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Wednesday, April 28, 2010

जीव-जंतुओं की अनोखी दुनिया - 47

- योगेश कुमार गोयल

(मीडिया केयर नेटवर्क)

सर्वाधिक रहस्यमयी, सर्वाधिक सुंदर कलाबाज बंदर ‘गिबन्स’

दक्षिण एशिया तथा ईस्टइंडीज के समशीतोष्ण जंगलों में पाए जाने वाले ‘गिबन्स’ नामक बंदर वानर प्रजाति में सर्वाधिक रहस्यमयी तथा सर्वाधिक सुंदर बंदर माने जाते हैं। भारत में असम के अलावा बांग्लादेश, उत्तरी म्यामा (बर्मा) तथा चीन के कुछ हिस्सों में भी हुलाक गिबन्स पाए जाते हैं। गिबन्स को रहस्यमयी वानर तो माना ही जाता है, यह वानर प्रजाति में सबसे कुशल कलाबाज भी हैं। ये वानर तरह-तरह की आवाजें निकालने में सक्षम होते हैं तथा पेड़ों के बीच से सुगमता एवं शक्तिपूर्वक झूल जाने की अपनी क्षमता के कारण भी दुनियाभर में विख्यात हैं। ये एक हाथ से पेड़ की एक डाली पकड़कर झूलते हुए दूसरी डाली पर पहुंच जाते हैं और कई बार इनकी यह छलांग आठ से दस मीटर लंबी होती है।
गिबन्स अपनी लंबी बांहों के कारण भी जाने जाते हैं। दरअसल इनकी बांहें इतनी लंबी होती हैं कि जब ये खड़े होते हैं, तब इनकी बांहों की उंगलियां जमीन को छूती हैं। इनकी भुजाएं मनुष्य की भुजाओं से लगभग दुगुनी लंबी होती हैं। अपनी लंबी बांहों से इन्हें अपने बहुत से कार्यों में काफी मदद मिलती है। लंबी उंगलियों के कारण ही एक पेड़ से दूसरे पेड़ तक झूलकर जाते समय इन्हें काफी मदद मिलती है। गिबन्स हवा में काफी करतब दिखाते हैं, इसी कारण इन्हें कुशल कलाबाज के रूप में भी जाना जाता है।

गिबन्स काफी शर्मीले होते हैं तथा घने जंगलों में रहते हैं। इसलिए मनुष्यों का इन तक पहुंच पाना बहुत कठिन होता है। यही कारण है कि वानरों की इस प्रजाति के बारे में जानकारी सीमित ही है। वैसे मनुष्यों की भांति गिबन्स भी एक परिवार के रूप में ही रहते हैं। इनके शरीर पर घने बाल होते हैं। आकार और शक्ल-सूरत में गिबन्स एक जैसे ही होते हैं। नर और मादा हुलाक गिबन्स जन्म के समय काले होते हैं मगर व्यस्क होते-होते मादा हुलाक गिबन्स का रंग भूरा हो जाता है। फूल, पत्ते, कीड़े-मकौड़े तथा उनके अंडे गिबन्स का पसंदीदा आहार हैं और अपना करीब 60 फीसदी समय ये आहार सेवन में ही बिताते हैं। (एम सी एन)

इंसानों को शहद का पता बताता है ‘हनीगाइड’

‘हनीगाइड’ का नाम सुनकर लोग प्रायः इस भ्रम में पड़ जाते हैं कि शायद यह पक्षी शहद का लोभी है यानी इसे शहद ज्यादा पसंद है, इसीलिए इसे ‘हनीगाइड’ के नाम से जाना जाता है किन्तु हकीकत यह है कि यह पक्षी स्वयं मनुष्यों को शहद का पता बताता है और इसके लिए यह उन्हें खुद मधुमक्खियों के छत्तों तक पहुंचने का मार्ग बतलाता है। यह काम यह पक्षी निस्वार्थ भाव से हरगिज नहीं करता बल्कि इसके पीछे हनीगाइड का यह स्वार्थ होता है कि इसे मधुमक्खियों के अण्डे बहुत स्वादिष्ट लगते हैं लेकिन जब तक छत्ते में मधुमक्खियां मौजूद होती हैं, इसकी दाल नहीं गलती। दरअसल हनीगाइड को मधुमक्खियों के डंकों से बहुत भय लगता है लेकिन इसके लिए यह बड़ी समझदारी से चाल चलता है।
हनीगाइड जब किसी इंसान को उस ओर जाते देखता है, जहां मधुमक्खियों का कोई छत्ता हो तो यह चीख-चीखकर उसका ध्यान उस ओर आकर्षित करने की कोशिश करता है किन्तु तब भी उस व्यक्ति का ध्यान उस ओर न जाए तो यह उसकी ओर उड़-उड़कर बरबस ही उसका ध्यान आकृष्ट करता है और जब इसे यकीन हो जाता है कि वह व्यक्ति उसी के पीछे-पीछे आ रहा है तो यह उसे सीधे शहद के छत्ते तक ले जाता है। बस, फिर इसे कुछ करने की जरूरत नहीं होती क्योंकि वह व्यक्ति छत्ता तोड़कर उसमें से शहद निकाल लेता है और उसके बाद छत्ते में छिपे अंडों को ‘हनीगाइड’ चट कर जाता है। चूंकि यह एक गाइड की भांति मनुष्यों को शहद का पता बताता है, इसीलिए इसे ‘हनीगाइड’ के नाम से जाना जाता है। (एम सी एन)

Friday, April 23, 2010

पुस्तक चर्चा : सामाजिक सरोकारों से जुड़े हैं ‘तीखे तेवर’

सामाजिक सरोकारों से जुड़े हैं ‘तीखे तेवर’


लेखक का यह प्रयास सामाजिक अभियंताओं तथा शोधार्थियों के लिए शोध का विषय बनकर अपनी विशिष्ट पहचान बनाएगा, ऐसी आशा है।

पुस्तक: तीखे तेवर

लेखक: योगेश कुमार गोयल

पृष्ठ संख्या: 160

मूल्य: 150 रुपये

संस्करण: 2009

प्रकाशक: मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स, बादली, जिला झज्जर (हरियाणा)-124105.

