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Wednesday, January 26, 2011

दैनिक पंजाब केसरी में ‘मीडिया केयर ग्रुप’ का आलेख

फॉर्मूलों को तोड़ती हिन्दी फिल्में


प्रस्तुति: मीडिया केयर नेटवर्क ब्यूरो

हिन्दी फिल्में अभी तक अमूमन ‘रामायण’ को ही ध्यान में रखकर बनती थी। इस धार्मिक ग्रंथ के प्रति हमारे यहां के लोगों में खास श्रद्धा है। जनमानस की इसी श्रद्धा को भुनाने की गरज से हिन्दी फिल्मों के लेखकों ने प्रायः ऐसी कहानियां लिखी, जिनमें हीरो को आधुनिक राम और विलेन को रावण के रूप में चित्रित किया गया। कहानी में रोमांस डालने की चाहत में उन्होंने हीरोइन को सीता जैसी पत्नी बनाने के पहले आदर्श प्रेमिका के रूप में प्रस्तुत किया, जो अपने भावी जीवनसाथी के हर सुख-दुख की भागीदार बनी।

समय बदला और फिर ऐसी भी कहानियां लिखी गई, जिनमें एक ही हीरोइन के पीछे दो हीरो मजनूं बने नजर आए या फिर एक नायक को पाने के लिए दो-दो नायिकाएं लैला बनी दिखी लेकिन इन सभी फिल्मों में एक बात जो कॉमन थी, वो थी फिल्म का सुखांत होना। तीन घंटे की फिल्म में हीरो-हीरोइन को भले ही तमाम मुसीबतों का सामना करना पड़ा हो मगर दि एंड के पांच मिनट पहले ही संकेत मिल जाता था कि अब इनके मिलन को कोई नहीं रोक पाएगा।

हमारा फिल्मोद्योग यूं ‘महाभारत’ से भी ज्यादा प्रभावित नहीं रहा मगर एक जैसे क्लाइमैक्स से ऊबे दर्शकों की नब्ज टटोलने की कोशिश हुई तो लेखकों व पिल्मकारों की नजर हॉलीवुड की फिल्मों पर पड़ी। फिर क्या था, जाने-माने तमाम लेखकों और फिल्मकारों ने ‘प्रेरणा’ कहकर उन फिल्मों की रीमेक बनानी शुरू कर दी।

भारत की आबादी का बड़ा हिस्सा आज भी गांवों में बसता है, ऐसे गांवों में भी, जहां टी.वी. और बिजली की बात आज भी अनोखी लगती है। ऐसे लोग भला हॉलीवुड के बारे में क्या जानें! इसीलिए इन फिल्मों ने ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले दर्शकों को तो रोमांचित किया मगर इन्हें पहले ही थिएटर या डीवीडी अथवा वीसीडी घर मंगाकर देख चुके शहरी दर्शकों ने नकार दिया। अब एक बार फिर परिवर्तन की मांग महसूस की जाने लगी। धार्मिक हो या काल्पनिक, ऐतिहासिक अथवा पौराणिक, वही नायक, नायिका और विलेन की कहानी देख-देखकर दर्शक तंग आ गए थे। बेशक भारतीय दर्शकों की रूचि को ध्यान में रखते हुए हिन्दी फिल्मों में एक से बढ़कर एक श्रवणीय गीत रखे जाते थे। रोमांटिक, सैड, भक्ति, देशभक्ति आदि से सराबोर गीत लेकिन एक समय वह भी आया, जब ये गीत भी दर्शकों को फिल्मों की ओर लुभाने में असफल होने लगे।

आवश्यकता आविष्कार की जननी है। अपनी फिल्म को चलाने के लिए उस फार्मूले का आविष्कार जरूरी हो गया, जो दर्शकों की नई चाहत को पूरा कर सके। ऐसे में हिन्दी फिल्मों के वर्चस्व को बचाने का जिम्मा एक बार फिर उन्हीं लेखकों के सिर पर आ पड़ा, जो फिल्मी दुनिया में आज भी सबसे ज्यादा उपेक्षित हैं। इस चुनौती को भी लेखकों ने स्वीकार किया और दौर चला फार्मूला तोड़ने वाली फिल्मों का।

