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Saturday, July 31, 2010

मानें या न मानें यह सच है


 
प्रस्तुति: योगेश कुमार गोयल

अंधी होकर चुकाई शोध की कीमत

मैडम मैरी क्यूरी और सर पायरे क्यूरी ने 20वीं सदी के आरंभ में रेडियोधर्मी तत्वों की खोज आरंभ की थी और अंततः विज्ञान की दुनिया में नया कारनामा करने के लिए मैडम क्यूरी ने अपनी जान दांव पर लगा दी। यूरेनियम और पिचवलेंड के पृथकीकरण के लिए अवशेष बनाने हेतु उन्होंने विभिन्न रसायनों का प्रयोग किया। इस दम्पत्ति ने पोलोनियम और रेडियम नामक दो तत्वों को अलग किया परन्तु चूंकि रेडियोधर्मी तत्व काफी हानिकारक होते हैं, अतः लंबे समय तक इस प्रकार के तत्वों के समीप रहने के कारण मैडम क्यूरी अंधी हो गई और कई रोगों से ग्रस्त भी हो गई। 1920 में श्वेत रक्तता (ल्यूकेमिया) के कारण उसकी मृत्यु हो गई। रेडियोधर्मिता के कारण ही उसे यह रोग हुआ था।

रस्सी पर चलकर पार किया न्यागरा जल प्रपात

30 जून 1859 को 35 साल की उम्र में एक फ्रांसीसी नट जां फ्रॉन्स्वा ग्रैवेल ने हजारों दर्शकों की उपस्थिति में न्यागरा जल प्रपात पर बंधी करीब 1100 मीटर लंबी रस्सी पर चलकर इस जल प्रपात को पार करके एक हैरतअंगेज करतब दिखाया था। रस्सी नदी के आर-पार 50 फुट की ऊंचाई पर बांधी गई थी और इसे पार करने में उसे कुल 20 मिनट लगे थे। जां फ्रॉन्स्वा को ‘ब्लौंदे’ भी कहा जाता था। वह एक पेशेवर नट का बेटा था और मात्र 5 साल की उम्र से ही उसने अपने पिता से तरह-तरह के करतब सीखने शुरू कर दिए थे। न्यागरा के आरपार बंधी रस्सी पर चलने का तो वह इस कदर अभ्यस्त हो गया था, जैसे वह रस्सी पर शाम की हवाखोरी कर रहा हो। रस्सी पर चलते हुए ही वह तमाम तरह के स्टंट भी करता, जैसे आंखों पर पट्टी बांधकर या अपने दोनों पांव बोरी में डालकर अथवा गेडी (स्टिल्ट) पर चढ़कर चलना, हाथगाड़ी चलाना इत्यादि। यही नहीं, रस्सी पर खड़े-खड़े ही वह आमलेट भी पका लेता था। एक बार तो जां फ्रॉन्स्वा ने अपने प्रदर्शन व्यवस्थापक हैरी कॉल्ककॉर्ड को ही अपनी पीठ पर लादकर रस्सी पार की थी। इस हैरतअंगेज प्रदर्शन के बाद कॉल्डकॉर्क का कहना था कि प्रदर्शन के दौरान पूरे समय उसका दिल बुरी तरह से धक-धक करता रहा था क्योंकि जां फ्रॉन्स्वा इस दौरान कुल 6 बार अपना संतुलन खो बैठा था लेकिन हर बार वह संभल गया। 72 वर्ष की उम्र में जां फ्रॉन्स्वा की मृत्यु हुई थी मगर कोई खतरनाक स्टंट दिखाते हुए नहीं बल्कि चारपाई पर लेटे-लेटे।

गुस्सा शांत करना है तो हथौड़े से पीट-पीटकर कारें चपटी करें

अगर आप बेहद गुस्से में हैं और अपना गुस्सा शांत करना चाहते हैं तो एक हथौड़ा उठाइए और पीट-पीटकर कारों को चपटी कर दीजिए। जी नहीं, हम आपके साथ कोई मजाक नहीं कर रहे बल्कि आप वाकई कारों पर अपना गुस्सा निकालकर अपना क्रोध शांत कर सकते हैं। हां, अगर कार आपकी न हुई तो आपको किसी दूसरे की कार का हुलिया बिगाड़ने पर कोर्ट के चक्कर तो लगाने ही पड़ सकते हैं और कार अगर आपकी ही हुई तो आपको इससे काफी बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है लेकिन अगर आपको इन दोनों ही स्थितियों से छुटकारा मिल जाए तो! यानी कार न तो आपकी हो और न ही किसी दूसरे की कार पर अपना गुस्सा निकालने पर आपको कोर्ट के धक्के खाने पड़े तो कहना ही क्या!

जर्मनी में बर्लिन के ‘ऑटोप्रेस टेम्पलहॉफ’ में आप वाकई ऐसा कर सकते हैं, जिसके लिए आपको मात्र दो डॉलर खर्च करने होंगे। दरअसल यह बेकार कारों के पुर्जों को दोबारा इस्तेमाल करने वाला कारखाना है और यहां ऐसी व्यवस्था की गई है कि आप दो डॉलर चुकाकर एक घंटे में एक कार को चपटी कर अपना गुस्सा ठंडा कर सकते हैं।

अब कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटने से बेहतर तो यही है ना कि दो डॉलर में ही अपना गुस्सा शांत कर लिया जाए। वैसे इस कारखाने के मालिकों का कहना है कि इन अनोखी योजना से उनके व्यवसाय का ग्राफ तेजी से ऊपर चढ़ता जा रहा है।

कैसा है लंदन का विंडसर राजमहल?

विंडसर राजमहल लंदन के पश्चिम में करीब 34 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। पिछली नौ शताब्दियों से यह इंग्लैंड के राजाओं का निवास स्थान है, जिसका निर्माण 11वीं शताब्दी में लकड़ी के किले के रूप में किया गया था और अगली शताब्दी में पत्थर से इसका पुनर्निमाण किया गया था। बाद में सन् 1820 तक इस महल में समय-समय पर बहुत कुछ जोड़ा जाता रहा और इसकी संरचना में काफी कुछ परिवर्तन भी किए गए लेकिन 1820 के बाद से इसमें कोई विशेष परिवर्तन नहीं किया गया है। इस राजमहल के निर्माण का उद्देश्य मध्यकालीन शाही शानोशौकत का प्रभाव पैदा करना था। विंडसर राजमहल के चारों ओर एक सुरक्षात्मक दीवार है। वर्तमान महारानी एलिजाबेथ द्वितीय का निजी निवास पूर्व की ओर है। राजमहल में अनेक प्रकार के खजाने, प्रसिद्ध चित्रकारियां, फर्नीचर, हीरे-जवाहरात और ऐतिहासिक महत्व की वस्तुएं हैं। प्रवेश द्वार के समीप एक गुड़ियाघर है, जिसमें दुनियाभर से एकत्रित की गई अनेक सुंदर गुड़िया रखी गई हैं। गुड़ियाघर के पास गेस्ट रूम तथा स्टेट अपार्टमेंट है। बहुत से राजाओं और रानियों को इस राजमहल में दफनाया जा चुका है और कब्रों पर सुंदर शाही मकबरे बनाए गए हैं। (मीडिया केयर नेटवर्क)

जीव-जंतुओं की अनोखी दुनिया


 
प्रस्तुति: योगेश कुमार गोयल

ताजे पानी में रेंगने वाला जानवर है ‘घड़ियाल’

घड़ियाल ताजे पानी में रेंगने वाला एक ऐसा समुद्री जानवर है, जो रेंगने वाले सर्वाधिक प्राचीनतम जानवरों में से एक है। माना जाता है कि घड़ियाल की प्रजाति करीब 70 लाख वर्ष पुरानी है। ये भारतीय उपमहाद्वीप में पाए जाते हैं। इनकी संख्या निरन्तर घटती जा रही है, जिससे इस प्रजाति के लुप्त होने का खतरा बरकरार है। घड़ियाल का सिर भोजन तलने वाले बर्तन जैसा और इसका थुथुन बेडौल होता है। हालांकि घड़ियाल प्रकृति के अन्य जीवों के लिए खतरनाक होते हैं लेकिन वर्तमान में तो ये खुद अपने अस्तित्व के संकट से ही जूझ रहे हैं। (मीडिया केयर नेटवर्क)

पेड़ों पर सिर के बल लटककर जीवन गुजारते हैं ‘स्लोथ’

दक्षिण अमेरिका में ‘स्लोथ’ नामक स्तनपायी जीवों का एक ऐसा वंश पाया जाता है, जिसके सदस्य अपना अधिकांश जीवन पेड़ों पर सिर के बल लटककर ही गुजारते हैं। स्लोथ की मुख्यतः दो प्रजातियां होती हैं, ‘उनाऊ’ तथा ‘आई’। ये जीव अपने पंजों और उंगलियों के मुड़े हुए नाखूनों की मदद से उल्टा चलने में समर्थ होते हैं। स्लोथ पेड़ की चोटी से नीचे की ओर धीमी गति से चलते हैं और सोते समय इनकी मांसपेशियां तनकर स्थिर हो जाती हैं, जो तब तक ढ़ीली नहीं होती, जब तक कि वे स्वयं ऐसा न करना चाहें। इन जीवों की पूंछ नहीं होती। (मीडिया केयर नेटवर्क)