दैनिक ट्रिब्यून सहित देशभर के कई प्रतिष्ठित समाचारपत्र-पत्रिकाओं के साप्ताहिक स्तंभ ‘जीव-जंतुओं की अनोखी दुनिया’ के स्तंभकार श्री योगेश कुमार गोयल आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। पिछले दो दशकों में प्रमुख राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में उनके आठ हजार से भी अधिक आलेख उनकी रचनात्मक पत्रकारिता एवं लेखन के प्रमाण कहे जा सकते हैं। एक समाचार आलेख सेवा एजेंसी के सम्पादक के तौर पर भी उन्होंने कुशल सम्पादन के अलावा सामाजिक सरोकारों से जुड़े बहुआयामी पक्षों को रेखांकित करते हुए जो समसामयिक लेखन किया है, वह सही मायने में पत्रकारिता के लिए एक मिसाल है। उनके इसी समसामयिक एवं प्रासंगिक लेखन पर आधारित है उनकी नई पुस्तक ‘‘तीखे तेवर’’, जिसमें उनके पच्चीस निबंध शामिल किए गए हैं। पुस्तक का खास पहलू यह है कि ‘तीखे तेवर’ सामाजिक सरोकारों से जुड़े ऐसे पक्ष हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
युवा कलमकार श्री गोयल के लेखन में उनके पत्रकार व लेखक के नैतिक दायित्वों का दिशाबोध साफ तौर पर झलकता है। बात चाहे ‘धर्म-जाति के नाम पर भड़कते दंगे’ नामक आलेख की हो या फिर ‘आस्था की चाशनी में लिपटी अंधविश्वास की कुनैन’ की, उनकी लेखनी राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता की जिम्मेदारी को सामने रखते हुए धर्म एवं जाति के तथाकथित ठेकेदारों को नंगा करते हुए राष्ट्रबोध की प्रेरणा जगाती है। ‘कहर मौत के अंधेरे कुओं का’ नामक आलेख में उन्होंने ‘प्रिंस प्रकरण’ के दूसरे चेहरे को बड़ी खूबसूरती से उजागर किया है। ‘बचपन बेचते नौनिहाल’, ‘रैगिंग: नहीं अब और नहीं’, ‘ठण्डा के नाम पर बिकता जहर’, ‘रियलिटी शो कितने रीयल’, ‘आफत बना शोर’, ‘जनसंख्या नियंत्रण’, ‘पान मसाला: एक पाउच कैंसर’, ‘शरीर को खोखला बनाते मादक पदार्थ’, ‘आफत बना मोबाइल’ जैसे अनेक निबंध न केवल सामाजिक विसंगितयों को रेखांकित करते हैं अपितु तथ्यपरक आंकड़ों के साथ उनके समाधान की ओर भी इशारा करते हैं।
इस पुस्तक में पर्यावरण असंतुलन तथा जल संरक्षण जैसे वैश्विक समसामयिक मुद्दों को ‘भयावह खतरे ग्लोबल वार्मिंग के’, ‘बिगड़ता मिजाज मौसम का’, ‘पानी के लिए अगला विश्व युद्ध’ आदि निबंधों के माध्यम से पूरी बेबाकी तथा तथ्यों के साथ प्रस्तुत करते हुए इनके संरक्षण एवं संवर्द्धन के उपाय भी सुझाये हैं। ‘एड्स नियंत्रण के लिए गंभीर प्रयासों की जरूरत’, ‘मूर्ति विसर्जन से प्रदूषित होता वातावरण’, ‘मौत का पूरा सामान मौजूद है कोल्ड ड्रिंक्स में’ तथा ‘असुरक्षा, बेबसी और आतंक ही हैं हमारी नई पहचान’ जैसे आलेख संबंधित विषयों के उन पहलुओं को प्रमुखता से उजागर करते हैं, जो अक्सर हाशिये पर रहते हैं।
रचनात्मक पत्रकारिता के पक्षधर, पोषक और सजग प्रहरी श्री गोयल ने संक्रमण के दौर से अपनी बिरादरी पर भी अनेक सवालिया निशान उठाते हुए नैतिक दायित्व बोध कराया है। ‘क्या महज मीडिया का फैशन ही है पुलिस की आलोचना करना?’, ‘राष्ट्रीय अखण्डता और प्रेस की भूमिका’ तथा ‘प्रिंट मीडिया बनाम इलैक्ट्रॉनिक मीडिया’ जैसे आलेख संविधान के चौथे स्तंभ पर तीखे तेवर हैं।
पुस्तक के सभी निबंध विचारोत्तेजक हैं तथा सामाजिक व राष्ट्रीय सरोकारों से जुड़े हैं। इन आलेखों की भाषा पुस्तक के शीर्षक के अनुरूप तीखी है। आवरण विषयानुरूप व प्रभावी है। यह पुस्तक एक ओर जहां वैचारिक महायज्ञ में प्रेरक आहुति का काम करेगी, वहीं लेखक का यह प्रयास सामाजिक अभियंताओं तथा शोधार्थियों के लिए शोध का विषय बनकर अपनी विशिष्ट पहचान बनाएगा, ऐसी आशा है।
समीक्षक : सत्यवीर ‘नाहड़िया’

(समीक्षक: दैनिक ट्रिब्यून)

257, सेक्टर-1, रेवाड़ी (हरियाणा)
मोबाइल: 9416711141

यदि इस पुस्तक को खरीदना चाहें तो इस पुस्तक पर पूरे 25 प्रतिशत की विशेष छूट प्रदान की जाएगी। पुस्तक के संबंध में किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए सीधे पुस्तक के लेखक से इस नंबर पर सम्पर्क कर सकते हैं:-

9416740584

Tuesday, April 20, 2010

नक्सलियों के स्वभाव में परिवर्तन कब, क्यों और कैसे?

- योगेश कुमार गोयल

(मीडिया केयर नेटवर्क)