बरसों बरस पुरानी हमारी भारतीय संस्कृति में ऐसी कहानियां घटित नहीं हुई होंगी, यह कहना तो मुश्किल है लेकिन ‘राज’ की सफलता ने इंडस्ट्री को एक नया फार्मूला दिया। इस फिल्म में भगवान के साथ शैतान के भी होने की बात कही गई थी। चूंकि फिल्म ने अच्छा व्यवसाय किया, इसलिए माना गया कि ‘राज’ की सफलता की वजह फिल्म के मधुर गाने थे लेकिन रामगोपाल वर्मा ने अपनी फिल्म ‘भूत’ को हिट करके इस धारणा को गलत साबित कर दिया कि फिल्म सिर्फ गाने के ही दम पर सफल हो सकती है। ‘भूत’ में एक भी गाना नहीं था, हां एक पढ़े लिखे युवक का भूत के अस्तित्व को नकारना और उसी की पत्नी की भूत में मान्यता जैसे नए फार्मूले ने ‘भूत’ को हिट कराने में कोई कसर नहीं छोड़ी। यह बात और है कि रामू का नया फार्मूला ‘डरना मना है’ में काम नहीं आया। इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और ‘एक हसीना थी’ के बाद ‘अब तक छप्पन’ जैसी फार्मूला तोड़ती फिल्में ला चुके हैं। इसी श्रेणी में पूजा भट्ट की ‘पाप’ भी थी, जिसमें भट्ट कैंप की पहचान बन चुके सैक्स की चाशनी भरपूर थी।

गौरतलब है कि अंडरवर्ल्ड पर पहले भी कई फिल्में आई हैं मगर ‘वैसा भी होता है पार्ट-2’ में कहानी के साथ किए गए प्रयोग को लीक से हटकर माना गया। यह सच है कि राजकुमार संतोषी कभी लकीर के फकीर नहीं बने। उन्होंने अपनी हर फिल्म में पारम्परिक फार्मूले को तोड़ने की कोशिश की, बेशक इस प्रयास में ‘लज्जा’ और ‘चाइना गेट’ फ्लॉप हो गई। ‘चाइना गेट’ में दस बुजुर्ग जहां एक विलेन के खिलाफ एकजुट होकर लड़ते हैं, वहीं ‘लज्जा’ में नारी जाति पर किए जाने वाले उत्पीड़न का बड़ा मार्मिक चित्रण था। संतोषी ने फार्मूला तब भी तोड़ा था लेकिन यही प्रयोग जब उन्होंने ‘चाइना गेट’ में किया, तब उर्मिला मातोंडकर के ‘छम्मा छम्मा’ से ज्यादा दर्शकों को कुछ अच्छा नहीं लगा था।

असल में भारतीय दर्शकों को नया देखने की चाहत तो जरूर रहती है पर नई कहानी में भी वे पैतृक पसंद को नजरअंदाज नहीं कर पाते। ‘मि. एंड मिसेज अय्यर’, ‘पैसा वसूल’, ‘झंकार बीट्स’, ‘जॉगर्स पार्क’, ‘धूप’, ‘मुम्बई मैटिनी’ आदि की असफलता से यह बात माननी ही पड़ती है। जातीय दंगों में फंसे एक पुरूष को एक परायी महिला द्वारा बचाने की कहानी को दर्शाती ‘मि. एंड मिसेज अय्यर’ हो या ‘धूप’ में ससुर द्वारा अपनी विधवा बहू की वेदना को समझने का प्रयास, दर्शकों को पसंद नहीं आया।

