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Tuesday, May 25, 2010

स्वास्थ्य चर्चा : औषधीय गुणों की खान रसीला आम


-- योगेश कुमार गोयल (मीडिया केयर नेटवर्क)

गर्मियों में जगह-जगह पर मीठे और रसीले आमों को देखकर किसका दिल नहीं ललचाता। हालांकि अधिकांश लोग इसके उम्दा स्वाद का मजा लेने के लिए आम का सेवन करते हैं लेकिन अपने उम्दा स्वाद के साथ-साथ आम अनेक बीमारियों के उपचार और उनकी रोकथाम में भी उपयोग किया जाता है। यहां तक कि आम की गुठलियों की गिरी, जिसे अक्सर बेकार समझकर आम खाने के बाद कूड़े में फैंक दिया जाता है, भी काफी उपयोगी होती है।

कुछ अनुसंधानों के बाद यह बात सामने आई है कि आम की 0.381 टन गिरी में जितना प्रोटीन होता है, उतना ही प्रोटीन 3.19 टन ज्वार अथवा जौ से या फिर 3 टन जई से अथवा 3.99 टन मक्का से मिलता है। इसके अलावा आम की गिरी में स्टार्च, आयोडीन, वसीय अम्ल, कच्चे रेशे तथा टैनिन भी पाए जाते हैं। हालांकि टैनिन से पाचन शक्ति पर कुछ असर पड़ता है लेकिन वैज्ञानिकों ने इसका भी इलाज ढ़ूंढ़ निकाला है। वैज्ञानिकों के अनुसार यदि थोड़ी मात्रा में पोटेशियम हाइड्रोक्साइड और सोडियम कार्बोनेट मिले पानी में आम की गिरी के आटे को 80 डिग्री तापमान पर करीब 20 मिनट तक भिगोया जाए तो इसमें टैनिन की मात्रा तो काफी कम हो ही जाती है, साथ ही यह आटा और अधिक गुणकारी हो जाता है।

आम के औषधीय गुणों की बात करें तो आम स्वाद की दृष्टि से तो एक बहुत उम्दा फल है ही, यह अनेक बीमारियों में भी एक रामबाण औषधि के रूप में उपयोग में आता है। शायद यही वजह है कि इस रसीले फल को ‘फलों का राजा’ भी कहा गया है। आइए डालते हैं आम के कुछ औषधीय गुणों पर एक नजर:-

लू से बचाव के लिए

दो कच्चे आमों को गर्म राख में भूनकर किसी बर्तन में उनका गूदा निकाल लें और इस गूदे में करीब 250 ग्राम पानी डालकर इसमें पुदीना और स्वादानुसार काला नमक मिला लें। चाहें तो इसमें बर्फ भी डाल सकते हैं। इसे दिन में दो बार पीएं। इससे लू की बीमारी ठीक होती है। इसके अलावा यह कब्ज ठीक करने के लिए भी एक कारगर दवा है।

हैजे से बचाव

यदि मरीज को दस्त लग जाएं अथवा हैजे की शिकायत हो तो आम के लगभग 20 ग्राम नरम-नरम पत्ते कुचलकर आधा लीटर पानी में उबाल लें और जब पानी आधा रह जाए, तब उसे छान लें और मरीज को यह गर्म पानी दिन में दो या तीन बार पिलाएं।

पेचिश तथा शुगर

पेचिश की शिकायत होने पर आम के पत्तों को छाया में सुखाकर बारीक पीसकर कपड़े में से छान लें और गर्म पानी में मिलाकर पीएं। यदि शुगर की बीमारी हो तो परहेज करते हुए पेड़ से झड़ चुके आम के पत्तों को बारीक पीसकर कपड़े में से छानकर ताजा व स्वच्छ पानी के साथ सेवन करें। इससे शुगर की बीमारी में काफी लाभ होगा।

कमजोरी दूर करने के लिए

शरीर की कमजोरी दूर करने के लिए मीठे आमों का करीब 250 ग्राम रस इतने ही दूध में मिलाकर उसमें स्वादानुसार चीनी मिलाकर मैंगो शेक की ही भांति तैयार कर लें और इसका सेवन लगभग दो माह तक नियमित करें। इसे यदि बर्फ के बिना ही पीएं तो और भी अच्छा रहेगा। इसके सेवन से शरीर को ताकत मिलती है।

उल्टी लगने पर

उल्टी लगने पर आम का रस, ग्लूकोज, कैल्शियम वाटर और अर्क गुलाब बराबर-बराबर मात्रा में मिलाकर दिन दो या तीन बार पीएं। इससे उल्टियां बंद हो जाती हैं। यह गर्भवती महिला के लिए तो उल्टियों में बहुत उपयोगी रहता है।

दांतों के लिए

यदि आपके दांतों से खून आता है या आपके दांत पीले पड़ चुके हैं तो आम के पत्तों को छाया में सुखाकर इन्हें जलाकर बारीक पीस लें और इससे रोजाना अपने दांतों पर मंजन करें। इससे दांतों से खून आना बंद होता है और दांत भी सफेद हो जाते हैं। (एम सी एन)

खोज खबर: डिजिटल पैन से होगा इलैक्ट्रॉनिक लेखन

प्रस्तुति: योगेश कुमार गोयल (मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स)

कम्प्यूटर उद्योग का पिछले काफी समय से यही प्रमुख लक्ष्य रहा है कि हाथ से लिखे शब्दों को पढ़ने में समर्थ कोई विश्वसनीय सॉफ्टवेयर विकसित किया जा सके। यह नई तकनीक हालांकि हमारे अपठनीय घसीट लेखन को भी डिजिटल दुनिया की मुख्यधारा में ले आएगी लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि कम्प्यूटरों के ‘की बोर्ड’ की उपयोगिता ही समाप्त हो जाएगी। जहां तक लिखने का सवाल है, कलम और कागज को न तो कोई भी उपकरण अब तक मात दे सका है और न ही दे सकता है।

हस्तलिखित सामग्री को डिजिटल डाटा के कम्प्यूटर नहीं बदल पाए लेकिन अब नया सॉफ्टवेयर, बेहतर हार्डवेयर और हाथ में पकड़े जा सकने वाले उपकरणों की सफलता ने कम्प्यूटर निर्माण करने वाली कम्पनियों को ‘इलैक्ट्रॉनिक लेखन’ पर पुनर्विचार करने को विवश कर दिया है। इस तरह की खोजों को ‘डिजिटल इंक’ के रूप में जाना जाता है। इनमें सबसे अच्छी मशीन आई बी एम की ‘थिंक पैड ट्रांसनोट’ है। हालांकि ट्रांसनोट हस्तलेखन को पढ़ने की कोशिश नहीं करता और न ही उसे कम्प्यूटर में दर्ज करता है लेकिन यह आपकी आड़ी-तिरछी लिखावट की तस्वीर खींच लेता है, जिसे कम्प्यूटर में सुरक्षित रखा जा सकता है और उसमें फेरबदल भी किया जा सकता है।

600 मैगा हटर््ज के ‘पेंटियम 3’ प्रोसेसर के साथ लगा ट्रांसनोट असाधारण सा नजर आता है। यह लैपटॉप और इलैक्ट्रॉनिक लीगल पैड का मिश्रण सा लगता है। ए-4 पेपर के आकार का पैड पैनल में जुड़ा होता है, जिसका कनैक्शन की बोर्ड और डिस्प्ले स्क्रीन से है। विशेष रूप से बनाए गए डिजिटल बॉल पैन और पैड में लगे सेंसर आपके शब्दों व रेखाचित्रों को दर्ज कर लेते हैं, जिन्हें बाद में आप कम्प्यूटर मे फीड कर सकते हैं या ई मेल भी कर सकते हैं। (मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स)

खोज खबर: बीमारियां पैदा करने वाले जीवाणुओं की पहचान करेगी मशीन

प्रस्तुति: योगेश कुमार गोयल (मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स)

तरह-तरह की बीमारियां पैदा करने वाले रोगाणुओं की मदद से बीमारियों की दवा बनाने के प्रयासों में दुनिया भर के वैज्ञानिक जुटे हैं। इसके अलावा किसी न किसी बीमारी के इलाज में कामयाब हो सकने योग्य लाखों रासायनिक अणुओं को परखने, उन्हें छांटकर अलग करने तथा उनसे दवा तैयार करने के प्रयोग भी चल रहे हैं। जाहिर है कि यह काम बहुत पेचीदा है और नए उपकरणों तथा नए सॉफ्टवेयर के बिना इसे कर पाना करीब-करीब असंभव सा है लेकिन उत्तरी इंग्लैंड में यार्कशायर स्थित ‘द डोन विटले’ नामक साइंटिफिक कम्पनी जीवाणुओं के अध्ययन के लिए विशेष उपकरण तथा विशेष सॉफ्टवेयर विकसित करने में सफल हुई है। कम्पनी ने बिना हवा के पनपने वाले जीवाणुओं के अध्ययन के लिए एक अनूठा वर्क स्टेशन तैयार किया है। कम्पनी ने एनारोबिक बैक्टीरिया को खाद्य पदार्थों, पानी तथा मेडिकल सेंपलों से अलग करने का काम इतना सटीक और आसान बना दिया है कि दुनिया के 20 देशों में ‘मैक्स’ नामक यही मशीन कार्य कर रही है और इस मशीन में अब एक और क्रांतिकारी संशोधन किया गया है, जिससे यह मशीन अब जीवाणु के चारों ओर के बदलते वातावरण का भी ध्यान रख सकेगी।