विषैली समुद्री परी

‘समुद्री परी’ समुद्र में रहने वाला एक ऐसा प्राणी है, जिसके साफ-सुथरे खोखले कवक अक्सर समुद्री किनारों पर देखे जा सकते हैं। जीवित अवस्था में इस प्राणी का कवकयुक्त शरीर चिमटे के आकार के अंगों से ढ़का रहता है, जिसकी सहायता से यह किसी भी वस्तु को बड़ी आसानी से पकड़ सकता है। समुद्री परी नामक इस समुद्री प्राणी के शरीर पर नुकीली रीढ़ की हड्डियों के पुंज होते हैं। ये रीढ़ की हड्डियां इसके चलने, खाद्य पदार्थ ग्रहण करने, स्वयं की रक्षा करने और खुदाई करने में इसकी सहायता करती हैं। इनमें से कुछ रीढ़ की हड्डियां विषैली भी होती हैं, जो किसी भी जीव के सम्पर्क में आने पर उसकी त्वचा में घुसकर अंदर ही टूट जाती हैं, जिससे बहुत भयंकर पीड़ा होती है और त्वचा पर अत्यधिक जलन का अहसास होता है। (मीडिया केयर नेटवर्क)

धीमी गति से उड़ने वाला शिकारी पक्षी ‘मार्श हैरियर’

‘मार्श हैरियर’ नामक पक्षी धीमी गति से उड़ने वाला एक ऐसा शिकारी पक्षी है, जो कुछ देर तक अपने पंख फड़फड़ाने के बाद अपने पंखों को खड़ा करके धीमी गति से उड़ान भरने लगता है। ‘मार्श हैरियर’ भ्रमणशील पक्षी हैं, जो प्रायः फरवरी-मार्च के दौरान यूरोप चले जाते हैं और शीत ऋतु में वापस एशिया और अफ्रीका लौट आते हैं। इनके चेहरे का विशिष्ट रूप इनके बड़े-बड़े कानों को ढ़के रहता है, जो शिकार पकड़ने में इनके लिए काफी सहायक सिद्ध होते हैं।

जिस समय मार्श हैरियर शानदार लय में उड़ान भरते हैं, उस समय नर अपनी रंगदार छाया प्रदर्शित करते हैं जबकि मादा उनसे मिलने के लिए मुड़ती है। ये पक्षी सरीसृप, मेंढ़क तथा छोटे स्तनधारी जीवों को अपना भोजन बनाते हैं। अधिकतर नर पक्षी द्वारा ही शिकार किया जाता है और उड़ान भरते समय मादा हैरियर को नर द्वारा ही भोजन का हस्तांतरण किया जाता है। जिस समय नर पक्षी मादा को भोजन का हस्तांतरण करता है, उस समय का दृश्य बड़ा मनोरम होता है। मादा हैरियर का प्रसव काल अक्सर मार्च-अप्रैल के बीच ही होता है। मादा हैरियर द्वारा उष्मायन क्रिया भी तभी की जाती है, जब नर हैरियर उसे नियमित भोजन उपलब्ध कराता रहे। (मीडिया केयर नेटवर्क)

चीते जैसी फुर्ती वाला जीव ‘बे लिंक्स’

दक्षिणी अमेरिका के वन्य इलाकों में पाया जाने वाला ‘बे लिंक्स’ गुफाओं, खोहों और पेड़ों को ही अपना आवास बनाता है। यह जीव स्वभाव से शेर के समान ही खूंखार होता है। हालांकि यह औसतन मात्र 75 सेंटीमीटर तक ही लंबा जीव है, जो शेर के आकार की तुलना में बहुत ही कम है। बे लिंक्स वृक्षों पर चढ़ने में माहिर होते हैं और अपने शिकार पर चीते की भांति बड़ी फुर्ती से झपटते हैं। बे लिंक्स के चेहरे पर गहरी धारियां होती हैं तथा इसके कान एक खास अंदाज में खड़े होते हैं। इसके बाल पीले धूसर रंग के होते हैं और इसकी पूंछ छोटी होती है। अपनी ग्रहणशीलता और आहार की विविधता के कारण इसने जंगल कम होने और कृषि भूमि का विस्तार होने के बावजूद भूमि पर अपना अस्तित्व बरकरार रखा है। ‘स्लोथ’ नामक यह जीव तीतर, चकोर, छोटे स्तनधारियों तथा अन्य छोटे जीवों को अपना शिकार बनाता है। यह अकेला अथवा अपनी मादा एवं बच्चों के साथ रहता है। मादा बे लिंक्स गर्भ धारण करने के बाद प्रायः 40 दिनों की अवधि के पश्चात् एक बार में दो या तीन बच्चों को जन्म देती है। (मीडिया केयर नेटवर्क)

Saturday, July 17, 2010

आफत बना मोबाइल


बढ़ते खतरे मोबाइल फोन के


--- योगेश कुमार गोयल ---
पिछले कुछ वर्षों में दुनिया भर में मोबाइल फोन (सेलफोन) का उपयोग आश्चर्यजनक रूप से बहुत तेजी से बढ़ा है। कुछ साल पहले तक मोबाइल फोन रखना जहां स्टेटस सिंबल की निशानी था, वहीं अब कामकाजी लोग हों या कालेज अथवा स्कूल के छात्र-छात्राएं, यहां तक कि रिक्शा चालक और भिखारी भी, हर कोई मोबाइल फोन पर बातें करता दिखाई पड़ता है। कहना गलत न होगा कि मोबाइल फोन आज हमारा चौबीसों घंटे का साथी बनता जा रहा है। दरअसल आए दिन मोबाइल फोन की बढ़ती खूबियों ने इसे इतना उपयोगी बना दिया है कि एक पल के लिए भी इसके बिना रह पाना अब असंभव सा प्रतीत होने लगा है लेकिन इसके साथ-साथ यह भी सच है कि मोबाइल फोन से स्वास्थ्य संबंधी खतरे भी बढ़ते जा रहे हैं और यही वजह है कि मोबाइल फोन से होने वाले स्वास्थ्य संबंधी दुष्प्रभावों पर पिछले कुछ वर्षों से बहस छिड़ी है।

दरअसल बड़ी-बड़ी कम्पनियां भी अपने प्रोड्क्ट्स बाजार में लांच करते समय उनकी खूबियां तो खूब बढ़ा-चढ़ाकर बताती हैं पर उनके साइड इफैक्ट्स को न सिर्फ बड़ी चालाकी से छिपा लिया जाता है बल्कि अगर किसी अनुसंधान अथवा अध्ययन के जरिये उन खामियों को उजागर करने की कोशिश भी की जाए तो उन अनुसंधानों को ही झुठलाने की कवायद शुरू हो जाती है। बिल्कुल यही आलम पिछले कुछ वर्षों से मोबाइल फोन इंडस्ट्री में भी देखा गया है। संभवतः यही वजह है कि मोबाइल फोन के विकिरण और मानव स्वास्थ्य के बीच का संबंध अभी तक पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हो पाया है लेकिन इस संबंध में अब तक जितने भी शोध हुए हैं, उन सभी से यही निष्कर्ष सामने आया है कि मानव स्वास्थ्य पर मोबाइल से निकलने वाले विकिरण का काफी बुरा प्रभाव पड़ता है। यहां तक कि इस विकिरण से मोबाइल फोन के उपयोगकर्ता को सिर व गले का कैंसर होने तक की संभावना भी बरकरार रहती हैं।

मानसिक अस्थिरता एवं याद्दाश्त से संबंध

मोबाइल फोन के भीतर एक शक्तिशाली ट्रांसमीटर लगा होता है, जिसमें से माइक्रोवेव विकिरण निकलता रहता है, जिसका असर मोबाइल फोन के उपयोग की समय सीमा के अनुसार दिनोंदिन मानव शरीर की कार्यप्रणालियों पर पड़ता रहता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि मोबाइल फोन से व्यक्ति की मानसिक अस्थिता एवं याद्दाश्त का घनिष्ठ संबंध है। दरअसल मोबाइल फोन से एक प्रकार की विद्युतीय चुम्बकीय शक्ति प्रवाहित होती रहती है, जो व्यक्ति की एकाग्रता भंग करने में अहम भूमिका निभाती है। इस संबंध में कुछ समय पूर्व वाशिंगटन वि.वि. के माइक्रोवेव रेडिएशन विशेषज्ञ डा. हेनरी लॉर्ड द्वारा किए अनुसंधान के काफी चौंका देने वाले नतीजे सामने आए थे। डा. लॉर्ड के अनुसार उन्होंने मोबाइल से निकलने वाले रेडिएशन का चूहों पर प्रयोग किया तो देखा कि चूहों पर इसका बहुत गहरा असर होता है। डा. लॉर्ड के अनुसार उन्होंने करीब 45 मिनट तक चूहों पर कम स्तर की किरणों का प्रयोग करने पर पाया कि इससे याद्दाश्त तथा मस्तिष्क के तंतु तो प्रभावित होते ही हैं, ध्यान केन्द्रित करने में भी बाधा उत्पन्न हो जाती है। डा. लॉर्ड के अनुसार मोबाइल के लंबे समय तक उपयोग से मस्तिष्क के तंतुओं पर सीधा प्रभाव पड़ता है और इसका दुष्प्रभाव कैंसर में भी परिणत हो सकता है।