गत 6 अप्रैल को छत्तीसगढ़ स्थित दंतेवाड़ा में तो नक्सलियों ने अपने जाल में फंसाकर अब तक का सबसे बड़ा नक्सली हमला करके करीब 76 सुरक्षाकर्मियों को मौत की नींद सुलाकर सरकार के ‘नक्सल विरोधी अभियान’ की धज्जियां उड़ा दी। 15 फरवरी 2010 को भी मिदनापुर के सिलदा क्षेत्र में नक्सलियों ने अपने हमले में ईस्टर्न फ्रंथ्अयर राइफल्स के 24 जवानों की हत्या कर दी थी। इसके अलावा 22 मई 2009 को नक्सलियों ने गढ़चिरौली के जंगलों में 16 पुलिसवालों को मौत के घाट उतार दिया था जबकि 16 जुलाई 2008 को उड़ीसा के मलकानगिरी में नक्सलियों ने विस्फोट करके पुलिस वाहन उड़ाकर 21 जवानों को मार डाला था। सवाल यह है कि देश में नक्सली संगठनों के स्वभाव में परिवर्तन कब, क्यों और कैसे आया?
वर्ष 1990-91 के आते-आते नक्सलवादी आतंकवाद के स्वभाव में काफी बदलाव आने लगा था। इस बदलाव के चिन्ह बिहार के नक्सलवादी संगठनों में स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगे थे। आन्दोलन के कई उग्रवादी नेताओं ने बंदूक की नाल से निकलने वाली क्रांति का स्वप्न छोड़कर लोकतांत्रिक तरीके से सामाजिक व्यवस्था को बदलने की बात भी सोचनी आरंभ कर दी थी। यह बदलाव किसी दिव्य शक्ति के चमत्कार के कारण नहीं हुआ था। पहले साम्यवादी रूस में खुलेपन की हवा चली, फिर माओवादी चीन की कटटरता में कमी आई, धीरे-धीरे विश्व साम्यवाद के तेवर बदलने शुरू हुए और अंत में नक्सली आतंकवाद ने शक्ति के हाथ सहमति की ओर बढ़ाने शुरू किए।
बिहार में भोजपुर जिले का इकवारी गांव सबसे पहले नक्सलवादी आतंक का केन्द्र बना था। यह बात 1970 के आसपास की है। फिर इसका प्रभाव तेजी से फैला और देखते ही देखते बिहार के 30 से भी अधिक जिलों में नक्सलवादियों का आतंक छा गया। इनमें करीब 12 जिले तो ऐसे थे, जहां नक्सलवादी निर्णायक और महाशक्ति के रूप में उभरकर सामने आए थे और भूमिहीन, गरीब और शोषित जनता इनकी ओर तेजी से खिंच रही थी।
बिहार के नक्सलवाद से प्रभावित क्षेत्रों में करीब आधा दर्जन नक्सलवादी गुट सक्रिय रहे हैं लेकिन इन सबमें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी लेनिनवादी) अपने प्रभाव के दृष्टिकोण से सर्वाधिक शक्तिशाली बनकर सामने आई। इसके अलावा पार्टी यूनिटी, सी.ओ.सी., माओवादी सेंटर सहित कई अन्य गुट भी बिहार में नक्सली आतंक के लिए चर्चा में आए। इस बीच जिन संगठनों ने खुलेपन से इस तरफ अपने कदम बढ़ाए, उनमें इंडियन पीपुल्स फ्रंट तथा बिहार प्रदेश किसान सभा के नाम लिए जा सकते हैं।
नक्सली उग्रवाद में खुलेपन की हवा चली तो पार्टी यूनिटी जैसे कट्टरवादी गुट ने भी अपने नेतृत्व में मजदूर किसान संग्राम का गठन किया और लोक संग्राम मोर्चा भी बंदूक के साथ बैलेट की तरफ मुड़ता दिखाई दिया। नक्सलवादी आतंकवाद जब लोकतांत्रिक प्रक्रिया की ओर बढ़ा तो इस बदलाव के अंतर्गत इंडियन पीपुल्स फ्रंट को संसद में अपना पहला प्रतिनिधि भेजने में सफलता प्राप्त हुई।
उधर आंध्र प्रदेश के कई नक्सलपंथियों ने भी चुनाव में हिस्सा लिया। बिहार से भाकपा (मार्क्सवादी लेनिनवादी) का सबसे पहला प्रतिनिधि 1989 में आरा संसदीय क्षेत्र से चुनाव जीतकर संसद में पहुंचा। इसी पार्टी का दूसरा सांसद असम से जीतकर आया था लेकिन थोड़ी सी संसदीय सफलताओं के अलावा नक्सलवादी संगठन कोई बड़ी छलांग नहीं लगा सके।
आखिरकार कई संगठन यह सोचने पर विवश हो गए कि नक्सलपंथी राजनीति का मुख्य मार्ग क्या हो? दरअसल नए जातीय ध्रुवीकरण तथा मध्यमवर्गीय जातियों के जुड़ाव ने एक अलग और नई स्थिति उत्पन्न कर दी। बिहार में नक्सलवादी वामपंथ का कौनसा मॉडल खड़ा हो, यह प्रश्न नक्सलवादियों के सामने मुंह बाये खड़ा हो गया। बंदूक की नाल से क्रांति के पक्षधर नक्सलवादी एक नए वैचारिक द्वंद्व के चक्रवात में फंस गए।
नक्सली आतंकवाद ने पश्चिम बंगाल से बिहार की ओर अपने कदम बढ़ाए। भोजपुर जिले में उसे अपने अनुकूल वातावरण मिला और धीरे-धीरे यह आग मध्य बिहार के 8 जिलों में फैल गई। भोजपुर, रोहतास, पटना, नालंदा, गया, जहानाबाद, औरंगाबाद तथा नवादा में नक्सलवाद ने अपनी शक्ति के झंडे गाड़ दिए। 1981-82 के बाद नक्सलियों का सैलाब धनबाद, हजारीबाग, पलामू, रांची, सिंहभूम, गिरिडीह की तरफ बढ़ने लगा और उन्होंने इन क्षेत्रों के औद्योगिक क्षेत्र में अपना प्रभाव जमा लिया।
इंडियन पीपुल्स फ्रंट के झण्डे तले हजारों युवक एवं छात्र एकत्रित हो गए। खेत मजदूर एवं भूमिहीन किसान उनके नारे पर सिर पर कफन बांधकर मैदान में निकल आए। नक्सलवादी संगठनों का प्रभाव इतना बढ़ गया कि उनकी एक आवाज पर बिहार की कोयला खानों में काम बंद हो जाता और माल की ढ़ुलाई रोक दी जाती।
जनता दल सरकार ने इस स्थिति को काफी गंभीरता से लिया। तब बिहार में नक्सलवादियों का भारी आतंक था और कानून व्यवस्था चरमराकर रह गई थी। इंडियन पीपुल्स फ्रंट ने तब अपना उग्रवादी मोर्चा ‘एक्यूट’ खोलकर ‘शक्ति’ और ‘सहमति’ दोनों रास्तों पर चलना शुरू कर दिया। ‘एक्यूट’ हिंसक वारदातें कर रहा था। उधर पुलिस उसकी हिंसक गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिए सक्रिय थी परन्तु स्थिति ने कुछ ऐसी पलटी खाई कि जनता दल के लोकप्रिय होते-होते दलित और शोषित व्यक्तियों के समीकरण बदलने लगे।
वे जातियां, जो नक्सलपंथ की सबसे प्रमुख आधार थी, जनता दल की ओर आकर्षित हुई। लालू प्रसाद यादव पहले से ही अपनी नक्सल विरोधी राजनीति के लिए प्रसिद्ध थे। उनके साथ भूमिहार, राजपूत, पिछड़ी जातियों के भू-स्वामी तथा धनी किसान भी जुड़ गए। इस प्रकार जनता दल के नाम पर जो नया मोर्चा बना, उसने नक्सलपंथ को काफी जोरदार झटका दिया और नक्सलवादी संगठनों में विभाजन की प्रक्रिया शुरू हो गई।
नक्सलवाद के उग्रवादी संगठनों में अब खुलेपन की हवा और तेज चलने लगी। नक्सलियों के सबसे बड़े संगठन ‘लिबरेशन’ ने अपनी राजनीतिक कार्रवाई को भी अब समाचारपत्रों में प्रकाशित कराना शुरू कर दिया जबकि इससे पहले संगठन की गतिविधियां पूर्णतया गुप्त रखी जाती थी। संगठन द्वारा प्रकाशित ‘लिबरेशन’ और ‘लोकयुद्ध’ भी अब खुले बाजार में दिखाई देने लगे।
नक्सलवाद में यह एक वैचारिक बदलाव था, जो धीरे-धीरे आया। लिबरेशन के नेता यह स्वीकार करने लगे कि यूरोप के साम्यवादी देशों में लोकतंत्र की जो आंधी चली, उसने नक्सलवाद के कट्टरपंथ को भी अपनी चपेट में ले लिया और बंदूक के महत्व को कम करके क्रांति के दूसरे रास्तों की तरफ भी सोचने के लिए विवश कर दिया। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण अंतर्राष्ट्रीय साम्यवादी सोच में आया बदलाव ही था। इस सोच की कट्टरवादिता जैसे-जैसे ढ़ीली पड़ी, वैसे-वैसे नक्सलवाद का हिंसक रूप नर्म पड़ता गया परन्तु अभी यह समझ लेना एक भारी भूल ही होगी कि नक्सलवादी हिंसा से प्रभावित भू भागों को पूर्ण रूप से हिंसा से मुक्ति मिल गई है। इसका स्पष्ट संकेत पिछले कुछ समय में हुई नक्सली हिंसा की कुछ बड़ी वारदातों से मिल ही गया है।
आतंकवाद अथवा उग्रवाद चाहे जहां भी और जिस भी रूप में हो, उसके पीछे कोई विचारधारा ही काम कर रही होती है। यह सकारात्मक भी हो सकती है और नकारात्मक भी लेकिन दोनों स्थितियों में इसका स्वभाव हिंसक ही होता है। इसका तोड़ पुलिस और प्रशासन इतना नहीं है, जितना मूल समस्याओं को हल करके इस प्रकार की विचारधारा का रूख मोड़ने के प्रयास में है। खेद की बात है कि शासन के स्तर पर हम शक्ति का तो भरपूर इस्तेमाल करते हैं किन्तु वैचारिक संघर्ष करते हुए इसे तोड़ने के लिए आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक कदम बहुत कम उठाते हैं लेकिन यह सफलता का नहीं वरन् असफलता का ही मार्ग है। (एम सी एन)
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Wednesday, April 14, 2010