दुनिया में इस तरह का यह एकमात्र उपकरण है, जिसे आमतौर पर भोजन को विषाक्त बनाने वाले जीवाणुओं को विविध प्रकार के खाद्य पदार्थों से अलग करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इस नई मैक्स प्रणाली को हर तरह से चुस्त-दुरूस्त बनाया गया है। इसमें जीवाणु का आकार, आकृति, आंतरिक संरचना आदि सभी कुछ परखा जा सकता है। इसका रिमोट पांव से भी चलाया जा सकता है, जिससे उपकरण को खोलना, बंद करना तथा इस्तेमाल करना बहुत आसान हो गया है। प्रयोगकर्ता को इसके उपयोग के लिए उठने की जरूरत नहीं पड़ती तथा एक जगह बैठे-बैठे ही काम किया जा सकता है। जीवाणु प्रयोगशाला से बाहर न निकल सकें, इसकी भी व्यवस्था की गई है। (मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स)

हैल्थ अपडेट : मानसिक क्षमता नहीं बढ़ने देता कैलकुलेटर

प्रस्तुति: योगेश कुमार गोयल (मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स)

आज छोटी-छोटी गणनाओं के लिए भी कैलकुलेटर का उपयोग आम बात हो गई है लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि गणित के कठिन सवालों के हल के लिए कैलकुलेटर के बढ़ते उपयोग से मानसिक क्षमता का विकास नहीं हो पाता। इसके विपरीत यदि गणित के हल मानसिक तौर पर तैयार किए जाएं तो मानसिक क्षमता के साथ ही गणितीय कौशल भी बढ़ता है। यूनिवर्सिटी ऑफ सैसकेटचेवन के वैज्ञानिकों के एक दल ने अध्ययन करके पाया कि कैलकुलेटरों का उपयोग करने तथा न करने वाले छात्रों के गणितीय कौशल में काफी अंतर है। चीन के कैलकुलेटर का उपयोग न करने वाले छात्रों की सवाल हल करने की मानसिक क्षमता कनाडियाई छात्रों से ज्यादा पाई गई। गौरतलब है कि चीन में प्राथमिक व माध्यमिक स्तर पर कैलकुलेटर का उपयोग नहीं होता जबकि कनाडा में हर छात्र के पास अपना कैलकुलेटर होता है।

यह अध्ययन करने वाले मनोवैज्ञानिक डा. जैमी कैंपबेल के अनुसार चीनी व कनाडियाई छात्रों ने हालांकि पूछे गए सवालों के सही जवाब दिए थे किन्तु चीनी छात्रों की प्रश्नों के उत्तर देने की गति काफी तेज थी। यह अध्ययन चीन तथा कनाडा में शिक्षा ग्रहण करने वाले चीनी छात्रों और श्वेत कनाडियाई छात्रों पर किया गया था। बिना कैलकुलेटर के आसान सवाल हल करने में श्वेत कनाडियाई छात्रों ने 1.1 सैकेंड का समय लिया जबकि चीन में पढ़ रहे चीनी छात्रों तथा कनाडा में पढ़ रहे चीनी छात्रों ने 0.9 सैकेंड में सवाल हल कर लिया। जब इन छात्रों को जटिल सवाल हल करने के लिए दिए गए तो चीन में शिक्षा ग्रहण करने वाले चीनी छात्रों ने श्वेत छात्रों से 50 प्रतिशत व कनाडा में शिक्षारत चीनी छात्रों से 33 प्रतिशत ज्यादा सवाल हल किए। निष्कर्षतः वैज्ञानिकों का कहना है कि जो छात्र कैलकुलेटरों का उपयोग बहुत कम करते हैं, उनकी बौद्धिक क्षमता बहुत विकसित होती है जबकि कैलकुलेटर का उपयोग करने वाले छात्रों की क्षमता का दोहन नहीं हो पाता। (मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स)

हैल्थ अपडेट : निकोटीन से टी. बी. जीवाणु का सफाया

प्रस्तुति: योगेश कुमार गोयल (मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स)

यह सही है कि सिगरेट में मौजूद निकोटीन को स्वास्थ्य के लिए हानिकारक तत्व माना जाता है क्योंकि निकोटीन धूम्रपान करने वाले को इसका आदी बनाकर फेफड़ों को नुकसान पहुंचाती है लेकिन क्या आप जानते हैं कि यही निकोटीन टी.बी. (तपेदिक) पैदा करने वाले जीवाणुओं का नाश भी करती है। जी हां, यह कहना है यूनिवर्सिटी ऑफ सेंट्रल फ्लोरिडा के प्रमुख शोधकर्ता डा. सलेह नासेर का। डा. सलेह नासेर कहते हैं कि तम्बाकू में पाई जाने वाली निकोटीन सिर्फ माइक्रोबैक्टीरियम ट्यूबर क्लोसिस का ही नहीं बल्कि अन्य शक्तिशाली जीवाणुओं का भी सफाया करती है। शोधकर्ताओं का कहना है कि निकोटीन टीबी बैक्टीरिया का विकास ही नहीं रोकती बल्कि उसे पूरी तरह नष्ट कर देती है। जब शोध के दौरान प्रयोगशाला में खतरनाक जीवाणुओं पर बहुत थोड़ी मात्रा में निकोटीन डाला गया तो सभी जीवाणु मर गए। तपेदिक फैलाने वाले जीवाणुओं को मारने में एक सिगरेट में मौजूद निकोटीन से भी कम मात्रा का उपयोग किया गया था।

इस शोध का अर्थ यह नहीं है कि निकोटीन का यह लाभ सिगरेट के जरिये इसका सेवन करने से भी मिल सकेगा। सिगरेट पीने पर शरीर में निकोटीन सिर्फ और सिर्फ नुकसान ही पहुंचाएगा और इससे किसी भी तरह के स्वास्थ्य लाभ की कामना नहीं की जा सकती। सिगरेट पीने या तम्बाकू खाने पर निकोटीन का यह लाभ इसलिए नहीं मिल सकेगा क्योंकि इसमें ‘कारसिनोजेन’ नामक यौगिक भी मौजूद होते हैं, जो कैंसर को बढ़ावा देते हैं। वैसे अभी तक यह पता नहीं चल सका है कि निकोटीन अत्यंत हानिकारक बैक्टीरिया को भी कैसे नष्ट करता है। (मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स)

Wednesday, May 19, 2010

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यह भी जानें : क्यों हो जाती हैं युवतियां शर्म से लाल?

आपमें से बहुतों ने युवतियों के मुख से कभी न कभी यह तो सुना ही होगा, ‘‘मैं शर्म से लाल हो गई ...!’’ अथवा आपने किसी को किसी युवती के लिए यह कहते सुना होगा, ‘‘वह देखो, कैसे शरमा रही है!’’
दरअसल शर्माना एक स्वाभाविक क्रिया है पर महिलाओं में मौजूद एक विशेष हार्मोन की सक्रियता शर्म की दशा में उनके चेहरे को लाल करने में प्रमुख रूप से जिम्मेदार है।
जब कोई युवती किसी बात पर शर्माती है, तब इस हार्मोन की सक्रियता से चेहरे पर विद्यमान रक्त कोशिकाओं में रक्त की मात्रा एकाएक बढ़ जाती है, जिसके कारण चेहरा लाल दिखाई देता है। (मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स)
(यह रचना ‘मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स’ के डिस्पैच से लेकर यहां प्रकाशित की गई है)

हैल्थ अपडेट : फल-सब्जियों के सेवन से फेफड़े बनें मजबूत

प्रस्तुति: योगेश कुमार गोयल (मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स)

