सघन वनस्पतियां मौजूद होती हैं। दरअसल जुगनू पूर्णतः शाकाहारी जीव है, जिसका जीवन वनस्पति पर ही निर्भर है।
भारत, भूटान, मलाया, दक्षिण अमेरिका, साइबेरिया, दक्षिण अफ्रीका, थाईलैंड इत्यादि देशों में अधिक प्रकाश देने वाले कुछ विशिष्ट प्रजाति के जुगनू भी पाए जाते हैं। दक्षिण अफ्रीका के जंगलों में तो ऐसे विचित्र जुगनू भी मिलते हैं, जो 300 ग्राम तक वजनी होते हैं। इन जुगनुओं से इतना अधिक प्रकाश निकलता है कि करीब 10 फुट के गोल घेरदार क्षेत्र में इतनी तेज रोशनी हो जाती है, जिसमें कोई व्यक्ति बड़े आराम से किताब भी पढ़ सकता है। इन जंगलों में शिकार के लिए आने वाले शिकारी पेड़ों की डाल पर ऊंचाई पर झूले डालकर बैठते हैं और 3-4 जुगनुओं को पकड़कर उन्हें एक पतली डोर से बांधकर पेड़ की किसी डाल पर लटका देते हैं, जिनकी तेज रोशनी के कारण कोई हिंसक पशु पेड़ के नजदीक नहीं आता। रात के समय उष्णकटिबंधीय जंगलों से गुजरने वाले लोग तो प्रायः किसी कांच के जार अथवा पात्र में जुगनुओं को एकत्र कर लालटेन के रूप में उनका इस्तेमाल करते हैं।
भारत में तो हिमालय की तलहटी और तराई में जुगनुओं की ऐसी अनेक किस्में भी पाई जाती हैं, जिनके शरीर से न केवल रंग-बिरंगी रोशनी निकलती है बल्कि अपने मुंह से ये मधुर संगीतमय आवाज भी निकालते हैं। क्यूबा तथा उष्णकटिबंधीय देशों में तो युवतियां रात के समय अपनी पोशाकों में सुई-धागे से ही जुगनुओं को टांग लेती हैं या उन्हें गले में माला की तरह पिरोकर पहनती हैं पर वे यह काम इतने ध्यान से और बड़े आराम से करती हैं कि कोई भी जुगनू दबकर मरने न पाए। फिर ये युवतियां जहां भी जाती हैं, जुगनुओं के प्रकाश के कारण इनके चारों ओर उजाला रहता है।
साइबेरिया में पाए जाने वाले जुगनू प्रायः हरे रंग के होते हैं। रात को इन जुगनुओं की रोशनी का लाभ उठाने के लिए यहां के आदिवासी हरे पेड़ों की टहनियों को थोड़ा-थोड़ा शहद लगा देते हैं, जिसकी गंध से सम्मोहित होकर जुगनू इन पेड़ों की ओर खिंचे चले आते हैं और रातभर इन पेड़ों के आसपास ही मंडराते रहते हैं, जिससे रातभर वहां पर्याप्त मात्रा में रोशनी रहती है। (एम सी एन)

हमारा महानगर (नयी दिल्ली) 28-03-2010


हमारा महानगर (मुंबई) 28-03-2010


Monday, March 22, 2010

जीव-जंतुओं की अनोखी दुनिया - 42



चींटियों की रहस्यमयी दुनिया
. योगेश कुमार गोयल (मीडिया केयर नेटवर्क)

चींटियां सम्पूर्ण विश्व में पाई जाती हैं, फिर चाहे हमारे रिहायशी स्थान होें, समतल भूमि हो या नदी-घाटियां, ऊंचे-ऊंचे दुर्गम पहाड़, वर्षा वन या तपते रेगिस्तान। हां, अलग-अलग स्थान पर इनकी अलग-अलग प्रजातियां अवश्य देखने को मिल जाती हैं। विश्वभर में चींटियों की अब तक 9 हजार से भी अधिक प्रजातियों की खोज की जा चुकी है। धरती पर इनकी संख्या कितनी ज्यादा है, इस बारे में जानकर तो आप चैंक ही उठेंगे। जीव विज्ञानी बताते हैं कि हर इंसान के पीछे करीब 10 लाख चींटियां हैं। अब आप स्वयं अनुमान लगा सकते हैं कि दुनियाभर में चींटियों की तादाद कितनी है। इनकी संचार व्यवस्था तो बेहद जटिल होती है और इनका संदेश देने का तरीका बहुत निराला। संदेश देने के लिए ये अपने एंटीना को आपस में मिलाती हैं, जिनसे रासायनिक द्रव्यों का आदान-प्रदान होता है और इन्हीं रसायनों के जरिये एक-दूसरे तक संदेश पहुंचाया जाता है। संदेशों के आदान-प्रदान के लिए ही हर चींटी के सिर पर दो एंटीना होते हैं। चींटियों की शारीरिक संरचना भी कमाल की होती है। इनकी कमर बेहद पतली और नाजुक होती है, जिससे इनके शरीर का आगे और पीछे का हिस्सा जुड़ा होता है। इनकी दो जोड़ी संयुक्त आंखें तथा तीन एकल आंखें होती हैं जबकि इनके पैरों की संख्या 6 होती है। सिर्फ नर चींटियां और रानी चींटी ही ऐसी होती हैं, जिनके पंख होते हैं। चींटियों की टांगें लंबी होती हैं, जिस कारण ये तेज गति से चलने में सक्षम होती हैं।
चींटियों की सबसे बड़ी विशेषता है इनका अनुशासन प्रिय होना। हालांकि चींटियां विशाल समुदाय और बड़े-बड़े समूहों में रहती हैं, फिर भी ये कड़े अनुशासन का पालन करती हैं और अपनी-अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाती हैं। चींटियों के कुछ समूह तो बेहद विशाल होते हैं, जिनमें एक-एक समूह में 25-30 करोड़ की संख्या में चींटियां होती हैं। चींटियों की एक और बड़ी खासियत यह है कि ये अपने शरीर के भार से 50-60 गुना अधिक भार उठाने में सक्षम होती हैं।
चींटियों की एक और विशेषता यह होती है कि ये अपने बिलों से बहुत दूर जाकर भी बड़ी आसानी से अपने बिलों तक पहुंच जाती हैं। रास्ता न भूलने के पीछे कारण यह बताया जाता है कि ये अपने बिल से दूर जाते समय एक विशेष प्रकार की रासायनिक गंध छोड़ती जाती हैं, जिसके जरिये ये आसानी से बिल तक वापस पहुंच जाती हैं।
विशाल समूहों में एक साथ चलने के बाद भी चींटियां बहुत अनुशासित होकर चलती हैं। इस संबंध में हार्वर्ड के मशहूर जीवविज्ञानी ई.ओ. विल्सन का कहना है कि जब चींटियां कई-कई मीटर लंबी कतारों में चलती हैं तो कुछ ऊंचाई से उन्हें देखने पर उनकी अनुशासित फौज किसी हाईवे पर ट्रैफिक के समान नजर आती है। चींटियों द्वारा आपस में यह तालमेल बनाने के संबंध में विल्सन बताते हैं कि रास्ते पर आगे चलती चींटियां थोड़ा सा संकेतक रसायन छोड़ती जाती हैं, जिसे फेरोमोन कहते हैं जबकि शेष चींटियां इस संकेत को पकड़कर उसी रास्ते पर चलती जाती हैं।
विल्सन ने शोध के दौरान यह जानने की भी कोशिश की कि क्या चींटियों की इस आवाजाही के दौरान ट्रैफिक जाम भी होता है। उन्होंने पाया कि हम इंसानों के मामले में भले ही आए दिन कहीं न कहीं ट्रैफिक जाम की स्थिति लगातार बनी रहती हो किन्तु चींटियों के साथ ऐसा नहीं होता क्योंकि उनमें गजब का ट्रैफिक सेंस होता है और वे भीड़भाड़ की स्थिति में भी ट्रैफिक जाम नहीं होने देती। विल्सन बताते हैं कि किसी भी मार्ग पर कुछ चींटियां धीमी चाल से चलती हैं तो कुछ तेज गति से चलती हैं और कुछ बहुत ही तेज रफ्तार से चलती हैं किन्तु जब ट्रैफिक का घनत्व बढ़ता है तो धीमी गति से चलने वाली चींटियां थोड़ी तेज चलने लगती हैं और तेज गति से चलने वाली चींटियां अपनी रफ्तार कुछ कम कर देती हैं।
नन्हीं-नन्हीं दिखने वाली इन चींटियों के जबड़े बहुत मजबूत होते हैं, जिनकी मदद से ये भोजन को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़कर खा जाती हैं। चींटियां हालांकि सर्वभक्षी होती हैं लेकिन अधिकांश प्रजाति की चींटियां मांसाहारी होती हैं, जो बिना रीढ़ वाले छोटे-बड़े कीड़ों को मारकर खा जाती हैं। यहां तक कि ये काॅकरोच, छिपकली तक को मारकर खा जाती हैं। हां, एक विशेष प्रजाति की चींटियां पूर्ण शाकाहारी होती हैं, जो एक खास तरह की फंगस (फफूंद) का भोजन करती हैं। ये पेड़ों की पत्तियों को कुतरने के लिए जानी जाती हैं। ये चींटियां चींटियों की रहस्यमयी दुनिया में ‘किसान’ की भूमिका निभाती हैं। ये पत्तियों के टुकड़े कर-करके उन्हें बिल में ले जाती हैं, जिनमें कुछ दिनों बाद फंगस उग आती है। इसी फंगस से ये चींटियां भोजन प्राप्त करती रहती हैं।
दक्षिण अफ्रीका में चींटियों की एक प्रजाति को ‘बुनकर चींटियां’ कहा जाता है, जो पेड़ों पर अपनी बांबी बनाती हैं। ये एक कुशल बुनकर की भांति पेड़ की पत्तियों को अपनी लार से उत्पन्न होने वाले सिल्क के धागे से सिलती हैं, जो एक लिफाफे की तरह बन जाता है, जिसमें रानी चींटी रहती है। दक्षिण अमेरिका, दक्षिण एशिया, मध्य अफ्रीका इत्यादि कुछ स्थानों पर चींटियों की ऐसी प्रजातियां भी पाई जाती हैं, जो बहुत खूंखार और आक्रामक होती हैं। ताकतवर चींटियां कमजोर चींटियों पर अक्सर हावी होती हैं ओर उन्हें उनके बिलों से खदेड़कर उन पर अपना कब्जा कर लेती हैं। कुछ प्रजाति की चींटियां ऐसी भी होती हैं, जो किसी भी प्रकार के खतरे का आभास होते ही अपने शरीर के पिछले हिस्से से बदबूदार रासायनिक द्रव्य छोड़ती हैं। (एम सी एन)