‘मुम्बई मैटिनी’ में एक बिंदास लड़की जब किसी युवक के संग शारीरिक सम्पर्क बनाकर साबित करना चाहती है कि वह नामर्द नहीं है, तब भी शहरों की इस आम बात को दर्शक पचा नहीं पाए। यहां तक कि इसी युवक राहुल बोस की ‘चमेली’ भी पिट गई जबकि इसके प्रोमो से ही करीना कपूर ने लोगों की नींदें उड़ा दी थी। ऐसे में ‘कोई मिल गया’ की जबरदस्त सफलता के बारे में आश्चर्य करना स्वाभाविक था, जिसमें राकेश रोशन ने एक अविश्वसनीय कहानी को भारतीयता का जामा पहनाया था। इसमें उन्होंने मधुर गानों का सहारा तो लिया ही, मां-बेटे के सीन में इमोशन उड़ेलकर दर्शकों की कमजोर नस को भी छुआ।

जाहिर है कि फार्मूला तोड़ती फिल्मों की लाइन अभी लंबी है मगर समय रहते समझना जरूरी है कि पूर्व में प्रदर्शित ऐसी तमाम फिल्में बॉक्स ऑफिस पर दम भी तोड़ चुकी हैं। उल्लेखनीय है कि बरसों से एक ही प्रकार के भोजन का शौकीन कोई भी भारतीय यदि एक जगह से दूसरी जगह जाता है तो वहां का स्थानीय भोजन वह हजम नहीं कर पाता। यही बात हिन्दी फिल्मों पर भी लागू होती है। चटनी की तरह कम मात्रा में बदला फार्मूला तो स्वीकार्य हो सकता है किन्तु नए फार्मूले के नाम पर भोजन रूपी पूरी फिल्म को ही भारतीय संस्कृति से दूर दर्शाना बुद्धिमानी नहीं है। आखिर हिन्दी फिल्मों के दर्शक अपनी जमीन तो नहीं छोड़ सकते न! (एम सी एन)

स्कूल में गुंडागर्दी किया करती थी प्रियंका चोपड़ा


प्रस्तुति: मीडिया केयर नेटवर्क ब्यूरो


अंदाज

मैं सफेद पायजामा और चिकन का टॉप पहनना पसंद करती हूं। चूड़ीदार सूट, छोटा कुर्ता और बंद गले के वस्त्र पसंद करती हूं। आमतौर पर रिलेक्स होने के लिए मैं जीन्स पहनती हूं। पार्टियों में जाने के समय मैं ठीक से कपड़े पहनती हूं। मुम्बई का मौसम ऐसा रहता है कि आप कई तरह के वस्त्र पहन सकते हैं। मेरे पसंदीदा रंग महरून, लेवेंडर, काला और सफेद हैं।

खानपान

मुझे खाना काफी पसंद है। अक्सर मैं अपने परिवार के साथ जुहू स्थित ‘तिआन’ रेस्तरां में जाती हूं। इसके अलावा कई और रेस्तरां भी मुझे पसंद हैं। मेरा भाई भी वहां जाना पसंद करता है। मैं उसके साथ सभी जगह जाना पसंद करती हूं। मैं पक्की मांसाहारी हूं। केवल सोमवार यानी शिवजी के दिन ही मैं शाकाहारी खाना पसंद करती हूं। नहीं तो रायता के साथ हैदराबादी बिरयानी खाना मुझे पसंद है। मुझे घी के साथ खिचड़ी खाना भी पसंद है। मेरे घर में दही के साथ आलू परांठा भी खूब खाया जाता है। नाश्ते में मैं एक अंडा और दो स्लाइस टोस्ट लेती हूं और इसके साथ एक गिलास दूध भी लेती हूं। मैं इस तरह खाती हूं कि कोई यकीन नहीं करेगा। मैं प्रतिदिन 4 घंटे नृत्य करती हूं, इसलिए फिल्मों में डांस करना मेरे लिए आसान हो गया। मेरे गुरूजी पंडित वीरू प्रसाद हैं।