किसी भी व्यक्ति को सांस की बीमारी होने पर उसका बुरा हाल हो जाता है। ऐसे में दम उखड़ने पर वह कहीं भी आने-जाने और कोई काम सही ढ़ंग से करने में असमर्थ होता जाता है लेकिन एक शोध के बाद वैज्ञानिकों का कहना है कि फेफड़ों के सही ढ़ंग से कार्य करते रहने और श्वसन रोग से मुक्त रहने के लिए जरूरी है कि फल-सब्जियों का हम अधिकाधिक सेवन करें। शोध के दौरान ब्रिटेन की नाटिंघम यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने 2600 से ज्यादा व्यस्कों के भोजन तथा श्वसन स्वास्थ्य का अध्ययन किया। शोधकर्ताओं का कहना है कि ज्यादा सेब तथा टमाटर खाने वाले व्यक्तियों का श्वसन स्वास्थ्य ठीक रहता है और उनके फेफड़े भी सही ढ़ंग से कार्य करते रहते हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि सप्ताह में कम से कम 5 सेब और 3 टमाटर खाने से बहुत लाभ होता है और ऐसे व्यक्तियों के फेफड़े अपनी उम्र से तीन वर्ष कम होने जैसी चुस्ती से कार्य करते हैं।

साउथ हैम्पटन यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने भी धूम्रपान करने वाले कुछ व्यक्तियों को दमे जैसी बीमारी होने तथा कुछ को ये बीमारी न होने के बारे में 115 पीड़ितों तथा 116 स्वस्थ व्यक्तियों पर अध्ययन करने के बाद बताया कि जो व्यक्ति धूम्रपान करने के साथ-साथ भोजन में पर्याप्त मात्रा में फल-सब्जियों का समावेश करते हैं, वे दमे तथा अन्य श्वसन रोगों से बचे रहते हैं जबकि फलों व सब्जियों का सेवन नहीं करने वाले व्यक्तियों के इस रोग के शिकार होने की काफी संभावना रहती है। शोधकर्ताओं का कहना है कि फल व सब्जियों के एंटीऑक्सीडेंट गुणों के कारण ही संभवतः सांस के साथ खींचे गए ऑक्सीडेंटों का सफाया संभव होता है और यही विभिन्न रोगों को पनपने से रोकता है। (मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स)

हैल्थ अपडेट : पौधों की चर्बी से होगा गठिया का इलाज

प्रस्तुति: योगेश कुमार गोयल (मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स)

जोड़ों में दर्द, जलन व कड़ापन लाने वाली बीमारी को ‘गठिया’ के नाम से जाना जाता है। गठिया नामक बीमारी प्रायः 25 से 50 वर्ष तक के व्यक्तियों को हो सकती है। यह बीमारी शरीर की प्रतिरोध प्रणाली के सही ढ़ंग से काम न कर पाने के कारण स्वस्थ उत्तकों के नष्ट हो जाने की वजह से होती है तथा गंभीर मामलों में गठिया से विकृति भी हो जाती है। इस बीमारी का सबसे बुरा पक्ष यह है कि इसका शरीर के दाएं व बाएं अंगों पर एक साथ असर पड़ता है। इसके कारण जोड़ों में दर्द व जलन के साथ ही वजन कम होना, बुखार, खून की कमी, थकावट व कमजोरी के लक्षण भी देखे जाते हैं।

जोहान्सबर्ग के वैज्ञानिकों ने गठिया के इलाज के लिए पौधों की चर्बी ‘स्टेरोल’ तथा ‘स्टेरोलिन’ के मिश्रण से ‘स्टेरीनॉल’ नामक एक दवा तैयार की है, जिसके बारे में इनका कहना है कि यह दवा गठिया का प्रभावी इलाज तो करती ही है, साथ ही शरीर की प्रतिरोध प्रणाली की अन्य गड़बड़ियों को भी ठीक कर देती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि स्टेरोल व स्टेरोलिन शरीर में बाहरी जीवों से लड़ने वाली कोशिकाओं को सक्रिय करती है। पौधों की ये दोनों चर्बियां जलननाशक होती हैं, इसलिए इनके सेवन से जोड़ों की जलन भी शांत हो जाती है। यह औषधि जलन के कारण हुए नुकसान को ठीक कर रोग पर नियंत्रण करती है। शोधकर्ता वैज्ञानिकों का कहना है कि गठिया के इलाज में पारम्परिक दवाओं तथा पौधे की चर्बी से बनी दवा के उपयोग का सबसे बड़ा अंतर यह है कि पारम्परिक दवाएं जहां शरीर की पूरी प्रतिरोधक प्रणाली पर असर डालती हैं, जिससे रोगी को अन्य रोग आसानी से हो सकते हैं, वहीं स्टेरोल तथा स्टेरोलिन से बनी दवाईयां शरीर के सिर्फ उसी स्थान पर असर डालती हैं, जहां प्रतिरोधक प्रणाली सही ढ़ंग से कार्य नहीं कर रही हो। यही वजह है कि पौधों की चर्बी से बनी दवाओं का शरीर पर कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ता। (मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स)

Saturday, May 15, 2010

अपना घर

. उषा जैन ‘शीरी’ (मीडिया केयर नेटवर्क)

सुशीला रोते-रोते सोचने लगी कि बचपन में एक बार गैस पर दूध रखकर मां उसे दूध देखते रहने के लिए कहकर मंदिर चली गई थी और वो एक पत्रिका पढ़ने में ऐसी मशगूल हुई थी कि दूध का उसे ध्यान ही न रहा था। दूध उबल-उबलकर गिरता रहा। जब दूध जलने की महक आई तो दौड़कर गई थी। तब तक दादी भी पूजा खत्म करके आ गई थी। उन्होंने उसकी पढ़ाई को कोसते हुए कहा था, ‘‘बहू को कितना कहती हूं कि इसकी पढ़ाई-लिखाई छुड़वाकर कुछ घर का काम धंधा भी सिखा दे। पढ़-लिखकर लड़की हाथ के बाहर हुई जा रही है।’’

मां ने भी मंदिर से आते ही उसे दो थप्पड़ जड़ दिए थे। उस दिन चाय भी नहीं मिली थी जबकि भैया उसे चिढ़ा-चिढ़ाकर मिल्क शेक पीता रहा था।

वह उस घर में बोझ थी। उसे पराए घर जो चले जाना था। पति के घर आई तो बात-बात पर सास कहती, ‘‘हमारे घर में ये सब नहीं चलेगा।’’

पति से जरा कहासुनी होने पर वे कहते, ‘‘निकल जाओ मेरे घर से।’’

समय के साथ बेटा जवान हो गया। पति गुजर गए। बहू उससे घर की नौकरानी जैसा बर्ताव करती। उस दिन भी अवसाद में डूबी वो दूध उबल जाना नहीं देख पाई। बहू का पारा अब सातवें आसमान पर था, ‘‘अपने घर में भी क्या ऐसे ही नुकसान किया करती थी?’’ क्रोध में फुफकारते आंखें तरेरते हुए बहू ने कहा।

‘‘अपना घर ...? कब था उसके पास कोई अपना घर? बहू भी कितनी नादान है ना।’’ मन ही मन सुशीला ने कहा पर ऊपर से कसूरवार बनी खामोश रही। (एम सी एन)

(यह रचना ‘मीडिया केयर नेटवर्क’ के डिस्पैच से लेकर यहां प्रकाशित की गई है)

पुलिस की वर्दी

- मुकेश कुमार सिन्हा (मीडिया केयर नेटवर्क)

‘‘अरे! मां जी! ऑटो का किराया तो देते जाइए। कुल 90 रुपये हुए हैं।’’

‘‘ऐ! तू जानता नहीं, कौन हूं मैं! मेरा बेटा इस शहर का कोतवाल है। अरे, तेरी हिम्मत कैसे हुई मुझसे किराया मांगने की?’’

किराया न मिलने से क्षुब्ध ऑटो चालक बड़बड़ाता हुआ ऑटो स्टार्ट कर ही रहा था कि वहीं से गुजर रहे उन्हीं कोतवाल साहब ने पता चलने पर अपनी मां के बदले उस ऑटो वाले का किराया चुकता कर दिया और अपने घर का रूख किया।

घर में घुसते ही मां ने कहा, ‘‘जानता है बेटा, आज ...!’’