सक्सेस मंत्र

परीक्षा से भय कैसा!
. योगेश कुमार गोयल (मीडिया केयर नेटवर्क)

प्रायः जनवरी-फरवरी माह में छात्र-छात्राएं खेलकूद व मौजमस्ती छोड़कर अपनी वार्षिक परीक्षाओं की तैयारी में जुट जाते हैं। बहुत से छात्रों को तो वार्षिक परीक्षा के नाम से ही कड़ाके की ठंड में भी पसीने छूटने लगते हैं। दरअसल यही वह समय होता है, जब उनकी सालभर की पढ़ाई का मूल्यांकन होना होता है, इसी परीक्षा की बदौलत उन्हें आगे की पढ़ाई के लिए आधार मिलता है। हर साल फरवरी-मार्च के महीने में 10वीं, 12वीं की बोर्ड परीक्षाएं होती हैं। कुछ छात्र तो इन परीक्षाओं की तैयारी में रात-दिन इस कदर जुट जाते हैं कि उन्हें खाने-पीने तक की सुध नहीं रहती। कई बार तो स्थिति यह हो जाती है कि खानपान के मामले में निरंतर लापरवाही बरतने के कारण स्वास्थ्य गिरता जाता है, जिसका सीधा प्रभाव उनकी स्मरण शक्ति पर पड़ता है और नतीजा, परीक्षा की भरपूर तैयारी के बावजूद उन्हें आशातीत सफलता नहीं मिल पाती। विशाल शर्मा के साथ भी 12वीं की परीक्षा में यही हुआ।
विशाल बहुत होनहार छात्र था और पूरे जोर-शोर से परीक्षा की तैयारी में जुटा था। पढ़ाई में वह इस कदर मग्न था कि उसे खाने-पीने का भी ध्यान न रहता। परिणामस्वरूप उसका स्वास्थ्य गिरता गया और परीक्षा के दिनों में वह बीमार पड़ गया। बीमारी में ही उसे परीक्षा देनी पड़ी और शारीरिक व मानसिक अस्वस्थता की दशा में वह याद किए गए प्रश्नों के उत्तर भी भूल गया। इसका परिणाम यह रहा कि वह बामुश्किल फेल होते-होते बचा और कामचलाऊ अंकों से ही परीक्षा उत्तीर्ण कर सका।
कहने का तात्पर्य यह है कि परीक्षा के दिनों में खूब मन लगाकर पढ़ाई करना और कड़ी मेहनत करना तो जरूरी है ही लेकिन पढ़ाई के साथ-साथ अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी बेहद जरूरी है क्योंकि अगर आपका शरीर ही स्वस्थ नहीं होगा तो आप परीक्षा की तैयारी बेहतर ढ़ंग से मन लगाकर कैसे कर पाएंगे? परीक्षा में सफलता-असफलता को लेकर भी बहुत से छात्र तनावग्रस्त हो जाते हैं और उनके मन में परीक्षा नजदीक आते ही बेचैनी सी छा जाती है। दरअसल ऐसे छात्र सालभर का समय तो मौजमस्ती में ही गुजार देते हैं और जब परीक्षाएं नजदीक आती हैं तो उन्हें हौव्वा मानकर घबराने लगते हैं। इसके अलावा समय सारिणी बनाकर नियमित अध्ययन न करना भी उनके तनावग्रस्त होने का प्रमुख कारण होता है।
कुछ छात्र परीक्षा की तैयारी के लिए अपना कोई लक्ष्य निर्धारित नहीं कर पाते और लक्ष्य निर्धारित न होने के कारण एकाग्रचित्त होकर परीक्षा की तैयारी नहीं कर पाते। ऐसे में परीक्षा को लेकर उनका चिंतित और तनावग्रस्त होना स्वाभाविक ही है किन्तु परीक्षा के दिनों में जरूरत से ज्यादा तनावग्रस्त रहना निश्चित रूप से हानिकारक साबित होता है। तनावग्रस्त रहने के कारण लाख कोशिशों के बाद भी पढ़ाई में उनका मन नहीं लग पाता। अतः यह बेहद जरूरी है कि आप शुरू से ही पढ़ाई के प्रति रूचि बनाए रखें, अपना लक्ष्य निर्धारित करें ताकि ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न ही न होने पाएं, जिनके कारण परीक्षा को हौव्वा मानकर आपको तनावग्रस्त रहना पड़े।
वही छात्र परीक्षाओं को हौव्वा मानते हैं, जो सालभर तो मौजमस्ती करते घूमते फिरते हैं और ठीक परीक्षा के मौके पर उन्हें किताबों की सुध आती है। तब उन्हें समझ ही नहीं आता कि परीक्षा की तैयारी कैसे और कहां से शुरू की जाए। इसी हड़बड़ी तथा तनाव के चलते वे परीक्षा में पिछड़ जाते हैं। यदि आपने सालभर नियमित रूप से मन लगाकर पढ़ाई की है तो कोई कारण नहीं, जो परीक्षा से आपको किसी प्रकार का भय सताए।
अगर आप समय सारिणी बनाकर अध्ययन-मनन करें तो कठिन से कठिन हर विषय भी आपको आसानी से समझ में आ सकता है लेकिन समय सारिणी बनाते समय इसमें सिर्फ अपने मनपसंद विषय को ही वरीयता न दें बल्कि सभी विषयों पर बराबर ध्यान देने का प्रयास करें बल्कि जिस विषय में आप स्वयं को कमजोर पाते हैं, उस पर कुछ ज्यादा ध्यान केन्द्रित करें। घर का वातावरण तथा अभिभावकों की सजगता भी परीक्षा में छात्रों की सफलता-असफलता का निर्धारण करने में अहम भूमिका निभाती है। यदि आप परीक्षा के खौफ से मुक्त होकर मन लगाकर परीक्षा की तैयारी करें तो निश्चित रूप से सफलता आपके कदम चूमेगी। (एम सी एन)

जीव-जंतुओं की अनोखी दुनिया-41




जीव-जंतुओं की अनोखी दुनिया
. योगेश कुमार गोयल (मीडिया केयर नेटवर्क)

घोंघा, जिसके पेट की नस में भरा होता है खतरनाक जहर घोंघे के बारे में तो आपने अपने स्कूली दिनों में अपनी पाठ्य पुस्तकों में अवश्य पढ़ा ही होगा लेकिन शायद आप नहीं जानते हों कि घोंघों की एक प्रजाति तो बहुत ही जहरीली होती है, जो अपने शिकार के शरीर में अपना खतरनाक जहर प्रविष्ट कराकर उसके दिल की धड़कन बंद कर देती है, जिससे कुछ ही पलों में शिकार मौत की नींद सो जाता है। हिन्द व प्रशांत महासागर के तटीय इलाकों में पाई जाने वाली घोंघों की यह प्रजाति हालांकि देखने में बहुत सुंदर और आकर्षक होती है लेकिन इसकी फितरत बहुत खतरनाक होती है। अपनी प्यारी बनावट और लुभावने व आकर्षक अंदाजों से जाने जाने वाले गैस्ट्रोपैड परिवार से संबंधित इन जहरीले घोंघों के पेट की नस में एक बहुत ही खतरनाक तरह का विष भरा होता है। इसी विष को ये घोंघे अपने शिकार के शरीर में एक बर्छी की तरह घुसा देते हैं। उस समय तो शिकार को बस यही अहसास होता है मानो उसके शरीर में कोई छोटी सी सुई चुभी हो किन्तु जहर के प्रभाव से कुछ ही पलों में उसे सांस लेने में दिक्कत होने लगती है और वह अपनी सुध-बुध खो देता है, जिसके बाद उसका हृदय भी काम करना बंद कर देता है। सांप की तरह घुमावदार शारीरिक आकृति वाले इन घोंघों के शरीर का कोमल हिस्सा ढ़क्कन (खोल) के अंदर होता है। ये अपने मुंह को खोल से बाहर निकालकर बड़ी आसानी से चारों ओर घुमा सकते हैं। जब ये घोंघे शिकार की तलाश में निकलते हैं तो संवेदनशील अंगों वाला अपना मुंह अपने सख्त खोल से बाहर निकाल लेते हैं लेकिन खतरे का जरा भी आभास होते ही मुंह को फौरन खोल के अंदर कर लेते हैं। (एम सी एन)
मेंढ़क, जिनका इस्तेमाल होता है नशे की लत की पूर्ति के लिए
नशा करने के लिए लोग न जाने-जाने क्या-क्या जतन करते हैं, कैसे-कैसे अजीबोगरीब तरीके खोज निकालते हैं। कुछ ऐसा ही क्वींसलैंड में भी देखने को मिलता है, जहां लोग अपनी नशे की लत की पूर्ति करने के लिए एक विशेष प्रजाति के मेंढ़कों का इस्तेमाल करते हैं। जी नहीं, नशा करने के लिए ये लोग इन मेंढ़कों को अपना शिकार नहीं बनाते बल्कि ‘बूफो मारनिम’ नामक प्रजाति के इन मेंढ़कों को बगैर कोई नुकसान पहुंचाए इनसे अपनी नशे की लत की पूर्ति करते हैं और इसके लिए ये लोग इन मेंढ़कों को अपने घरों में पालते हैं। दरअसल ये मेंढ़क दिनभर में कई बार एक चिपचिपे से पदार्थ का स्राव करते हैं, जो बहुत नशीला होता है। इसी चिपचिपे पदार्थ को ये लोग कांच के किसी बर्तन में एकत्र करते रहते हैं और फिर नशा करने के लिए इसी पदार्थ का सेवन करते हैं। इस चिपचिपे पदार्थ को पीने से शराब से भी तेज नशा चढ़ता है। (एम सी एन)
‘आॅर्ब वीवर’ मकड़ी के जाले से बनता है मजबूत जाल
शायद आपको जानकर हैरानी हो कि किसी मकड़ी के जाले को कैसे कोई मछली पकड़ने के लिए एक मजबूत जाल के रूप में इस्तेमाल कर सकता है किन्तु ‘आॅर्ब वीवर’ नामक एक विशेष प्रजाति की मकड़ी पेड़ों के बीच इतना बड़ा और मजबूत जाला बुनती है, जिसका उपयोग मछुआरे वाकई मछली पकड़ने के लिए करते हैं। मछुआरे पेड़ों के बीच बुने आॅर्ब वीवर के इस जाले को उतार लेते हैं और फिर इस जाले की मदद से आराम से मछलियां पकड़ते हैं। पपुआ न्यू गिनी में पाई जाने वाली ये मकड़ियां पेड़ों के बीच करीब सात मीटर लंबा ऐसा मजबूत, वाटरप्रूफ और अत्यधिक तन्यता वाला जाला बुनती हैं, जिसके रेशमी धागों पर चिपचिपा पदार्थ होता है और इसी चिपचिपे पदार्थ के कारण यह जाला पानी में नहीं भीगता है। इस जाले की तन्यता भी बहुत ज्यादा होती है, जिसके कारण यह जाला बड़ी-बड़ी मछलियों का भार भी आसानी से झेल लेता है। (एम सी एन)