मोबाइल फोन का विकिरण

मोबाइल फोन के विकिरण की सबसे ज्यादा मात्रा इसके एंटीना के आसपास ही होती है और विशेषज्ञों का मानना है कि विकिरण का करीब 60 फीसदी भाग मोबाइल का उपयोग करने वाले व्यक्ति के सिर द्वारा ग्रहण कर लिया जाता है। कुछ अनुसंधानकर्ताओं का तो यह भी कहना है कि मोबाइल से होने वाला विकिरण कई बार तो मस्तिष्क के एक इंच भीतर तक मार करता है और विकिरण की किरणें सिर के आसपास के हिस्से को भेदती रहती हैं। हालांकि कुछ लोगों की धारणा है कि इंटरनल एंटीना वाले मोबाइल फोन सुरक्षित हैं किन्तु इस बारे में भी अनुसंधानकर्ताओं का कहना है कि इंटरनल एंटीना से भी बहुत ज्यादा विकिरण होता है। चूंकि मोबाइल के एंटीना के इर्द-गिर्द ही विकिरण की मात्रा सर्वाधिक होती है, अतः विशेषज्ञों द्वारा अब ऐसे सुरक्षित मोबाइल सेटों की मांग की जाने लगी है, जिनके एंटीना नीचे की तरफ हों ताकि विकिरण का प्रभाव मस्तिष्क तथा सिर पर कम से कम पड़ सके।

मोबाइल फोन के विकिरण का स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव

मोबाइल फोन के इस्तेमाल से स्वास्थ्य संबंधी खतरे किस कदर बढ़ रहे हैं, इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि कुछ समय पूर्व ब्रिटेन के स्कूलों में छात्रों द्वारा स्कूल में मोबाइल फोन लाए जाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। प्रतिबंध लगाए जाने की प्रमुख वजह थी कि इसके इस्तेमाल से कम उम्र के बच्चों को भी मस्तिष्क ट्यूमर हो सकता है लेकिन अब यह समस्या सिर्फ बच्चों की ही समस्या नहीं रह गई है बल्कि बड़े भी इससे अछूते नहीं रहे हैं। मोबाइल के उपयोग से मानव शरीर की कोशिकाओं की क्रियाशीलता में परिवर्तन होता है, जिससे स्वास्थ्य संबंधी विभिन्न समस्याएं सामने आती हैं। थकान, सिरदर्द, चक्कर आना, त्वचा में झनझनाहट, खिंचाव व जलन होना मोबाइल के विकिरण से होने वाले सामान्य दुष्प्रभाव हैं जबकि स्वीडन में हुए एक अध्ययन में बताया गया है कि मोबाइल फोन का ज्यादा उपयोग करने वाले व्यक्तियों को ब्रेन ट्यूमर होने का खतरा सामान्य व्यक्ति की तुलना में ढ़ाई गुना अधिक होता है। इसी प्रकार एक जर्मन अध्ययन के अनुसार मोबाइल के उपयोग से रक्तचाप भी बढ़ता है और कई बार तो यह इस स्थिति तक पहुंच जाता है कि उपयोगकर्ता को हार्ट अटैक भी हो सकता है।

एक अध्ययन के अनुसार मोबाइल फोन का प्रतिदिन दिन में चार या अधिक बार इस्तेमाल करने वालों को इस प्रकार की समस्याओं का सामना अधिक करना पड़ता है। दरअसल यह तथ्य जगजाहिर है कि विद्युत चुम्बकीय विकिरण का तरह-तरह के कैंसर तथा अन्य खतरनाक बीमारियों से सीधा संबंध माना जाता रहा है और इस विकिरण का सर्वाधिक प्रभाव शरीर के ऐसे हिस्सों पर पड़ता है, जहां ब्लड सर्कुलेशन कम से कम हो। इसकी वजह यह होती है कि रक्त प्रवाह न्यूनतम होने के कारण उस अंग में समाई हुई गर्मी बाहर नहीं निकल पाती। इस गर्माहट का स्तर इन विद्युत चुम्बकीय तरंगों की आवृत्ति तथा शरीर के संबंधित अंग अथवा उत्तक के प्रकार पर निर्भर करता है।

जीएसएम हैंडसेट प्रयोग करने वाले 18 से 45 वर्ष आयु वर्ग के लोगों पर अध्ययन करने के बाद पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीच्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (पीजीआईएमईआर) के आटोलेरिंगोलाजी विभाग (नाक, कान, आंख विभाग) के प्रमुख डा. नरेश पांडा का कहना है कि जो लोग चार साल से ज्यादा अवधि और तीस मिनट प्रतिदिन से ज्यादा समय तक मोबाइल फोन का प्रयोग करते हैं, वे अपनी सुनने की शक्ति खो सकते हैं। ईएनटी स्पेशलिस्ट डा. नरेश पांडा के मुताबिक सुनने की शक्ति उसी कान की अधिक खत्म होती है, जिसका उपयोग मोबाइल पर बात करने के लिए अक्सर किया जाता है।

डा. पांडा बताते हैं कि अगर कान भरा-भरा लगता हो, गर्म लगता हो और अजीबोगरीब आवाजें सुनाई देती हों तो यह आपके लिए बुरा संकेत है और इसे हल्के से नहीं लेना चाहिए। उनका कहना है कि मोबाइल पर किए गए इस अध्ययन का उद्देश्य यह पता लगाना था कि अगर लंबे समय तक मोबाइल फोन का उपयोग किया जाता है तो श्रवण शक्ति तथा केन्द्रीय ऑडिटरी पाथ-वे पर इसका कोई असर होता है या नहीं।

स्वीडन की लुंड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार मोबाइल का अधिक उपयोग व्यक्ति को समय से पहले बूढ़ा और जर्जर बना सकता है। शोधकर्ताओं के अनुसार मोबाइल से निकलने वाली माइक्रोवेव्स मस्तिष्क की कोशिकाओं पर घातक असर डालकर व्यक्ति को बुढ़ापे की ओर धकेलती हैं। स्वीडिश शोधकर्ता हालांकि यह दावा भी करते हैं कि मोबाइल फोन से निकलने वाली चुम्बकीय तरंगें इतनी अधिक प्रभावशाली नहीं होती कि इनकी वजह से दिमागी कैंसर उत्पन्न हो जाए पर साथ ही वो यह भी कहते हैं कि आने वाले समय में संचार उपकरण इतने बढ़ जाएंगे कि दुनिया का कोई भी हिस्सा इन सूक्ष्म तरंगों की पहुंच से बाहर नहीं होगा अर्थात् पूरी दुनिया सूक्ष्म तरंगों (माइक्रोवेव्स) के अथाह समुद्र में घिर जाएगी। शोधकर्ताओं का कहना है कि उन्होंने 15 वर्षों तक हर एंगल से निरन्तर शोध करने के पश्चात् ही यह निष्कर्ष निकाला है। स्वीडन में ही करीब 750 लोगों पर किए गए एक अन्य अध्ययन में यह भी पता चला है कि लगातार 10 वर्षों तक मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते रहने से कानों में ट्यूमर होने का खतरा भी अपेक्षाकृत चार गुना तक बढ़ जाता है।

मोबाइल के विकिरण के मानव स्वास्थ्य पर पड़ते दुष्प्रभावों के मद्देनजर कुछ समय से वैज्ञानिकों द्वारा यह मांग की जाने लगी है कि सेल्युलर कम्पनियों के लिए यह अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए कि वे अपने सेटों पर विकिरण की दर संबंधी लेबल अवश्य लगाएं। बताया जाता है कि कुछ देशों में मोबाइल फोन निर्माताओं ने मोबाइल फोन धारक द्वारा सोखे जाने वाले विकिरण को नापने के लिए नए अंतर्राष्ट्रीय मानक स्वीकार करने के बाद विकिरण की दर (स्पेसिफिक एबसोपर््शन रेट) का लेबल हैंडसेटों पर लगाना शुरू भी कर दिया है लेकिन भारत में सरकारी सजगता के अभाव में हैंडसेटों पर विकिरण की दर अंकित किए जाने की दिशा में कोई पहल नहीं की गई है।

डी. एन. ए. क्षतिग्रस्त कर रहे हैं मोबाइल

यूरोप में किए गए एक शोध में बताया गया है कि मोबाइल से निकलने वाली हानिकारक तरंगें डी एन ए को भी क्षतिग्रस्त करती हैं। 7 यूरोपीय देशों में 12 शोध समूहों द्वारा लगातार 4 वर्षों तक किए गए शोध के बाद वैज्ञानिकों ने यह निष्कर्ष निकाला है। गौरतलब है कि डीएनए (डीऑक्सी राइबोस न्यूक्लिक एसिड) का शरीर में बिल्कुल वही महत्व होता है, जो किसी इमारत में लगी ईंटों का होता है। शोधकर्ता बताते हैं कि डीएनए मॉलीक्यूल जैसा ही दिखता है, जैसे किसी सीढ़ी को मोड़कर रख दिया जाए। शरीर चलाने वाली इस मशीन में जब कोई खराबी आती है तो या तो कोशिका मर जाती है या अनियंत्रित व्यवहार करने लगती है। डीएनए की मरम्मत करने की जिम्मेदारी उसके ऊपरी आवरण अर्थात् कोशिका की होती है लेकिन कभी-कभी लगातार प्रहार होते रहने के कारण इसकी मरम्मत संभव नहीं हो पाती।