गाड़ी

मेरे पास लैसर गाड़ी है। मुझे अच्छी कारें काफी पसंद हैं। मैं ड्राइव नहीं कर सकती। सन्नी देओल की कार में घूमना मुझे पसंद है। मुझे बाइक बहुत पसंद हैं मगर ‘मिस इंडिया’ प्रतियोगिता के थोड़े दिन पहले बाइक से ही मेरा एक्सीडेंट हो गया था। मुझे अक्षय कुमार की बाइक बहुत पसंद है, जिसे उसने फिल्म ‘तलाश’ में इस्तेमाल किया था। वैसे मैं अपने स्कूल में थोड़ी बहुत गुंडागर्दी कर लिया करती थी।

पुरूष

मुझे संवेदनशील और भावुक मर्द पसंद हैं। रोमांटिक स्वभाव वाले मर्द मुझे पसंद हैं, जो उपहार के लेन-देन में विश्वास करते हों, कैंडल नाइट डिनर में जिनकी रूचि हो और जो लंबी ड्राइव पर जाते हों। मुझे फूल बहुत पसंद हैं। जो मर्द कविता लिखते हैं, वे मुझे पसंद हैं। मैं गुलजार साहब की शायरी पसंद करती हूं। विदेशी शायरों में शेली मेरे पसंदीदा हैं। मुझे लगता है कि बुरे लोग भी मजेदार और दिलचस्प होते हैं। ब्रॉड पिट एक बुरा आदमी है मगर मैं उससे दोस्ती करना चाहूंगी।

खेल

क्रिकेट और बॉस्केटबाल मेरे पसंदीदा खेल हैं। क्रिकेट तो मुझे खासतौर पर पसंद है। जब मैं फिल्म ‘किस्मत’ की शूटिंग कर रही थी तो मेरा स्पॉट ब्वाय मेरी वैन के ऊपर एंटीना पकड़े खड़ा था ताकि मैं मैच देख सकूं। मैं देशभक्त भी हूं। भारतीय टीम अच्छा खेल रही है या खराब, यह मेरे लिए मायने नहीं रखता बल्कि मैं सभी मैच देखती हूं। स्कूल के दिनों में मैं लड़कों के साथ बॉस्केटबाल खेला करती थी। मैं छोटे और तंग कपड़े पहनती थी, जिससे वे परेशान हो जाते थे। कई बार तो वे मेरे साथ खेलने से ही इन्कार कर देते थे। बाद में मैं स्कूल में अमेरिकन फुटबाल खेलने लगी।

संगीत

संगीत और नृत्य मेरी जिंदगी के अहम हिस्से हैं। मैं आशा भोंसले और मोहम्मद रफी के पुराने गाने काफी पसंद करती रही हूं। मैंने संगीत से जुड़े काफी डी.वी.डी. संग्रहित किए हैं। पश्चिमी क्लासिकल में भी मैंने प्रशिक्षण लिया है। 4 साल मैं अमेरिका में थी और वहां सोपार्नो का प्रशिक्षण लिया। फिल्म ‘साथिया’ का टाइटल गीत मेरा पसंदीदा गीत है। संगीत के अलावा फिल्में भी मुझे पसंद हैं। जो फिल्म मुझे पसंद आती है, उसे मैं दोबारा देखती हूं। कभी मैं अपना म्यूजिक एलबम भी बनाऊंगी।

स्टार

मुझे करिश्मा कपूर का तौर तरीका बहुत पसंद रहा है। वह खास मौके के लिए ड्रैस पहनती हैं। सही समय के लिए सही कपड़े का चुनाव करती हैं। वे खूबसूरत और आत्मविश्वास से भरी लगती हैं। शाहरूख खान भी बहुत अच्छे ढ़ंग से कपड़े पहनते हैं। अमिताभ बच्चन जी भी ढ़ंग के कपड़े पहने नजर आते हैं।

