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Thursday, December 30, 2010

कॉफी कितनी फायदेमंद कितनी नुकसानदायक?

‘मीडिया केयर नेटवर्क’ की विशेष प्रस्तुति

जीव-जंतुओं की अनोखी दुनिया

‘मीडिया केयर नेटवर्क’ की विशेष प्रस्तुति

जान है जहान है

‘मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स’
की विशेष प्रस्तुति

क्या होता है सी.टी. स्कैन?


‘मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स’ की विशेष प्रस्तुति

Monday, December 27, 2010

विदेशों में नव वर्ष का धमाल

उफ ...! ये अदा

मुम्बई में एक कार्यक्रम के दौरान रैम्प पर
कैटवॉक करती मॉडल्स

अनोखे जीव-जंतु

‘मीडिया केयर नेटवर्क’
द्वारा पंजाब केसरी (जालंधर) में 25 व 26 दिसम्बर 2010 को प्रकाशित

उपयोगी होम टिप्स

‘मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स’
द्वारा पंजाब केसरी (जालंधर) में प्रकाशित

जलपरी हूं मैं

Friday, December 24, 2010

शांति, प्रेम एवं भाईचारे का संदेश देता ‘क्रिसमस’ पर्व


-- योगेश कुमार गोयल (मीडिया केयर नेटवर्क)

प्रतिवर्ष 25 दिसम्बर को विश्वभर में मनाया जाने पर्व ‘क्रिसमस’ ईसाई समुदाय का सबसे बड़ा त्यौहार है और संभवतः सभी त्यौहारों में क्रिसमस ही एकमात्र ऐसा पर्व है, जो एक ही दिन दुनियाभर के हर कोने में पूरे उत्साह एवं उल्लास के साथ मनाया जाता है। हिन्दुओं में जो महत्व दीवाली का है, मुस्लिमों में जितना महत्व ईद का है, वही महत्व ईसाईयों में क्रिसमस का है। जिस प्रकार हिन्दुओं में दीवाली पर अपने घरों को सजाने की परम्परा है, उसी प्रकार ईसाई समुदाय के लोग क्रिसमस के अवसर पर अपने घरों को सजाते हैं। इस अवसर पर शंकु आकार के विशेष प्रकार के वृक्ष ‘क्रिसमस ट्री’ को सजाने की तो विशेष महत्ता होती है, जिसे रंग-बिरंगी रोशनियों से सजाया जाता है।

ऐसी मान्यता है कि करीब दो हजार साल पहले 25 दिसम्बर को ईसा मसीह ने समस्त मानव जाति का कल्याण करने के लिए पृथ्वी पर जन्म लिया था। उस समय पूरे रोम में मूर्तिपूजा व अन्य धार्मिक आडम्बर चारों ओर फैले थे, रोम शासक यहूदियों पर अत्याचार करते थे, धनाढ़य वर्ग विलासितापूर्ण जीवन व्यतीत करता था जबकि गरीबों की हालत अत्यंत दयनीय थी। मनुष्य अपने पापों के कारण परमेश्वर के मार्ग से हट चुका था, चारों ओर अशांति फैली थी, भाई भाई का शत्रु बन गया था, मंदिरों के पुजारी अपनी स्वार्थ सिद्धि में लगे थे, छोटे-बड़े, अमीर-गरीब और ऊंच-नीच के बीच भेदभाव की गहरी खाई बन चुकी थी। ऐसे विकट समय में पृथ्वी पर जन्म लिया था यीशु (ईसा मसीह) ने।

ईसाई धर्म के लोग मानते हैं कि ईसा के जन्म के साथ ही समूचे विश्व में एक नए युग का शुभारंभ हुआ था, यही वजह है कि हजारों वर्ष बाद भी प्रभु यीशु के प्रति लोगों का वही उत्साह, वही श्रद्धा बरकरार है और 25 दिसम्बर की मध्य रात्रि को गिरिजाघरों के घड़ियाल बजते ही ‘हैप्पी क्रिसमस’ के उद्घोष के साथ जनसैलाब उमड़ पड़ता है, लोग एक-दूसरे को गले मिलकर बधाई देेते हैं और आतिशबाजी भी करते हैं।

हालांकि इस बात का कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता कि क्रिसमस का त्यौहार मनाने की परम्परा कब, कैसे और कहां से शुरू हुई थी लेकिन माना जाता है कि यह पर्व मनाने की शुरूआत रोमन सभ्यता के समय ईसा मसीह के शिष्यों ने ही की होगी। आज इस अवसर पर लोग गिरिजाघरों के अलावा अपने घरों में भी खुशी और उल्लास से ऐसे गीत गाते हैं, जिनमें ईसा मसीह द्वारा दिए गए शांति, प्रेम एवं भाईचारे के संदेश की महत्ता स्पष्ट परिलक्षित होती है। खुशी के इस अवसर पर लोग गिरिजाघरों में एकत्रित होते हैं और एक-दूसरे को बधाई देते हैं।

जिन प्रभु यीशु की पुण्य स्मृति में दुनिया भर के लोग क्रिसमस का त्यौहार मनाते हैं, उन प्रभु यीशु (ईसा मसीह) का जन्म अत्यंत विकट परिस्थितियों में हुआ था। दिसम्बर के महीने की हड्डियों तक को कंपा देने वाली कड़ाके की ठंड में इसराइल के येरूसलम से 8 कि.मी. दूर बेथलेहम नामक एक छोटे से गांव में आधी रात के वक्त खुले आसमान तले एक अस्तबल में एक गरीब यहूदी यूसुफ की पत्नी मरियम की कोख से जन्मे थे यीशु। उनके जन्म की शुभ सूचना भी सबसे पहले हेरोद जैसे क्रूर सम्राट को नहीं बल्कि गरीब चरवाहों को ही मिली थी। माना जाता है कि ये चरवाहे उसी क्षेत्र में अपनी भेड़ों के झुंड के साथ रहा करते थे और जिस रात ईसा ने धरती पर जन्म लिया, उस समय ये लोग खेतों में भेड़ों के झुंड की रखवाली करते हुए आग ताप रहे थे। तभी अचानक चारों ओर अलौकिक प्रकाश फैल गया और एक देवदूत प्रकट हुआ। अचानक हुए तेज प्रकाश से चरवाहे घबरा गए और भागने लगे किन्तु तभी उस देवदूत ने कहा कि तुम लोगों को डरने की जरूरत नहीं है बल्कि मैं तो तुम्हें इस समय बहुत आनंद का संदेश सुनाने आया हूं। तब देवदूत ने बताया कि आज दाऊद नगर में तुम्हारे मुक्तिदाता प्रभु ईसा मसीह का जन्म हुआ है, जो एक अस्तबल में घोड़ों के झुंड के बीच लेटे हुए हैं। डरते-डरते चरवाहे वहां पहुंचे और उन्होंने देवदूत के बताए अनुसार अस्तबल में ईसा तथा उनके माता-पिता के दर्शन किए तो खुद को धन्य मानते हुए उन्हें दण्डवत प्रणाम कर अपने झुंड की ओर लौट गए।