HINDI MEDIA : तीखे तेवर

कृपया इस लिंक का अनुसरण करें:-

http://www.hindimedia.in/index.php?option=com_content&task=view&id=10989&Itemid=43

कार्टूंन कोना


साभार: मीडिया खबर डॉट कॉम

तीखे तेवर

कृपया इस लिंक का अनुसरण करें:-

http://mediakhabar.com/topicdetails.aspx?mid=95&tid=2404

Tuesday, April 13, 2010

बैसाखी से जुड़े ऐतिहासिक तथ्य

- योगेश कुमार गोयल

(मीडिया केयर नेटवर्क)



भारत एक कृषि प्रधान देश है और हमारे यहां बैसाखी पर्व का संबंध फसलों के पकने के बाद उसकी कटाई से जोड़कर देखा जाता रहा है। इस पर्व को फसलों के पकने के प्रतीक के रूप में भी जाना जाता है। हालांकि बैसाखी का त्यौहार विशेष तौर पर पंजाब का प्रमुख त्यौहार माना जाता रहा है लेकिन यह त्यौहार सिर्फ पंजाब में नहीं बल्कि देशभर में लगभग सभी स्थानों पर खासतौर से पंजाबी समुदाय के लोगों द्वारा तो हर साल 13 अप्रैल को बड़ी धूमधाम एवं हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।

पंजाब तो वैसे भी देश का प्रमुख अन्न उत्पादक राज्य है और जब यहां किसान अपने खेतों को फसलों से लहलहाते देखता है तो वह इस दिन खुशी से झूम उठता है और खुशी के इसी आलम में शुरू हो जाता है गिद्दा और भांगड़ा का मनोहारी दौर। यही वजह है कि खासतौर से पंजाब में बैसाखी के पर्व पर गिद्दा और भांगड़ा के कार्यक्रम न हों, यह तो हो ही नहीं सकता।

उत्तर भारत में और खासतौर से पंजाब में गिद्दा और भांगड़ा की धूम के साथ मनाए जाने वाले बैसाखी पर्व के प्रति भले ही काफी जोश देखने को मिलता है लेकिन वास्तव में यह त्यौहार विभिन्न धर्म एवं मौसम के अनुसार देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग नामों से मनाया जाता है। पश्चिम बंगाल में इसे ‘नबा वर्ष’ के नाम से मनाया जाता है तो केरल में ‘विशू’ नाम से तथा असम में यह ‘बीहू’ के नाम से मनाया जाता है।

बैसाखी पर्व के साथ भारतीय इतिहास की कई महत्वपूर्ण घटनाएं जुड़ी हैं। दरअसल इसी दिन अर्थात् 13 अप्रैल 1699 को गुरू गोविन्द सिंह ने आनंदपुर साहिब में ‘खालसा पंथ’ की स्थापना की थी और इस पंथ की स्थापना करने का उनका प्रमुख उद्देश्य था अत्याचार एवं शोषण का सामना करते हुए देश की एकता एवं अखंडता की रक्षा करना।

गुरू गोविन्द सिंह कलम के साथ-साथ तलवार के भी उपासक थे और उनके पंच प्यारों में सभी जातियों के लोग शामिल थे। उन्होंने अन्याय, विरोध एवं पाखंड के सर्वनाश की प्रेरणा और मानव जाति को एकता का संदेश देते रहने में ही अपना सम्पूर्ण जीवन व्यतीत कर दिया था।

13 अप्रैल 1875 को बैसाखी के ही दिन विश्व प्रसिद्ध संत स्वामी दयानंद सरस्वती ने ‘आर्य समाज’ की स्थापना की थी। स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा स्थापित ‘आर्य समाज’ नामक संस्था को आज भी सामाजिक क्रांति का प्रतीक माना जाता है।

बताया जाता है कि लाहौर पर विजय प्राप्त करने के बाद वापस लौटे ‘शेरे पंजाब’ महाराणा रणजीत सिंह का राजतिलक बैसाखी के दिन ही हुआ था। महाराजा रणजीत सिंह ने पंजाब में सिख राज्य की नींव रखी थी और अंग्रेजी शासन की जड़ें खोखली करने के लिए जीवन पर्यन्त कड़ा संघर्ष करते रहे थे। उन्होंने अपनी सरकार में विभिन्न सैनिक एवं असैनिक पदों पर सभी धर्मों के लोगों को नियुक्त किया था।

कहा जाता है कि अहमद शाह अब्दाली पंजाब को अफगानिस्तान में मिलाना चाहता था तो उसे मुंहतोड़ जवाब देने के लिए बैसाखी के ही दिन 13 अप्रैल 1749 को जनरल जस्सा सिंह अहलूवालिया ने ‘खालसा दल’ का गठन किया था और सिखों को एक नारा दिया था, ‘‘वाहे गुरू जी दा खालसा, वाहे गुरू जी दी फतेह।’’

सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक संदर्भों के अलावा बैसाखी का त्यौहार देश के स्वतंत्रता संग्राम से भी गहरा संबंध रखता है। 13 अप्रैल 1919 का बैसाखी का दिन आज भी चीख-चीखकर अंग्रेजों के जुल्मों की दास्तान बखान करता है। दरअसल रोलट एक्ट के विरोध में अपनी आवाज उठाने के लिए राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के आव्हान पर इस दिन हजारों लोग जलियांवाला बाग में इकट्ठा हुए थे क्योंकि ‘रोलट एक्ट’ कानून के तहत न्यायाधीशों और पुलिस को किसी भी भारतीय को बिना कोई कारण बताए और उन पर बिना कोई मुकद्दमा चलाए जेलों में बंद करने का अधिकार दिया गया था।

यही वजह थी कि महात्मा गांधी के आव्हान पर भारतवासियों में इस कानून के खिलाफ जबरदस्त आक्रोश उमड़ पड़ा था और इसके विरोध में अमृतसर के जलियांवाला बाग में हजारों लोगों की एक विशाल जनसभा हुई थी लेकिन अंग्रेज सरकार ने एक बहुत खतरनाक षड्यंत्र रचकर चारों तरफ से जलियांवाला बाग में एकत्रित हुए लोगों को घेरकर बिना किसी पूर्व चेतावनी के लोगों पर अचानक अंधाधुंध गोलियां बरसानी शुरू कर दी और इस दर्दनाक हत्याकांड में सैंकड़ों भारतवासी शहीद हो गए थे। हालांकि बाद में इस नृशंस हत्याकांड के सूत्रधार जनरल डायर की हत्या करके इसका बदला लिया गया था।