शोधकर्ताओं ने मोबाइल फोन से निकलने वाले इलैक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन का प्रयोग इंसानों और जानवरों की कोशिकाओं पर किया तो डीएनए में टूटन और क्षति नोटिस की गई। शोधकर्ताओं का कहना है कि मोबाइल फोन का अत्यधिक इस्तेमाल मानव कोशिका में छिपे डीएनए के असामान्य व्यवहार का कारण बनता है। डीएनए के क्षतिग्रस्त होने या टूटने से विभिन्न प्रकार के कैलरस ट्यूमर पैदा होने का खतरा बन जाता है, जो निरन्तर बढ़ते रहते हैं।

ब्रेन ट्यूमर होने पर मोबाइल कम्पनियों पर हर्जाने के मुकद्दमे

मोबाइल फोन के इस्तेमाल से ब्रेन ट्यूमर होने के पश्चात् हर साल विदेशों में कुछ लोगों द्वारा मोबाइल फोन बनाने वाली कम्पनियों के खिलाफ करोड़ों डॉलर हर्जाने के मुकद्दमे दर्ज कराए जा रहे हैं। कुछ वर्ष पूर्व अमेरिका के एक न्यूरोलॉजिस्ट ने भी यह कहते हुए मोबाइल सेट बनाने वाली एक कम्पनी के खिलाफ 80 करोड़ डॉलर हर्जाने का ऐसा ही एक मुकद्दमा ठोंक दिया था कि कम्पनी ने अपने उत्पाद के दुष्प्रभावों के बारे में अपने ग्राहकों को उचित जानकारी नहीं दी। दरअसल 45 वर्षीय डा. क्रिस्टोफर न्यूमैन नामक इस न्यूरोलॉजिस्ट को 1992 से 1998 तक काम के दौरान मोबाइल फोन का लगातार इस्तेमाल करने से ब्रेन ट्यूमर हो गया था। डा. क्रिस्टोफर ने मोटरोला सहित कुल 8 दूरसंचार कम्पनियों पर बाल्टीमोर में मुकद्दमा दायर करते हुए कम्पनी पर आरोप लगाया था कि कम्पनी अपने उपभोक्ताओं को यह बताने में विफल रही है कि उसका सेलफोन उच्च आवृत्ति की रेडियो तरंगें पैदा करता है, जिससे कैंसर तथा अन्य खतरनाक बीमारियां हो सकती हैं। डा. क्रिस्टोफर का कहना था कि अगर उन्हें सेलफोन के इन घातक दुष्प्रभावों के बारे में पता होता तो वे इसका उपयोग ही नहीं करते।

बच्चों पर मोबाइल फोन का दुष्प्रभाव

विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों को मोबाइल फोन से यथासंभव दूर रखने में ही हमारी भलाई है क्योंकि इससे निकलने वाली तरंगों से बच्चों को अपेक्षाकृत अधिक नुकसान होने की संभावना रहती है। प्रमुख शोधकर्ता सर विलियम स्टीवर्ट का कहना है कि विशेष परिस्थितियों में ही बच्चों को मोबाइल फोन देना चाहिए। एक अनुमान के अनुसार ब्रिटेन में ही 7-10 वर्ष आयु के 25 फीसदी बच्चे मोबाइल फोन का उपयोग करते हैं।

ब्रिटेन के स्वास्थ्य विभाग द्वारा कराए गए एक शोध के अनुसार 16 वर्ष से कम आयु के जो बच्चे मोबाइल फोन का ज्यादा उपयोग करते हैं, उन्हें मिर्गी होने का खतरा काफी बढ़ जाता है। इसके अलावा उनमें सिरदर्द, याद्दाश्त में कमी तथा नींद न आने जैसी कई अन्य शिकायतें भी हो सकती हैं। शोध करने वाली टीम के प्रमुख सदस्य डा. गेरार्ड हायलैंड के अनुसार मोबाइल फोन से कम आवृत्ति की किरणें निकलती हैं, जिन्हें ‘नॉन थर्मल रेडिएशन’ भी कहा जाता है। ये किरणें धीरे-धीरे मनुष्य की कोशिकाओं के स्वरूप को बदल देती हैं। बच्चों के लिए ये ज्यादा खतरनाक होती हैं क्योंकि बच्चों का इम्यून सिस्टम (प्रतिरक्षा तंत्र) पूर्ण रूप से विकसित नहीं हो पाता है। डा. हायलैंड के अनुसार मोबाइल फोन से निकलने वाली माइक्रोवेव्स का कोशिकाओं पर उसी प्रकार प्रभाव पड़ता है, जिस प्रकार रेडियो की तरंगों में व्यवधान आने पर प्रसारण गड़बड़ा जाता है। ये किरणें कोशिकाओं की मजबूती तथा उनकी वृद्धि पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं।

वाहन दुर्घटनाओं में मोबाइल फोन की भूमिका

आमतौर पर यह माना जाता रहा है कि वाहन चलाते समय चालक द्वारा मोबाइल पर बात करने के लिए मोबाइल फोन पकड़ने की वजह से ही उसका संतुलन गड़बड़ा जाता है और दुर्घटना होने की संभावना बढ़ जाती है किन्तु रोहड आईलैंड यूनिवर्सिटी द्वारा किए गए अनुसंधान में इस तर्क को पूर्णतया खारिज करते हुए कहा गया है कि मोबाइल फोन पर बात करते समय चालक के ‘व्यू टनर विजन’ का क्षेत्र संकुचित हो जाता है और इससे उसकी नजर बाधित होती है।

इंडस्ट्रियल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर मनबीर सोढ़ी तथा मनोविज्ञान के प्रोफेसर जैरे कोहेन द्वारा किए गए इस अनुसंधान के दौरान उन्होंने वालंटियर ड्राइवरों को ‘आई ट्रेकिंग डिवाइस’ लगाई, जिसे सिर पर हेलमेट या ईयरफोन की तरह पहना जा सकता है। उसके बाद अनुसंधानकर्ताओं ने पाया कि कोई भी ऐसा कार्य करते समय, जिससे दिमाग पर जोर पड़ता हो, चालक की अलर्टनेस कम हो जाती है। प्रो. सोढ़ी के अनुसार सेलफोन पर बात करने के कुछ समय बाद भी चालक की अलर्टनेस वापस नहीं आती क्योंकि उसके बाद वह फोन पर की गई उस बातचीत के बारे में देर तक सोचता रहता है। प्रो. सोढ़ी के अनुसार सेलफोन पकड़ने के कारण चालक का संतुलन बिगड़ने से दुर्घटना नहीं होती बल्कि दुर्घटना की वजह वास्तव में संतुलन का बिगड़ना न होकर एकाग्रता का भंग होना है, जो सेलफोन पर बातचीत करने के कारण भंग होती है।

कैसे होता है मोबाइल फोन से कैंसर?

आस्ट्रेलिया की सिडनी यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने अपने लंबे अध्ययन के बाद बताया है कि मोबाइल फोन के उपयोग से कोशिकाओं में तनाव बढ़ता है और वे ‘हीट शॉक प्रोटीन’ छोड़ती हैं। मानव कोशिकाएं प्रायः चोट लगने अथवा संक्रमण होने की दशा में ही प्रतिक्रिया स्वरूप यह प्रोटीन छोड़ती हैं। अतः स्पष्ट है कि जब मोबाइल फोन के उपयोग से बार-बार कोशिकाएं ‘हीट शॉक प्रोटीन’ छोड़ती हैं तो इससे कोशिकाओं का सामान्य नियमन प्रभावित होता है और परिणामस्वरूप कैंसर विकसित होने लगता है। इस संबंध में सेंट विंसेट अस्पताल के इम्यूनोलॉजी रिसर्च सेंटर के प्रधान वैज्ञानिक अधिकारी डा. पीटर फ्रैंच का कहना है कि प्रोटीन में अचानक हलचल होना हालांकि शरीर का प्राकृतिक बचाव है किन्तु लंबे समय तक इसके सक्रिय रहने से कैंसर बनता है और उसके बाद उपचार करने पर भी कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं होती। डा. फ्रैंच के सहयोगी प्रो. रॉन पेनी का कहना है कि यह पहले ही सिद्ध हो चुका है कि मोबाइल फोन से निकले कम मात्रा के विकिरण भी मानव उत्तकों को प्रभावित करते हैं। वह कहते हैं कि ‘हीट शॉक’ प्रतिक्रिया के जरूरत से ज्यादा सक्रिय हो जाने से शरीर का कोशिकाओं की अनियंत्रित वृद्धि पर नियंत्रण नहीं रह जाता, इस कारण मोबाइल फोन के विकिरण की वजह से कैंसर होने की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता।
- योगेश कुमार गोयल

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, तीन पुस्तकों के लेखक, तीन समाचार-फीचर एजेंसियों के प्रधान सम्पादक एवं स्तंभकार हैं)

