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Thursday, June 24, 2010

‘दिल्ली प्रेस’ की पत्रिका ‘सरस सलिल’ में प्रकाशित हमारी कवर स्टोरी

‘दिल्ली प्रेस’ की पत्रिका ‘सरस सलिल’ के पिछले अंक में प्रकाशित अपनी कवर स्टोरी आपसे साझा कर रहा हूं. इस पर आपकी टिप्पणियों एवं सुझावों का स्वागत है.




Monday, June 21, 2010

व्यंग्य: बिजली का बिल

-- सुनील कुमार ‘सजल’ (मीडिया केयर नेटवर्क)

गर्मी का मौसम है। जैसे अल्हड़ युवती की जवानी गर्म होती है, वैसे ही बैसाख के दिन पूरे शबाब में गनगना रहे हैं और ऊपर से बिजली विभाग वालों की कुख्यात कृपा से बिजली कटौती! हाय राम मारकर ही दम लेगी क्या! खैर! जब तक गर्मी में 14-14 घंटे की बिजली कटौती न हो तो काहे की गर्मी! कूलर, ए.सी. की ठंडी हवा या फ्रिज का ठंडा पानी पीकर क्या कोई गर्मी का आनंद उठा सकता है? जब तक गुनगुने जल से प्यास न बुझायें, बदन पर लू के थपेड़े न पड़ें तो काहे की गर्मी और काहे का गर्मी का मजा।

वैसे हमने मनोविज्ञान का कचरा ज्ञान प्राप्त कर घर में एक रेफ्रिजरेटर ला रखा है ताकि देखकर दिमाग को ठंडे का असर पड़े और मोहल्ले के लोग देखकर यह न कह सकें, ‘‘हाय इतना सब कुछ होते हुए भी घर में एक फ्रिज भी नहीं है, मिट्टी के घड़े का पानी पीते हो। ऐसी कंजूसी हमने देखी नहीं कहीं।’’

हमने एक चालाकी और अपना रखी है कि कोल्ड ड्रिंक की जगह घड़े के पानी में नींबू रस और शक्कर घोलकर मेहमानों के घर में प्रवेश के साथ कबाड़ी वालों से खरीदी गई ब्रांडेड कम्पनी की बोतलों में भरकर चुपचाप फ्रिज में रख देते हैं ताकि फ्रिज से निकालकर उन्हें पिला सकें। इसी बीच उनकी नजर अगर फ्रिज में पड़ भी जाए तो वे यह न कह सकें कि घर में फ्रिज तो है मगर दो-चार बोतलें कोल्ड ड्रिंक की नहीं हैं। खैर छोड़िये, इस भीषण महंगाई तले दबे कुचले तन की पसली में उठे दर्द को हम जानते हैं।

उस दिन बनवारी लाल जी घर पहुंचे। पसीने से ऐसे लथपथ थे, जैसे किसी फव्वारे के आसपास घूम-फिरकर आए हैं। अपने अंगोछे से मुंह पोंछते हुए बोले, ‘‘ऐसी गर्मी पिछले 10 बरस में नहीं देखी।’’

‘‘हां, आप ठीक कहते हैं, रिकॉर्ड टूट रहा है इस बरस तो ...!’’

अभी बात चल ही रही थी कि इतने में मिंकू बिटिया जल से भरा गिलास लेकर उनके सामने उपस्थित हुई। उन्होंने दो-चार घूंट पानी पीया और बोले, ‘‘लगता है, घड़े का पानी है।’’

‘‘घड़े का नहीं होगा। घर में फ्रिज है तो घड़े का पानी क्यों पिलायेंगे मेरे दोस्त।’’

तभी हमारी बात काटती हुई मिंकू बोल पड़ी, ‘‘हां अंकल जी, घड़े का पानी है। बात यह है कि बिजली का बिल ज्यादा आता है न, इसलिए पापा जी फ्रिज और टीवी ज्यादा नहीं चलाने देते।’’ बिटिया ने जैसे हमारी पोल खोल दी। हम शर्म से दर्जन भर घड़े का पानी उड़ेले इंसान की तरह होकर रह गए।

वे बोले, ‘‘काहे इतना कंजूस बनते हो यार। कम से कम पानी तो फ्रिज का पिया करो।’’

‘‘नहीं, ऐसी बात नहीं है। हमने बहाना ढूंढ़ते हुए कहा, ‘‘पूरे घर के सदस्य चार-पांच दिनों से सर्दी-जुकाम से पीड़ित रहे हैं, इसलिए फ्रिज बंद करके रखना पड़ा है। बच्चे तो कुछ भी कहते रहते हैं।’’