‘‘बस कर मां। मैं जानता हूं पूरी बात लेकिन बेटे की पुलिस की वर्दी की धौंस दिखाकर इस तरह किसी गरीब का निवाला छीनना सही बात नहीं है। बेचारा सुबह से लेकर शाम तक मेहनत करता है, तब जाकर रात के वक्त उस गरीब के घर का चूल्हा जलता है। मां, यह वर्दी दूसरों की हिफाजत के लिए है, इस तरह से गरीबों पर धौंस दिखाने के लिए नहीं।’’ (एम सी एन)

(यह रचना ‘मीडिया केयर नेटवर्क’ के डिस्पैच से लेकर यहां प्रकाशित की गई है)

Thursday, May 13, 2010

सर्वाधिक जीवित रहने वाला हिरण ‘उत्तरी अमेरिकी हिरण’

जीव-जंतुओं की अनोखी दुनिया-48-2

. योगेश कुमार गोयल (मीडिया केयर नेटवर्क)

 
दुनिया भर में पाई जाने वाली हिरणों की अनेक प्रजातियों में से कनाडा तथा उत्तरी अमेरिका में पाया जाने वाला हिरण, जिसे प्रायः ‘उत्तरी अमेरिकी हिरण’ ही कहा जाता है, दुनियाभर में हिरणों में सबसे ज्यादा समय तक जीवित रहने वाला हिरण है लेकिन इसके मांस के भक्षण के लिए इसका बड़े पैमाने पर शिकार किए जाने के कारण इनके अस्तित्व पर भी खतरा मंडराने लगा है। दरअसल इसका मांस काफी स्वादिष्ट बताया जाता है, इसलिए पिछले कुछ दशकों में इन हिरणों का शिकार बहुत बड़ी तादाद में हुआ है। इस हिरण की एक खासियत यह भी है कि यह हिरणों की अन्य प्रजातियों के मुकाबले करीब तीन गुना बड़ा होता है और इसके सींग भी दूसरे हिरणों के मुकाबले बहुत बड़े, लंबे और भारी होते हैं लेकिन अपने बड़े आकार के भारी शरीर व भारी-भरकम लंबे सींगों के बावजूद यह जंगलों में आसानी से भ्रमण-विचरण करता है। हालांकि उत्तरी अमेरिकी हिरण अपने लंबे व भारी सींगों का उपयोग दुश्मनों से अपने बचाव के लिए करते हैं लेकिन मादा के साथ संगम के मौसम में नर हिरण मादा पर अपने अधिकार के लिए दूसरे नर हिरणों से लड़ने के लिए भी अपने सींगों का खूब इस्तेमाल करते हैं। इन हिरणों को प्रायः झीलों के अंदर आधा डूबा हुआ देखा जा सकता है। अपने लंबे सींगों से ये हिरण झाड़ियों व पेड़ों के पत्तों के अलावा जलीय वनस्पति भी तोड़कर खाते हैं। (एम सी एन)

Tuesday, May 11, 2010

स्वास्थ्य चर्चा : प्रकृति की अनमोल देन 'तरबूज'

- योगेश कुमार गोयल (मीडिया केयर नेटवर्क)

गर्मी का मौसम शुरू होते ही बाजारों में और सड़क के किनार भी तरबूज के भारी-भरकम ढ़ेर नजर आने लगते हैं। तरबूज गर्मी के मौसम का ठंडी तासीर वाला बड़े आकार का सस्ता फल है। वास्तव में सख्त हरे छिलके के भीतर काले अथवा सफेद बीजों से युक्त लाल रसदार गूदे वाला ग्रीष्म ऋतु का एक बेमिसाल फल है तरबूज।

तरबूज को मतीरा, पानीफल, कालिन्द आदि विभिन्न नामों से भी जाना जाता है। इसे संस्कृत में कालिन्द तथा मराठी में कलिंगड़ कहा जाता है। ग्रीष्म ऋतु का फल तरबूज प्रकृति की अनमोल देन है। इसे प्रकृति प्रदत्त अनुपम ठंडाई माना गया है।

तरबूज के 100 ग्राम गूदे में 95.8 ग्राम जल, 3.3 ग्राम कार्बोहाइड्रेट, 0.2 ग्राम प्रोटीन, 0.2 ग्राम वसा, 0.2 ग्राम रेशा, 12 मिलीग्राम फास्फोरस, 11 मि.ग्रा. कैल्शियम, 7.9 मि.ग्रा. लौह तत्व, 1 मि.ग्रा. विटामिन सी, 0.1 मि.ग्रा. नियासिन, 0.04 मि.ग्रा. राइबोफ्लेविन, 0.02 मि.ग्रा. थायमिन, 16 किलो कैलोरी ऊर्जा इत्यादि अनेक पोषक तत्व पाए जाते हैं।

आयुर्वेद के अनुसार तरबूज मस्तिष्क एवं हृदय को ताजगी प्रदान करने वाला, नेत्रज्योति बढ़ाने वाला, मन-मस्तिष्क एवं शरीर को शीतलता प्रदान करने वाला, कफनाशक, पित्तनाशक, वातनाशक और प्यास बुझाने वाला मधुर फल है। तरबूज के सेवन से उच्च रक्तचाप, सीने, आंतों तथा पेट में जलन, फेफड़ों के रोगों, चर्म रोगों, पेशाब में जलन, मूत्र रोगों, बवासीर, पीलिया, उल्टी, जी मिचलाना, पेचिश, कब्ज, पथरी, जोड़ों का दर्द, लीवर, मोटापा, सिर दर्द इत्यादि अनेक रोगों में लाभ होता है।

तरबूज का प्रत्येक हिस्सा (छिलका, गूदा एवं बीज) किसी न किसी रूप में उपयोग में आते हैं। छिलके का उपयोग सौन्दर्यवृद्धि, विभिन्न दवाओं के निर्माण तथा पशुओं के आहार के रूप में किया जाता है। तरबूज का गूदा बेहद स्वादिष्ट एवं पौष्टिक होता है। तरबूज के गूदे में पैक्टिन की पर्याप्त मात्रा होती है, इसलिए इसका उपयोग खाने के अलावा अच्छी क्वालिटी के स्वादिष्ट जैम, जैली इत्यादि तैयार करने में भी किया जाता है।

तरबूज के बीजों की गिरी का उपयोग ठंडाई, शर्बत तथा अन्य शीतल पेय पदार्थ तैयार करने, स्वादिष्ट व्यंजन बनाने तथा बहुत सी विभिन्न औषधियों के निर्माण में किया जाता है। तरबूज के बीजों का तेल बादाम के तल के समान ही पौष्टिक एवं गुणकारी माना गया है। तरबूज के बीजों की गिरी खाने से रक्तचाप कम होता है। तरबूज के बीजों की गिरी पौष्टिक होती हैं। इनके सेवन से मन-मस्तिष्क को शीतलता मिलती है। तरबूज के बीजों की गिरियां तो तरबूज के गूदे से भी अधिक पौष्टिक मानी जाती हैं। इनके सेवन से शारीरिक ताकत बढ़ती है।

गर्मी के मौसम में अत्यधिक पसीना आने से शरीर में प्राकृतिक लवणों की मात्रा कम होने लगती है और इनकी मात्रा कम होने से शरीर में कमजोरी आने लगती है। गर्मी के मौसम में प्यास भी बहुत लगती है। तरबूज के सेवन से प्यास तो शांत होती ही है, साथ ही यह पोषक तत्वों एवं विभिन्न लवणों का अथाह भंडार होने के कारण शरीर के लिए आवश्यक लवणों की पूर्ति भी करता है।

तरबूज के सेवन से बेचैनी एवं घबराहट दूर होती है तथा भीषण गर्मी और धूप के प्रभाव के कारण उत्पन्न होने वाली खुश्की तथा इस वजह से उत्पन्न होने वाले अन्य दुष्प्रभाव भी दूर होते हैं। तरबूज खाने से आंतों को चिकनाई मिलती है और इससे आंतों की जलन भी मिटती है। कब्ज, पीलिया, बुखार, शारीरिक दाह, जोड़ों के दर्द, मसाने की पथरी, सूजाक (ल्यूकोरिया) आदि रोगों में तो तरबूज का सेवन बहुत लाभदायक है। शारीरिक एवं मानसिक श्रम करने वाले व्यक्तियों के लिए तो यह एक श्रेष्ठ टॉनिक का कार्य करता है क्योंकि इसके सेवन से शरीर को पर्याप्त ऊर्जा मिलती है।

तरबूज एक अच्छा मल शोधक फल है। इसके सेवन से पेट की गंदगी मल के जरिये निकलकर पेट साफ रहता है। तरबूज खून को साफ करता है और शरीर में रक्त की मात्रा में भी वृद्धि करता है। तरबूज में मौजूद विटामिन ए, बी व सी तथा आयरन खून के रंग को लाल सुर्ख बनाते हैं। तरबूज खाने से लू से बचाव होता है। इसके नियमित सेवन से नेत्रज्योति बढ़ती है। प्रतिदिन नियमित रूप से 2-3 गिलास तरबूज का रस पीने से गुर्दे की पथरी नष्ट हो जाती है। प्रतिदिन नियमित रूप से तरबूज के रस का सेवन करने से अनिद्र्रा, दिमागी गर्मी, हिस्टीरिया, पागलपन आदि रोगों में बहुत लाभ मिलता है।