उर्मिला को है सपनों के राजकुमार की तलाश



उर्मिला भले ही आज भी अपनी फिल्मों में धमाकेदार आइटम करके दर्शकों को अपना दीवाना बनने पर मजबूर करने की सामर्थ्य और सैक्स अपील रखती हों पर अब उर्मिला ने शादी करके घर बसाने का फैसला कर लिया है। रामगोपाल वर्मा की फिल्म ‘रंगीला’ में अपने जलवों की बदौलत रातों-रात बॉलीवुड की हॉट क्वीन बनने और सफलता की बुलंदियों को छूने वाली उर्मिला ने रामू की ही बहुचर्चित फिल्म ‘रामगोपाल वर्मा की आग’ में ‘महबूबा महबूबा’ नामक गाने पर डांस करते हुए अपने हुस्न का ऐसा कहर बरपाया कि दर्शकों के होश उड़ाने के लिए यह काफी था।

अब शादी के बाद भी उर्मिला फिल्मों में काम करेंगी या नहीं और अगर करेंगी भी तो क्या तब भी इसी तरह की हॉट-हॉट परफॉसमेंस दे सकेंगी, इस बारे में तो दावे के साथ कुछ नहीं कहा जा सकता पर शादी के बारे में उर्मिला का कहना है कि शादी जिंदगी का एक अहम मोड़ होता है और मुझे अब तक कोई ऐसा व्यक्ति मिला ही नहीं है। मुझे ऐसे शख्स की जरूरत नहीं है, जो मुझे कहे कि मैं बहुत खूबसूरत हूं या बहुत महान हूं बल्कि जीवनसाथी के रूप में मैं एक ऐसा इंसान ही चाहती हूं, जो समझदार हो। अपने जीवन में मैं जो कुछ पाना चाहती हूं, वह सब मुझे मिल चुका है, इसलिए अब मैं भी सोचती हूं कि मेरे लिए यह शादी का सही वक्त है और मुझे अब अपने सपनों के राजकुमार की तलाश शुरू कर देनी चाहिए।

डेढ़ मिनट में तीन पिज्जा


अगर कोई शेफ एक समय में तीन पिज्जा बना डाले और वह भी सिर्फ 90 सैकेंड में तो इसे एक अनोखी उपलब्धि ही माना जाएगा। ब्रिटेन में पिछले दिनों यह कमाल कर दिखाया 32 वर्षीय प्रेम सिंह नामक एक भारतीय शेफ ने, जिसे इस प्रतियोगिता के बाद सबसे तेज गति से पिज्जा बनाने वाले शेफ के रूप में मान्यता भी प्रदान की जा चुकी है। प्रेम सिंह इस समय मिडलैंड्स के उस लैस्टर नगर में मशहूर फास्ट फूड कम्पनी ‘डोमिनोज पिज्जा’ में कार्यरत है, जहां भारतीयों की विशाल आबादी रहती है। ब्रिटेन आने से पहले वह भारत में डोमिनोज पिज्जा में ही काम करता था। प्रेम सिंह ने अपनी निपुणता का प्रदर्शन ‘फास्टेस्ट पिज्जा मेकर’ नामक प्रतियोगिता में किया। इस प्रतियोगिता में दो जज थे। प्रेम सिंह ने तीखे स्वाद के मशरूम, पनीर और टमाटर के पिज्जा सिर्फ एक मिनट 23 सैकेंड में बनाकर यह प्रतियोगिता जीती। डोमिनोज पिज्जा ने 25 साल पहले इस प्रतियोगिता की शुरूआत की थी, जिसका उद्देश्य अपनी शाखाओं पर स्टाफ की कार्यकुशलता में निखार लाना था लेकिन अब दुनियाभर के स्टोरों से शेफ इस प्रतियोगिता में भाग लेकर विश्व चैम्पियन का खिताब हासिल कर सकते हैं। प्रतियोगिता के नियम सख्त हैं, जिनके अनुसार प्रत्येक स्लाइस का बेस छिद्ररहित हो और ऊपर के सभी टॉपिंग्स समान रूप से बिछे हुए हों ताकि एक बेहतरीन पिज्जा बन सके।

प्रेम सिंह लैस्टर के डोमिनोज पिज्जा मं क्षेत्रीय स्टोर निदेशक पद पर हैं। 2006 में उन्होंने यूरोप में दूसरे सबसे तेज गति से पिज्जा बनाने का खिताब हासिल किया था। तब वह व्श्वि रिकॉर्ड कायम करने में सिर्फ 24 सैंकेंड पीछे रह गए थे। पिछले दिनों उन्होंने एल्टोन टावर्स में आयोजित यूके फाइनल प्रतियोगिता में सात प्रतियोगियों को पछाड़कर ब्रिटेन में सबसे तेज गति से पिज्जा बनाने का खिताब हासिल किया। प्रेम सिंह बताते हैं, ‘‘यह प्रतियोगिता सुनिश्चित करती है कि आप यथासंभव तेजी से वाकई अच्छे पिज्जा बनाएं। प्रत्येक पिज्जा ग्राहकों को परोसने लायक होना चाहिए।ञञ

ब्रिटेन में लगातार छह साल तक सबसे तेज गति से पिज्जा बनाने का रिकॉर्ड पाली ग्रेवाल के नाम रहा है। ग्रेवाल लंदन के कई इलाकों मं अनेक स्टोरों के मालिक हैं। वह लगभग एक मिनट में पिज्जा बना सकते हैं।

क्यों माना जाता है 13 का अंक अशुभ?


13 के अंक को बहुत से लोग अशुभ मानते हैं और न केवल हमारे यहां बल्कि दूसरे देशों में भी यह अंधविश्वास प्रचलित है। कई इमारतों में 13 से ज्यादा मंजिलें होने पर भी वहां 13वीं मंजिल नहीं होती। कुछ अस्पतालों में आपको 13 नंबर का वार्ड नहीं मिलेगा। बहुत से लोग 13 अंक को अशुभ मानने की वजह से इस तारीख को कोई शुभ कार्य भी नहीं करते। आखिर क्या वजह है कि दुनिया भर में 13 के अंक को इतना अशुभ माना जाता है?

इस बारे में कई प्रसंग प्रचलित हैं। कहा जाता है कि जीजस क्राइस्ट की आखिरी दावत में जीजस सहित कुल 13 व्यक्ति थे, जिनमें 12 उनके शिष्य थे। उसके बाद जीजस का अंत कर दिया गया था। तभी से 13 की संख्या को अशुभ माना जाने लगा।

13 को अशुभ मानने के संबंध मं एक यूनानी कथा भी प्रचलित है। माना जाता है कि वलहंला बैकंट में 12 देवताओं को आमंत्रित किया गया लेकिन उस दावत में लौकी नाम का एक शैतान जबरन घुस आया, जिससे वहां मौजूद लोगों की संख्या 13 हो गई, जिसका परिणाम यह हुआ कि उनके सबसे प्रिय देवता बाल्डर को मार दिया गया, जिसके बाद 13 के अंक को अशुभ माना जाने लगा। हालांकि इस प्रकार की मान्यताओं के पीछे कोई प्रामाणिक तथ्य नहीं है और न ही वास्तव में 13 की संख्या को अशुभ माने जाने के पीछे कोई अन्य प्रामाणिक कारण। किसी भी संख्या को शुभ या अशुभ मानना सिवाय अंधविश्वास के और कुछ नहीं है।

प्रस्तुति: योगेश कुमार गोयल

पानी पर चलने वाला रोबोट


कुछ साल पूर्व तक किसी ऐसी मशीन की कल्पना करना भी मुश्किल था, जो पानी पर चल सके लेकिन आज के वैज्ञानिक युग में सब कुछ संभव है। वैज्ञानिकों ने कुछ समय पूर्व पानी पर चलने वाला एक रोबोट बनाकर हर किसी को हैरत में डाल दिया।

प्रकृति से प्रेरणा लेकर मैसाच्युएट्स इंस्टीच्यूट ऑफ टैक्नोलॉजी के शोध से मदद लेकर कार्नेगी मेलान इंजीनियरिंग के असिस्टेंट प्रोफेसर मेटिन सिट्टी और उनकी टीम ने एक ऐसा छोटा सा रोबोट बनाने में सफलता हासिल की, जो तालाब के शांत पानी पर चहलकदमी करने वाले कीट वाटर स्किमर्स, पांड स्केटर्स या जीसस बग्स की तरह ही आराम से पानी पर चल-फिर सकता है।

प्रो. सिट्टी, उनकी टीम तथा अन्य शोधकर्ताओं को विश्वास है कि इस टैक्नोलॉजी से विकसित किए जाने वाले अन्य रोबोट भी पानी पर अपने लंबे पैरों की मदद से चल सकेंगे। प्रो. सिट्टी की टीम द्वारा विकसित पानी पर चलने वाला रोबोट एक केमिकल सेंसर से युक्त है।

प्रो. सिट्टी बताते हैं कि इस रोबोट का सबसे बड़ा फायदा यह है कि किसी भी शहर के पेयजल भंडारण में विचरण करके ये रोबोट किसी भी रासायनिक मिलावट का पता आसानी से लगा सकते है। इन पर कैमरा फिट कर दिया जाए तो इनसे दुरूह स्थानों के बारे में भी सटीक जानकारी एकत्रित की जा सकती है। इसके अलावा ये रोबोट जासूसी के लिए भी बेहद उपयुक्त हैं।