‘‘न बाबा न! बच्चे झूठ न बोलें।’’ उन्होंने सिर मटकाते हुए कहा।

हम थोड़ी देर चुप रहे। फिर उन्हें धीरे से गर्म हवा के बीच शीतल पुरवाई की तरह फुसलाते हुए चर्चा के विषय को बदल दिया।

एक दिन पत्नी हमें धमकाते हुए बोली, ‘‘देखो जी, पाकिस्तान के तानाशाहों की तरह तानाशाही प्रवृत्ति अब इस घर में नहीं चलेगी। हम सब ऊब चुके हैं। अगर आप अभी भारतीय राष्ट्रपति की तरह ‘रबर स्टाम्प’ नहीं बनते तो मैं बच्चों के साथ सैनिकों की तरह विद्रोह कर मायके चली जाऊंगी।’’

‘‘क्या हुआ? क्यों गर्म दल के नेता की तरह गर्मागर्म बातें कर रही हो?’’ हमने उनके आक्रोश को जानने का प्रयास किया।

‘‘तुम्हारी बिजली-बचत की कंजूसी ने हम सबको इंसान से भुट्टे का भुरता बना दिया है।’’ वे संसद में विपक्षी नेता की भांति हमारी कमजोरियों पर उंगलियां उठाते हुए बोली।

‘‘मैं क्या कर सकता हूं?’’ हमने भी सत्तापक्ष के नेता की भांति पूरे गर्व से जवाब दिया।

‘‘तुम कुछ नहीं कर सकते तो हम करेंगे। आज और अभी से पंखे, कूलर, फ्रिज यानी सब शीत प्रदायक यंत्र अपनी पूरी गति से घूमेंगे। अगर आपने रोकने का प्रयास किया तो हमारे तेवर भी जेठ के तपते सूरज से कम नहीं होंगे।’’ पत्नी की जुबान पर महंगाई भत्ते के लिए अड़े कर्मचारी संघों की भांति आन्दोलन झलक रहा था।

पूरे सदस्य एक तरफ और हम वीराने में खड़े अकेले पेड़ की तरह हवा के थपेड़ों से कब तक जूझ सकते थे। अंततः संघर्ष के इस दौर में अपने सारे गुण-दोष सूखते पत्तों की तरह झड़ा दिए।

घर में बिजली मनमाने ढ़ंग से खर्च की जा रही थी। मीटर का चक्र ऐसे घूम रहा था जैसे नॉन स्टॉप ट्रेन का पहिया। पर बिजली के खर्च को देखकर हमारा जिया ऐसे जल रहा था मानो बिजली के शॉर्ट सर्किट से टायर फैक्टरी में लगी आग। और इस वक्त आग बुझाने के लिए अग्नि शामक दल न हो।

महीना गुजरा। बिजली का बिल आया पूरे दो हजार रुपये। एक पल बिल देखकर हमें यूं लगा मानो धारा प्रवाहित बिजली का नंगा तार हमने अपने हाथों से पकड़ लिया है। पूरा बदन झनझना रहा था और हम फड़फड़ा रहे थे। हम धम्म से कुर्सी पर बैठ गए। थोड़ी देर तक गर्मी की भरी दोपहरी में गांव की गलियों की भांति खामोश रहे।

कुछ देर बाद जब पत्नी की नजर हम पर पड़ी तो उन्होंने पूछा, ‘‘क्या हुआ? हवा में पीपल के पत्तों की तरह खड़खड़ाते रहने वाले आप इतने खामोश क्यों हो?’’ हमारी खामोशी पर उन्होंने जैसे व्यंग्य बाण छोड़े।

‘‘हमें खामोश ही रहने दो।’’ हमने कहा।

‘‘क्या हुआ? तबीयत खराब लग रही है या फिर लू लग गई। कहो तो आम का पना लेकर आती हूं या फिर डॉक्टर के पास फोन करूं!’’ इसी बीच उसने हमारे माथे व बदन पर हाथ रखकर देखा, ‘‘कुछ तो महसूस नहीं हो रहा है। न बदन इतना गर्म है कि बुखार हो और न ही इतना ठंडा कि ब्लडप्रैशर डाउन हुआ हो।’’

‘‘तुम ठीक कह रही हो। मुझे दोनों प्रकार की शिकायत नहीं है। यह देख रही हो बिजली का बिल। पूरे दो हजार रुपये! और यूं ही बिजली का बिल आता रहा तो मेरे घरेलू बजट का भट्ठा बैठ जाएगा।’’