Saturday, March 20, 2010

अत्यंत उपयोगी सूचना

लेखक/पत्रकार तथा हिन्दी के समाचारपत्र/पत्रिकाओं के लिए उपयोगी सूचना

देश की हिन्दी भाषी प्रतिष्ठित समाचार-फीचर एजेंसियों ‘मीडिया केयर नेटवर्क’, ‘मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स’ तथा ‘मीडिया केयर न्यूज’ को राष्ट्रीय एवं राज्यों की गतिविधियों पर राजनीतिक विश्लेषणात्मक लेख/रिपोर्ट, सामयिक, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय चर्चा, फिल्म गाॅसिप, फिल्म आलेख एवं इंटरव्यू, खेल, व्यंग्य, स्वास्थ्य, घर परिवार, सौन्दर्य, फैशन, हैल्थ टिप्स, ब्यूटी टिप्स, होम टिप्स, कुकिंग टिप्स, व्यंजन विधियां, महिला जगत, युवा जगत, बाल कहानियां, बालोपयोगी रचनाएं, रोचक जानकारियां, रहस्य-रोमांच, विचित्र परम्पराएं, महत्वपूर्ण दिवस, तीज-त्यौहारों एवं विशेष अवसरों पर लेख, कैरियर इत्यादि विषयों पर स्तरीय, मालिक एवं अप्रकाशित रचनाओं की सदैव आवश्यकता रहती है। रचनाएं ई-मेल द्वारा भी हिन्दी फोंट में भेज सकते हैं।
हिन्दी के समाचारपत्र/पत्रिकाएं भी ‘मीडिया केयर समूह’ की उपरोक्त तीनों एजेंसियों की सेवाएं लेने के लिए हमसे इस पते पर सम्पर्क कर सकते हैं:-
योगेश कुमार गोयल
समूह सम्पादक
मीडिया केयर ग्रुप
मेन बाजार बादली, जिला झज्जर (हरियाणा)-124105.
मोबाइल: 9416740584, 9896036475. टेलीफैक्स: 01276-240011.
ई-मेल: mediacaregroup@gmail.com

मुरादाबाद में ‘श्री वीरेन्द्र गुप्त साहित्य-रत्न सम्मान-2008’ प्राप्त करते श्री योगेश कुमार गोयल


मुरादाबाद में पत्रकारों एवं साहित्यकारों को सम्बोधित करते वरिष्ठ पत्रकार श्री योगेश कुमार गोयल


श्री योगेश कुमार गोयल की पुस्तक ‘‘जीव-जंतुओं की अनोखी दुनिया’’ का लोकार्पण करती हरियाणा साहित्य अकादमी की निदेशक डा. मुक्ता मदान


श्री योगेश कुमार गोयल की बहुचर्चित पुस्तक ‘‘तीखे तेवर’’ का लोकार्पण करते राजस्थान पुलिस में डी.आई.जी. श्री हरिराम मीणा तथा अन्य


श्री योगेश कुमार गोयल को सम्मानित करती हरियाणा साहित्य अकादमी की निदेशक डा. मुक्ता मदान व पूर्व निदेशक डा. चंद्र त्रिखा


‘स्व. सुरेश चन्द्र शर्मा स्मृति अनुराग साहित्य सम्मान-2009’ प्राप्त करते श्री योगेश कुमार गोयल


पुस्तक समीक्षाएं











पुस्तक समीक्षाएं
















पुस्तक समीक्षाएं











पुस्तक समीक्षा (हमारा महानगर) 27-12-2009


पुस्तक समीक्षा (अजीत समाचार) 13-12-2009


पुस्तक समीक्षा (अजीत समाचार) 14-03-2010


तीखे तेवर




पुस्तक समीक्षा
सामाजिक अपघातों को बेनकाब करने का सार्थक प्रयास है योगेश कुमार गोयल की ‘तीखे तेवर’

पुस्तक: तीखे तेवर
लेखक: योगेश कुमार गोयल
पृष्ठ संख्या: 160
मूल्य: 150 रुपये
संस्करण: 2009 (सजिल्द)
प्रकाशक: मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स, मेन बाजार, बादली, जिला झज्जर (हरियाणा)-124105.


‘तीखे तेवर’ हरियाणा के प्रतिष्ठित साहित्यकार एवं वरिष्ठ पत्रकार श्री योगेश कुमार गोयल की एक महत्वपूर्ण साहित्यिक कृति है, जिसमें सामाजिक अपघातों के विरूद्ध न केवल जोरदार आवाज लेखक ने उठाई है अपितु ऐसा करने वालों को अपने लेखों के माध्यम से कठोर चेतावनी भी दी है। इस कृति में योगेश कुमार गोयल के कुल 25 आलेखों को संजोया गया है, जिनमें साम्प्रदायिक एवं जातीय प्रदूषण, न्याय व्यवस्था की कछुआ चाल और हास्यास्पद निर्णय, बोरवैलों में गिरकर होने वाली नवजातों की अकाल मृत्यु, सिसकते बचपन, बालश्रम, पुलिस का नंगा नाच, असुरक्षा और आतंक का फैलता सुरसा गात, शिक्षण संस्थानों में रैगिंग का दंश, पेय पदार्थों में घुली विष भरी मृत्यु, एड्स की संक्रामकता, धार्मिक अंधविश्वासों का फैलता जाल, ‘रियलिटी शो’ का क्रूर मजाक, शोर प्रदूषण, जल प्रदूषण, ग्लोबल वार्मिंग का कालजयी आक्रमण, मौसम और जलवायु की अस्थिरता, जलाभाव का निरन्तर बढ़ता खतरा, जनसंख्या अनियंत्रण के उत्तरदायी कारक, मोबाइल प्रदूषण, पान मसालों में बिकता कैंसर, मद्यपानों का फैलता गरल, धूम्रपान के संक्रामक रोग, पीत पत्रकारिता की भरमार, प्रिंट मीडिया और इलैक्ट्राॅनिक मीडिया की दायित्वहीनता आदि-आदि सामाजिक अपघातों को लेखक ने बड़ी तटस्थता एवं ईमानदारी से अभिव्यक्ति दी है।
‘तीखे तेवर’ में संजोये गए आलेखों में समाज, परिवार, राष्ट्र और शासन की उदासीन भूमिका को भी दो टूक चित्रित किया गया है। इन आलेखों में लेखक के विशद चिंतन एवं अनुभव की गहराई का स्पष्ट बोध होता है। पुस्तक के आवरण पृष्ठ से ही लेखक के तीखे तेवरों का आभास बखूबी हो जाता है। ‘तीखे तेवर’ में वास्तव में लेखक के रचनात्मक तेवर देखते ही बनते हैं। आज के सामाजिक सरोकारों को ‘तीखे तेवर’ में बखूबी दर्शाया गया है और सामाजिक बुराईयों का सीधा पर्दाफाश किया गया है। इन आलेखों में लेखक का रचनात्मक कौशल लाजवाब है। ‘तीखे तेवर’ में संग्रहीत एक-एक आलेख अत्यंत महत्वपूर्ण है। काश! बुद्धिजीवी वर्ग इन आलेखों का संज्ञान ले ले तो न केवल भारत में अपितु विश्व भर में मानवता को भयमुक्त किया जा सकता है और समता, स्वतंत्रता, सह-अस्तित्व, भेदभाव रहित तथा पारस्परिक सौहार्द पर आधारित एवं ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना से ओत-प्रोत विश्व की संरचना करना सहज एवं सरल होगा।
‘तीखे तेवर’ की भूमिका एक प्रतिष्ठित हिन्दी दैनिक के सम्पादक डा. राधेश्याम शुक्ल ने लिखी है और उन्होंने बिल्कुल सही लिखा है कि लेखक योगेश कुमार गोयल की दृष्टि बहुत व्यापक है और इस पुस्तक में संकलित प्रत्येक आलेख निश्चय ही श्री गोयल को एक यशस्वी, जागरूक एवं समाज चेता पत्रकारों की श्रेणी में स्थान दिलाएंगे। डा. शुक्ल ने इस पुस्तक की भूमिका में लिखा है, ‘‘तीखे तेवर श्री गोयल के ऐसे सामाजिक सरोकार वाले लेखों का संग्रह है, जिसमें एक अत्यंत संवेदनशील लेखक की उत्तेजक और तनिक आक्रोशपूर्ण टिप्पणियां सामने आयी हैं। ये केवल पत्रकारिता के दायित्व से प्रेरित आलेख नहीं हैं बल्कि इसमें लेखक की पीड़ा, क्षोभ और सामाजिक विकृतियों के निराकरण की तीव्र आकांक्षा व्यक्त हुई है। ये आलेख पाठक को उद्वेलित ही नहीं करते, उसे कुछ सोचने और करने के लिए प्रेरित भी करते हैं।’’
निसंदेह, देश की तीन प्रतिष्ठित समाचार-फीचर एजेंसियों ‘मीडिया केयर नेटवर्क’, ‘मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स’ तथा ‘मीडिया केयर न्यूज’ के समूह सम्पादक श्री योगेश कुमार गोयल द्वारा लिखित पुस्तक ‘तीखे तेवर’ सामाजिक अपघातों को बेनकाब करने का एक सार्थक प्रयास है। यह एक शाश्वत एवं उपादेय कृति है, जिसको साहित्य एवं पत्रकारिता जगत में ही नहीं अपितु सामाजिक सरोकारों से जुड़े सभी सहृदयजनों में समादृत किया जाना चाहिए। लेखक को इस महत्वपूर्ण कृति के लिए बहुत-बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं।
- डा. महेश दिवाकर
डी. लिट् (हिन्दी)
अध्यक्ष, रीडर एवं शोध निर्देशक, स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग,
गुलाब सिंह हिन्दू महाविद्यालय, चांदपुर, बिजनौर (उ.प्र.)