कार्नेगी मेनोन्स नैनो रोबोटिक्स लैब के संचालक प्रो. सिट्टी बताते हैं, ‘‘मैं बचपन से ही तालाब और नदियों में पानी की ऊपरी सतह पर विचरण करने वाले जीसस बग्स जैसे कीटों को हैरानी से देखा करता था और सोचता था कि ये कीट डूबते क्यों नहीं? जब मैं रोबोटिक्स में आया तो मैंने फैसला किया कि मैं ऐसी मशीन बनाऊंगा, जो इन कीटों की तरह ही अपने लंबे-लंबे पैरों से पानी की ऊपरी सतह पर बिना डूबे चल-फिर सके। रोबोटिक्स के लिए यह एक बड़ी चुनौती थी। आप कभी जीसस बग्स को देखें, वह पानी पर कैसे चल पाता है। इसका राज उसके हल्के शरीर और लंबी-लंबी टांगों में छिपा है। अपने आधे इंच के शरीर के साथ जीसस बग्स पानी पर एक सैकेंड में एक मीटर की गति से चलता है।’’

प्रो. सिट्टी के रोबोट का आकार एक इंच से कुछ अधिक है। कार्बन फाइबर्स की मदद से इसका डिब्बीनुमा शरीर बनाया गया और वाटर रिपेलिंग प्लास्टिक कोटिंग वाले दो-दो इंच लंबे स्टील के तारों से इसकी टांगें बनाई गई।
प्रस्तुति: योगेश कुमार गोयल

क्यों अटकती है दिमाग के रिकार्ड ट्रैक पर कोई धुन?


कई बार ऐसा होता है कि चलते-फिरते सुनी गई कोई धुन पूरा दिन हमारे दिमाग में ‘अटकी’ रह जाती है। ऐसा क्यों होता है, अब तक यह एक पहेली ही था पर वैज्ञानिक अब इस पहेली को समझने के करीब आ गए हैं। वैज्ञानिकों ने मस्तिष्क के उस भाग को खोज लिया है, जो संगीत को हमारे समझने लायक बनाता है। मस्तिष्क का यही भाग हमारी तार्किक शक्ति और जरूरत पड़ने पर हमारी स्मरण शक्ति (याद्दाश्त) का दरवाजा खोलने में भी सहायक होता है। वैज्ञानिकों ने इसके लिए ऐसे व्यक्तियों पर परीक्षण किया, जिन्हें संगीत की थोड़ी-बहुत समझ थी। उन व्यक्तियों को 8 मिनट की एक ऐसी धुन सुनाई गई, जिसमें सभी 24 मेजर और माइनर ‘की’ प्रयुक्त हुई थी। इस धुन में एक अन्य धुन इस प्रकार मिलाई गई थी, जो बीच-बीच में उभरती थी। यह धुन एक विशेष ‘आकार’ में तैयार की गई थी।

वैज्ञानिकों ने पाया कि उक्त सभी व्यक्तियों के मस्तिष्क का वह हिस्सा, जो माथे के ठीक पीछे स्थित होता है, उक्त धुन के ‘आकार’ की पहचान कर रहा था। इसके आधार पर वैज्ञानिकों ने यह सिद्ध किया कि मस्तिष्क का उक्त हिस्सा, जो ‘रोस्ट्रोमाडियल प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स’ कहलाता है, मस्तिष्क में संगीत का ‘नक्शा’ स्टोर करके रखता है और यही वह हिस्सा है, जो कहीं अधसुनी सी धुन को बार-बार हमें गुनगुनाने पर मजबूर करता है।
प्रस्तुति: योगेश कुमार गोयल

बदलती जलवायु से निपटना सिखाएंगे पौधे


ब्रिटेन की दो शोध परिषदों ‘जैव प्रौद्योगिकी तथा जीव विज्ञान शोध परिषद’ (बीबीएसआरसी) और ‘प्राकृतिक पर्यावरण शोध परिषद’ द्वारा अनुदानित वैज्ञानिक यह अध्ययन कर रहे हैं कि पौधे कैसे प्राकृतिक तौर पर बदलती जलवायु के साथ अपनी अनुकूलता बैठा लेते हैं। उन्होंने एक ऐसी खोज की है, जो हमें नई किस्म की फसलों को पैदा करने में मदद कर सकती है, जो फसलें बदलती जलवायु में भी खुद को बचाए रख सकें। इस खोज का महत्व इस तथ्य में निहित है कि यह प्रदर्शित करता है कि कैसे एक प्रजाति कम अवधि में विभिन्न जलवायु परिवर्तनों के प्रति विभिन्न किस्म की प्रतिक्रियाएं विकसित करने में सक्षम होती हैं। ‘जॉन आईनेस संेटर’ के शोधकर्ता यह पता लगाने में जुटे हैं कि पौधे किस तरीके से सर्दियों की ठंड को इस्तेमाल कर फूल पैदा कर सकते हैं, जिसके लिए वसंत की गर्माहट जरूरी होती है। यह प्रक्रिया, जिसे ‘वर्नलाइजेशन’ कहते हैं, एक ही पौध प्रजाति के भीतर स्थानीय जलवायु के मुताबिक भिन्न हो सकती है। यह पाया गया है कि एक विशेष आनुवंशिक सूत्र एफएलसी ही सर्दियों में फूलों के पैदा होने में विलम्ब की वजह है। शोध टीम ने यह खोज निकाला कि सर्दियां एफएलसी को निष्क्रिय कर देती हैं और वसंत इसे सक्रिय कर देता है। ब्रिटेन जैसे देश में पौधों को एफएलसी निष्क्रिय करने के लिए मात्र चार हफ्तों की ठंड ही चाहिए होती है। शोध टीम की प्रमुख प्रो. कैरोलीन डीन के अनुसार किस तरीके से एडिनबर्ग और उत्तरी स्केनडीनेविया में पतझड़ और ठंड के दौरान एक ओर जहां एफएलसी का स्तर समान रहा, वहीं उसके निष्क्रिय होने में लगने वाला समय भिन्न रहा। वह कहती हैं, ‘‘यह जानना दिलचस्प होगा कि पौधे किस तरह विभिन्न जलवायु के मुताबिक खुद को अनुकूल बना लेते हैं, जिसकी मदद से हम ग्लोबल वार्मिंग के दौर में ऐसी खाद्य फसलें उगा सकें, जो उसके अनुकूल हों।’ञ बीबीएसआरसी की मुख्य कार्यकारी प्रो. जुलिया गुडफेलो ने भी उपर्युक्त आवश्यकता पर बल दिया है। जेआईसी नॉर्विश शोध पार्क मंे स्थित है और उसे बीबीएसआरसी से अनुदान मिलता है। गौरतलब है कि ब्रिटेन जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अग्रणी स्थान रखता है और यूरोप की सार्वजनिक जैव प्रौद्योगिकी कम्पनियांे में 75 फीसदी ब्रिटेन की हैं।
प्रस्तुति: योगेश कुमार गोयल

Monday, July 12, 2010

ऐसे दूर करें शारीरिक एवं मानसिक थकान


हम सबकी दिनचर्या में कुछ ऐसे क्षण आते हैं, जब हम मानसिक और शारीरिक रूप से थकान अनुभव करते हैं। आमतौर पर हम अपनी थकान कुछ समय आराम करके दूर भगाने का प्रयास करते हैं किन्तु आराम के लिए अधिक समय की आवश्यकता होती है। हर समय आराम करना संभव भी नहीं होता। ऐसे में थकान दूर करने के लिए कई अन्य उपायों का सहारा लिया जा सकता है।

’ थकान अधिक होने पर हाथ-पांव ढ़ीले छोड़कर आंखें बंद कर पलंग पर लेट जाइए। इससे मांसपेशियों का तनाव दूर होता है।

’ अधिक समय खड़े होकर काम करने से पांव की एड़ियां दर्द करने लगती हैं। ऐसे में गर्म पानी में थोड़ा नमक डालकर पांव कुछ समय इस पानी में रखें, जिससे दर्द कम हो जाएगा।

’ टांगों की पिंडलियां दर्द करने पर घुटनों के ऊपर से ठंडा पानी डालें। पिंडलियों का दर्द कम हो जाएगा।

’ सफर के बाद थकान होने से घर या होटल पहुंचकर मौसम के अनुसार गुनगुने या ताजे पानी से स्नान करके ढ़ीले वस्त्र पहन लें।

’ अपनी रूचि और मौसम के अनुसार चाय, कॉफी, दूध, शर्बत, शिकंजी, जूस पीने से भी थकान से राहत मिलती है।

’ रसोई तथा घर के दूसरे कार्यों से निपटने के बाद ताजे पानी से हाथ-मुंह धोकर कपड़ बदल लें। बाल संवारने से भी थकान दूर होती है।

’ कमर दर्द करने पर दरी या चटाई बिछाकर फर्श पर सीधे लेटें। कमर दर्द अधिक होने पर गर्म पानी, रेत या नमक गर्म करके थैले में डालकर सेंक करने से भी आराम मिलता है।

’ काम के दौरान आराम न कर सकें तो आंखें बंद करके आंखों पर हथेलियां रख लें, जिससे आंखों को आराम मिलेगा।