कहा जाता है कि मरियम जब गर्भवती थी तो एक रात गैबरियल नामक एक देवदूत मरियम के सामने प्रकट हुआ और उसने मरियम को बताया कि उन्हें ईश्वर के बेटे की मां बनने के लिए चुना गया है। उन दिनों जनगणना का कार्य चल रहा था और तब यह प्रथा थी कि जनगणना के समय पूरा परिवार अपने पूर्वजों के नगर में एकत्रित होता था और वहीं परिवार के सभी सदस्यों का नाम रजिस्टर में दर्ज कराता था।

यूसुफ दाऊद के कुटुम्ब तथा देश का था, इसलिए वह भी गर्भवती मरियम को साथ लेकर नाम लिखवाने अपने पूर्वजों की भूमि बेथलेहम पहुंचा। जनगणना की वजह से बेथलेहम में उस समय बहुत भीड़ थी। वहां पहुंचकर युसूफ ने एक सराय के मालिक से रूकने के लिए जगह मांगी लेकिन सराय में बहुत भीड़ होने के कारण उन्हें जगह नहीं मिल सकी। मरियम को गर्भवती देख सराय के मालिक को उस पर दया आई और उसने उन्हें घोड़ों के अस्तबल में ठहरा दिया। वहीं आधी रात के समय मरियम ने एक अति तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया और 7 दिन बाद उसका नामकरण संस्कार हुआ। बालक का नाम रखा गया ‘जीजस’, जिसे यीशु के नाम से भी जाना गया।

यहूदियों के इस देश में उस समय रोमन सम्राट हेरोद का शासन था, जो बहुत पापी और अत्याचारी था। हेरोद को जीजस के जन्म की सूचना मिली तो वह बहुत घबराया क्योंकि भविष्यवक्ताओं ने यह भविष्यवाणी की थी कि यहूदियों का राजा इसी वर्ष पैदा होगा और उसके बाद हेरोद राजा नहीं रह सकेगा। हेरोद ने जीजस की खोज में अपने सैनिकों की टुकड़ियां भेजी लेकिन वे जीजस के बारे में कुछ पता नहीं लगा सके।

घोर गरीबी के कारण जीजस की पढ़ाई-लिखाई की व्यवस्था तो नहीं हो पाई पर उन्हें बाल्यकाल से ही ज्ञान प्राप्त था। गरीबों, दुखियों व रोगियों की सेवा करना उन्हें बहुत अच्छा लगता था। इतना ही नहीं, बड़े-बड़े धार्मिक नेता भी उनके सवाल-जवाबों से अक्सर चकित हो जाते थे।

उन दिनों लोग मूर्तिपूजा किया करते थे और सर्वत्र धर्म के नाम पर आडम्बर फैला हुआ था। यीशु ने मूर्तिपूजा के स्थान पर एक निराकार ईश्वर की पूजा का मार्ग लोगों को बताया और उन्हें अपने हृदय में आविर्भूत ईश्वरीय ज्ञान का संदेश सुनाया। उनके उपदेशों से प्रभावित होकर उनके शिष्यों की संख्या दिनोंदिन बढ़ने लगी तथा उनकी दयालुता और परोपकारिता की प्रशंसा सर्वत्र फैल गई, जिससे यहूदियों के पुजारी और धर्म गुरू उनके घोर शत्रु बन गए।

एक बार यीशु प्रार्थना कर रहे थे तो उन्हें अपना शत्रु मान चुके यहूदियों के पुजारी व धर्मगुरू उनको पकड़कर ले गए। जब उन्हें न्यायालय में उपस्थित किए गया तो न्यायाधीश ने राजा और धर्मगुरूओं के दबाव में यीशु को प्राणदंड की सजा सुना दी। यहूदियों ने यीशु को कांटों का ताज पहनाया और फटे कपड़े पहनाकर उन्हें कोड़े मारते हुए पूरे नगर में घुमाया। फिर उनके हाथ-पांवों में कीलें ठोंककर उन्हें ‘क्रॉस’ पर लटका दिया गया लेकिन यह यीशु की महानता ही थी कि इतनी भीषण यातनाएं झेलने के बाद भी उन्होंने ईश्वर से उन लोगों के लिए क्षमायाचना ही की। सूली पर लटके हुए भी उनके मुंह से यही शब्द निकले, ‘‘हे ईश्वर! इन लोगों को माफ करना क्योंकि इन्हें नहीं पता कि ये क्या कर रहे हैं? ये अज्ञानवश ही ऐसा कर रहे हैं।’’ (एम सी एन)
(लेखक तीन प्रतिष्ठित फीचर एजेंसियों के समूह ‘मीडिया केयर ग्रुप’ के समूह सम्पादक हैं)

विश्व सिनेमा और ईसा मसीह


प्रस्तुति: मीडिया केयर नेटवर्क ब्यूरो

प्रेम, दया और करूणा के सागर प्रभु ईसा मसीह के धर्मावलम्बी विश्व के हर देश में हैं। भारत में भी उनके अनुयायी बहुत बड़ी तादाद में हैं लेकिन इसके बावजूद यह एक विड़म्बना ही है कि ईसा मसीह और उनके महान् धर्मग्रंथ बाइबिल पर किसी भी देश में ज्यादा फिल्में नहीं बनी हैं। यदि हम सम्पूर्ण विश्व के फिल्म इतिहास का अवलोकन करें तो सबसे कम संख्या हमें इन ईसा विषयक फिल्मों की ही नजर आएगी। भारत में तो इन फिल्मों की संख्या लगभग नगण्य है ही, विश्व के जिन अत्यधिक सम्पन्न देशों ने सिने कला को जन्म दिया, जहां इस कला ने लगातार तकनीकी प्रगति की, वहां भी ईसा और बाइबिल पर बनी फिल्मों की संख्या उंगलियों पर गिनी जा सकती है। इन फिल्मों में भी ईसा मसीह या बाइबिल पर पूरी तरह कम फिल्में ही बनी हैं, अधिकांश फिल्में बाइबिल की कथाओं और उपकथाओं के आधार पर ही बनी हैं।


पूरी तरह ईसा और बाइबिल पर बनी पहली फिल्म संभवतः सन् 1897 में प्रदर्शित ‘पैशन डी जीसस क्राइस्ट’ थी। उसके बाद ‘लाइफ ऑफ क्राइस्ट’, ‘किंग ऑफ किंग्स’, ‘द ग्रेटेस्ट स्टोरी एवर टोल्ड’, ‘द बाइबिल’, ‘द बाइबिल इन द बिगिनिंग’ जैसी कुछ और फिल्में बनी। इन फिल्मों में प्रभु यीशु की जीवन कथा और उनके सारगर्भित उपदेश व बाइबिल की उत्पत्ति के कुछ अंशों को ईमानदारी के साथ दिखाने का पूरा पूरा प्रयास किया गया था। अपने इस प्रयास और उद्देश्य में ये फिल्में काफी हद तक सफल भी रही।