तरबूज के नियमित सेवन से विभिन्न चर्म रोगों में बहुत फायदा होता है। गर्भवती महिलाओं द्वारा तरबूज के बीजों की गिरी को सौंफ तथा मिश्री के साथ मिलाकर खाने से गर्भस्थ शिशु का विकास और भी अच्छी तरह से होता है। कुछ देर के लिए सिर पर तरबूज का ठंडा गूदा रखने से सिरदर्द से राहत, मस्तिष्क को शीतलता और मानसिक शांति मिलती है।

सावधानियां

तरबूज का सेवन करते समय कुछ छोटी-छोटी बातों का विशेष तौर पर ध्यान रखें वरना जरा सी लापरवाही के चलते आपको तरबूज के सेवन से फायदे के बजाय स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का ही सामना करना पड़ सकता है। तरबूज का सेवन करते समय ये सावधानियां अवश्य बरतें:-

’ बाजार से तरबूज खरीदते समय इस बात का खास ध्यान रखें कि तरबूज बासी, कटा हुआ अथवा पिलपिला न हो।

’ दमे के मरीजों को तरबूज का सेवन नहीं करना चाहिए।

’ तरबूज खाने के तुरन्त बाद पानी, दूध अथवा दही का सेवन न करें क्योंकि इससे हैजे के संक्रमण का खतरा रहता है।

’ तरबूज का सेवन करने से कम से कम एक घंटा पहले इसे ठंडे पानी में डाल दें ताकि इसकी गर्मी निकल जाए। गर्म तरबूज का सेवन न करें।

’ घर में तरबूज काटकर रखते समय इसे ऐसे स्थान पर रखें, जहां इस पर मक्खियां न भिनकने पाएं।

’ काटकर ज्यादा समय तक रखे गए तरबूज का सेवन करने से बचें।

’ खाली पेट तरबूज का सेवन न करें।

’ भोजन के बाद तरबूज काटकर पिसी हुई काली मिर्च व काला नमक बुरककर ही इसका सेवन करें।

’ तरबूज का सेवन करने से कम से कम दो घंटा पहले और दो घंटे बाद तक चावल का सेवन न करें।

(यह लेख ‘मीडिया केयर नेटवर्क’ के डिस्पैच से लेकर यहां प्रकाशित किया गया है)

Monday, May 10, 2010

फिल्म विशेष : बॉलीवुड की रीयल लाइफ जोड़ियां रील लाइफ में फ्लॉप क्यों?

- एम. कृष्णाराव राज, - एम.सी.एन. ब्यूरो (मीडिया केयर नेटवर्क)

बॉलीवुड की रीयल लाइफ जोड़ियां रील लाइफ में जब एक साथ नजर आती हैं तो कुछ खास कमाल नहीं दिखा पाती, फिर वो चाहे जॉन अब्राहम और बिपाशा बसु की हॉट एंड सेक्सी जोड़ी हो या अजय देवगन और काजोल की स्वीट सी जोड़ी। आखिर ऐसी क्या वजह है कि रीयल लाइफ की हॉट एंड पॉपुलर जोड़ियां रील लाइफ में हिट नहीं हो पाती? मीडिया केयर ग्रुप की इस विशेष प्रस्तुति में आइए जानते हैं कि बॉलीवुड में रीयल लाइफ जोड़ियां रील लाइफ में क्यों होती हैं फ्लॉप?

दर्शक रीयल लाइफ जोड़ी को परदे पर साथ देखने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं लेते: जॉन अब्राहम

बिपाशा और मेरी जोड़ी को बॉलीवुड की सबसे हॉट एंड सेक्सी जोड़ी माना जाता है। बावजूद इसके काफी हद तक यह बात सच है कि हमारी साथ-साथ की गई फिल्में फ्लॉप रही, जैसे कि फिल्म ‘जिस्म’ ने भले ही बतौर एक्टर मुझे पहचान दी लेकिन यह फिल्म हिट नहीं हुई। ठीक उसी तरह हम दोनों की एक और फिल्म ‘गोल’ भी फ्लॉप रही। इसके पीछे खास वजह क्या है, यह तो मुझे पता नहीं लेकिन मुझे लगता है कि दर्शक रीयल लाइफ जोड़ी को परदे पर साथ देखने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं लेते।

मुझे इस बात में यकीन नहीं है: करीना कपूर

मुझे इस बात में यकीन नहीं है कि रीयल लाइफ जोड़ी जब परदे पर एक साथ नजर आती है तो वो फ्लॉप हो जाती है। अगर ऐसा होता तो शाहिद कपूर और मेरी फिल्म ‘जब वी मैट’ हिट नहीं होती। इस फिल्म के दौरान मैं और शाहिद साथ थे। ‘चुप चुपके’ भी मैंने शाहिद के साथ की थी, जो ठीक-ठाक चली थी। हालांकि सैफ अली खान के साथ मेरी फिल्म ‘टशन’ खास नहीं चली लेकिन ‘कुर्बान’ को पूरी फ्लॉप नहीं कहा जा सकता। मेरा मानना है कि किसी फिल्म के फ्लॉप होने की कई वजहें होती हैं। ऐसे में सिर्फ आर्टिस्ट्स को ही दोष देना गलत है।

रीयल लाइफ लवर परदे पर दर्शकों को बहुत ज्यादा अट्रैक्ट नहीं कर पाते: सलमान खान

मैं इस बात से एग्री नहीं करता कि रीयल लाइफ जोड़ी रील लाइफ में फ्लॉप साबित होती है। अगर ऐसा होता तो ‘हम दिल दे चुके सनम’ जैसी फिल्में हिट नहीं होती। अगर फिल्म की स्टोरी और डायरेक्शन अच्छा हो तो फिल्म जरूर हिट होती है। हालांकि मैं इस बात से एग्री करता हूं कि रीयल लाइफ लवर परदे पर दर्शकों को बहुत ज्यादा अट्रैक्ट नहीं कर पाते लेकिन अगर फिल्म अच्छी बनी है तो वो जरूर चलती है।

रीयल लाइफ जोड़ी रील लाइफ में हिट साबित नहीं हो पाती: काजोल

काफी हद तक यह बात सच है कि रीयल लाइफ जोड़ी रील लाइफ में हिट साबित नहीं हो पाती है, इसकी वजह शायद यही है कि दर्शक रीयल लाइफ जोड़ी को परदे पर बहुत ज्यादा पसंद नहीं करते। जिन फिल्मों में अजय और मैंने साथ काम किया, वो उतनी सफल नहीं हुई, जितनी कि हम दोनों की अलग-अलग की गई फिल्में जबकि एक आर्टिस्ट के तौर पर हमने अपनी जोड़ी वाली फिल्मों में भी पूरी मेहनत की थी, बावजूद इसके वो फिल्में नहीं चली।

मैं नहीं जानती कि हरमन और मेरी फिल्में फ्लॉप क्यों हुई: प्रियंका चोपड़ा

हरमन बावेजा के साथ मैंने फिल्म ‘लव स्टोरी 2050’ और ‘व्हाट्स योअर राशि’ में काम किया था लेकिन ये दोनों ही फिल्में बॉक्स ऑफिस पर नहीं चल सकी। हालांकि दोनों ही फिल्में काफी अच्छी बनी थी। दरअसल इसके पीछे खास वजह क्या है, यह मुझे नहीं पता। जहां तक हरमन और मेरी जोड़ी होने की वजह से ये फिल्में फ्लॉप होने का सवाल है तो मैं यही कहूंगी कि हम दोनों प्रेमी नहीं बल्कि अच्छे दोस्त हैं। ऐसे में हम सिर्फ रील लाइफ लवर हैं, इसलिए रीयल लाइफ जोड़ी होने के कारण हमारी फिल्में फ्लॉप हुई, यह कहना गलत होगा।

फिल्म अच्छी है तो वो हिट होती है वरना फ्लॉप हो जाती है: दीपिका पादुकोण

यह बात काफी हद तक सही है कि रीयल लाइफ जोड़ी की जो भी फिल्में रिलीज होती हैं, वे कई बार फ्लॉप हो जाती हैं लेकिन मेरी और रणबीर कपूर की फिल्म ‘बचना ऐ हसीनो’ फ्लॉप नहीं थी। इसी तरह ऐश्वर्या राय बच्चन और अभिषेक बच्चन की फिल्म गुरू’ ने भी अच्छा बिजनेस किया था। कहने का मतलब यह है कि अगर फिल्म अच्छी है तो वो हिट होती है वरना फ्लॉप हो जाती है। (एम सी एन)

(यह रचना ‘मीडिया केयर नेटवर्क’ के डिस्पैच से ली गई है)

हास-परिहास : मियां खटकरर्म का ‘पीस महल’!