’ चिंताओं से मुक्त होकर शरीर को ढ़ीला छोड़कर आराम करने से थकान दूर भागती है।

’ छोटी-छोटी बातों से परेशान होना छोड़िये, यह सब तो जिंदगी का हिस्सा है। यह सोचकर भी आप कुछ तनाव और थकान कम कर सकते हैं।

’ हंसने-हंसाने की आदत को विकसित करें। खुश रहने वाले लोग कम थकान महसूस करते हैं।

’ दर्द निवारक गोलियों का सेवन कम से कम करें। ये अभी तो आराम दिलाएंगी पर बाद में घातक सिद्ध हो सकती हैं।

’ नींद पूरी लेने से भी शारीरिक और मानसिक थकान दूर होती है। नींद सबसे बड़ा टॉनिक है, जिससे शरीर को सम्पूर्ण आराम मिलता है। अच्छी नींद हमारे शरीर को ही नहीं, मस्तिष्क को भी पूरा आराम देती है। इसलिए अच्छी नींद मिलने से आप पुनः पूरे जोश से काम करने लायक हो जाते हैं।

रोजगार और पैसा दिलाये ‘धन की छतरी’



-- योगेश कुमार गोयल --

पूर्ण रूप से शाकाहारी भोज्य पदार्थ मशरूम (खुम्ब) का उत्पादन हाल के वर्षों में दूसरे व्यवसायों की अपेक्षा कम समय में अधिक पैसा प्रदान करने वाले उद्योग के रूप में पनपा है। हालांकि बड़े स्तर पर मशरूम उत्पादन के लिए अधिक पूंजी की आवश्यकता होती है पर एक छोटे से कमरे में बहुत कम पूंजी लगाकर भी आप मोटा मुनाफा कमा सकते हैं लेकिन इसके लिए यह अपेक्षित है कि मशरूम उगाने से पहले आपको इसकी खेती के बारे में कुछ बुनियादी बातों की जानकारी हो।

मशरूम मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं:- विषैले तथा विषरहित। आपने बारिश के दिनों में अपने आप उग जाने वाले कुछ मशरूम देखे होंगे, वो विषैले होते हैं लेकिन वैज्ञानिक तरीके से घर या खेत में उगाए जाने वाले मशरूम विषरहित तथा पौष्टिक होते हैं। इनमें पौष्टिकता के साथ-साथ खनिज, प्रोटीन तथा विटामिन्स का भी भंडार होता है तथा रोगकारक कोलेस्ट्रोल, शक्कर और सोडियम जैसे तत्वों की मात्रा भी बहुत कम होती है, जिससे ये उच्च रक्तचाप व मधुमेह के रोगियों के लिए भी एक सुरक्षित खाद्य पदार्थ है।

विषरहित मशरूम की भी कई किस्में हैं, जिनमें से भारत में तीन प्रकार के मशरूम (पैडस्ट्रा मशरूम, सफेद बटन मशरूम तथा ढ़ींगरी मशरूम) ही अधिक उगाए जाते हैं। इनमें भी ढींगरी मशरूम की खेती सबसे ज्यादा होती है क्योंकि इसकी उपज दूसरे मशरूमों की उपेक्षा प्रति वर्ग मीटर 2-3 गुना अधिक मिलती है।

कितना करें पूंजी निवेश?

अगर आप घर में ही मशरूम उगाना चाहते हैं तो इसके लिए शुरूआती तौर पर 1000-1500 रुपये तक के खर्च में ही इसकी शुरूआत कर सकते हैं और शुरू में ही लागत से चार गुना तक लाभ कमा सकते हैं। कुछ ही समय बाद आप घर में ही मशरूम उगाकर हर महीने 5 से 15 हजार रुपये तक कमा सकते हैं। अगर आप बड़े स्तर पर अर्थात् खेत में मशरूम उगाना चाहें तो इसके लिए सरकार द्वारा ऋण की सुविधा भी प्रदान की जाती है, जिस पर करीब 35 फीसदी तक सब्सिडी भी मिलती है।

लाभ की छतरी

मशरूम को हम ‘लाभ की छतरी’ इसलिए कह रहे हैं क्योंकि एक बार पॉलीथीन बैग में मशरूम के बीज उगाकर आप उसी से लगातार पांच बार तक फसल प्राप्त कर सकते हैं। पॉलीथीन बैग में मशरूम के बीज डालने के 20-22 दिन बाद ही पौधे में फूल आ जाते हैं, जो मशरूम की फसल कहलाते हैं। उसके 4-5 दिन बाद ही पौधे में कलियां निकलनी शुरू हो जाती हैं। जब मशरूम का फूल पूरी तरह खिल जाए, तब इसे तोड़ लिया जाता है। एक बार मशरूम तोड़ने के बाद मशरूम वाले बैग में दोबारा पानी देने से 10-12 दिनों बाद फिर से फसल तैयार हो जाती है और इसी तरह यह प्रक्रिया पांच बार तक चलती है यानी एक बार की लागत में पांच बार फसल मिलती है।

कहां उगाएं मशरूम?

बड़े स्तर पर मशरूम की खेती करने के लिए खेत का चुनाव कर सकते हैं लेकिन अगर घर में ही मशरूम उगाना चाहें तो इसके लिए इस बात का ध्यान रखें कि जहां भी आप मशरूम उगाना चाहें, वहां का तापमान ठंडा होना चाहिए। आप घर के ही किसी खाली कमरे का भी मशरूम उत्पादन के लिए उपयोग कर सकते हैं लेकिन यह अवश्य ध्यान रखें कि जहां भी आप इसका उत्पादन करना चाहें, उस कमरे में सूर्य की किरणें सीधी न पहुंचती हों और कमरे का तापमान 20-30 डिग्री सेंटीग्रेड के बीच ही हो, कमरे में आर्द्रता (नमी) भी 60 प्रतिशत से अधिक हो।

कहां से प्राप्त करें कच्चा माल?

मशरूम उगाने के लिए चावल, गेहूं, जौ, ज्वार, बाजरा, मक्का, कपास, गन्ना इत्यादि की सूखी पत्तियों, डंठल व भूसे की तथा कपास के व्यर्थ अवशेष पदार्थों, मक्का के छिले हुए भुट्टों, मूंगफली के छिलकों, सूखी घास, इस्तेमाल की हुई चाय की पत्ती इत्यादि की जरूरत होती है और इस प्रकार के कृषि अवशेष हमें खेतों से आसानी से प्राप्त हो जाते हैं। इसके अलावा मशरूम के बीज आप बाजार से या किसी कृषि विज्ञान केन्द्र से खरीद सकते हैं।

कैसे करें बुवाई?

पानी में फार्मेलीन मिलाकर पानी को कीटाणुरहित करके इसमें उपरोक्त कच्चे माल (कृषि अवशेषों) को 8-10 घंटे तक भिगो दें और इस अवशेष को पॉलीथीन के बैगों में भर दें। इन्हीं बैगों में बीच-बीच में मशरूम के बीज डालते जाएं। बीजों को अंकुरित होने के लिए हवा मिलती रहे, इसके लिए पॉलीथीन बैगों में बीच-बीच में कुछ सुराख कर दें। अब इन बैगों को ऊपर किसी सहारे से बांधकर लटका दें।

कितना मिलेगा उत्पादन?

अगर आप एक साधारण आकार के कमरे में मशरूम उगा रहे हैं तो यह मानकर चलें कि आपको एक बार की लागत में मिलने वाली पांच बार की फसलों से ही 500-1000 किलो तक मशरूम प्राप्त हो जाएगा और चूंकि थोक बाजार में ही ताजी मशरूम का भाव 55-70 रुपये किलो तक है, अतः आपको 50 रुपये किलो के हिसाब से बिकने पर भी कम से 25000 रुपये की कीमत तो वसूल हो ही जाएगी।

कहां बेचें?

आजकल कई प्रकार के देशी-विदेशी व्यंजनों में मशरूम की खास डिमांड रहती है, अतः खासकर बड़े-बड़े होटल मशरूम के सबसे बड़े ग्राहक हैं। इसलिए आप सीधे इन होटलों से सम्पर्क कर सकते हैं या फिर सब्जी मंडियों में बड़े व्यापारियों को भी मशरूम बेच सकते हैं।

कहां से लें प्रशिक्षण?