पुस्तक की प्राप्ति अथवा इस पुस्तक के संबंध में किसी भी प्रकार की अन्य जानकारी के लिए कृपया पुस्तक के लेखक श्री योगेश कुमार गोयल से निम्न नंबरों पर सम्पर्क करें:-
9416740584, 9896036475.
email : mediacaregroup@gmail.com


पुस्तक समीक्षा
सच में ‘अनोखी’ है
‘जीव-जंतुओं की अनोखी दुनिया’
. डा. प्रवीण खुराना

(पी.एच.डी.), वरिष्ठ पत्रकार, हरियाणा
सम्पादक: हरियाणा एजुकेशन न्यूज, ब्यूरो चीफ: इंडिया न्यूज हरियाणा

पेड़-पौधे और जीव-जंतु भी हमारे जीवन का एक ऐसा हिस्सा हैं, जिनके बिना सामाजिक परिवेश अधूरा सा है। यह बात अब लोगों को समझ में आने भी लगी है, शायद इसी कारण से टी. वी. व पत्र-पत्रिकाओं में जीवों के बारे में आने वाले कार्यक्रमों और लेखों को लोग रूचि लेकर देखते व पढ़ते हैं। जीवों की विचित्र दुनिया तो बच्चों व बड़ों के लिए सदा से कौतूहल भरी रही भी है। इसी कौतूहल और ज्ञान को बढ़ाने में बादली (झज्जर) निवासी जाने-माने युवा कलमकार एवं ‘मीडिया केयर नेटवर्क’, ‘मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स’ तथा ‘मीडिया केयर न्यूज’ के सम्पादक योगेश कुमार गोयल ने सच में एक अनोखी कृति की रचना की है, जिसका नाम भी उन्होंने ‘जीव-जंतुओं की अनोखी दुनिया’ ही रखा है।
हमारे समाज में यह तो प्रचलित रहा है कि सृष्टि में 84 लाख योनियों के बाद मानव जीवन मिलता है मगर जब हम योनियों की गिनती करते हैं तो ये पचास-सौ पर ही खत्म हो जाती हैं किन्तु जीवों की योनियों को ढूंढ़ें तो यह संख्या बहुत बड़ी हो जाती है और अनेक प्रकार के जीवों एवं उनके रहन-सहन की जानकारी मिलती है, जिसे जानने के बाद लोग दांतों तले उंगलियां दबाने को विवश हो जाते हैं। योगेश कुमार गोयल कृत इसी तरह की अनूठी पुस्तक ‘जीव-जंतुओं की अनोखी दुनिया’ में जीव-जंतुओं के जीवन के बारे में, उनके रहने और खाने के अलावा उनकी दिनचर्या सहित अन्य जानकारियां समाहित हैं।
लेखक ने अपनी बात पाठकों तक पहुंचाते हुए लिखा है कि पुस्तक में 134 जीवों के बारे में सचित्र जानकारियां दी गई हैं। यह सही है कि इस पुस्तक में संकलित किए गए जीव-जंतु अत्यंत दुर्लभ हैं और इनमें से अधिकांश की जानकारी तो इसी पुस्तक से ही मिलती है। जीवों और प्रकृति की चीजों को मानव अपने हितार्थ नष्ट करता रहा है, इस पर भी लेखक ने चिन्ता व्यक्त की है। शायद यही कारण है कि अब जीव दुर्लभ होते जा रहे हैं। यदि इस संदेश से भी हम नहीं चेते तो आज जो परिन्दे और जीव हमें दिखाई देते हैं, वे आने वाले समय में दुर्लभ हो जाएंगे।

हरियाणा साहित्य अकादमी के अनुदान से प्रकाशित इस पुस्तक के प्राक्कथन में अकादमी के निवर्तमान निदेशक देश निर्मोही ने सही लिखा है कि पाण्डुलिपि स्तरीय है। उनका कहना है कि इससे हर वर्ग के पाठक के ज्ञान में तो वृद्धि होगी ही, साथ ही बच्चों के लिए तो यह पुस्तक संग्रहणीय होगी। पुस्तक संग्रह करने लायक है भी।
वाकई इस पुस्तक में अनेक अद्भुत, असाधारण, दुर्लभ जीव-जंतुओं के बारे में बहुत दिलचस्प जानकारियां हैं। जैसे पुस्तक में ‘प्लैनेरियन’ नामक अद्भुत कीड़े की जानकारी है, जो न पूंछ काटने से मरता है और न ही मुंह काटने से। दुनिया के सबसे जहरीले बिच्छू ‘एड्रोक्टोमस आस्ट्रेलिस’ सहित अन्य जहरीले जीवों की जानकारी भी हैरान करने वाली है। दुनिया में अद्भुत पक्षियों में कौन पक्षी सबसे बड़ा है और किसका कितना वजन तथा कैसा आकार है, इनके अलावा पक्षी होते हुए भी कौन उड़ नहीं सकता, जैसी जानकारियां ज्ञान बढ़ाती हैं। मार्श हैरियर रंगदार छाया प्रदान करते हैं तो नर व मादा आस्ट्रिच, दोनों के अण्डे देने की जानकारी तो होश उड़ा देती है। आस्ट्रिच नाम के इस पक्षी के अलावा अन्य परिन्दों की रोचक जानकारी भी इस पुस्तक में है। सी-हाॅर्स नामक समुद्री जीव को ‘समुद्री घोड़ा’ ही कहा जाता है मगर वास्तव में वह मछली है, जो घोड़ेनुमा होती है। इसके अलावा अनेक प्रकार की मछलियों की जानकारी पाठकों को अपने साथ बांधे रहती है। अपने जीवन का हिस्सा हो चुके मुर्गे, बिल्ली, कोयल जैसे जीव भी यहां अपनी अनूठी जानकारियों के कारण अनोखे ही लगते हैं। कोई पक्षी संगीत भी बजा सकता है, यह सुनने में ही अजीब लगता है मगर कुक्कुट एक ऐसा पक्षी है, जो कुशल ड्रम वादक है। व्हेल सहित अन्य कई पक्षी संगीत का शौक रखते हैं।
जमीन पर रेंगने वाले कीड़ों के अलावा सांपों व अन्य जीवों के रहन-सहन, उनकी खूबियां, कौनसा जीव किसका शिकार करना पसंद करता है, उनकी प्रजनन क्षमता और किस जीव का कौनसा अंग महत्वपूर्ण होता है तथा कौनसा पक्ष कमजोर होता है, सहित अनेक दुर्लभ जानकारियां इस पुस्तक में समायी हैं। पुस्तक का आवरण भी अपने आप में अच्छा बन पड़ा है। जंगल के जीवों के चित्र अपनी ओर आकृष्ट करते हैं। इन सभी कारणों से यह पुस्तक सच में अनोखी और संग्रहणीय होने के साथ-साथ ज्ञानवृद्धि भी करती है।
पुस्तक: जीव-जंतुओं की अनोखी दुनिया
लेखक: योगेश कुमार गोयल
पृष्ठ संख्या: 96
मूल्य: 100 रुपये
संस्करण: 2009
प्रकाशक: मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स, बादली, जिला झज्जर (हरियाणा)-124105.
Mob : 9416740584.


पुस्तक की प्राप्ति अथवा इस पुस्तक के संबंध में किसी भी प्रकार की अन्य जानकारी के लिए कृपया पुस्तक के लेखक श्री योगेश कुमार गोयल से निम्न नंबरों पर सम्पर्क करें:-
9416740584, 9896036475.