- कपूत प्रतापगढ़ी (मीडिया केयर नेटवर्क)

सवेरे-सवेरे मियां खटकरर्म ने मेरे घर की कुंडी खड़कायी और बोले, ‘‘कपूत भाई, मैंने अपने इमामबाड़े का नाम बदलकर ‘पीस महल’ रख लिया है। आप तो जानते ही हैं कि मैं इन दिनों काफी तंगहाल हूं। इसलिए मैं इस पीस महल को किराये पर देना चाहता हूं। सुना है कि आपको भी मकान बदलना है, इसीलिए मैंने सोचा कि क्यों न आप से ही शुरूआत करूं।’’

मैंने पूछा, ‘‘लेकिन मियां, भला आपको कैसे पता चला कि हमें मकान बदलना है?’’

‘‘अरे मियां, हम सब कुछ जानकर भी चुप रहें, ये और बात है। ऐसा क्या है कि हमको तुम्हारी खबर न हो! आपके पड़ोसी झुट्ठन मिसिर जी बता रहे थे। मेरी मानिये तो आज ही चलकर कमरा देख लीजिए।’’ मियां खटकरर्म इतना कहकर एक लंबी सांस भरकर फिर बोले, ‘‘अजी वाह! क्या कमरे हैं हमारे इमामबाड़े के ... माफ कीजिएगा ‘पीस महल’ के, जहां हवा-पानी की मुफ्त व्यवस्था है।’’

मैंने कहा, ‘‘मियां, तशरीफ भी रखिएगा या बस यूं ही बड़बड़ाते रहिएगा?’’

‘‘क्यों नहीं, क्यों नहीं’’ कहते हुए मियां सोफे में धंस गए। मैंने पत्नी को चाय लाने को कहा और खुद कपड़े बदलने चला गया।

थोड़ी देर बाद हम उनके उस तथाकथित ‘पीसमहल’ के सामने थे। शायद यह इस शहर की सबसे पुरानी कोठी थी, जिसकी दीवारों पर चढ़ी काई ने इसे हरे रंग का बना दिया है। सामने बॉक्स पर कानफोडू आवाज में बज रही कव्वाली और बगल के पान की गुमटी से आ रही भोजपुरी गीत की आवाज और उस पर भी मुख्य द्वार पर ही खेल रहे लगभग 50 बच्चे, जैसे किसी स्कूल की छुट्टी हो गई हो।

उन सब को पार करते हुए मैं अभी अंदर दाखिल ही हुआ था कि एकाएक ‘धम्म’ की आवाज के साथ एक ईंट हमसे लगभग डेढ़ फुट की दूरी पर आ गिरी। वो तो भगवान का शुक्र था कि मैं पीछे खड़ा था वरना मेरी गंजी चांद में गड्ढ़ा हो गया होता।

मेरी घबराहट देख मियां खटकरर्म दांत निपोरते हुए बोले, ‘‘अमां, थोड़ा संभलकर चलना।’’

मेरा तो कलेजा ही उछल गया। खैर, मैं अपनी धड़कनों पर काबू पाने की कोशिश करता आगे बढ़ने लगा।

‘‘आइए आपको ऊपर का कमरा दिखा दूं, जहां आप सुकून से अपनी पढ़ाई-लिखाई कर सकें। आइए ... आइए ...।’’ कहकर वह खुद तो पीछे खड़े हो गए और मैंने जैसे ही सीढ़ी पर पैर रखा, वह उत्तर प्रदेश की सरकार की तरह बैठ गई। अब तो मेरा डर के मारे बुरा हाल हो गया। खैर, उनके बहुत कहने पर मैं डरता-डरता ऊपर पहुंचा।

उन्होंने अभी कमरे का दरवाजा खोला ही था कि लगभग चार दर्जन चूहे व तिलचट्टे पलक-पांवड़े बिछाए मिले। संयोग से उसी समय बारिश भी आ गई और हमें वहीं रूक जाना पड़ा।

अब आपसे क्या कहें, छत तो बस नाम की थी। एक बूंद पानी भी बाहर नहीं जा रहा था। उस पर उसमें जमी कालिख ने मेरे साथ-साथ मेरे कुर्ते का रंग भी ऐसा बिगाड़ा कि सूरत ही पहचान में नहीं आ रही थी। इतनी बेरहमी से तो कोई हमें होली पर भी नहीं रंगता है। हम वहीं रूके हुए बारिश के थमने का इंतजार कर रहे थे और हमारे घुटने के छह इंच नीचे तक पानी आ गया। इधर काले बादलों की वजह से थोड़ा और अंधेरा बढ़ा कि तब तक अचानक मेरा पूरा शरीर झनझना उठा। मैं कुछ समझ पाता, इससे पहले ही एक जोरदार झटका लगा। मैंने चीखते हुए कहा, ये क्या हो रहा है मियां?’’

‘‘वो मैं बत्ती जलाने की कोशिश कर रहा था। लगता है स्विच में करंट आ गया है।’’ दांत निापोरते हुए मियां खटकरर्म बोले।

इससे पहले कि वो कुछ और बोलते, मैं सीधा नीचे की तरफ चल पड़ा। अभी जीने पर ही था कि देखा लगभग चार सीढ़ियां पानी में पूरी डूब चुकी हैं और आंगन में लगभग कमर तक पानी जमा है तथा लगातार भरता ही जा रहा है।

मैं किसी तरह वहां से निकला। पीछे से मियां चिल्लाते रहे, ‘‘अरे कपूत भाई, क्या हुआ? अरे ये पसंद नहीं है तो दूसरा दिखाऊं?’’

लेकिन मेरी हिम्मत ही नहीं हुई कि पलटकर देख लूं। (एम सी एन)

(यह व्यंग्य ‘मीडिया केयर नेटवर्क’ के डिस्पैच से लिया गया है)

जीव-जंतुओं की अनोखी दुनिया-48-1

- योगेश कुमार गोयल (मीडिया केयर नेटवर्क)

स्तनधारी होने पर भी अण्डे देता है ‘एकिड्ना’

‘एकिड्ना’ साही जैसा एक कांटेदार प्राणी है लेकिन इसके कांटेदार शरीर के अलावा भी इसकी एक और बड़ी विशेषता यह है कि यह दुनियाभर में पाए जाने तमाम स्तनपायी प्रजाति के जीवों में से उन दो प्रजाति के जीवों में शामिल है, जो स्तनपायी होने के बावजूद अण्डे देते हैं। अण्डे देने वाले ये दोनों स्तनपायी जीव आस्ट्रेलिया के न्यू गिनी क्षेत्र में ही पाए जाते हैं। अण्डे देने वाले ये दोनों स्तनपायी जीव हैं:- प्लैटीपस तथा एकिड्ना। मादा एकिड्ना सालभर में सिर्फ एक ही अंडा देती है। यह अंडा उसके पेट पर बनी थैली में रहता है। जब नर और मादा एकिड्ना का शारीरिक मिलन होता है, उसी समय यह थैली मादा एकिड्ना के पेट पर बन जाती है और शिशु कई हफ्तों तक इसी थैली में रहकर थैली में बनी ग्रंथियों से रिसने वाला दूध पीकर बड़ा होता है। एक व्यस्क एकिड्ना की लम्बाई करीब एक फुट तक होती है जबकि उसका वजन 4 से 10 किलो के बीच होता है। चूंकि एकिड्ना का शरीर भी साही की ही भांति नुकीले कांटों से भरा होता है और यह अपनी लंबी तथा चिपचिपी जीभ से कीड़े-मकौड़े पकड़-पकड़कर खाता है, इसीलिए इसे ‘कंटीला कीटभक्षी’ भी कहा जाता है। (एम सी एन)

Thursday, May 06, 2010

केवल कसाब ही नहीं, देश के अमन-चैन के दुश्मन इन कुख्यात आतंकियों का यही हश्र होना चाहिए!


मुम्बई के शहीदों को सलाम! देश की अदालतों को सलाम!