बाइबिल की कथाओं व उपकथाओं पर आधारित जो फिल्में बनी हैं, उनमें ‘एडम एंड ईव’, ‘सैमसन एंड डिलाइला’, ‘डेविड एंड बाथ शीबा’, ‘हैन्स क्रिश्चियन एंडरसन’, ‘जोसेफ एंड जि ब्रदरेन’, ‘यूलिसिस’, ‘द टेन कमांड मेंट्स’, ‘एलैक्जेंडर द ग्रेट’, ‘सोलोमन एंड शीबा’, ‘स्पाटकिस’, ‘सैमुअल बॉनस्टन के एल सिंड’, ‘बाराबस’, ‘क्लियोपेट्रा’ आदि प्रमुख हैं। इनमें ‘सैमसन एंड डिलाइला’ (1950) और ‘द टेन कमांड मेंट्स’ (1956) बेहतरीन फिल्में मानी जाती हैं। ‘सैमसन एंड डिलाइला’ ब्लॉक बस्टर फिल्मों के युग की शुरूआत करने वाली बाइबिल पर आधारित एक भव्य फिल्म थी। इस फिल्म के क्लाइमैक्स में पागन मंदिर के ध्वस्त करने के दृश्य लाजवाब थे। भारत में सर्वाधिक लोकप्रियता अर्जित करने वाली, दर्शकों को विदेशी फिल्मों की ओर आकृष्ट करने वाली, परदे पर सतरंगी छटा बिखेरकर आंखों को तृप्त करने वाली यह फिल्म कालजयी है।

‘सैमसन एंड डिलाइला’ के समान ही ‘द टेन कमांड मेट्स’ को भी दर्शकों ने बहुत पसंद किया। मोजेस की कहानी पर आधारित इस फिल्म में भगवान दहोवा द्वारा हजरत मूसा को दिए गए संदेशों का विवरण है। पत्थर पर संदेशों का अंकित होना और दहोवा के अनुयायियों के लिए समुद्र में रास्ता बन जाने के दृश्यों का फिल्मांकन फिल्म में काफी खूबसूरती से किया गया था। इसके अलावा कई छोटे-छोटे प्रसंग भी कलात्मक रूप से परदे पर अवतरित हुए।

ईसा मसीह के जीवन में प्रत्यक्ष संबंध रखने वाली अन्य फिल्मों में ‘ईस्टर एंड द किंग’, ‘जीसस ऑफ नजरेश’, ‘द सांता क्लॉस’ व ‘नाइट मेअर बिफोर क्रिसमस’ और प्रत्यक्ष संबंध रखने वाली फिल्मों में ‘द रोब’, ‘सलोमी’, ‘प्रांडिंगल’, ‘द सिल्वर शॉलिस’, ‘बेनहर’ आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इनमें ‘बेनहर’ (1959) सर्वश्रेष्ठ फिल्म मानी जाती है। ‘बेनहर’ हॉलीवुड की सर्वाधिक प्रतिष्ठित पुरस्कृत व भव्य ब्लॉक बस्टर फिल्म है। मानवीय पहलुओं से ओत-प्रोत इस मर्मस्पर्शी फिल्म की कहानी का काफी बड़ा भाग ईसा के अंतिम दिनों पर आधारित था। फिल्म की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसमें प्रभु यीशु की भूमिका कर रहे पात्र का चेहरा एक दृश्य में भी नहीं दिखाया गया था, केवल उनकी मौजूदगी लोगों पर क्या असर छोड़ती है, इसका बड़ी कुशलता से चित्रण किया गया था। विश्व भर में इस फिल्म को करोड़ों दर्शकों ने बड़े चाव से बार-बार देखा। ‘बेनहर’ को पहली बार सर्वाधिक 11 ऑस्कर अवार्ड प्राप्त हुए थे, जो उस समय एक कीर्तिमान था।

ईसा या बाइबिल पर यद्यपि भारत में कोई हिन्दी फिल्म नहीं बनी है लेकिन तमिल, तेलुगू व अन्य दक्षिण भारतीय भाषाओं में जरूर कुछ प्रयास हुए हैं। यह कहना भी असंगत न होगा कि विषय पर बहुत ज्यादा पकड़ न होने के बावजूद ये प्रयास सराहनीय हैं। समूचे विश्व सिनेमा में ईसा मसीह और बाइबिल पर गंभीर, सार्थक व प्रभावपूर्ण फिल्मों की आवश्यकता अभी भी है। ऐसी फिल्में, जो न केवल प्रभु यीशु के विराट और सार्वभौमिक व्यक्तित्व को उभारें बल्कि उनके संदेशों को भी गहराई से अभिव्यक्त करें। आज के हिंसा, आतंकवाद व अशांति के दौर में ये ईसा विषयक फिल्में प्रेम और सौहार्द का कार्य कर सकती है। (एम सी एन)

(‘मीडिया केयर ग्रुप’ की विशेष प्रस्तुति)

Tuesday, December 14, 2010

बचें वायरल फीवर से


- रंजीत कुमार ‘सौरभ’ -

(मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स)

फ्लू, इंफ्लूएंजा, कॉमन कोल्ड या साधारण जुकाम का बुखार, एक प्रकार का वायरल बुखार होता है। यह बीमारी एक रोगी से दूसरे स्वस्थ व्यक्ति में सांस के जरिये पहुंचती है यानी जब रोगी खांसता है तो उसका विषाणु नजदीक मौजूद स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में सांस के जरिये प्रवेश करता है और इस तरह वह स्वस्थ व्यक्ति भी एक-दो दिन में वायरल बुखार से ग्रसित हो जाता है।

वायरल बुखार के लक्षण

वायरल बुखार के लक्षण अन्य बुखार के जैसे ही होते हैं। जैसे मरीज को सिर में दर्द, बदन में दर्द के साथ अचानक बुखार आना, गले में खराश, नाक में खुजली और पानी गिरना आम लक्षण हैं। इस बुखार में बदन का तापमान 101 से 103 डिग्री फॉरेनहाइट या इससे भी अधिक हो जाता है और शरीर में बेचैनी अनुभव होती है तथा भूख नहीं लगती।

डॉक्टरों का मानना है कि यह बुखार एक संक्रामक विषाणु से फैलता है। यह विषाणु स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में भी आसानी से प्रवेश कर जाता है और इसके एक या दो दिन बाद ही व्यक्ति वायरल बुखार की चपेट में आ जाता है तथा उसमें इस बुखार के लक्षण स्पष्ट दिखाई देने लगते हैं। इसके अलावा सुपर एडेड बैक्टीरियल इंफैक्शन रोगी के कान में साइनस और फेफड़ों को प्रभावित करता है।

वायरल फीवर ठंडे वातावरण के सम्पर्क में आने, फ्रिज का ठंडा पानी पीने, सॉफ्ट ड्रिंक्स पीने, आइसक्रीम खाने से गले में खराश से शुरू होता है और फिर इम्यून सिस्टम को कुछ समय के लिए बुरी तरह से प्रभावित करता है।