विशेष लेख

इंसानी रिश्तों को शर्मसार करते पंचायती फैसले
तार-तार होती रिश्तों की गरिमा
. योगेश कुमार गोयल
हरियाणा में जातिगत पंचायतें समाज की भलाई या सामाजिक समस्याओं के निवारण के कार्यों के लिए नहीं बल्कि समाज को बांटने, बसे-बसाये घरों को तोड़ने और गोत्र के नाम पर मौत के फरमान सुनाने जैसे बर्बर एवं घृणित कार्यों के लिए अधिक चर्चा में रही हैं। अब एक बार फिर ये पंचायतें अपने तानाशाही एवं अमानवीय रवैये और तालिबानी फतवों को लेकर चर्चा में हैं। बीते दिनों सिर्फ एक सप्ताह के अंदर ही एक-एक कर ऐसे ही कई मामले सामने आए, जिन्होंने तालिबानी हुकूमत की यादें ताजा कराने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
30 जनवरी 2010 को रोहतक जिले के गांव खेड़ी में दो साल से भी अधिक समय से खुशहाल जीवन व्यतीत कर रहे एक दम्पत्ति को पंचायत द्वारा भाई-बहन बनाए जाने का फरमान सुनाया गया जबकि उसके महज दो ही दिन बाद 1 फरवरी को नारनौंद क्षेत्र के गांव खांडा-खेड़ी में एक नवविवाहित दम्पत्ति सहित पूरी बारात को ही न तो गांव में घुसने दिया गया, साथ ही नवविवाहित दम्पत्ति को जान से मारने की धमकी भी दी गई। इसी प्रकार 3 फरवरी को जींद जिले के बूढ़ाखेड़ा गांव के नवीन और फरमाणा गांव की नीलम की तीन दिन बाद ही होने वाली शादी न होने देने का फरमान पंचायतियों द्वारा सुनाया गया।
भारतीय लोकतंत्र को कलंकित करती इस तरह की घटनाओं से यही संकेत मिल रहे हैं कि 21वीं सदी में आधुनिकता की ओर तेजी से आगे बढ़ते हमारे समाज का सही मायने में तालिबानीकरण होता जा रहा है।
पंचायतोें के अमानवीय फैसले
बीती 30 जनवरी को रोहतक जिले के महम हलके के गांव खेड़ी में हुई पंचायत ने ऐसा फरमान सुना डाला था, जिससे इंसानी रिश्ते तो शर्मसार हुए ही, पंचायत ने 10 माह के मासूम बच्चे के भविष्य पर भी प्रश्नचिन्ह लगा दिए थे। गोत्र विवाद को लेकर खेड़ी गांव में आयोजित हुई पंचायत में करीब सवा दो साल पहले वैवाहिक बंधन में बंधे दम्पत्ति को संबंध विच्छेद कर आपस में भाई-बहन का रिश्ता कायम करने का फरमान सुनाया था।
दरअसल खेड़ी (महम) के आजाद सिंह बेरवाल के बेटे सतीश की शादी नवम्बर 2007 में भिवानी जिले के गांव भागी बिहरोड़ के राजबीर बैनीवाल की पुत्री कविता के साथ हुई थी। खेड़ी गांव में बैनीवाल गोत्र की भी बहुलता है, इसलिए बेरवाल और बैनीवाल गोत्रों में आपसी भाईचारे का रिश्ता कायम है। हालांकि शादी के बाद से लेकर अब तक सब कुछ ठीक-ठाक चलता रहा किन्तु मामले ने तूल तब पकड़ा, जब गत दिनों खेड़ी गांव के कुछ लोग भैंस खरीदने के सिलसिले में भिवानी के भागी गांव में गए और वहां भैंस खरीदने के बाद फिरौती की रकम को लेकर आपस में चल रहे हंसी-मजाक के बीच किसी ने सतीश और कविता के संबंध को लेकर कोई मजाक कर दिया। बस, उसके बाद खेड़ी गांव के लोगों ने सतीश और कविता के गोत्रों की छानबीन की और उसके बाद खेड़ी गांव में एक पंचायत का आयोजन किया गया।
30 जनवरी को पंचायत ने फैसला सुनाने के लिए 21 सदस्यीय समिति का गठन कर दिया, जिसने फरमान सुनाया कि पिछले सवा दो साल से पति-पत्नी के रूप में साथ रह रहे सतीश और कविता अब भाई-बहन की तरह रहेंगे। दोनों के 10 माह के बेटे रौनक का दादा यानी सतीश का पिता रौनक का नाना कहलाएगा। कविता सतीश के साथ न रहकर अपने मायके में रहेगी और रौनक उसी के साथ रहेगा। पंचायत ने निर्णय दिया कि सतीश का पिता सतीश को अपनी चल-अचल सम्पत्ति से बेदखल करेगा और उसे गांव वालों से कविता का गोत्र छिपाने के कारण रौनक के नाम तीन लाख रुपये का फिक्स डिपोजिट करवाना होगा। सतीश की तमाम सम्पत्ति भी रौनक के नाम होगी। पंचायत में सजा के तौर पर सतीश के पिता के मुंह में जबरदस्ती जूता भी ठूंस दिया गया।
कविता का पंचायत के फैसले के संबंध में कहना था कि जब उसकी शादी हुई थी तो विवाह समारोह में दोनों गांवों के सैंकड़ों लोग मौजूद थे और सभी के सामने कई बार वर-वधू पक्ष के गोत्र पंडित जी द्वारा पढ़े गए थे, उस वक्त लोगों ने इस ओर ध्यान क्यों नहीं दिया कि उसका गोत्र बैनीवाल है? कविता का कहना था कि फेरों के समय वहां मौजूद बारातियों को तब उसका गोत्र सुनाई नहीं दिया तो इतने लंबे समय बाद अब कैसे सुनाई दे गया? वैसे भी सतीश और कविता का रिश्ता शादी से 9 महीने पहले ही तय हो गया था। फिर इतने समय तक भी दोनों गांवों के लोगों ने कोई बात क्यों नहीं उठाई?
कविता के साहस की दाद देनी होगी, जिसने पंचायत के घोर अमानवीय और घृणित फैसले के समक्ष झुकने केे बजाय कहा था कि उसने सतीश के साथ सात फेरे लेते समय उसके साथ जीने-मरने की कसम खाई थी, जिसे वह हर हाल में निभाएगी और अगर पंचायतियों ने उसके परिवार को प्रताड़ित किया तो वह जहर खाकर आत्महत्या कर लेगी और इस मामले में कार्रवाई के लिए कोर्ट का सहारा भी लेगी। उसकी शिकायत पर ही प्रशासन द्वारा पंचायत में ऐसा फैसला सुनाने वालों की खोजबीन शुरू की गई और खासकर तब प्रशासन नींद से जागा, जब 1 फरवरी को पंचायत के इस अमानवीय फैसले पर पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए चीफ जस्टिस मुकुल मुदगल तथा जस्टिस जसबीर सिंह की खण्डपीठ ने हरियाणा सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा। खण्डपीठ ने कहा कि किसी विवाहित जोड़े को भाई-बहन की तरह रहने का फरमान कैसे सुनाया जा सकता है?
मामला हाईकोर्ट के संज्ञान में आने और अपने फैसले को लेकर चैतरफा आलोचनाओं से घिरने के बाद आखिरकार 5 फरवरी को खेड़ी पंचायत को भी अपना फैसला बदलते हुए इस शादी को मान्यता देनी पड़ी लेकिन इस पूरे प्रकरण ने कई गंभीर सवालों को जन्म दे दिया। सवाल यह है कि एक बसी-बसाई गृहस्थी को उजाड़ना और एक मासूम बच्चे के सारे हकों पर कुठाराघात करना क्या कोई इंसानियत है, कोई न्याय है? 10 माह के मासूम रौनक का क्या कसूर था, जिसके माता-पिता को भाई-बहन बनने का फरमान सुना दिया गया था, जिसके दादा को उसका नाना बना दिया गया था? उसे किस बात की सजा दी जा रही थी? अगर पंचायत के तुगलकी फरमान के खिलाफ पुरजोर आवाज बुलंद नहीं होती तो अपने ही जन्मदाता, अपने ही पिता को वह क्या कहकर पुकारता?
क्या पंचायतों के ये पैरोकार इस सवाल का जवाब दे सकेंगे कि ऐसे बच्चों को स्कूलों या अन्य संस्थानों में पिता का नाम कौन देगा? उनके प्रमाण पत्रों में पिता के रूप में किसका नाम लिखा जाएगा? उनकी परवरिश कौन करेगा? सर्वाधिक हैरत की बात तो यह है कि मानसिक दिवालियेपन के प्रतीक ऐसे अमानवीय फैसलों के खिलाफ न समाज के किसी कोने में कोई आवाज सुनाई देती है, न सत्ता के गलियारों में, यहां तक कि वोटों की राजनीति के चलते विपक्ष की आवाज भी कहीं गुम हो जाती है। चाहे कोई मंत्री हो या सांसद या किसी भी दल का कोई विधायक, पंचायतों के ऐसे तालिबानी फैसलों के खिलाफ बोलना तो दूर, कोई समाज को इस दिशा में जागरूक करने के लिए रत्ती भर भी पहल करता दिखाई नहीं देता।
नारनौंद क्षेत्र के गांव खांडाखेड़ी में 1 फरवरी को एक नवदम्पत्ति को न तो गांव में घुसने दिया गया और उन्हें जान से मार डालने की धमकी भी दी गई, जिसके बाद इस दम्पत्ति ने कई घंटे थाने में बिताए किन्तु पुलिस की दखलंदाजी के बाद भी उन्हें गांव नहीं भेजा जा सका और ग्रामीणों के विरोध के बाद दम्पत्ति को दूल्हे की बहन के घर शरण लेनी पड़ी।
दरअसल करीब एक साल पहले खांडाखेड़ी गांव के धानक समुदाय के सतबीर खनगवाल के बेटे रवि का रिश्ता नंगथला गांव के कर्मबीर नागर की बेटी कविता से तय हुआ था, जिनकी शादी की तारीख 31 जनवरी 2010 तय हुई। उससे ठीक 20 दिन पहले वर पक्ष कविता की मांग भरने की रस्म भी पूरी कर आया लेकिन जैसे-जैसे शादी की तारीख नजदीक आने लगी, नंगथला में नागर गोत्र के लोगों ने इस रिश्ते का विरोध शुरू कर दिया, जो इस रिश्ते को तुड़वाने के लिए वर पक्ष के घर भी गए किन्तु दोनों पक्षों ने ऐन मौके पर शादी तोड़ने से मना कर दिया। 31 जनवरी को जब खांडाखेड़ी से बारात रवाना हुई तो लोगों ने चेतावनी दी कि शादी के बाद बारात को गांव में नहीं घुसने देंगे। आखिर जैसे-तैसे यह शादी तो सम्पन्न हो गई किन्तु अगले दिन बारात को गांव में नहीं घुसने दिया गया किन्तु महम के खेड़ी गांव के मामले में पंचायत के फैसले को लेकर जिस तरह का माहौल बना और हाईकोर्ट ने जिस प्रकार उस मामले का संज्ञान लिया, संभवतः उसी का परिणाम रहा कि 4 फरवरी को गांव की 36 बिरादरी की पंचायत ने दोनों गोत्रों के लोगों से बातचीत कर इस मामले में समझौता करा दिया और यह तय किया गया कि रवि और कविता अब पति-पत्नी के रूप में गांव में रह सकते हैं।