Wednesday, May 05, 2010

बेटा! संवाददाता बन जा

व्यंग्य

- सुनील कुमार ‘सजल’

(मीडिया केयर नेटवर्क)

मुझ जैसे व्यक्ति की इतनी विशाल औकात नहीं है कि मैं रोजाना आठ-दस अखबार खरीदकर पढ़ सकूं मगर अखबार पढ़ने के मामले में मैं उस दिन खुद को खुशनसीब समझने लगा, जब मेरे छोटे से कस्बे में एक के बाद एक कई छोटे-बड़े अखबारों के संवाददाता, सह-न्यूज एजेंट पैदा हो गए। भगवान उनका भला करे! भले ही इन बेचारों की 20-25 प्रतियां ही बिक पाती हैं मगर उनकी शान के गले में ‘संवाददाता’ होने का तमगा अवश्य लटका रहता है।
अभी तक दफ्तर में बामुश्किल एक-दो अखबार ही आया करते थे लेकिन दो-चार दिन से देख रहा हूं कि दफ्तर में रोज 8-10 अखबार आने शुरू हो गए हैं। जो भी चौड़ी छाती वाला साहसी संवाददाता बन जाता है, वह अपना एक अखबार दफ्तर में फैंक जाता है, भले ही दफ्तर से उसे परमिशन न मिली हो। वैसे भी आजकल छोटे शहरों में संवाददाता वही बन पाता है (ज्यादातर मामलों में), जो उनका अखबार बेच पाता है। फिर संवाददाता होने का रूतबा दिखाना है तो अखबार तो अपने क्षेत्र में चलाना ही पड़ेगा।
दफ्तर में बढ़ती अखबारों की संख्या को लेकर एक दिन मैंने साहब से पूछ ही लिया, ‘‘सर ...! हर महीने दो-चार अखबार बढ़ते जा रहे हैं, इस तरह इनकी संख्या सरकारी आंकड़ों की तरह अब दस को पार कर गई है। क्या आपने अनुमति दे रखी है?’’
वे बोले, ‘‘मैं क्यों इतने सारे अखबार खरीदने की अनुमति देने चला?’’
‘‘फिर अपने पास इनको भुगतान करने के लिए इतनी राशि कहां है? कहो तो सबको एक तरफ से बंद करा दूं।’’ मैंने साहब के सामने खुद के उनका वफादार होने का उदाहरण पेश करते हुए कहा।
‘‘अरे नहीं यार! ऐसा मत करो। अपन भी तो पक्के रंगे सियार हैं। साल में जहां लाखों रुपये की शासकीय राशि की ऐसी-तैसी कर अपनी जेबें भर लेते हैं, उसमें से अगर इन्हें साल में 8-10 हजार रुपया भुगतान करना भी पड़ा तो क्या फर्क पड़ता है। कम से कम इन लोगों का मुंह तो बंद रहेगा न! अपनी ‘गबन क्रिया’ में ज्यादा दखलंदाजी तो नहीं करेंगे। अगर की तो अपने से थोड़ा-बहुत पाकर संतुष्ट हो जाएंगे और अनावश्यक मैटर अपने अखबार में नहीं छापेंगे। इसलिए मिस्टर, हमेशा ध्यान रखो कि साधे रास्ते चलते नाग को कभी नहीं छेड़ना चाहिए। दुनिया का उसूल है कि खुद सुखद पल जीना है तो दूसरों को भी अपने हिस्से में से थोड़ा सुख दो। कुछ समझे!’’
साहब ने हमें लंबे-चौड़े वृत्तांत के साथ ‘शासकीय नौकरी का दर्शन’ समझा दिया।
‘‘पर इतने सारे अखबार पढ़ेगा कौन? अगर इन्हें पढ़ने बैठ गए तो सरकारी कामकाज कौन निपटाएगा?’’ हमने पूछा।
‘‘तुम लोगों से कौन कह रहा है कि इन अखबारों को पढ़कर अपने माथे का दर्द बढ़ाओ। अगर तुम मुझसे ज्यादा परेशानी महसूस कर रहे हो तो एक काम करो, इन सब अखबारों को बटोर-बटोरकर अपने घर ले जाकर कड़ाके की सर्दी के दिनों में जलाकर अपने हाथ-पांव सेंक लिया करो।’’
हम समझ गए कि बेवजह की बहस से साहब का दिमाग गर्म हो रहा है। अतः हम उनसे बहस करने के बजाय स्वयं ‘शीत प्रकोप’ के प्रभाव में आकर शांत हो गए।
मैंने अपने जीवन में कई तरह के संवाददाता देखे हैं। एक तो वे, जो खुद तो लिख नहीं सकते मगर खबर लिखते हैं और खूब छपते हैं। उनका नाम होता है। ऐसे लोगों के पास बजबजाती नाली के पलते कीड़ों से लेकर पेड़ों से झरते पत्तों तक की खबर होती है। अखबार वाले भी इन्हें बड़े चाव से छापते हैं क्योंकि उनके पास कोई और धांसू खबर नहीं होती।
एक वे होते हैं, जो दूसरे अखबार की खबर अपने अखबार में छापने हेतु जेबकतरे की तरह खबरों का पोस्टमार्टम कर शान से छपवा देते हैं। बस, उन्हें उन खबरों को थोड़ा तोड़ने-मरोड़ने की जरूरत होती है। सो, इतना कर लेने में तो वे सिद्धहस्त होते हैं।
मेरे एक मित्र हैं, जो क्षेत्र के एक साप्ताहिक अखबार के संवाददाता हैं। वे खबरें ढूंढ़ने के लिए गली-गली में साइकिल या मोटरसाइकिल लेकर नहीं घूमते बल्कि शान से शरीर लहराते हुए दिन में चार बार पान की दुकान व चाय की दुकान में चाय-पान ग्रहण करने जाते हैं। वहां मौजूद लोगों के मुख से तरह-तरह की बातें सुनते हैं और फिर वहां से खबरें ‘कलेक्ट’ करके ले आते हैं। सप्ताह भर बाद वे ही खबरें उस साप्ताहिक में दिखाई दे जाती हैं।
कस्बे के संवाददाता बनवारीलाल जी, जो संवाददाता कम, अखबार विक्रेता ज्यादा हैं, उनसे हमने एक दिन कहा, ‘‘भाई जी, हमारे दफ्तर में आयोजित एक कार्यक्रम की खबर छपवा दो।’’
वे बोले, ‘‘काहे को छपवाने-खपवाने की बला हमारे सिर पर थोप रहे हो। जब अपनी धौंस से ही अखबार बिक रहा है तो बिना मतलब के कागज-कलम घिसकर हम अपना समय बर्बाद नहीं करना चाहते। अगर आप कह रहे हैं तो किसी और संवाददाता से आपको मिलवा देता हूं, वह छाप देगा।’’
कुछ संवाददाताओं को पत्रकारिता से ज्यादा अपनी गाड़ी पर ‘प्रैस’ लिखवाकर घूमने में ही रूचि होती है। उनके बोलने का, मिलने का अंदाज भी किसी राष्ट्रीय अखबार के संवाददाता की तरह ही होता है। इनकी संवादगिरी में पत्रकारिता से ज्यादा नेतागिरी की रूचि ज्यादा दिखाई देती है। कारण कि ये किसी न किसी पार्टी से जुड़े होते हैं। चंदा वसूली इनका मुख्य कर्त्तव्य होता है। अखबारनवीसी तो बचाव का मुखौटा होता है ताकि लोग कह सकें कि जनाब ये तो जनसेवक हैं।
पड़ोसी शहर में मेरे एक प्रतिष्ठित व्यापारी मित्र हैं। मैंने देखा कि कुछ महीनों से उन्हें भी संवाददाता बनने का चस्का लग गया है। वे भी आजकल खबरें लिखते हैं, खूब छपते हैं। एक दिन मैंने उनसे कहा, ‘‘अरे रघुवीर, तू सामान तोलते-तोलते संवाददाता कब से बन गया?’’
वह हंसते-हंसते बोला, ‘‘अबे, हमारी बुद्धि व्यापारी बुद्धि है। सारे नंबर दो के काम हम लोगों को करने पड़ते हैं। बच्चू, जब ऐसा काम कर रहे हैं तो एक ‘सुरक्षा कवच’ भी तो चाहिए न और वो कवच है किसी प्रतिष्ठित अखबार का संवाददाता बन जाना। वही हम कर रहे हैं।’’
उनकी बातें सुनकर हमें बोलना ही पड़ा, ‘‘वाकई गुरू तू तो बड़ा घण्टाल है।’’
एक शाम मेरे दसवीं फेल बेटे ने कहा, ‘‘पापा, मैं ऑटोमोबाइल रिपेयरिंग का काम सीखने शहर जा रहा हूं।’’
मैंने उसे समझाया, ‘‘बेवकूफ, ऑटोमोबाइल का काम सीखेगा! हाथ काले करेगा! कपड़े गंदे करेगा! अरे नालायक, तू किसी अखबार की एजेंसी लेकर उसका संवाददाता बन जा। दादागिरी करना तो तू जानता ही है। नेतागिरी के लिए किसी नेता के चरण पकड़ ले। रिपेयरिंग से कहीं ज्यादा तू रिपोर्टिंग में कमाएगा।’’
वह मेरा मुंह ऐसे ताक रहा था, जैसे मैं उसे बिना ‘मलेरिया प्रकोप’ के जबरदस्ती कुनैन की गोली निगलने के लिए मजबूर कर रहा हूं। शायद मेरी समझाइश या तो उसके भेजे में नहीं घुसी या उसे नागवार गुजरी। वह एक पल की देरी किए बिना मेरे सामने से ऐसे गायब हो गया, जैसे मौका पाकर बिल्ली के पंजे से चूहा। (एम सी एन)
(श्री सुनील कुमार ‘सजल’ प्रतिष्ठित व्यंग्यकार हैं तथा ‘मीडिया केयर नेटवर्क’ से जुड़े हैं)

Saturday, May 01, 2010

कैसा मज़दूर, कैसा दिवस? Web-Patrika Srijangatha

कैसा मज़दूर, कैसा दिवस? Web-Patrika Srijangatha

Star News Agency: अनूठा संग्रह है ‘जीव-जंतुओं की अनोखी दुनिया’

Star News Agency: अनूठा संग्रह है ‘जीव-जंतुओं की अनोखी दुनिया’

कैसा मजदूर, कैसा दिवस?