बैसाखी पर्व का महत्व इस वजह से भी बढ़ जाता है क्योंकि इसी दिन से विक्रमी संवत् की शुरूआत होती है और भारतीय संस्कृति के उपासक बैसाखी को ही नववर्ष का शुभारंभ मानकर इसी दिन से अपने नए साल का कार्यक्रम बनाते हैं और पंचांग भी विक्रमी संवत् के अनुसार ही तैयार किए जाते हैं। कहा जाता है कि बैसाखी के ही दिन दिन-रात बराबर होते हैं, इसीलिए इस दिन को ‘संवत्सर’ भी कहा जाता है।

बैसाखी को सूर्य वर्ष का प्रथम दिन माना गया है क्योंकि इसी दिन सूर्य अपनी पहली राशि मेष में प्रविष्ट होता है और इसीलिए इस दिन को ‘मेष संक्रांति’ भी कहा जाता है। यह मान्यता रही है कि सूर्य के मेष राशि में प्रवेश करने के साथ ही सूर्य अपनी कक्षा के उच्चतम बिन्दुओं पर पहुंच जाता है और सूर्य के तेज के कारण शीत की अवधि खत्म हो जाती है। इस प्रकार सूर्य के मेष राशि में आने पर पृथ्वी पर नवजीवन का संचार होने लगता है।

बैसाखी पर्व के संबंध में कुछ अंधविश्वास भी प्रचलित हैं। माना जाता है कि यदि बैसाखी के दिन बारिश होती है या आसमान में बिजली चमकती है तो उस साल बहुत अच्छी फसल होती है।

इस तरह देखा जाए तो बैसाखी का त्यौहार हमारे लिए खुशियों का त्यौहार तो है ही लेकिन इसके साथ-साथ यह दिन हमारे स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास की कुछ कड़वी यादें भी संजोये हुए है। बैसाखी का पवित्र दिन हमें गुरू गोविन्द सिंह जैसे महापुरूषों के महान् आदर्शों एवं संदेशों को अपनाने तथा उनके पद्चिन्हों पर चलने के लिए प्रेरित करता है और हमें यह संदेश भी देता है कि हमें अपने राष्ट्र में शांति, सद्भावना एवं भाईचारे के नए युग का शुभारंभ करने की दिशा में सार्थक पहल करनी चाहिए। (एम सी एन)

(लेखक ‘मीडिया केयर ग्रुप’ के प्रधान सम्पादक हैं)

पुस्तक समीक्षा

अनूठा संग्रह है ‘जीव-जंतुओं की अनोखी दुनिया’



पुस्तक: जीव-जंतुओं की अनोखी दुनिया


लेखक: योगेश कुमार गोयल


पृष्ठ संख्या: 96


मूल्य: 100 रुपये


संस्करण: 2009

प्रकाशक: मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स, बादली, जिला झज्जर (हरियाणा)-124105.



कौनसे मेंढ़क से शराब निकलती है? कौनसे मुर्गे की पूंछ बीस फुट होती है? कौनसा बंदर हर पल रंग बदलता है? कौनसी चील आग में कूदकर शिकार पर झपटती है? दुनिया की सबसे कीमती मछली कौनसी है? कौनसा सांप घोंसला बनाता है? कौनसा जीव स्तनधारी होने पर भी अण्डे देता है? कौनसा पक्षी तूफान के दौरान भी उड़ सकता है? अपने बिल तक कैसे पहुंच जाती हैं चींटियां? मानव उपस्थिति का पता कैसे लगा पाते हैं मच्छर? कौनसे पक्षी रखते हैं संगीत की परख? कैसे बदलता है गिरगिट का रंग? कौनसी मछली हवा में उड़ती है? छह टांगें होने पर भी कौनसा जीव उड़ नहीं सकता? कौनसा चमगादड़ पशुओं का खून पीता है? दुनिया का सबसे बड़ा अजगर कौनसा है? दुनिया का सबसे विचित्र बाज कौनसा है? कौनसी बिल्ली ताड़ी पीती है? सबसे जहरीला बिच्छू कौनसा है? ... जैसे एक सौ चौंतीस जीव-जंतुओं पर आधारित पुस्तक ‘जीव-जंतुओं की अनोखी दुनिया’ अपने नाम को चरितार्थ करती है, जिसमें लेखक श्री योगेश कुमार गोयल ने जीव-जंतुओं की अनूठी प्रजातियों के बारे में सचित्र रोचक जानकारी प्रस्तुत की है।

‘हरियाणा साहित्य अकादमी’ की पुस्तक प्रकाशनार्थ सहायतानुदान योजना के अंतर्गत ‘बाल साहित्य’ श्रेणी में गत वर्ष अनुदानित उक्त कृति केे लेखक श्री गोयल राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में गत दो दशकों से प्रमुखता से प्रकाशित होने वाले लेखक हैं। विभिन्न समाचार एवं फीचर एजेंसियों के सम्पादक के तौर पर श्री गोयल बहुआयामी लेखन से जुड़े हैं। ‘जीव-जंतुओं की अनोखी दुनिया’ उनका एक रोचक संग्रह है, जिसमें दुर्लभ प्रजातियों के उन जीव-जंतुओं को शामिल किया गया है, जिनके क्रियाकलाप लीक से हटकर हैं। एक ओर संग्रह में ऐसी प्रजातियां भी हैं, जो विलुप्त हो चुकी हैं या विलुप्त होने के कगार पर हैं, वहीं दूसरी ओर उन अनूठे जीव-जंतुओं को भी इस श्रेणी में शामिल किया गया है, जो पर्यावरण संरक्षण में अहम भूमिका निभाते हैं।

पुस्तक में अधिकांश जीव-जंतु ऐसे हैं, जिन्हें देखना तो दूर, उनके बारे में सुना भी नहीं है, जिसके चलते हर पाठक वर्ग में ‘जीव-जंतुओं की अनोखी दुनिया’ के प्रति जिज्ञासा एवं कौतूहल पैदा होता है। संग्रह जीव-जंतुओं की विचित्र गतिविधियों की ज्ञानवर्द्धक जानकारी के अलावा इनकी विलुप्त होती प्रजातियों के संरक्षण का आव्हान भी करता है। यदि पुस्तक के अंदर के पृष्ठों पर भी आवरण की भांति श्वेत-श्याम के बजाय रंगीन छायाचित्र होते तो ‘जीव-जंतुओं की अनोखी दुनिया’ की वस्तुस्थिति और अधिक प्रभावी ढ़ंग से मुखरित हो पाती। लेखक का यह संग्रह अनूठे जीव-जंतुओं के बारे में संबंधित जानकारी देने में सफल रहा है तथा बच्चों के अलावा भी हर वर्ग को ‘जीव-जंतुओं की अनोखी दुनिया’ पसंद आएगी, ऐसी आशा है।



समीक्षक: सत्यवीर ‘नाहड़िया’

257, सेक्टर-1, रेवाड़ी (हरियाणा)

मोबाइल: 9416711141

Saturday, April 10, 2010

जीव-जंतुओं की अनोखी दुनिया-46





. योगेश कुमार गोयल (मीडिया केयर नेटवर्क)