परहेज / बचाव

- यदि वायरल फीवर से परिवार के सदस्य या आसपास के लोग पीड़ित हों तो ऐसे स्थानों पर मुंह व नाक पर रूमाल रखकर जाएं। इससे विषाणु से बचाव होगा।

- गले में सूजन हो तो ऐसी हालत में अचार, चटनी, नींबू, मिर्च, तली-भुनी चीजों, ठंडा पानी व आइसक्रीम का सेवन न करें।

- अधिकाधिक मात्रा में तरल पदार्थ व हॉट ड्रिंक्स का सेवन करें।

- शराब का सेवन हरगिज न करें। धूम्रपान भी न करें।

- नोजल ड्रॉप्स का इस्तेमाल न करें।

- ऐसे वातावरण से बचें, जहां तापमान अचानक बदलता हो।

उपचार / देखभाल

- डॉक्टर वायरल इंफैक्शन में सिर्फ दर्द की दवा आराम के लिए देते हैं।

- बैक्टीरियल इंफैक्शन से बचाव हो, इसके लिए रोगी को एंटीबायोटिक दवाएं दी जाती हैं।

- यदि बुखार और खांसी लगातार बढ़ नहीं रही हों तो एंटीबायोटिक्स की कोई विशेष आवश्यकता नहीं होती।

- कुछ घरेलू नुस्खे भी आजमा सकते हैं, जैसे:- गर्म चाय, गर्म सूप, तुलसी की चाय या अदरक की चाय का सेवन कर सकते हैं। इसके अलावा हल्के गर्म पानी में शहद मिलाकर आराम से धीरे-धीरे पीते रहें। इससे गले की खराश कम होगी।

- वायरल बुखार में सिरदर्द व बदन दर्द से राहत पाने के लिए आपको कुछ समय तक एंटी पायरेटिक एनालजेसिक ड्रग ‘पैरासिटामोल’ का सेवन करना चाहिए।

- एंटीबायोटिक दवाएं तभी लें, जब सुपर एडेड बैक्टीरियल इंफैक्शन की स्थिति हो।

- एंटीबायोटिक दवाओं का सेवन किसी योग्य और जानकार डॉक्टर की सलाह पर ही किया जाना चाहिए।

- नमक युक्त पानी से गरारे करने से भी बहुत आराम मिलता है।

- पीड़ित व्यक्ति को ठंडे एवं हवादार स्थान पर रखें। उनके कपड़े भी हल्के व सूती हों।

- रोगी को ताजे फल-सब्जी तथा दूध से बना पौष्टिक एवं सुपाच्य भोजन करना चाहिए।

- रोगी द्वारा अत्यधिक मात्रा में जल का सेवन किया जाना बहुत फायदेमंद रहता है। (मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स)

(लेखक देश की तीन प्रतिष्ठित फीचर एजेंसियों के समूह ‘मीडिया केयर ग्रुप’ से जुड़े हैं)

कैसे सुधरे हॉकी की सूरत?


- नरेन्द्र देवांगन -
सन् 1928 के ओलम्पिक गेम्स में भारत की हॉकी टीम पहली बार मैदान में उतरी थी और गोल्ड मैडल जीत लिया था। तब से 1956 के ओलम्पिक तक भारत की जीत का सिलसिला निर्बाध चलता रहा। भारत ने लगातार 6 गोल्ड मैडल जीते। सम्मोहक स्टिक वर्क, चतुर डॉज और ड्रिबल का लाजवाब हुनर ऐसा कि दर्शक वाह-वाह कर उठते थे। वर्ष 1956 के ओलम्पिक में इस हुनर का नाम ही ‘इंडियन ड्रिबल’ पड़ गया था। यह सुनहरा सिलसिला 1960 के रोम ओलम्पिक में खत्म हो गया, जब फाइनल में पाकिस्तान ने भारत को 1-0 से हरा दिया और लेस्ली क्लाडियस की टीम को सिल्वर मैडल से ही संतुष्ट होना पड़ा।

भारत फिर उभरा और 1964 के टोक्यो ओलम्पिक में स्वर्ण पदक हासिल कर लिया लेकिन भारतीय हॉकी को चुनौतियां मिलने लगी थी और उसका वर्चस्व समाप्ति के कगार पर था। फिर 1968 और 1972 में लगातार दो बार भारत को सिर्फ कांस्य पदक से ही संतोष करना पड़ा। मांट्रियल ओलम्पिक (1976) में तो भारत की बड़ी दुर्दशा हुई थी, जब टीम लुढ़ककर एकदम सातवें स्थान पर पहुंच गई थी। मास्को ओलम्पिक तो आधा अधूरा था क्योंकि आस्ट्रेलिया, यूरोप और अमेरिका सहित एशिया के कई देशों ने भी इसका बहिष्कार किया था। इसलिए भारत यहां आसानी से जीत गया था लेकिन स्वर्ण पदक में वो चमक और आभा नहीं थी क्योंकि जर्मनी, हॉलैंड और ग्रेट ब्रिटेन जैसे यूरोपीय देशों ने इसमें हिस्सा नहीं लिया था। तब से भारतीय हॉकी में लगातार गिरावट आती चली गई। भारतीय हॉकी टीम 2008 के बीजिंग ओलम्पिक स्पर्धा से ही बाहर हो गई।

भारतीय हॉकी की इस दुर्दशा के पीछे कहीं न कहीं हॉकी के प्रति सरकार की उदासीन नीति और भारतीय हॉकी महासंघ को ही उत्तरदायी माना जाएगा। हर हार के बाद खिलाडियों और कोच को जिम्मेदार ठहराया जाता है किन्तु हॉकी महासंघ के पदाधिकारी पाक-साफ बच जाते हैं। राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत, राष्ट्र चिन्ह आदि के प्रति यदि हम वाकई संवेदनशील हैं तो राष्ट्रीय खेल की उपेक्षा आखिर क्यों? कोई भी खेल किसी न किसी देश का प्रतिनिधित्व करता है। जब यह खेल हमारा राष्ट्रीय खेल है तो उसमें उम्दा प्रदर्शन करना तो हमारा कर्त्तव्य बनता है।

आज के समय में हॉकी में कई नई तकनीकों का समावेश हुआ है लेकिन भारतीय हॉकी में कहीं भी वह दिखाई नहीं देता। हम पहले जैसे परम्परागत खेल को अपनाए हुए हैं। हॉकी की बदली शैली और घास के मैदान के बजाय एस्ट्रो टर्फ के चलन से तालमेल बैठाने में विफल रहने के कारण भी हम पिछड़े हैं। आज हॉकी के मैदान में भारत के मुकाबले पाकिस्तान कहीं मजबूती से पैर जमाए हुए है। आधुनिक हॉकी में दक्षिण कोरिया हमारे लिए सबक होना चाहिए।