व्यक्तित्व

मैं एक सामान्य व्यक्ति हूं और जितना मिल जाए, उतने में ही खुश रहती हूं। मैं कोई बहुत बड़ा बंगला नहीं चाहती। अगर मैं अपने परिवार को खुश रख पा रही हूं तो मेरे लिए यही काफी है। मुझे अपनी खुशी के लिए भारी भरकम चीजें नहीं चाहिएं। मेरे पास मेरा अपना मोबाइल, संगीत और नृत्य है। मैं अपने परिवार को शॉपिंग करते जाना देखना पसंद करती हूं। मेरे पास अच्छी नींद के लिए एक बिस्तर है। इतने से ही मैं खुश हूं। (एम सी एन)

सूर्य की तेज रोशनी आंखों के लिए नुकसानदायक

बॉलीवुड हलचल

गोल्डन टिप्स फॉर ब्यूटी केयर

कैसे बना भारत का संविधान?


-- योगेश कुमार गोयल --

’ सर्वप्रथम सन् 1895 में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने यह मांग की थी कि अंग्रेजों के अधीनस्थ भारतवर्ष का संविधान स्वयं भारतीयों द्वारा ही बनाया जाना चाहिए लेकिन तिलक के सहयोगियों द्वारा भारत के लिए स्वराज्य विधेयक के प्रारूप को, जिसमें पहली बार भारत के लिए स्वतंत्र संविधान सभा के गठन की मांग की गई थी, ब्रिटिश सरकार द्वारा ठुकरा दिया गया था।

’ 1922 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने मांग की थी कि भारत का राजनैतिक भाग्य भारतीय स्वयं बनाएंगे। 1924 में पं. मोतीलाल नेहरू ने संविधान सभा के गठन की फिर मांग की लेकिन अंग्रेजों द्वारा उनकी मांग को भी ठुकरा दिया गया। तब से संविधान सभा के गठन की मांग लगातार उठती रही लेकिन अंग्रेजों द्वारा इसे हर बार ठुकराया जाता रहा।

’ 1939 में कांग्रेस अधिवेशन में एक प्रस्ताव पारित किया गया, जिसमें कहा गया कि स्वतंत्र देश के संविधान के निर्माण के लिए संविधान सभा ही एकमात्र उपाय है और अंततः 1940 में ब्रिटिश सरकार ने इस मांग को मान लिया कि भारत का संविधान भारत के लोगों द्वारा ही बनाया जाए।

’ 1942 में क्रिप्स कमीशन ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें कहा गया कि भारत में निर्वाचित संविधान सभा का गठन किया जाएगा, जो भारत का संविधान तैयार करेगी।

’ संविधान सभा 9 दिसम्बर 1946 को सच्चिदानंद सिन्हा की अध्यक्षता में पहली बार समवेत हुई थी लेकिन मुस्लिम लीग ने अलग पाकिस्तान बनाने की मांग को लेकर इस बैठक का बहिष्कार किया।

’ 11 दिसम्बर 1946 को हुई संविधान सभा की बैठक में डा. राजेन्द्र प्रसाद को संविधान सभा का अध्यक्ष चुना गया और वे संविधान के निर्माण का कार्य पूरा होने तक इस पद पर रहे।

’ 14 अगस्त 1947 को भारत डोमिनियन की प्रभुत्ता सम्पन्न संविधान सभा पुनः समवेत हुई और 29 अगस्त 1947 को स्वतंत्र भारत में संविधान सभा द्वारा संविधान निर्मात्री समिति का गठन किया गया, जिसका अध्यक्ष सर्वसम्मति से डा. भीमराव अम्बेडकर को बनाया गया।