दुबला-पतला 12 फुट लंबा जहरीला सांप ‘बुशमास्टर’
मध्य अमेरिका तथा दक्षिण अमेरिका के उष्णकटिबंधीय स्थानों में पाया जाने वाला पिट वाइपर समूह का ‘बुशमास्टर’ सांप बेहद विषैला सांप है, जिसका संबंध रैटल स्नैक से भी है। बिल्कुल दुबला-पतला यह सांप 12 फुट तक लंबा होता है, जिसके विषदंत की लम्बाई भी एक इंच तक होती है। मादा बुशमास्टर एक बार में 12 तक अण्डे देती है। बुशमास्टर के शरीर का पिछला भाग लाल या पीला होता है, जिस पर तिरछे गहरे बांड भी होते हैं और आंख से लेकर मुंह तक एक लंबी लकीर भी होती है। (एम सी एन)
दरियाई घोड़ा: जिसके शरीर से निकलता है गुलाबी पसीना अपने वैज्ञानिक नाम ‘हिप्पोपोटेमस’ के नाम से जाना जाने वाला दरियाई घोड़ा हाथी तथा गैंडे के बाद धरती पर सबसे बड़ा जीव है लेकिन इस जानवर की हैरानी में डालने वाली सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह एकमात्र ऐसा जानवर है, जिसके शरीर से गुलाबी पसीना निकलता है। दरियाई घोड़े प्रायः 6 से 10 फुट तक लंबे होते हैं किन्तु कांगो के घने जंगलों में 10 से 14 फुट लंबे दरियाई घोड़े भी देखे जा सकते हैं। व्यस्क दरियाई घोड़े का वजन तकरीबन 3500 पौंड होता है। अपने भारी-भरकम शरीर के बावजूद दरियाई घोड़ा 30 मील प्रतिघंटा की रफ्तार से दौड़ लगाने में सक्षम होता है। यह जानवर हर मौसम में ठंडे पानी से भरे दरिया में रहना पसंद करता है किन्तु भोजन के लिए यह जमीन पर आता है। घास-फूस, पेड़-पौधों या झाड़ियों के हरे पत्ते तथा जंगली साग-सब्जियां इसका पसंदीदा भोजन हैं। यह एक शाकाहारी जानवर है, जो देर रात को ही भोजन की तलाश में निकलता है और एक रात में करीब 200 पौंड घास व हरी पत्तियां चर जाता है। मादा दरियाई घोड़ा शिशु को 8 माह तक गर्भ में रखती है। नवजात शिशु इतना हृष्ट-पुष्ट एवं शक्तिशाली होता है कि जन्म लेते ही अपनी मां की नकल कर दौड़ने व पानी में तैरने लगता है। (एम सी एन)
दूसरी चिड़ियों की आवाज की नकल कर लेती है ‘अकेंथिजा पुसिल्ला’ चिड़िया
लेटिन अकेंथिजा पुसिल्ला के नाम से जानी जाने वाली चिड़िया संकट के समय कई अन्य प्रजाति की चिड़ियों की नकल करने में सक्षम होती है। सिर्फ आस्ट्रेलिया में ही पाई जाने वाली यह नन्हीं चिड़िया आवाज बदलने की विचित्र क्षमता तथा अपनी फुर्ती के कारण ही जानी जाती है। यह इतनी तेज गति से उड़ती है कि पलक झपकते ही नजरों से ओझल हो जाती है और पलभर में इसे सही प्रकार से देख पाना संभव नहीं होता। भोजन की तलाश में यह अन्य प्रजाति की चिड़ियों के साथ ही उड़ान भरती है किन्तु इसकी एक और खासियत यह भी है कि भोजन की तलाश में भी इसका विस्तार क्षेत्र सीमित ही रहता है। यह चिड़िया प्रायः पेड़ों तथा झाड़ियों की पत्तियों पर कीड़े-मकौड़ों की तलाश में फुदकती रहती है किन्तु किसी भी स्थान पर कुछ पल के लिए ही रूकती है। इस चिड़िया का घोंसला गुंबदनुमा होता है, जिसके शीर्ष पर एक ओर छिद्रनुमा प्रवेश द्वार होता है। मादा अकेंथिजा पुसिल्ला अपने इस घोंसले में एक बार में प्रायः तीन अण्डे ही देती है मगर कई बार कोयल भी अपना एक अण्डा चुपके से इसके घोंसले में छोड़ जाती है, जिसे मादा पुसिल्ला अपना अण्डा समझकर सेती रहती है। (एम सी एन)

गंगा का तन मैला, तुम्हारा मन मैला, कैसे भरेगा पुण्य का थैला!

. श्रीगोपाल ‘नारसन’ (मीडिया केयर नेटवर्क)