1970 के दशक के मध्य से भारतीय हॉकी में गिरावट आनी तब शुरू हो गई, जब एस्ट्रो टर्फ पर हॉकी खेली जाने लगी। उपमहाद्वीप के खिलाड़ी, जो घास के मैदान पर हॉकी के सुलतान थे, कृत्रिम मैदानों पर अपनी क्लासिक हॉकी का तारतम्य नहीं मिला सके। हॉकी के जो खिलाड़ी ध्यानचंद की परम्परा में ड्रिबलिंग के उस्ताद थे, तेज कृत्रिम मैदानों पर फिसलने और चोट खाकर अपमानित महसूस करने लगे। गेंद तेज रफ्तार में मैदान के एक सिरे से दूसरे सिरे तक पहुंचने लगी और वो इस रफ्तार से पीछे छूटने लगे। मैदान से घास क्या गायब हुई, कलात्मक हॉकी का गला ही घुट गया। हॉकी में फुटबॉल जैसा पावर प्ले शुरू हो गया। इसके साथ ही यूरोपीय स्टाइल की तेज और दनादन हिटों वाली हॉकी के समर्थन में खेल के नियम भी बदले जाने लगे। कई लोगों का कहना है कि भारतीय हॉकी और उसके प्रशासक इन परिवर्तनों व इनसे पैदा होने वाले अन्याय को चुपचाप स्वीकार करते चले गए।

घास पर खेली जाने वाली कलात्मक हॉकी के समर्थक आज भी कहते हैं कि टेनिस की ही तरह हॉकी को भी भिन्न-भिन्न प्रकार के मैदानों पर खेला जाना चाहिए। टेनिस सपाट चट मैदान पर, घास और एस्ट्रो टर्फ पर खेली जाती है। हॉकी को घास के मैदान से हटाकर उसके साथ बहुत बड़ी नाइंसाफी की गई है। हॉकी के मुरीदों का तर्क है कि चैम्पियन टीमें वो ही होंगी, जो सभी तरह के मैदानों पर अपने हुनर का कमाल दिखाएंगी। दूसरी तरफ हॉकी के आधुनिक समर्थकों का कहना है कि भारत को अंतर्राष्ट्रीय हॉकी में हो चुके नए परिवर्तनों के अनुसार खुद को ढ़ालना चाहिए और इस काम में विदेशी कोच ही उसे बेहतर बना सकते हैं। कहा जाता है कि हॉकी के आस्ट्रेलियाई जादूगर रिक चार्ल्सवर्थ, जो भारतीय हॉकी फेडरेशन के तकनीकी सलाहकार हैं, को भारतीय हॉकी टीम का कोच नियुक्त किया जाना चाहिए था।

अब परिदृश्य बहुत बदल चुका है। हॉकी अब कृत्रिम सतह पर खेली जाती है, जो कि पूर्व में मौजूद प्राकृतिक सतह से भिन्न होने के कारण प्रारम्भिक स्तर पर खेलने वाले युवाओं के लिए अजूबा ही बनी हुई है। एस्ट्रो टर्फ जहां बहुत खर्चीले हैं, वहीं उनका रखरखाव भी महंगा है। आज हमारे देश में मौजूद 600 जिलों में से 10 प्रतिशत अर्थात् 60 जिलों में भी एस्ट्रो टर्फ नहीं है। वहीं महंगी खेल सामग्री, स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षकों की सुविधाएं न होना आदि कुछ प्रमुख बिन्दु हैं, जिसके कारण हॉकी का जनाधार देश में घट रहा है।

उपरोक्त कारणों पर विचार करने पर यह बात सामने आती है कि प्रमुख रूप से अच्छे खेल मैदानों की कमी एवं प्रशिक्षण का अभाव हॉकी पर विपरीत प्रभाव डाल रहा है। राष्ट्रीय खेल होने के नाते हमारी खेल नीति में यह स्पष्ट कर दिया जाना चाहिए कि देश की समस्त शैक्षणिक संस्थाएं, चाहे वे स्कूल हों या कॉलेज, उनके यहां हॉकी का मैदान होना अनिवार्य हो। स्तरीय प्रशिक्षकों के अभाव में पूर्व खिलाड़ियों को प्रशिक्षण का भार सौंपकर प्रतिदिन अभ्यास कराया जाना चाहिए।

यदि हमें एस्ट्रो टर्फ पर होने वाली तेज हॉकी के लिए बच्चों को उसी अनुरूप तैयार करना है तो एस्ट्रो टर्फ के समान गति वाले, कम खर्च में और आसानी से हर जगह तैयार किए जा सकें, ऐसे मैदानों का निर्माण करना होगा। इसके लिए ठोस समतल धरातल पर अधिक मात्रा में रेत मिलाकर चट मैदान तैयार किया जा सकता है। इस तरह से तैयार मैदान पर खेलने के लिए एस्ट्रो टर्फ पर प्रयोग की जाने वाली गेंदों का उपयोग किया जाए तो खेल की गति कमोवेश वही होगी, जो एस्ट्रो टर्फ पर होती है। इस तरह से तैयार किए जाने वाले मैदानों की लागत स्थानीय स्तर पर ही उपलब्ध सामग्री के उपयोग होने से बहुत कम होगी। फलस्वरूप देश में हर जिले या तहसील स्तर में ऐसे मैदान अधिक संख्या में तैयार किए जा सकते हैं। साथ ही रखरखाव पर भी व्यय कम आने के कारण लंबे समय तक उपयोग भी किया जा सकेंगे। एस्ट्रो टर्फ पर प्रयोग की जाने वाली गेंद परम्परागत लेदर की गेंदों से सस्ती तथा अधिक समय तक चलने के कारण दैनिक अभ्यास व्यय भी कम हो जाएगा।

भारतीय हॉकी में कोच का जीवन बहुत ही छोटा होता है। जब भी टीम हारी तो कोच पर कुल्हाड़ा चल गया। भारतीय हॉकी के भविष्य की खातिर इंडियन हॉकी फेडरेशन को चाहिए कि वो क्लासिकल और आधुनिक हॉकी का सुंदर सम्मिश्रण लाने का प्रयास करें। (एम सी एन)
(लेखक देश की तीन प्रतिष्ठित फीचर एजेंसियों के समूह ‘मीडिया केयर ग्रुप’ से जुड़े हैं)

लघुकथा : अल्ट्रासाउंड


- विक्की नरूला -
सुजाता फिर से गर्भवती हुई। परिवार में फिर आस जगी कि इस बार सुजाता बेटे को ही जन्म देगी। सुजाता के पति अमन ने भी इस बार चाहा कि सुजाता एक पुत्र को जन्म दे, इसलिए वह सुजाता को लेकर अल्ट्रासाउंड करवाने शहर चला गया। अमन बहुत चिन्ताजनक स्थिति में डॉक्टर साहब से मिला तथा डॉक्टर साहब से बोला, ‘‘डॉक्टर साहब, मेरी पत्नी का अल्ट्रासाउंड करके बताएं कि गर्भ में लड़का है या लड़की? यदि लड़की हुई तो मैं अबोर्शन करवा दूंगा।’’
 डॉक्टर साहब ने अमन को समझाते हुए कहा, ‘‘अमन जी, लड़का या लड़की तो भगवान की देन हैं। भगवान ने मुझे भी दो लड़कियां दी हैं। मेरे पास भी लड़का नहीं है। मैंने दोनों लड़कियों को अच्छी शिक्षा दी, उन्हें खूब पढ़ाया-लिखाया। दोनों की शादी अच्छे घरों में की। आज जब भी उन्हें पता चलता है कि मेरी या उनकी मां की तबीयत खराब है तो फौरन दोनों दौड़ी चली आती हैं। वहीं दूसरी ओर मेरे भाई साहब के दो लड़के हैं। दोनों शहर में अपनी पत्नियों के साथ रहते हैं परन्तु उनका हालचाल जानने दोनों बेटों में से कोई नहीं आता। इसलिए मेरी मानो तो लड़कियां लड़कों से कहीं बेहतर हैं।’’
 डॉक्टर साहब की बात अमन को अच्छी लगी। वह अपनी पत्नी का अल्ट्रासाउंड करवाए बिना ही सुजाता को लेकर अपने घर की ओर चल दिया। (एम सी एन)
(लेखक देश की तीन प्रतिष्ठित फीचर एजेंसियों के समूह ‘मीडिया केयर ग्रुप’ से जुड़े हैं)