’ संविधान प्रारूप समिति की बैठकें 114 दिन तक चली।

’ संविधान के निर्माण में 2 वर्ष 11 माह 18 दिन का समय लगा।

’ संविधान के निर्माण कार्य पर कुल 63 लाख 96 हजार 729 रुपये का खर्च आया।

’ संविधान के निर्माण कार्य में कुल 7635 सूचनाओं पर चर्चा की गई।

’ 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू होने के बाद से अब तक हुए अनेक संशोधनों के बाद भारतीय संविधान में 440 से भी अधिक अनुच्छेद व 12 परिशिष्ट हो चुके हैं।

Thursday, January 20, 2011

लेखकों के लिए पुस्तक प्रकाशन की विशेष सुविधा


लेखक बंधु उत्तम क्वालिटी में सस्ती दरों पर अपनी पुस्तकें प्रकाशित कराने हेतु सम्पर्क कर सकते हैं.

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कैसे बनें एक अच्छी ब्यूटीशियन?

बाल कहानी: बाबा बिलास की चतुराई

अनोखी दुनिया जीव-जंतुओं की

सम्मानजनक एवं शानदार कैरियर ‘होटल मैनेजमेंट’

Tuesday, January 18, 2011

पुस्तक प्रकाशन की विशेष सुविधा

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लेखक बंधु उत्तम क्वालिटी में सस्ती दरों पर अपनी पुस्तकें प्रकाशित कराने हेतु भी अब हमसे सम्पर्क कर सकते हैं.

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जब जाएं परीक्षा देने

दिल के लिए फायदेमंद चॉकलेट

कोई शेर नहीं है ‘समुद्री लॉयन’

कैंसर के इलाज में फल-सब्जियों के रंगों की उपयोगिता


दैनिक पंजाब केसरी (पंजाब) में
‘मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स’ द्वारा 15.01.2011 को प्रकाशित

हम क्यों झपकाते हैं पलकें?


दैनिक पंजाब केसरी (पंजाब) में
‘मीडिया केयर नेटवर्क’ द्वारा 15.01.2011 को प्रकाशित

Monday, January 10, 2011

खुशियों का त्यौहार ‘लोहड़ी’


‘मीडिया केयर नेटवर्क’ द्वारा
दैनिक पंजाब केसरी (पंजाब) में 10.01.11 को प्रकाशित

Thursday, January 06, 2011

सावधान! आपके कपड़ों में तो नहीं झांक रहा कोई ‘इन्फ्रारेड कैमरा’

घोंसला बनाने वाली मछली

सर्दियों में बनें ‘हुस्न परी’

ताकि आपकी त्वचा मुस्कराए सौम्यता के साथ

लीजिए आनंद बॉलीवुड गपशप का






ये सभी बॉलीवुड गॉसिप्स
विभिन्न समाचारपत्रों में
‘मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स’
के माध्यम से प्रकाशित हुई हैं.

ऐसे पाएं इंटरव्यू में सफलता


‘मीडिया केयर नेटवर्क’ द्वारा ‘हमारा महानगर’ में प्रकाशित

जीव-जंतुओं की अनोखी दुनिया


‘मीडिया केयर नेटवर्क’ द्वारा ‘हमारा महानगर’ में प्रकाशित

साइंस की दुनिया


‘मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स’ द्वारा ‘हमारा महानगर’ में प्रकाशित

नोट गिनते समय क्यों करते हैं उंगली गीली?


‘मीडिया केयर नेटवर्क’ द्वारा ‘हमारा महानगर’ में प्रकाशित

सर्दियों को बनाएं खुशनुमा

क्या आप करेंगे ऐसे अंधविश्वासों का समर्थन?

Saturday, January 01, 2011

नव वर्ष मंगलमय हो





नव वर्ष 2011 आपके तथा आपके परिवार के लिए मंगलमय हो. ईश्वर से यही कामना है कि यह वर्ष आपके लिए खुशियों की सौगात लेकर आए तथा नित सफलता के नए द्वार खोले.

समय बहुमूल्य है, अतः एक-एक पल का सदुपयोग सार्थक कार्यों में करें.