गंगा को मैला सब कर रहे हैं लेकिन इसकी नियमित सफाई हो, यह ध्यान किसी को नहीं है। कुम्भ के चलते आए दिन लाखों श्रद्धालु गंगा में डुबकी लगाकर अपने ‘पाप’ गंगा में धो रहे हैं लेकिन गंगा कितने पाप झेल पाएगी, इसकी फिक्र कोई नहीं कर रहा। हद तो यह है कि श्रद्धालु आस्था की डुबकी के साथ-साथ साबुन स्नान का भी प्रयास करते हैं। यहां तक कि अपने मैले कपड़ों और वाहनों तक को गंगा में धोने की धृष्टता अब सरेआम की जा रही है, जिससे गंगा दिन-प्रतिदिन मैली हो रही है।
गंगा की सफाई का दिखावा करने वाले तो बहुत हैं लेकिन सफाई के नाम पर बजट डकारकर चुप्पी साध लेने, सिर्फ फोटो खिंचवाने के लिए गंगा सफाई का नाटक करने से काम चलने वाला नहीं है। सरकार जहां गंगा का मैलापन दूर करने के लिए 1670 करोड़ रुपये खर्च करके बैठ गई, वहीं योग गुरू बाबा रामदेव भी अपने शिष्यों के साथ एक दिन गंगा की सांकेतिक सफाई करके चले गए और अगले ही पल से फिर गंगा में मैलापन छाने लगा।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि गंगा को मैलेपन से बचाने यानी प्रदूषण मुक्त रखने के लिए गंभीरता के साथ प्रयास क्यों नहीं किए जा रहे हैं? आज भी गंगा में शवों का विसर्जन, जली-अधजली लाशों का बहाव, मृतकों के कपड़ों का अर्पण, हवन की राख, धार्मिक कलैंडर, मूर्तियों आदि का डाला जाना लगातार जारी है। दूसरी ओर साबुन से स्नान कर गंगा को प्रदूषित करने की गलत आदत के साथ-साथ गंगा में कपड़े धोने, वाहन धोने, पॉलीथिन इत्यादि डालने से भी गंगा पर प्रदूषण का बोझ लगातार बढ़ रहा है।
‘कुम्भ में भविष्य’ नामक स्वयंसेवी संस्था ने जरूर पम्पलेट बंटवाकर व दीवारों पर चस्पां करके श्रद्धालुओं से गंगा की पवित्रता बचाने और प्रदूषित करने से रोकने की अपील की है। संस्था के अध्यक्ष दुर्गाशंकर भाटी प्रयासरत हैं कि हर की पौड़ी के निकट खड़खड़ी श्मशान घाट को शहर से बाहर स्थानांतरित किया जाए ताकि श्मशान से आने वाली गंदगी से गंगा की पवित्रता को बचाया जा सके।
गंगा को प्रदूषण मुक्त बनाने की मुहिम देश में सबसे पहले तत्काल प्रधानमंत्री स्व. श्री राजीव गांधी ने चलाई थी। उन्हीं के समय में ‘गंगा एक्शन प्लान’ शुरू कर 1984 से 1990 तक गंगा को प्रदूषण से मुक्त करने का निश्चय लिया गया था लेकिन यह प्लान कारगर सिद्ध नहीं हो सका। 452 करोड़ रुपये खर्च हो जाने के बाद भी जब ‘गंगा प्रदूषण नियंत्रण’ के कोई सार्थक परिणाम सामने नहीं आए तो मजबूरन सन् 2000 में इस योजना को बंद कर देना पड़ा।
अब फिर प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने गंगा एवं देश की अन्य प्रमुख नदियों को प्रदूषण से मुक्त करने की कवायद शुरू की है, जिसके लिए 2460 करोड़ रुपये की लागत से 763 योजनाएं स्वीकृत की गई हैं। इस ‘नेशनल कंजर्वेशन प्रोजेक्ट’ नामक योजना के तहत नदियों के प्रदूषण से बचाव के लिए 70 प्रतिशत राशि केन्द्र सरकार और 30 प्रतिशत संबंधित राज्य सरकारें खर्च करेंगी। यह योजना भी कितनी कारगर साबित हो पाएगी, यह तो अभी से नहीं कहा जा सकता लेकिन पुराने अनुभव तो यही बताते हैं कि इस तरह की अधिकांश योजनाएं भ्रष्टाचार की भेंट चढ़कर दम तोड़ देती हैं।
सबसे बड़ी जरूरत तो यही है कि केन्द्र एवं राज्य स्तर पर देश की नदियों को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए जहां ईमानदार पहल हो, वहीं स्वयंसेवी संस्थाओं को भी बिना किसी आर्थिक सहायता के गंगा सहित अन्य सभी नदियों का मैलापन दूर करने के लिए आगे आना चाहिए। मौजूदा हालात तो इतने बदतर हैं कि गंगा और यमुना का पानी आचमन तो दूर, स्नान योग्य भी नहीं रह गया है। ऐसे में हमारी आस्था कब तक इन नदियों की पवित्रता के प्रति टिकी रह सकेगी, यह सवाल हर किसी के कानों में गूंज रहा है।
स्वयं हरिद्वार स्थित गंगा में ही कई स्रोत ऐसे हैं, जो गंगा को निरन्तर मैला बना रहे हैं। यहां तक कि सीवर लाइन व गटरों तक का गंदा पानी मां गंगा की पवित्रता में जहर घोल रहा है। कम से कम मोक्षदायिनी मां गंगा की पवित्रता बहाल करने के लिए तो ईमानदार प्रयास हों, तभी पुण्य प्राप्ति की आस मां गंगा से की जा सकती है वरना गंगा का तन मैला, तुम्हारा मन मैला, फिर कैसे भरेगा पुण्य का थैला! (एम सी एन)

Cartoon Kona

Sunday, April 04, 2010

जीव-जंतुओं की अनोखी दुनिया-45







. योगेश कुमार गोयल (मीडिया केयर नेटवर्क)
शिकार के पीछे कभी-कभार ही भागता है ‘रेसर’ सांप
रेसर जाति के अन्य सांपों की ही भांति यूं तो लाल पूंछ वाले रेसर सांप की गिनती तेजी से रेंगने वाले सांपों में ही की जाती है किन्तु फिर भी यह शिकार के पीछे कभी-कभार ही भागता है। अमूमन होता यही है कि जब इसे भूख लगती है तो यह अपनी जीभ को बाहर निकालकर लपलापाता है, जिससे इसे छिपकली या छोटे स्तनपायी प्राणियों की गंध सूंघने में मदद मिलती है। गंध मिलने के बाद यह शिकार के इंतजार में उस स्थान के आसपास बिल्कुल स्थिर अवस्था में खड़ा हो जाता है और जैसे ही कोई शिकार इसके नजदीक आता है, यह अपने जबड़े खोलकर अपने दांतों की सहायता से झट से शिकार को खींचकर पूरा का पूरा निगल जाता है। चमगादड़ रेसर सांप का पसंदीदा भोजन हैं, जिनकी तलाश में यह चमगादड़ों के निवास के आसपास वृक्षों की शाखाओं पर गोल व चिकने पत्थर की भांति लटकता रहता है। (एम सी एन)
अण्डे देने के लिए घोंसला बनाती है मादा किंग कोबरा
दुनियाभर में घोंसला बनाने वाला एकमात्र सांप है ‘किंग कोबरा’ यानी नागराज। मादा किंग कोबरा पत्ते और मिट्टी इकट्ठा कर-करके शंकु आकार का करीब एक फुट ऊंचा घोंसला बनाती है। मादा नाग यह घोंसला अपने अण्डे देने के लिए ही बनाती है। अपने इसी घोंसले में अण्डे देने के बाद मादा अपने अण्डे फूटकर उनसे बच्चे निकलने तक उसी के आसपास रहकर बड़ी मुस्तैदी से उसकी निगरानी करती है। अण्डे फूटने में करीब दो माह का समय लगता है और इस दौरान वह अधिकांशतः भूखी ही रहती है, जिसकी वजह से इन दो महीनों में मादा किंग कोबरा बहुत दुबली-पतली और कमजोर हो जाती है। जब अण्डे फूटने का समय आ पहुंचता है, तभी वह भोजन की तलाश में निकलती है। (एम सी एन)
सबसे भयानक सांप है थूकने वाला कोबरा
अत्यंत जहरीले माने वाले कोबरा सांपों में अफ्रीका में मिलने वाले ‘थूकने वाले कोबरा’ सबसे भयानक कोबरा माने जाते हैं। हालांकि समूचे अफ्रीका में कोबरा बड़ी संख्या में पाए जाते हैं और सभी बेहद जहरीले भी होते हैं किन्तु थूकने वाले कोबरा सबसे ज्यादा खतरनाक होते हैं। काले रंग के थूकने वाले कोबरा की लम्बाई पांच फुट तक हो सकती है। खतरा महसूस करने पर या इसे उत्तेजित करने पर यह अपना सिर ऊपर की ओर उठाकर अपना फन फैला लेते हैं और अपनी सुरक्षा का अचूक हथियार अपनाते हुए अचानक बड़ी फुर्ती से शत्रु की आंखों में अपने बेहद घातक और शक्तिशाली विष की दो बौछारें फैंक देते हैं। विष की यह बौछार कितनी खतरनाक हो सकती है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यह विष की बौछार से 8 फुट की दूरी से भी अपने दुश्मन पर अचूक प्रहार करने में सक्षम होता है। इसका विष इसके विषदंत के किनारे पर स्थित दो छोटे से छिद्रों से निकलता है और यह विष इतना घातक होता है कि मात्र 1 ग्राम विष ही 160-170 व्यस्क व्यक्तियों को पलभर में ही मौत की नींद सुला देने के लिए पर्याप्त होता है। छोटे स्तनधारी, पक्षी, छिपकली, अण्डे इत्यादि थूकने वाले कोबरा का पसंदीदा भोजन हैं। (एम सी एन)

ये कैसा ‘कुम्भ’ है?