अगर आप व्यावसायिक स्तर पर मशरूम का उत्पादन शुरू करना चाहते हैं तो इसके लिए बेहतर है कि आप मशरूम की खेती वैज्ञानिक तरीके से करने के लिए इसका विधिवत प्रशिक्षण लें। अधिकांश कृषि विज्ञान महाविद्यालयों तथा कुछ निजी संस्थाओं द्वारा यह प्रशिक्षण दिया जाता है, जो 5-7 दिन का ही होता है और इसके लिए 500-2500 रुपये तक ही फीस लगती है।

हर तरह के वातावरण में रह सकते हैं ‘सियार’


भारत में लगभग हर जगह पर पाया जाने वाला जानवर ‘सियार’ कुत्ते जैसा दिखने वाला एक मांसाहारी जानवर है। इसे ‘गीदड़’ के नाम से भी जाना जाता है। इनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये सभी प्रकार के वातावरण में रहने में समर्थ होते हैं। इनके शरीर का रंग भूरा होता है जबकि इनके कंधे, कान और पेट पर काले-सफेद बाल होते हैं तथा पूंछ का अंतिम सिरा काला होता है। सियार की टांगें लंबी और मजबूत होती हैं, जिस कारण ये कम समय में लंबी दूरी तय करने में सक्षम होते हैं सियार 16 किलोमीटर प्रति घंटा की गति से दौड़ सकते हैं। सियार के दांत थोड़ा मुड़ाव लिए हुए काफी तीखे होते हैं, जिस कारण ये पक्षियों, छोटे स्तनधारियों और रेंगने वाले जीवों का आसानी से शिकार कर लेते हैं। करीब साढ़े तीन फुट लंबा यह जानवर औसतन 10-12 किलो वजनी होता है। सियार रात्रिचर होते हैं और मांद में रहते हैं। यह समूहों में रहने वाला प्राणी है। इसका बड़ी संख्या मे शिकार किए जाने के कारण यह अब विलुप्त होते प्राणियों की श्रेणी में शुमार हो गया है और इस कारण इसे संरक्षित वन्य प्राणी का दर्जा दिया गया है। मादा सियार नर के साथ सहवास के करीब दो माह बाद 4-5 बच्चों को एक साथ जन्म देती है।

-- योगेश कुमार गोयल

संकटग्रस्त वन्य प्राणी है ‘आसामीज बंदर’


भारत, भूटान, नेपाल, वियतनाम, थाईलैंड, दक्षिण चीन सहित दक्षिण एवं दक्षिण-पूर्व एशिया के कई भागों में पाए जाने वाले आसामीज बंदर प्रायः सघन वनों में देखे जाते हैं। भारत में ये बंदर हिमालय के जंगलों में उत्तर प्रदेश से असम तक पाए जाते हैं। इनके शरीर का रंग भूरा होता है तथा इनका शरीर काफी गठीला होता है। इनके पीछे का हिस्सा लाल व नारंगी नहीं होता, इसलिए इन्हें अन्य बंदरों से अलग आसानी से पहचाना जा सकता है। सिर से पूंछ तक इनके शरीर की लम्बाई करीब 80 सेंटीमीटर तथा वजन 10 से 15 किलो के बीच होता है। मादा का वजन 8 से 12 किलो के बीच होता है। इनकी पूंछ की लम्बाई 25-30 सेंटीमीटर होती है। हिमालय में यह बंदर 810 से 1830 मीटर की ऊंचाई पर पाया जाता है। यह एक संकटग्रस्त वन्य प्राणी है। इसकी आदतेें विध्वंसक किस्म की होती हैं। फल, फूल, पत्तियां तथा कीड़े-मकोड़े इसका पसंदीदा आहार होते हैं। इसकी औसत आयु लगभग 20 वर्ष होती है। इसका प्रजनन काल वर्षभर रहता है और मादा छह माह के गर्भाधान के बाद एक बच्चे को जन्म देती है।

-- योगेश कुमार गोयल

खरगोश से बड़े आकार का बुद्धिमान प्राणी है ‘बिज्जू’


बिज्जू अरब क्षेत्र में पाया जाने वाला एक छोटे आकार का जानवर है, जो खरगोश से थोड़ा बड़े आकार का होता है। वैसे यह सम्पूर्ण भारत में भी पाया जाता है। इसे एक बुद्धिमान प्राणी माना जाता है। इसकी लम्बाई करीब 2 फुट और इसका वजन लगभग 2.5 से 4.5 किलो के बीच होता है। चूंकि यह अधिकांशतः पत्थरों व चट्टानोे पर रहता है, अतः प्रकृति ने इसका रंग भी पत्थरोें व चट्टानों जैसा काला ही बनाया है, जिससे काफी हद तक दुश्मनों से इसका बचाव होता है। यह इन्हीं चट्टानों या पत्थरों में खोह अथवा बिल बनाकर रहता है। जब तक यह अपनी खोह के आसपास रहता है, यह सुरक्षित रहता है क्योंकि दुश्मन का हमला होते ही यह बड़ी फुर्ती से अपनी खोह में घुस जाता है लेकिन जैसे ही यह अपने सुरक्षित ठिकाने से दूर निकलता है, दुश्मन इस पर हमला बोलकर इसका काम तमाम कर देता है। चील, गिद्ध और अन्य बड़े मांसाहारी पक्षी इसके सबसे बड़े दुश्मन होते हैं, जो इस पर हमला करने की ताक में रहते हैं। बिज्जू कुछ स्थानों पर पेड़ों के खोखलों में भी अपना आवास बनाता है। यह छोटे स्तनपायी और छोटे पक्षियों को अपना शिकार बनाता है। इसका प्रजनन काल वर्षभर रहता है। मादा बिज्जू छह माह के गर्भकाल के बाद 3-4 बच्चों को जन्म देती है।

-- योगेश कुमार गोयल

Saturday, July 10, 2010

सामाजिक सरोकारों से जुड़ी एक पुस्तक


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Friday, July 09, 2010

‘अजीत समाचार’ (दैनिक) में ‘तीखे तेवर’

‘तीखे तेवर’ पुस्तक पर कुछ प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं की प्रतिक्रियाएं

  


तीखे तेवर

(25 विचारोत्तेजक निबंधों की 160 पृष्ठों की पुस्तक)

-- एक संजीदा पत्रकार होने के नाते योगेश गोयल हमेशा सामाजिक सरोकारों के साथ निकट से वाबस्ता रहे हैं। वह चिंतक भी हैं और आम आदमी की निजी अनुभूतियों को पहचानने वाली दृष्टि भी उनके पास है। उनकी इस पुस्तक का हर आलेख कुछ-न-कुछ कहता, शिक्षा अथवा नसीहत देते प्रतीत होता है। यह पुस्तक पढ़ने और संग्रह करने के योग्य है।

- अजीत समाचार (जालंधर)

-- पूरी किताब एक-एक ऐसे विचार बिन्दु को प्रदर्शित करती है, जिसमेें गोयल का रचना संसार सामाजिक समस्याओं के बीच एक ऐसी खिड़की की तलाश करता है, जिससे कुरीतियों, गिरते सामाजिक सरोकारों और बुराईयों पर बराबर प्रहार होता है।
- दैनिक हमारा महानगर (मुम्बई एवं नई दिल्ली) (27.12.2009)

-- लेखक का रचनात्मक कौशल लाजवाब है। पुस्तक में संग्रहीत एक-एक आलेख अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- दैनिक पंजाब केसरी (दिल्ली) (29.1.2010)

-- रचनात्मक पत्रकारिता के पक्षधर, पोषक और सजग प्रहरी श्री गोयल ने संक्रमण के दौर से अपनी बिरादरी पर भी अनेक सवालिया निशान उठाते हुए नैतिक दायित्वबोध कराया है। पुस्तक के सभी निबंध विचारोत्तेजक हैं तथा सामाजिक व राष्ट्रीय सरोकारों से जुड़े हैं। इन आलेखों की भाषा पुस्तक के शीर्षक अनुरूप तीखी है।आवरण विषयानुरूप व प्रभावी है।
- दैनिक ट्रिब्यून (चण्डीगढ़) (7.3.2010)

-- पुस्तक के सभी निबंध विचारोत्तेजक हैं तथा सामाजिक व राष्ट्रीय सरोकारों से जुड़े हैं। इन आलेखों की भाषा पुस्तक के शीर्षक के अनुरूप तीखी है। आवरण विषयानुरूप व प्रभावी है। यह पुस्तक एक ओर जहां वैचारिक महायज्ञ में प्रेरक आहुति का काम करेगी, वहीं लेखक का यह प्रयास सामाजिक अभियंताओं तथा शोधार्थियों के लिए शोध का विषय बनकर अपनी विशिष्ट पहचान बनाएगा, ऐसी आशा है।
- दैनिक स्वतंत्र वार्ता (हैदराबाद) (27.6.2010)

-- यह एक शाश्वत एवं उपादेय कृति है, जिसको साहित्य एवं पत्रकारिता जगत में ही नहीं अपितु सामाजिक सरोकारों से जुड़े सभी सहृदयजनों में समादृत किया जाना चाहिए।
- शुभ तारिका (अम्बाला छावनी) (जनवरी 2010)

-- योगेश कुमार गोयल लिखित ‘तीखे तेवर’ सामाजिक अपघातों को बेनकाब करने का एक सार्थक प्रयास है।
- यू.एस.एम. पत्रिका (गाजियाबाद) (जनवरी 2010)

-- पुस्तक आवरण, जिल्द, सम्पूर्ण सामग्री, भूमिका से लेकर लेखक के परिचय तक बहुत ही श्रेष्ठ बन पड़ी है। यह सम्पादकों एवं पत्रकारिता जगत में ही पढ़ने योग्य नहीं अपितु आज के प्रत्येक व्यक्ति को झकझोरने के लिए ऐसी पुस्तकों की आवश्यकता है। पत्रकारिता के चमचागिरी युग में आज ऐसी ही पत्रकारिता की आवश्यकता है।
- उर्मि कृष्ण, निदेशक, कहानी लेखन महाविद्यालय

Thursday, July 01, 2010

समय बहुमूल्य है, अतः एक-एक पल का सदुपयोग सार्थक कार्यों में करें.