मजदूर दिवस (1 मई) पर विशेष


-- योगेश कुमार गोयल (मीडिया केयर नेटवर्क)

प्रतिवर्ष 1 मई का दिन ‘अंतर्राष्ट्रीय श्रम दिवस’ अथवा ‘मजदूर दिवस’ के रूप में मनाया जाता है, जिसे ‘मई दिवस’ भी कहा जाता है। मई दिवस समाज के उस वर्ग के नाम किया गया है, जिसके कंधों पर सही मायनों में विश्व की उन्नति का दारोमदार है। इसमें कोई दो राय नहीं कि किसी भी राष्ट्र की प्रगति एवं राष्ट्रीय हितों की पूर्ति का प्रमुख भार इसी वर्ग के कंधों पर होता है। यह मजदूर वर्ग ही है, जो हाड़-तोड़ मेहनत के बलबूते पर राष्ट्र के प्रगति चक्र को तेजी से घुमाता है लेकिन कर्म को ही पूजा समझने वाला श्रमिक वर्ग श्रम कल्याण सुविधाओं के लिए आज भी तरस रहा है।

मई दिवस के अवसर पर देशभर में बड़ी-बड़ी सभाएं होती हैं, बड़े-बड़े सेमीनार आयोजित किए जाते हैं, जिनमें मजदूरों के हितों की बड़ी-बड़ी योजनाएं बनती हैं और ढ़ेर सारे लुभावने वायदे किए जाते हैं, जिन्हें सुनकर एक बार तो यही लगता है कि मजदूरों के लिए अब कोई समस्या ही बाकी नहीं रहेगी। लोग इन खोखली घोषणाओं पर तालियां पीटकर अपने घर लौट जाते हैं किन्तु अगले ही दिन मजदूरों को पुनः उसी माहौल से रूबरू होना पड़ता है, फिर वही शोषण, अपमान व जिल्लत भरा तथा गुलामी जैसा जीवन जीने के लिए अभिशप्त होना पड़ता है।

बहुत से स्थानों पर तो ‘मजदूर दिवस’ पर भी मजदूरों को ‘कौल्हू के बैल’ की भांति काम करते देखा जा सकता है यानी जो दिन पूरी तरह से उन्हीं के नाम कर दिया गया है, उस दिन भी उन्हें दो पल का चैन नहीं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक ही है कि आखिर मनाया किसके लिए जाता है ‘मजदूर दिवस’? बेचारे मजदूरों की तो इस दिन भी काम करने के पीछे यही मजबूरी होती है कि यदि वे एक दिन भी काम नहीं करेंगे तो उनके घरों में चूल्हा कैसे जलेगा। बहुत से कारखानों के मालिक उनकी इन्हीं मजबूरियों का फायदा उठाकर उनका खून चूसते हैं और बदले में उनके श्रम का वाजिब दाम तक उन्हें उपलब्ध नहीं कराया जाता।

विड़म्बना ही है कि देश की स्वाधीनता के छह दशक बाद भी अनेक श्रम कानूनों को अस्तित्व में लाने के बावजूद हम आज तक ऐसी कोई व्यवस्था ही नहीं कर पाए हैं, जो मजदूरों को उनके श्रम का उचित मूल्य दिला सके। भले ही इस संबंध में कुछ कानून बने हैं पर वे सिर्फ ढ़ोल का पोल ही साबित हुए हैं। हालांकि इस संबंध में एक सच यह भी है कि अधिकांश मजदूर या तो अपने अधिकारों के प्रति अनभिज्ञ होते हैं या फिर वे अपने अधिकारों के लिए इस वजह से आवाज नहीं उठा पाते कि कहीं इससे नाराज होकर उनका मालिक उन्हें काम से ही निकाल दे और उनके परिवार के समक्ष भूखे मरने की नौबत आ जाए।

देश में हर वर्ष श्रमिकों को उनके श्रम के वाजिब मूल्य, उनकी सुविधाओं आदि के संबंध में दिशा-निर्देश जारी करने की परम्परा सी बन चुकी है। समय-समय पर मजदूरों के लिए नए सिरे से मापदंड निर्धारित किए जाते हैं लेकिन इनको क्रियान्वित करने की फुर्सत ही किसे है? यूं तो मजदूरों की समस्याओं को देखने, समझने और उन्हें दूर करने के लिए श्रम मंत्रालय भी अस्तित्व में है किन्तु श्रम मंत्रालय की भूमिका भी संतोषजनक नहीं रही। कितनी हैरत की बात है कि एक ओर तो सरकार द्वारा सरकारी अथवा गैर-सरकारी किसी भी क्षेत्र में काम करने पर मजदूरों को मिलने वाली न्यूनतम मजदूरी तय करने की घोषणाएं जोर-शोर से की जाती हैं, वहीं देशभर में करीब 36 करोड़ श्रमिकों में से 34 करोड़ से अधिक को सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी भी नहीं मिल पा रही। यह अफसोस का ही विषय है कि निरन्तर महंगाई बढ़ने के बावजूद आजादी के 61 साल बाद भी मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी ‘गुजारे लायक’ भी नहीं हो पाई है।

देश का शायद ही ऐसा कोई हिस्सा हो, जहां मजदूरों का खुलेआम शोषण न होता हो। आज भी स्वतंत्र भारत में बंधुआ मजदूरों की बहुत बड़ी तादाद है। कोई ऐसे मजदूरों से पूछकर देखे कि उनके लिए देश की आजादी के क्या मायने हैं? जिन्हें अपनी मर्जी से अपना जीवन जीने का ही अधिकार न हो, जो दिनभर की हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी अपने परिवार का पेट भरने में सक्षम न हो पाते हों, उनके लिए क्या आजादी और क्या गुलामी? सबसे बदतर स्थिति तो बाल एवं महिला श्रमिकों की है। बच्चों व महिला श्रमिकों का आर्थिक रूप से तो शोषण होता ही है, उनका शारीरिक रूप से भी जमकर शोषण किया जाता है लेकिन अपना और अपने बच्चों का पेट भरने के लिए चुपचाप सब कुछ सहते रहना इन बेचारों की जैसे नियति ही बन जाती है!

जहां तक मजदूरों द्वारा अपने अधिकारों की मांग का सवाल है तो मजदूरों के संगठित क्षेत्र द्वारा ऐसी मांगों पर उन्हें अक्सर कारखानों के मालिकों की मनमानी और तालाबंदी का शिकार होना पड़ता है और सरकार कारखानों के मालिकों के मनमाने रवैये पर कभी भी कोई लगाम लगाने की चेष्टा इसलिए नहीं करती क्योंकि चुनाव का दौर गुजरने के बाद उसे मजदूरों से तो कुछ मिलने वाला होता नहीं, हां, चुनाव फंड के नाम पर सब राजनीतिक दलों को मोटी-मोटी थैलियां कारखानों के इन्हीं मालिकों से ही मिलनी होती हैं।

जहां तक मजदूर संगठनों के नेताओं द्वारा मजदूरों के हित में आवाज उठाने की बात है तो आज के दौर में अधिकांश ट्रेड यूनियनों के नेता भी भ्रष्ट राजनीतिक तंत्र का हिस्सा बने हैं, जो विभिन्न मंचों पर श्रमिकों के हितों के नाम पर गला फाड़ते नजर आते हैं लेकिन अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति हेतु कारखानों के मालिकों से सांठगांठ कर अपने ही मजदूर भाईयों के हितों पर कुल्हाड़ी चलाने में संकोच नहीं करते। देश में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के फैलते जाल से भारतीय उद्योगों के अस्तित्व पर वैसे ही संकट मंडरा रहा है और ऐसे में मजदूरों के लिए रोजी-रोटी की तलाश का संकट और भी विकराल होता जा रहा है।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं तीन फीचर एजेंसियों के समूह ‘मीडिया केयर ग्रुप’ के प्रधान सम्पादक हैं)

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