सीधे कुम्भ नगरी से

. श्रीगोपाल ‘नारसन’ (मीडिया केयर नेटवर्क)

चाय, सुल्फा और भभूत बने आकर्षण
कुम्भ मेले में आने वाले श्रद्धालुओं के लिए जहां कुम्भ स्नान और हरिद्वार के मंदिर मुख्य आकर्षण हैं, वहीं साधु-संतों के अखाड़ों व मठों से जुड़े डेरों में चाय, सुल्फा और भभूत आकर्षण का केन्द्र बने हुए हैं। शायद ही कोई ऐसा डेरा हो, जहां दिनभर चाय, सुल्फा और भभूत मलने व प्रसाद के रूप में वितरित करने का दौर न चलता हो। तम्बूनुमा छोटे-छोटे डेरों में लकड़ी के बड़े तने को ही धूने में आग के हवाले कर सुल्फे के कश और चाय की चुस्की के साथ कुम्भ का आनंद ले रहे हैं नागा सन्यासी और उनके भक्तजन। साथ ही तम्बुओं में चल रहे रंगीन टी.वी. पर देश के ताजा हालात से भी वाकिफ हो रहे हैं सन्यासी बाबा। (एम सी एन)
रोज हो रही है लाखों रुपये के नशीले पदार्थों की खरीद-फरोख्त ‘‘माल है क्या?’’
‘‘कितना चाहिए!’’
‘‘चार तोला।’’
‘‘मिल जाएगा, 500 रुपये प्रति तोला का रेट है। रुपये एडवांस देने होंगे। सुबह रुपये दोगे तो शाम तक माल की डिलीवरी होगी।’’
ये संवाद अथवा वाक्य किसी फिल्म के डायलॉग नहीं हैं बल्कि धर्मनगरी हरिद्वार में कहीं ओर नहीं बल्कि एक ‘साधु’ के डेरे पर चरस खरीदने और बेचने को लेेकर होती बातचीत का अंश है। कुम्भ क्षेत्र में पुलिस एवं मेला प्रशासन भले ही सुरक्षा व्यवस्था के चाक-चौबंद होने का दावा कर रहे हों लेकिन हकीकत यह है कि कुम्भ मेला क्षेत्र में आए दिन लाखों रुपये के नशीले पदार्थों की खरीद-फरोख्त हो रही है। अफीम, चरस, गांजा, भांग की सप्लाई कुम्भ में आए साधु-संतों और कुम्भ में आने वाले नशेड़ी यात्रियों के लिए नेपाल तक से हो रही है। कुम्भ मेले की आड़ में नशीले पदार्थों की तस्करी नेपाल से हरिद्वार और हरिद्वार से पुनः बिक्री के रूप में उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और दिल्ली तक की जा रही है। (एम सी एन)
‘फिलिप’ से बन गए ‘गोपाल गिरी’
धार्मिक आस्था को मन में संजोकर ब्राजील से हरिद्वार कुम्भ में आए फिलिप को नागा सन्यासियों की दुनिया ऐसी भायी कि वो उन्हीं में रम गए। देखते ही देखते फिलिप ने गेरूएं वस्त्र धारण कर लिए और एक सन्त के चेले बन गए। करीब एक माह से कुम्भ क्षेत्र के डेरे पर रहकर फिलिप ने हिन्दी में ‘नमस्ते’ व ‘बोल बम’ कहना सीख लिया, वहीं चिलम का लंबा कश भी मारने लगे। सन्त ने इस विदेशी मेहमान को ‘गोपाल गिरी’ नाम से नवाजा। एक सप्ताह बाद वीजा अवधि खत्म होने के कारण ब्राजील लौट जाने वाले फिलिप उर्फ गोपाल गिरी का कहना है कि वे अब जीवन पर्यन्त अध्यात्म मार्ग पर चलते रहेंगे यानी ब्राजील में रहकर भी हरिद्वार से मिले संस्कारों का डंका बजेगा। (एम सी एन)
टू-लेन के चक्कर में बेहाल हुई सड़क
कुम्भ यात्रियों की सुरक्षा के लिए कुम्भ क्षेत्र के बाहर मंगलौर, लखनौता और राज्य बॉर्डर पर भले ही चप्पे-चप्पे पर पुलिस तैनात कर दी गई हो लेकिन कुम्भ यात्रियों की सुविधा के लिए देवबन्द-मंगलौर मार्ग टू-लेन बनाने के चक्कर में पहले से भी बदतर हो गया है। तीन शाही स्नानों के बाद भी इस मार्ग के निर्माण की गाड़ी आगे नहीं बढ़ पा रही है। मार्ग पर जगह-जगह गड्ढ़े तो हैं ही, ऊपर से टू-लेन के नाम पर सड़क खोद दिए जाने से इस मार्ग पर चलना दूभर हो गया है। ऐसे में डाइवर्ट ट्रैफिक का लोड यह सड़क कैसे वहन कर पाएगी, भगवान ही जानें!
गायब हो गई शांति!
एक अखाड़े के थानापति शिव गिरी महाराज कुम्भ का वातावरण बदल जाने से आहत हैं। कुम्भ में न पहले जैसी शांति है और न ही आस्था का परम्परागत जज्बा दिखाई पड़ता है। लगता है, जैसे सब ड्यूटी बजाने ही आए हों। फिर चाहे लोगों को सुविधाएं मिलें या न मिलें, मेला निर्माण कार्य पूरे हों या अधूरे रहें। बजट पानी की तरह बहे या अधूरा खर्च हो, मेला प्रशासन तो बस 30 अप्रैल की बाट जोह रहा है ताकि कुम्भ अवधि समाप्त होते ही हालात से पल्ला झाड़ सकें जबकि पहले ऐसा नहीं था। साधु-संतों के साथ-साथ ड्यूटी बजाने वाले भी भक्ति और आस्था में लीन रहते थे, तभी तो एक ऐसा वातावरण बनता था कि चारों तरफ गंगा मैया के जयकारे सुनाई पड़ते थे, जिससे आध्यात्मिक शांति का सुख मिलता था हर किसी को। (एम सी एन)
धूना जलाना है तो लकड़ी खरीदें 500 रुपये क्विंटल
कुम्भ में आए साधु-संतों को शिकायत है कि धूना जलाने के लिए पहले के कुम्भों में उन्हें लकड़ी आसानी से मिल जाती थी लेकिन इस बार उन्हें 500 रुपये प्रति क्विंटल की दर से लकड़ी खरीदनी पड़ रही है। आसमान छूते लकड़ी के दामों के कारण साधु-संतों के लिए धूना जलाना ही कठिन हो गया है। लकड़ी महंगी मिलने के कारण साधु-संतों में खासी नाराजगी भी देखने को मिली। हठयोगी प्रेम भारती कहते हैं कि समझ में नहीं आता कि ये कैसा कुम्भ है, जहां साधु-सन्तों को पूजा के लिए भी लकडियां महंगी दरों पर मिल रही हैं। (एम सी एन)
(लेखक ‘मीडिया केयर नेटवर्क’ से संबद्ध टिप्पणीकार हैं)

समय बहुमूल्य है, अतः एक-एक पल का सदुपयोग सार्थक कार्यों में करें.