कहानी : मन्दिर


आज वह बहुत खुश था। एक सुंदर सुबह थी। वह नहा-धोकर मंदिर के लिए तैयार हो चुका था। उसके मुहल्ले में एक नया मन्दिर बन गया है और उसमें आज मूर्ति की स्थापना की जानी है। इसके बाद मंदिर में पूजा-पाठ का काम आरंभ हो जाएगा यानी अब तो मौज ही मौज है! जब भी भगवान से कुछ मांगना होगा तो चार कदम चले और मांग लिया वरना मामूली सी डिमांड के लिए भी उसे दूसरे मुहल्ले में स्थित मंदिर में जाना पड़ता था। दरअसल अपनी चीज का मजा ही कुछ और है! जब जी चाहे ...!

अचानक उसे बाहर कुछ शोर सुनाई दिया। उसने दरवाजा खोला।

‘‘किशन बाबू, आपका लड़का ...!’’

‘‘क्या हुआ?’’

‘‘सड़क पर एक्सीडेंट।’’ एक ने आगे बढ़कर कहा। सुनते ही वह मुख्य सड़क की तरफ लपके। पीछे-पीछे उसकी पत्नी दौड़ी चली आ रही थी।

खून से लथपथ उनका 10 वर्षीय बच्चा सड़क पर अचेत पड़ा था। किशन की पत्नी ने आगे बढ़कर उसे बाहों में उठाकर भींच लिया।

‘‘मुन्ना! मुन्ना!’’

तब तक एम्बुलेंस आ गई थी। पति-पत्नी बच्चे को लेकर अस्पताल की ओर चल पड़े।

‘‘सरकारी अस्पताल?’’

‘‘नहीं-नहीं। प्राइवेट नर्सिंग होम।’’ पत्नी ने निर्णायक स्वर में कहा।

फर्स्ट एड के दौरान ही मुन्ना को होश आ गया।

‘‘मुन्ना!’’ किशन तड़पकर बोला।

‘‘पापा!’’ मुन्ना ने चारों तरफ नजर दौड़ाई और फिर बोला, ‘‘पापा मेरी टांग में ...?’’

‘‘क्या हुआ बेटा?’’ किशन ने मुन्ना के पैरों को छूते हुए पूछा।

‘‘लगता है कि आपके बच्चों के पैरों में चोट आई है। एक्स-रे करना पड़ेगा।’’ डॉक्टर ने कहा। एक्स-रे के लिए मुन्ना को अंदर केबिन में ले जाया गया।

‘‘सुनो जी, घर खुला पड़ा है।’’ किशन की पत्नी ने कहा।

‘‘हां! और मेरी जेब में इस वक्त पैसे भी नहीं हैं?’’ किशन ने चिंतित स्वर में जवाब दिया।

‘‘घर पर हैं पैसे। मैं अभी लाती हूं और घर को ताला भी लगा आती हूं।’’ कहकर पत्नी घर चली गई।

एक्स-रे देखते हुए डॉक्टर ने कहा, ‘‘आपके बेटे की दोनों टांगों में फ्रैक्चर है, इसलिए प्लास्टर करना होगा। तब तक आप ये दवाईयां बाजार से ले आइए।’’

मुन्ना को अस्पताल के कर्मचारियों ने एक बिस्तर पर लिटा दिया और डॉक्टर किशन को दवाईयों की पर्ची थमाकर दूसरे मरीज को देखने में व्यस्त हो गए। मुन्ना के पैरों पर पलस्तर करते-करते एक बज गया। पलस्तर करने के बाद डॉक्टर खाना खाने चले गए।

मुन्ना को अब नींद आ गई थी। किशन की पत्नी भी घर से रुपये लेकर आ गई और बोली, ‘‘आपने सुबह से कुछ नहीं खाया है, बाहर जाकर कुछ खा-पी आइए।’’

‘‘छोड़ो जी!’’ किशन ने बेरूखी से कहा।

पत्नी ने बात करने की कोशिश करते हुए फिर से कहा, ‘‘आपको आज मंदिर में मूर्ति स्थापना समारोह में भी तो जाना था न! आप वहां हो आइए। मुन्ने के पास मैं बैठी ही हूं। वैसे भी अभी यह सो रहा है।’’

‘‘मेडिकल स्टोर से दवाईयां लानी हैं। लाओ रुपये मुझे दो।’’ किशन ने बात बदलते हुए कहा और वह पत्नी से रुपये लेकर दवाईयां लाने चला गया।

वापस आया, तब तक मुन्ना जाग गया था और अब वह अपनी मां से बातें कर रहा था। किशन ने दवाईयां उसके सिरहाने रखी और मुन्ना से बातें करने लगा। तब तक डॉक्टर भी खाना खाकर वापस आ गए। डॉक्टर ने दवाईयां देखी और नर्स को एक खुराक दवाई देने की हिदायत देकर अपने काम में व्यस्त हो गए।

शाम के पांच बज चुके थे। मुन्ना की हालत में अब काफी सुधार नजर आ रहा था। इसलिए किशन ने डॉक्टर से मुन्ना को अपने साथ घर ले जाने की इजाजत मांगी। डॉक्टर ने मुन्ना का चैकअप करने के बाद उसको डिस्चार्ज करने की अनुमति दे दी और किशन के हाथ में पांच हजार रुपये का बिल बनाकर थमा दिया और मुन्ना की देखरेख संबंधी कुछ जरूरी हिदायतें भी उसे दी।

घर पहुंचकर किशन ने बड़े आराम से मुन्ना को बिस्तर पर लिटा दिया। थोड़ी ही देर में मुन्ना को नींद आ गई। थोड़ी सी फुर्सत मिली तो दिन-भर के भूखे प्यासे किशन व उसकी पत्नी मुन्ना के पास बैठकर चाय पीने लगे।

तभी दरवाजे पर दस्तक हुई। किशन ने दरवाजा खोला। सामने मंदिर के पुजारी जी और मुहल्ले के लोग खड़े थे।