जींद जिले के बुढ़ाखेड़ा गांव के बूरा गोत्र के नवीन और फरमाणा गांव की सहारण गोत्र की नीलम की 6 फरवरी को होने वाली शादी से तीन दिन पहले 3 फरवरी को फरमाणा गांव से 200 लोगों का काफिला बुढ़ाखेड़ा गांव पहुंचा था, जिसने इस आधार पर कि फरमाणा में दोनों गोत्रों के बीच भाईचारा है, नवीन की सहारण गोत्र की लड़की से शादी तोड़ने के लिए वर और वधू पक्ष को फरमान सुनाया था किन्तु वर पक्ष ने पंचायत से यह सवाल करते हुए रिश्ता तोड़ने से साफ इन्कार कर दिया था कि यह रिश्ता 1 नवम्बर 2009 को तय हुआ था, तब से अब तक पंचायत कहां थी। उधर लड़की के परिजनों ने भी रिश्ता तोड़ने से इन्कार कर दिया था, जिसके बाद पंचायत ने खुद फैसला लेने की बात कही थी किन्तु पुलिस बल की मौजूदगी में जींद के एक होटल में 6 फरवरी को नवीन और नीलम की शादी के बाद आखिरकार इस मामले में भी पंचायत को झुकना पड़ा।
कानून को ठेंगा दिखाती पंचायतें
ज्यादा समय नहीं बीता है, जब हरियाणा के झज्जर जिले में बेरी हलके के गांव ढ़राणा निवासी रविन्द्र और पानीपत के सिवाह गांव की शिल्पा की शादी तुड़वाने के लिए भी एक खाप पंचायत के तुगलकी फरमान के चलते खूब बवाल मचा था लेकिन कानून व्यवस्था पर हर बार जाति पंचायतों के फतवे हावी होते दिखाई दिए हैं। संभवतः इसी कारण हरियाणा में गोत्र विवाद को लेकर शादी तोड़ने, दोनों पक्ष के परिजनों का सामाजिक बहिष्कार करने, उन्हें गांव छोड़ने का फरमान सुनाने और यहां तक कि शादीशुदा जोड़ों की हत्या तक के तालिबानी फरमान बार-बार देखे जा रहे हैं किन्तु कानून इन पंचायतों के सामने हमेशा बौना साबित हुआ है। जातियों के आधार पर बनी ऐसी स्वयंभू खाप पंचायतों के ऐसे ही नादिरशाही फतवों के कारण अब तक कई हंसते-खेलते परिवार पूरी तरह बर्बाद हो चुके हैं। इस प्रकार के सामंती फैसले समाज के इन तथाकथित ठेकेदारों की संकीर्ण एवं पंगु मानसिकता को ही उजागर करते हैं और इस बात की ही गवाही देते हैं कि वास्तव में हम आधुनिक युग के बजाय उस मध्य युग की ओर लौट रहे हैं, जहां किसी भी मामले में सजा के रूप में ‘आंख का बदला आंख’ और ‘खून का बदला खून’ का बर्बर कानून हुआ करता था।
ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें इसी प्रकार के तानाशाहीपूर्ण फैसले लेकर पति-पत्नी को भाई-बहन बनने को बाध्य किया गया और खाप पंचायत का फैसला न मानने पर दम्पत्ति सहित उनके पूरे परिवार को गांव से बेदखल कर उनकी सम्पत्ति पर कब्जा कर लिया गया। सरेआम कानून को ठेंगा दिखाते इस प्रकार के फैसले ऐसी पंचायतों की भूमिका के बारे में अब बहुत-कुछ सोचने-विचारने पर विवश करने लगे हैं। सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि हमारे संविधान में जब हर किसी को अपनी स्वतंत्रता से जीने का अधिकार दिया गया है तो गोत्र विवाद के नाम पर लोगों के जीने और मरने का फैसला करने वाली ये पंचायतें कौन होती हैं? क्यों नहीं प्रशासन ऐसे मामलों में अपनी सक्रिय भूमिका निभाता और अदालती निर्देशों के बाद भी ऐसे पंचायतियों के खिलाफ सख्त कदम उठाता?
रोहतक रेंज के आई.जी. वी. कामराजा कहते हैं कि इस प्रकार के संविधान विरोधी फैसले रोकने के लिए ऐसी पंचायतों में मौजूद रहने वाले जनप्रतिनिधियों व सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई करने का प्रावधान है किन्तु शिकायतों व साक्ष्यों के अभाव में ऐसे लोग अक्सर बच जाते हैं। दूसरी ओर हरियाणा के डीजीपी (लाॅ एंड आॅर्डर) वी. एन. राय का कहना है कि खाप पंचायतों के नाम पर फतवे जारी करना अब आसान नहीं होगा, ऐसा करने वालों पर जहां अपराधिक मामले दर्ज किए जाएंगे, वहीं ऐसी पंचायतों में शामिल होने वाले पंचों को अपने पदों से भी हाथ धोना पड़ सकता है। राय खुद मानते हैं कि खाप पंचायतें न्यायालय से ऊपर होकर असंवैधानिक फतवे जारी कर सामाजिक सौहार्द को खत्म करने पर तुली हैं।
क्यों नहीं होती पंचायतियों के खिलाफ कार्रवाई?
अदालतें बार-बार ऐसी पंचायतों के खिलाफ दिशा-निर्देश देती रही हैं, सरकार भी मानती रही है कि इन खाप पंचायतों का कोई लीगल स्टेट्स नहीं है, न ही पंचायती राज कानून के अधीन इनके फरमानों का कोई कानूनी आधार है, न सरकार इन्हें मान्य मानती है, फिर भी इन पंचायतों का इतना रूतबा है कि सत्ता में बैठे लोग ऐसी पंचायतों की गैरकानूनी गतिविधियों को नजरअंदाज करते हैं। एक ओर सरकार अदालत में शपथपत्र देकर कहती है कि ऐसी पंचायतों की कोई कानूनी वैधता नहीं है, वहीं मुख्यमंत्री फरमाते हैं कि ये पंचायतें सामाजिक तंत्र और मान्यताओं का अहम हिस्सा हैं। यह सरकार का निकम्मापन ही कहा जाएगा कि सब कुछ सार्वजनिक रूप से होने के बावजूद वह बेशर्मी से गर्दन झुकाये नजरअंदाज किए रहती है और ऐसे मामलों में अक्सर उसका यही बेशर्मी भरा जवाब रहता है कि जब उसके पास कोई लिखित शिकायत आएगी, वह कार्रवाई करेगी। यदि अदालतें ऐसे मामलों में खुद संज्ञान लेकर सरकार से जवाबतलबी कर सकती हैं तो फिर सरकार खुद ऐसे मामलों का संज्ञान लेते हुए ऐसी पंचायतों पर अंकुश लगाने की पहल क्यों नहीं कर सकती? हैरानी की बात तो यह है कि रह-रहकर हर कुछ माह बाद सामने आ रहे इस तरह के मामलों में प्रशासन ऐसी पंचायतों के सामने लाचार एवं बेबस मुद्रा में नजर आया है, जो किसी तरह ऐसे मामलों को रफा-दफा कराकर अपना पल्ला झाड़ने की ही कोशिश करता है। यही कारण है कि कानून की नजर में इन पंचायतों के गैरकानूनी होने के बावजूद गांव के लोगों में इनसे दहशत व्याप्त है और इसी कारण जातिगत पंचायतों द्वारा ऐसे तुगलकी फैसले लेने की एक परम्परा सी बनती जा रही है।
अहम सवाल यह है कि जब दो परिवारों को ही ऐसे विवाह पर कोई ऐतराज नहीं, दूल्हा-दुल्हन एक-दूसरे के साथ संतुष्ट हैं, फिर खाप पंचायतों को ऐसे संबंधों को लेकर तकलीफ क्यों होती है? जिन समुदायों, जातियों या गोत्रों का ये पंचायतें प्रतिनिधित्व करती हैं, जब उन्हीं समुदायों, जातियों या गोत्रों के लोग चोरी, डकैती, हत्या, बलात्कार जैसे गंभीर अपराध करते हैं तो ये पंचायतें न जाने कहां गुम हो जाती हैं लेकिन कौन किससे शादी कर रहा है, किस शादी को वैध माना जाए और किसे नहीं, ये सवाल इनके लिए जीवन-मरण का प्रश्न बन जाते हैं।
युवाओं की सकारात्मक पहल
बहरहाल, ऐसी विकृत मानसिकता रखने वाले पंचायतियों और इन जाति पंचायतों के विरोध में अब समाज के प्रबुद्ध वर्ग को लामबंद होना होगा तथा खासकर युवाओं को इस दिशा में अपनी आवाज बुलंद करनी होगी। प्रगतिशील सोच वाले युवाओं को स्वस्थ समाज के निर्माण में अपनी सार्थक भूमिका का निर्वहन करते हुए दकियानूसी सोच वाले बुजुर्गों की मानसिकता में बदलाव लाने के प्रयास शुरू करने होंगे।
फिलहाल उठे गोत्र विवादों में जो सबसे सुखद और सराहनीय बात सामने आई है, वह है युवाओं की बदलती मानसिकता। ऐसा पहली बार हुआ है, जब ऐसे किसी गोत्र विवाद में उसी क्षेत्र के युवा एकजुट होकर पंचायत के अमानवीय एवं बर्बर फैसले के खिलाफ खड़े हुए हैं। खेड़ी गांव में हुई पंचायत के फैसले के अगले ही दिन सर्वखाप, सर्वजातीय महम चैबीसी युवा पंचायत ने खेड़ी में हुई पंचायत के फैसले की तीव्र भत्र्सना करते हुए पीड़ित परिवार को हरसंभव सहयोग देने का वादा किया था तथा पिता को मामा और दादा को नाना बना देने के पंचायत के फैसले को असहनीय बताते हुए इसे सामाजिक परम्परा के बजाय सामाजिक कलंक बताते हुए कहा था कि यदि जरूरत पड़ी तो युवा इसे लेकर बड़ा आन्दोलन करेंगे। उसके बाद दो खाप पंचायतें भी ऐसे तुगलकी फैसलों के खिलाफ खुलकर खड़ी हुई थी। इसे इस दिशा में एक सकारात्मक संकेत ही माना जाना चाहिए।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं तीन प्रतिष्ठित फीचर एजेंसियों के समूह ‘मीडिया केयर ग्रुप’ के प्रधान सम्पादक हैं)



सम्पर्क: गुप एडीटर, मीडिया केयर ग्रुप, मेन बाजार बादली, जिला झज्जर (हरियाणा)-124105.
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कितनी सार्थक होगी पाकिस्तान से बातचीत की प्रक्रिया?

खरी खोटी
कितनी सार्थक होगी पाकिस्तान से बातचीत की प्रक्रिया?
. योगेश कुमार गोयल

नवम्बर 2008 के मुम्बई हमले के बाद भारत-पाक के रिश्तों में जो खटास उत्पन्न हुआ था, उस कारण दोनों देशों के बीच वार्ताओं का सिलसिला पूरी तरह से बंद था और भारत द्वारा बार-बार स्पष्ट रूप से यही कहा गया था कि जब तक पाकिस्तान मुम्बई हमलों के जिम्मेदार पाकिस्तान में बैठे आतंकवादी गिरोहों के नेताओं को सजा नहीं देता तथा अपने वहां फैले भारत विरोधी आतंकी नेटवर्क को नेस्तनाबूद करने के लिए ठोस कार्रवाई नहीं करता, तब तक दोनों देशों के बीच कोई बातचीत शुरू नहीं हो सकती लेकिन अति उत्साह से सराबोर भारत सरकार द्वारा अपने ही बयानों से पलटी मारते हुए पाकिस्तान की निरन्तर वादाखिलाफी के बावजूद पिछले दिनों जिस प्रकार पाकिस्तान के साथ बातचीत की पेशकश की गई, उससे हर किसी का हतप्रभ होना स्वाभाविक ही है।
यह बड़े हैरत की ही बात है कि जहां 26/11 के मुम्बई हमले के बाद भारत सरकार अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान की पोल खोलने और उसे पूरी दुनिया में अलग-थलग करने में सफल हुई थी, वहीं उसने अब न केवल अपनी उसी रणनीति को पूरी तरह पलट दिया है बल्कि एक प्रकार से पाकिस्तान के समक्ष घुटने भी टेक दिए हैं। भारत सरकार मुम्बई हमले के बाद बार-बार कहती रही कि पाकिस्तान के साथ कोई बातचीत तभी शुरू हो सकती है, जब वो मुम्बई हमले के षड्यंत्रकारियों के खिलाफ कार्रवाई करते हुए उन्हें कानून के हवाले करे लेकिन पाकिस्तान का रूख हर बार टालमटोल वाला रहा। पाक प्रधानमंत्री युसूफ रजा गिलानी ने तो साफ शब्दों में कहा कि पाकिस्तान इस सिलसिले में कुछ नहीं कर सकता क्योंकि वह खुद आतंकवाद का शिकार है और मुम्बई जैसे हमले उनके यहां हर महीने होते रहते हैं लेकिन अपनी ठोस रणनीति के चलते भारत सरकार पाकिस्तान को आतंकवाद के मुद्दे पर अलग-थलग करने में काफी हद तक सफल हो गई थी और उसने पाकिस्तान के साथ बातचीत की प्रक्रिया शुरू करने के लिए शर्त रखी थी कि पहले पाकिस्तान पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न अवसरों पर दिए गए अपने उस वायदे को निभाए कि उसकी सीमाओं का इस्तेमाल दूसरे देशों में आतंकवाद फैलाने के लिए नहीं होगा।
भुला दिया मुम्बई हमले का दर्द
एकाएक ऐसा क्या होगा कि मनमोहन सरकार अपनी इन शर्तों को दरकिनार करते हुए मुम्बई हमले के दर्द को भूलकर पाकिस्तान के साथ बातचीत की प्रक्रिया शुरू करने के लिए बेचैन हो उठी? बावजूद इसके कि खुद अमेरिका ने, जिसके दबाव में झुककर सरकार द्वारा बातचीत की प्रक्रिया शुरू करने की पहल की गई बताई जाती है, भारत को पाकिस्तान द्वारा उसकी जमीन का प्रयोग भारत में आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए किए जाने के सबूत उपलब्ध कराए थे और खुद अमेरिकी रक्षामंत्री राॅबर्ट्स गेट्स ने भारत की सरजमीं पर खड़े होकर पाकिस्तान को चेतावनी भरे लहजे में कहा था कि पाकिस्तान भारत के सब्र का और इम्तिहान न ले अन्यथा भारत युद्ध के रास्ते पर जा सकता है। आज पाकिस्तान के समक्ष बातचीत की पेशकश करके जहां भारत सरकार पाकिस्तान के समक्ष एक प्रकार से आत्मसमर्पण की मुद्रा में नजर आ रही है, वहीं उल्टे पाकिस्तान भारत को अलग-थलग करने की कोशिशों में सफल होता दिख रहा है।
भारत सरकार को देश की जनता को यह जवाब देना होगा कि जिस पाकिस्तान के साथ बातचीत की प्रक्रिया शुरू करने को वह इतनी उतावली है, क्या उस धूर्त पाकिस्तान ने 26/11 के हमलावरों को दण्डित किया? क्या उसने गुलाम कश्मीर में आतंकी शिविरों को नष्ट किया? शर्म-अल-शेख में प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने अपनी किस नीति के तहत पाकिस्तान से वार्ता के अपने घोषित एजेंडे को आगे बढ़ाया? उल्लेखनीय है कि जुलाई 2009 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मिस्र के शर्म-अल-शेख शहर में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री युसूफ रजा गिलानी से मुलाकात कर एक संयुक्त बयान जारी किया था, जिसमें भारत की ओर से न केवल ‘समग्र बातचीत’ को आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई की शर्त से मुक्त कर दिया गया था बल्कि उस बयान में यह भी शामिल किया गया था कि ब्लूचिस्तान में हो रही हिंसा पर भारत पाकिस्तान की चिंताओं को महसूस करता है। इस संयुक्त बयान को भारत की एक भारी कूटनीतिक भूल माना गया था। वैसे भी तब से लेकर अब तक पाकिस्तान के व्यवहार से दोनों देशों के रिश्तों की मजबूती को लेकर कोई सकारात्मक संकेत नहीं मिले।
सबसे अहम सवाल, जिसका जवाब मनमोहन सरकार को देना होगा, वो है कि एक ओर सरकार हथियार न छोड़ने वाले नक्सलियों से बात करने से साफ इन्कार कर रही है, फिर उस पाकिस्तान से किस आधार पर सचिव स्तर की बातचीत शुरू करने की तैयारी कर रही है, जिसका प्रधानमंत्री ही कश्मीर में जेहाद छेड़ने की घोषणा सार्वजनिक रूप से कर रहा हो? जिस दिन विदेश मंत्रालय में पाकिस्तान को सचिव स्तर की बातचीत का न्यौता दिया गया, उसके अगले ही दिन पाक प्रधानमंत्री गिलानी जमात-उल-दावा के सरगना हाफिज मुहम्मद सईद के नेतृत्व में गुलाम कश्मीर में जेहादियों के एक बड़े सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए भारत से वार्ता में कश्मीर को भी शामिल करने और जम्मू कश्मीर में ‘आजादी की लड़ाई’ जारी रखने का ऐलान कर भारत के जख्मों पर नमक छिड़क रहे थे। सवाल यह है कि जब तक कश्मीर में पाक प्रायोजित आतंकवाद और छद्म युद्ध जारी है, क्या पाकिस्तान से कश्मीर मसले पर किसी भी प्रकार की वार्ता उचित होगी?
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने हाल ही में खुद माना है कि जम्मू कश्मीर में आतंकवादी घटनाओं में तो कमी आई है लेकिन वहां घुसपैठ की घटनाओं में बढ़ोतरी हुई है। ऐसे में सरकार को इस सवाल का जवाब भी देना होगा कि वो क्या कर रही है? न वो सीमा पार से पाकिस्तान द्वारा जम्मू कश्मीर में कराई जा रही घुसपैठ व आतंकवादी घटनाओं को रोक पा रही है और न ही भारत विरोधी जेहादी ढ़ांचे को तोड़े बिना पाकिस्तान से कोई बातचीत न करने के अपने स्टैंड पर कायम रह पा रही है। आखिर पाकिस्तान के साथ फिर से बातचीत की पेशकश कर मनमोहन सरकार साबित क्या करना चाहती है? वास्तविकता यही है कि कूटनीति के मोर्चे पर पाकिस्तान हमेशा भारत को मात देता आया है और वही इस बार भी हुआ है।
भारत की हास्यास्पद स्थिति
पाकिस्तान ने भारत का सचिव स्तर की बातचीत का प्रस्ताव तो स्वीकार कर लिया लेकिन धूर्तता का परिचय देते हुए इस पेशकश पर ‘समग्र वार्ता’ (कम्पोजिट डायलाॅग) की शर्त लगा दी और उसके तुरंत बाद पाकितान के विदेश मंत्री शाह मुहम्मद कुरैशी सहित पाक प्रधानमंत्री भी भारत का मजाक उड़ाने में जुट गए, जिससे अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भारत की स्थिति बहुत ही हास्यास्पद हो गई है। पाकिस्तान यह कहकर भारत की फजीहत करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा कि उसने नई दिल्ली के समक्ष घुटने नहीं टेके हैं बल्कि भारत ने घुटने टेके हैं और उसे वार्ता के लिए मजबूर किया है।