‘‘आइए, आइए ...।’’ किशन ने उन सभी का स्वागत करते हुए कहा।

‘‘किशन भैया, हमें पता चल गया था कि आपके बच्चे का एक्सीडेंट ...। कैसी तबीयत है अब उसकी?’’ एक पड़ोसी ने बात शुरू करते हुए कहा।

‘‘जी, अब ठीक है। पलस्तर हो गया है। वह देखो। अभी-अभी सोया है।’’ किशन ने कहा।

सब लोग कमरे में ही बैठ गए। पुजारी जी ने बच्चे के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘वाह किशन बाबू, बच्चा बिल्कुल आप ही की मूर्त है।’’

‘‘अरे, कुछ चाय-पानी का प्रबंध करो।’’ किशन ने पत्नी की तरफ मुड़कर कहा।

‘‘अरे नहीं-नहीं किशन बाबू! इसकी कोई जरूरत नहीं है।’’ पुजारी जी ने उन्हें बैठे रहने का संकेत करते हुए कहा।

‘‘आहा! आपका घर तो वाकई मंदिर है!’’ पुजारी जी किशन के कंधे को छूते हुए बोले।

‘‘अरे हां!’’ अचानक किशन को याद आया तो वह चौंककर बोला, ‘‘पंडित जी, माफ करना, मैं आज मंदिर में मूर्ति स्थापना के समय नहीं आ पाया।’’

‘‘आपको वहां आने की क्या आवश्यकता थी! दिनभर आप जिस कार्य में व्यस्त रहे, वह किसी पूजा-पाठ या मंदिर में मूर्ति स्थापना से कम नहीं था।’’ पुजारी जी ने कहा। (एम सी एन)

(लेखक देश की तीन प्रतिष्ठित फीचर एजेंसियों के समूह ‘मीडिया केयर ग्रुप’ से जुड़े हैं)

लघुकथा : लाडली


- विक्की नरूला -

‘‘सुनो जी, मैं कहती हूं आपकी लाडली रीना के लिए कोई अच्छा सा लड़का देखकर इसके हाथ पीले कर देते हैं।’’ रश्मि ने अपने पति सागर से कहा।

‘‘अरे तुम पागल हो गई हो, अभी अपनी रीना की उम्र ही क्या है? अभी तो उसके खेलने खाने की उम्र है। उसने सिर्फ मैट्रिक पास की है। अभी तो उसे शहर के कॉलेज में पढ़ना है, आगे बढ़ना है। मैं उसे पढ़ा-लिखाकर एक काबिल डॉक्टर बनाकर ही उसकी शादी करूंगा।’’ सागर ने रश्मि को समझाया।

‘‘अजी रहने दो। शहर के कॉलेजों में माहौल बेहद खराब है। वहां अच्छे बुरे सब तरह के लड़के पढ़ते हैं। कहीं रीना के कदम बहक गए तो! जमाना बड़ा खराब है, इसलिए रीना को आगे मत पढ़ाओ।’’ रश्मि कहकर चुप हो गई।

‘‘रश्मि तुम भी गुजरे जमाने की बात कर रही हो। हमारी रीना बहुत अच्छी लड़की है। इसे हमारी इज्जत की चिन्ता है। इसे अच्छे-बुरे की भी पहचान है। तुम्हें नहीं पता, आज लड़कियां कहां सं कहां पहुंच गई हैं? वो हर क्षेत्र में लड़कों से आगे हैं। प्रतिभा पाटिल, सोनिया गांधी, सुनीता विलियम्स, कल्पना चावला सभी ने देश का नाम ऊंचा किया है। ये सभी लड़कियां ही तो थी। इसलिए मैं अपनी बेटी रीना को आगे पढ़ाऊंगा और एक डॉक्टर बनाऊंगा। फिर उसकी शादी के बारे में सोचूंगा।’’

अब रश्मि अपने पति से संतुष्ट थी। (एम सी एन)

(लेखक देश की तीन प्रतिष्ठित फीचर एजेंसियों के समूह ‘मीडिया केयर ग्रुप’ से जुड़े हैं)

खतरे में है ‘पहाड़ों की रानी’ मसूरी


- श्रीगोपाल ‘नारसन’ -

दिन के बजाय रात को अधिक चमकने वाली ‘पहाड़ों की रानी’ मसूरी धरती डोलने पर कभी भी ध्वस्त हो सकती है। वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक टैक्निकल जांच सर्वे में यह महत्वपूर्ण और सनसनीखेज खुलासा हुआ है कि मसूरी में करीब पौने दो शताब्दियों पहले बनी हैरिटेज इमारतें भूकम्प के खतरों को नहीं झेल पाएंगी, वहीं मसूरी में 94 प्रतिशत भवन ईंट व पत्थरों से बने होने के कारण भूकम्प के भारी झटकों में देखते ही देखते ध्वस्त हो सकते हैं, जिस कारण पहाड़ों की रानी मसूरी भी अब सुरक्षित नहीं रह गई है।

पर्वत श्रृंखलाओं पर बसी होने के कारण मसूरी में ऊंचे-नीचे रास्ते हैं, वहीं अधिकांश भवन भी पर्वत श्रृंखलाओं पर बने हैं परन्तु ये पर्वत श्रृंखलायें और उन पर बने भवन उतने मजबूत नहीं रह गए हैं, जो भूकम्प आपदा का सामना कर सकें। आईआईटी रूड़की एवं डीएमएमसी द्वारा संयुक्त रूप से किए गए इस सर्वे में कहा गया है कि मसूरी में भवन निर्माण के समय भूकम्परोधी उपायों की अनदेखी की गई है और मौजूदा समय में भी भूकम्परोधी तकनीक न अपनाए जाने से मसूरी खतरे की जद में आ गई है।

हाल ही में प्रकाशित इस सर्वे विषयक शोध पत्र में यह बताया गया है कि मौजूदा समय में मसूरी में 3344 मकान हैं, जिन्हें लेकर भूकम्पीय दृष्टि से तकनीकी अध्ययन किया गया। मसूरी की ऐतिहासिक विरासत खोजते हुए वैज्ञानिकों ने पाया कि मसूरी में सन् 1836 के बने घर भी मौजूद हैं जबकि एक अस्पताल सन् 1857 का बना हुआ है तथा एक स्कूल तो उससे भी पहले सन् 1845 का बना हुआ है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि सन् 1905 में भूकम्प का तगड़ा झटका झेल चुकी मसूरी में यदि फिर जलजला आता है तो शहर के आधे से भी अधिक भवन धराशायी या फिर बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो जाएंगे, जिससे करीब ढ़ाई सौ करोड़ रुपये का नुकसान मसूरी को झेलना पड़ सकता है।

इस समय मसूरी भले ही रात के समय बिजली की रंगीन रोशनी में और दिन के समय सुहावने मौसम और हरियाली से नहा रही हो, भले ही माल रोड़ पर देशी-विदेशी पर्यटकों का जमावड़ा लगा हुआ हो, भले ही मसूरी की झील और गनहिल की रौनक बरकरार हो, भले ही अठारहवीं सदी की लाइब्रेरी, आईएएस प्रशिक्षण अकादमी, लण्टोर बाजार, रमणीक लक्ष्मीनारायण मंदिर, अंग्रेजों के जमाने के चर्च के लिए मसूरी में आने को लोग आतुर रहते हों लेकिन यदि वैज्ञानिकों की भूकम्प आपदा आशंका सच हो गई तो पहाड़ों की रानी का अस्तित्व ही मिट जाएगा।

केन्द्रीय भवन अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक यादवेन्द्र पाण्डेय बताते हैं कि मसूरी तथा अन्य पर्वतीय शहरों और गांवों में भूकम्प रोधी तकनीक अपनाकर भवन निर्माण किए जाने की जरूरत है। साथ ही भू-स्खलन से भी भवनों को कम से कम नुकसान पहुंचे व जनहानि न हो, इसके लिए नई तकनीक के भवनों को अपनाए जाने की आवश्यकता है।

मसूरी के खतरे की जद में होने का कारण भूकम्प का कारण बनने वाली भूगर्भीय दरार का मसूरी के पास से गुजरना माना जा रहा है। वैज्ञानिकों की राय है कि भूकम्प कभी भी मसूरी के विनाश का कारण बन सकता है, जिससे बचाव के लिए अभी से ऐहतियात बरतने की जरूरत है, तभी पहाड़ों की रानी मसूरी को आने वाले भूकम्पीय खतरों से बचाया जा सकता है। (एम सी एन)

(लेखक देश की तीन प्रतिष्ठित फीचर एजेंसियों के समूह ‘मीडिया केयर ग्रुप’ से जुड़े टिप्पणीकार हैं)

खास आपके लिए है ये शानदार ‘गिफ्ट’!!!

निकल पड़ी ‘सांता’ की सवारी

Sunday, December 05, 2010

सांप का श्राप

-- शिशु मानव (मीडिया केयर नेटवर्क) --




श्राप कभी बेअसर नहीं होता, देर-सवेर इसे भुगतना ही पड़ता है। मानव तो मानव, देवी-देवता और भगवान तक भी श्राप के प्रभाव से बच नहीं पाते। सर्प योनि के नाग-नागिन के श्राप के अनेक किस्से सुनने में आते रहे हैं। सांपों के श्राप को लेकर घटी कुछ सच्ची तो कुछ काल्पनिक कथाओं पर बॉलीवुड में कई फिल्में भी बन चुकी हैं। उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में हाल ही में घटी ऐसी ही एक अजीबोगरीब घटना में सांप के श्राप का प्रभाव स्पष्ट देखा भी गया है। सोनभद्र जिले के दुद्धी कोतवाली क्षेत्र के सुगवामान नामक गांव में इन दिनों एक ऐसे ही अजीबोगरीब वाकये को देख-सुनकर हर कोई हैरान है।

दरअसल हुआ यह कि इस गांव के एक किशोर ने जब से एक सांप को मारा है, तभी से वह स्वयं भी सांपों की तरह ही हरकतें करते हुए फुफकारने भी लगा है। हालांकि डॉक्टरों की रिपोर्ट के अनुसार यह किशोर पूरी तरह से सामान्य है लेकिन ओझा और तांत्रिक इसे सांप के श्राप का प्रभाव मान रहे हैं। उनका मानना है कि किशोर ने जिस सांप को मारा है, उसके श्राप से ही किशोर की यह दशा हुई है क्योंकि इस किशोर ने सांप से किया अपना वायदा पूरा नहीं किया था।

बताया जाता है कि सुगवामान गांव का आलोक पिछले दिनों अपने चार-पांच दोस्तों के साथ मवेशियों को चराने के लिए जंगल में गया था। उसी दौरान उन्हें वहां रास्ते में एक सांप दिखाई दिया। लकड़ी से मारने की कोशिश पर सांप डरकर एक बिल में घुस गया। आलोक के दोस्तों का कहना है कि उसी दौरान आलोक ने बिल के पास जाकर सांप से कहा कि अगर वह बिल से बाहर आ जाएगा तो वह उसे दूध-लावा खिलाएगा। हैरानी की बात यह कि कुछ ही पलों बाद सांप वास्तव से बिल से बाहर निकल आया और एक ओर भागने लगा लेकिन तभी आलोक ने उस पर आक्रमण कर दिया। तभी अचानक आलोक के साथ बिल्कुल अप्रत्याशित घटना घटी। सांप को मारने के लिए ऊपर उठा आलोक का हाथ ऊपर ही उठा रह गया। फिर अन्य दोस्तों ने मिलकर उस सांप को मार डाला।

सांप को मारने के बाद आलोक को उसके दोस्त अपने साथ घर ले आए लेकिन आलोक उसके बाद से लगातार अजीब-अजीब सी हरकतें करने लगा, जिसके बाद उसके परिजन उसे चैकअप के लिए अस्पताल ले गए। अस्पताल में तमाम डॉक्टरी जांच करने के बाद डॉक्टरों ने कहा कि आलोक पूरी तरह से सामान्य है। आलोक में किसी भी तरह की शारीरिक या मानसिक बीमारी के कोई लक्षण नहीं पाए गए। फिर भी आलोक फुफकारने के साथ ही सांपों की तरह ही लहराने और हाथ घुमाने जैसी हरकतें कर रहा है। फिलहाल गांव में इस अद्भुत नजारे को देखने के लिए लोगों की भीड़ जुट रही है और डॉक्टरों द्वारा आलोक में किसी भी तरह की बीमारी के कोई लक्षण नहीं बताने पर ओझाओं ने आलोक को ‘सांप के श्राप’ से मुक्ति दिलाने की कवायदें शुरू कर दी हैं। (एम सी एन)
 
(‘मीडिया केयर नेटवर्क’ के डिस्पैच में प्रकाशित इस रचना का प्रकाशन ‘मीडिया केयर नेटवर्क’ के माध्यम से ‘दैनिक पंजाब केसरी’ व ‘हमारा महानगर’ सहित कई पत्र-पत्रिकाओं में हो चुका है).

कुत्ते की तरह भौंकने वाली गिलहरी

स्वतंत्र वार्ता (05.12.10) में प्रकाशित बॉलीवुड गपशप

रांची एक्सप्रेस (05.12.10) में प्रकाशित बॉलीवुड गपशप

पंजाब केसरी (05.12.10) में प्रकाशित बॉलीवुड गपशप




‘पंजाब केसरी’ (05.12.10)
(जालंधर, लुधियाना, जम्मू, पालमपुर, धर्मशाला, अम्बाला इत्यादि संस्करणों) में
‘मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स’ के डिस्पैच में प्रसारित बॉलीवुड गपशप

Friday, December 03, 2010

हिन्दी फिल्मों में चुम्बन का इतिहास


‘मीडिया केयर नेटवर्क’ के डिस्पैच में प्रसारित
एवं
दैनिक सन्मार्ग (कोलकाता) में 3.12.2010 को प्रकाशित

समय बहुमूल्य है, अतः एक-एक पल का सदुपयोग सार्थक कार्यों में करें.