भारत का मजाक उड़ाते हुए पाक विदेश मंत्री कुरैशी का कहना है कि समग्र वार्ता प्रक्रिया को तोड़ने वाला और पाकिस्तान के साथ संबंध खत्म करने की बात करने वाला भारत खुद हमारे पास आया और बातचीत करने को कहा। 26 नवम्बर की घटना के बाद जो भारत हम पर हमला करने की बात कर रहा था, एक साल बाद वह स्वयं वार्ता का प्रस्ताव लेकर आया है। आखिर भारत को झुकना पड़ा और अब उसकी अकड़ ढ़ीली हो गई है। कुरैशी का कहना है कि मुम्बई का मामला हो या कश्मीर का, पाकिस्तान लगातार अपने रूख पर कायम रहा लेकिन भारत कभी किसी रूख पर स्थिर नहीं रह पाता। भारत डर गया है और ऐसा पाकिस्तान की अपनी ताकत की वजह से हुआ है।
एक ओर पाक विदेश मंत्री ने भारत का खुलेआम मजाक उड़ाते हुए मनमोहन सरकार की स्थिति ऐसी हास्यास्पद बना दी है कि न तो वो अब वार्ता की अपनी पेशकश से पीछे हट सकती है और न ही पाकिस्तान की ही भाषा में उसे कोई जवाब देते बन रहा है, वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान के गृहमंत्री ने आईपीएल में पाकिस्तान के खिलाड़ियों के न चुने जाने पर भारत को इसका सबक सिखाये जाने की धमकी भी दे डाली है।
क्यों करें पाकिस्तान से बातचीत?
पाकिस्तान के साथ वार्ता शुरू करने के हिमायती हमारे देश के ही कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी यह बात उठाते नहीं थकते कि पाकिस्तान आज खुद आतंकवाद से पीड़ित है, ऐसे में भारत को उसकी मदद करनी चाहिए। ऐसे लोगों से यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि पाकिस्तान अपनी भारत विरोधी गतिविधियों और आतंकी संगठनों पर लगाम कसने की कोई सार्थक पहल क्यों नहीं करता? अगर पाकिस्तान स्वयं आतंकवादी हादसों से इतना घबराया है तो क्यों नहीं वह अपने परमाणु हथियारों के जखीरे को राष्ट्रसंघ के हवाले कर देता, जिसका दुरूपयोग उसके पाले-पासे आतंकी संगठन कभी भी कर सकते हैं और पूरी दुनिया में भारी तबाही मचा सकते हैं?
माना कि पाकिस्तान खुद अपनी ही लगाई आतंकवाद की ज्वाला में झुलसने लगा है लेकिन इसके बावजूद अगर वो आज भी यह मानने को तैयार नहीं कि भारत में सक्रिय आतंकी संगठन उसकी धरती से ही अपनी तमाम गतिविधियां चला रहे हैं तो इसका क्या अर्थ निकाला जाए? वैसे भी भारत और पाकिस्तान दोनों देशों में पनपते आतंकवाद की एक-दूसरे से तुलना हो ही नहीं सकती। भारत में सक्रिय आतंकवाद सीमा पार से चलाया जा रहा ‘आतंकी मिशन’ है, जो पाकिस्तान की ही देन है, जिसका मकसद इस देश को विखंडित करना, भारत के अटूट हिस्से जम्मू कश्मीर को इस देश से अलग करना और इस देश को एक ‘इस्लामिक स्टेट’ में तब्दील करना है जबकि पाकिस्तान में पनपता आतंकवाद न तो सीमा पार से चलाया जा रहा कोई आतंकी अभियान है और न ही यह पाकिस्तान को विखंडित करने के लिए चल रहा है बल्कि यह उस सत्ता केन्द्र के प्रति आतंकवादी गुटों की नाराजगी का ही नतीजा है, जिनका मानना है कि सरकार कठपुतली की भांति अमेरिका के इशारों पर नाचते हुए पाकिस्तान के हितों का सौदा कर रही है।
किससे करें बातचीत?
पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद की विभीषिका की जो भारी कीमत हम पिछले तीन दशकों से लगातार चुका रहे हैं, क्या वह किसी से छिपा है? क्या तमाम सबूतों के बावजूद आज तक पाकिस्तान ने मुम्बई हमले के दोषियों को सजा दिलाने के लिए रत्ती भर भी पहल की? क्या आतंकवाद और सीमापार से बढ़ती घुसपैठ को लेकर उसने भारत की चिंताओं को दूर करने के लिए कोई कदम उठाया? फिर भला ऐसे धूर्त पड़ोसी से दोस्ती या बातचीत का अर्थ ही क्या रह जाता है? वैसे भी पाकिस्तान में बातचीत की भी किससे जाए? वहां सत्ता का कोई एक केन्द्र तो है नहीं। सत्ता वहां तीन केन्द्रों में विभाजित है, जिनमें सबसे ताकतवर है वहां की सेना और दूसरा केन्द्र है खुफिया एजेंसी आईएसआई तथा आतंकी, जो निरंकुश हैं जबकि तीसरा केन्द्र है निर्वाचित सरकार, जो तभी तक टिकी रहती है, जब तक वह हर सही-गलत हरकत के लिए इन दोनों केन्द्रों की पीठ थपथपाती है। क्या ऐसी निर्वाचित सरकार से किसी भी वार्ता के सार्थक परिणाम निकलने की जरा भी उम्मीद की जा सकती है।
दोनों देशों के बीच चली शांति वार्ताओं का अब तक का यही हश्र रहा है कि भारत कोई एक आरोप सबूतों के साथ उठाता है तो पाकिस्तान बदले में भारत पर ही ढ़ेर सारे आरोप मढ़ने में देर नहीं लगाता। अगर भारत पाकिस्तान को हमारे यहां उसी की जमीन से फैलाये जा रहे आतंकवाद के पुख्ता सबूत सौंपता है तो पाकिस्तान उस पर नियंत्रण की कोई पहल करने के बजाय भारत पर ही आरोपों की झड़ी लगाकर दुनिया को यह दिखाने की कोशिशों में जुट जाता है कि आरोप लगाने वाला भारत स्वयं कितना दूध का धुला है।
बेढ़ंगी और पिलपिली नीतियां
हमारी विदेश नीति कितनी हास्यास्पद रही है, इसका आभास बार-बार होता रहा है। समझौता ट्रेन हादसे में पाकिस्तानी हाथ होने के स्पष्ट संकेत मिले थे, उसके बावजूद प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह तब पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री शौकत अजीज को ही यह आश्वासन देते नजर आए थे कि इन घृणित गतिविधियों में शामिल लोगों को बख्शा नहीं जाएगा। क्या प्रधानमंत्री नहीं जानते थे कि भारत उसी पाकिस्तान की लगाई आतंकवाद की ज्वाला में बुरी तरह झुलस रहा है, जिसे वह अपने इस प्रकार के आश्वासनों के जरिये आतंकवादी घटनाओं को लेकर हमारे ही ऊपर उंगली उठाने का मौका दे रहे थे। हुआ भी वही, पाकिस्तान ने भारत के उस आश्वासन के तुरंत बाद हम पर ही आतंकवादी गतिविधियां चलाने का आरोप मढ़ दिया था। इससे ज्यादा शर्मनाक स्थिति और क्या होगी कि मनमोहन सरकार के कुछ मंत्री भी आतंकवाद से निपटने की अपनी ही सरकार की नीतियों पर संदेह जाहिर करते रहे हैं।
आखिर क्या वजह है कि बिना हालात सुधारे पाकिस्तान के साथ आपसी संबंध सुधारने की सबसे ज्यादा बेचैनी भारत को ही है जबकि यह जगजाहिर है कि पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज आने वाला नहीं? यह हमारी सरकारों की बेढ़ंगी नीतियों का ही परिणाम है कि हमारी छवि एक ऐसे बेहद कमजोर और नरम राष्ट्र की बन गई है, जिसे छोटे-छोटे देश भी घुड़कने से नहीं घबराते। आए दिन आतंकी हादसों को झेलने के बाद भी हममें इतना माद्दा नहीं है कि अपनी ही जमीन पर दहशत फैला रहे नापाक तत्वों का सिर कुचल सकें बल्कि ऐसे हर हादसे के बाद हम कातर दृष्टि से अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी इत्यादि की ओर ताकने लगते हैं और उनसे फरियाद करते हैं कि वो इन आतंकियों के विरूद्ध कदम उठाएं? कितनी शर्मनाक स्थिति है!
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं तीन फीचर एजेंसियों के समूह ‘मीडिया केयर ग्रुप’ के प्रधान सम्पादक हैं)


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