‘‘क्या हुआ? गर्मी है ... बिजली खर्च हो रही है ... इतना बिल आ गया तो कौनसा पहाड़ टूटकर गिर पड़ा। अपने यहां तो कम बिल आया है। वो शर्मा जी के यहां पूरे पांच हजार का बिल आया है।’’

‘‘शर्मा जी और मुझमें अंतर है।’’

‘‘कुछ अंतर नहीं है। आप और वह दोनों एक पद एक वेतनमान वाले कर्मचारी हैं। फिर किस बात का अंतर।’’

‘‘मतलब तुम चाहती हो कि मैं शर्मा जैसे लोगों की बराबरी करूं।’’

‘‘क्यों नहीं। लोग अपने घर के बिजली का बिल देखकर मजाक उड़ाते हैं। कहते हैं कि आप लोग दीया-लालटेन जलाकर रहते हैं, जो इतना कम बिल आता है या फिर बिजली की चोरी करते हैं। कभी-कभी तो इतना कम बिल आता है कि मुझे बताते हुए शर्म आती है।’’ पत्नी ने अपने बड़प्पन को पड़ोसियों द्वारा पहुंचाई गई चोट को उघाड़कर दिखाते हुए कहा।

‘‘तुम शर्म करो और शर्माती रहो। घर में एक भी बिजली का उपकरण अनावश्यक रूप से नहीं चलेगा। मेरा मतलब जरूरत से भी कम चलेंगे।’’ हमने अधिकारी की तरह आदेश देकर कहा।

‘‘क्या कहा आपने? अगर ऐसे नहीं चलेंगे तो वैसे तुम्हारा बिजली का मीटर चलेगा मगर बिल कम नहीं आएगा। मोहल्ले में हमारी इमेज का सवाल है।’’ पत्नी ने पूरे जोश से आन्दोलनरत नारियों की शैली में कहा।

‘‘क्या कहा, बिजली के बिल के सहारे मोहल्ले में अपनी इमेज बनाओगी?’’ हमने कहा।

‘‘और नहीं तो क्या करूंगी? देखती हूं, बिजली का बिल कैसे कम आता है?’’ पत्नी ने कहा।

‘‘क्या करोगी?’’

‘‘सारे बिजली के उपकरण तो चलेंगे ही, साथ ही आपके तानाशाही गुरूर को तोड़ने के लिए एक-दो सौ वाट के बिजली के बल्ब भी बिजली रहने तक निरन्तर जलेंगे।’’ पत्नी ने कहा।

‘‘क्या कह रही हो?’’ हमने कहा।

‘‘गीता की कसम खाकर कहती हूं कि जो भी कह रही हूं, सच कह रही हूं, सच के सिवा कुछ भी नहीं कह रही हूं।’ पत्नी ने पूरे जोश से कहा।

बात बढ़ती रही, जैसे अदालत में सुनवाई चल रही हो। अंततः दोनों अपने-अपने में तन गए।

चार-पांच दिनों तक दोनों ओर से खामोशी छाई रही। किसी भी चीज की जरूरत के लिए बच्चों का सहारा ढूंढ़ते।

एक दिन हमने मौन तोड़ते हुए पत्नी से कहा, ‘‘एक कप चाय बनाओ।’’

‘‘इतनी गर्मी में चाय पीओगे।’’ पत्नी ने भी खामोशी तोड़ते हुए कहा।

‘‘मैं सब दिन एक-सा जीना चाहता हूं।’’ हमने कहा।

‘‘नहीं, हमारे रहते हुए आप गर्मी में ‘ठंडा’ ही लेंगे।’’ पत्नी ने कहा।

‘‘नहीं शूट नहीं होता।’’

‘‘होगा ... कैसे नहीं होगा!’’

पत्नी फ्रिज में ठंडा किया हुआ नींबू का शर्बत ले आई।

‘‘लो पीओ। इससे तन-मन और मस्तिष्क में ठंडक बनी रहेगी।’’

हमने पीया और गिलास को टेबल पर रखते हुए कहा, ‘‘किसी पहाड़ी स्थल पर जाने का मन हो रहा है।’’

‘‘अचानक कैसे हिम्मत कर बैठे?’’

‘‘बस यूं ही दफ्तर के सभी लोग जा रहे हैं ... मैं अकेला छूट रहा हूं।’’

‘‘छूट जाइए, क्या फर्क पड़ता है।’’

‘‘क्या ... तुम्हारी तरह मेरी भी इमेज का सवाल है।’’

‘‘अचानक यह बदलाव ... वह भी इमेज की चिन्ता के साथ! फिर बिजली का भारी भरकम बिल कौन जमा करेगा?’’ पत्नी ने कहा।

‘‘पर जितने दिन वहां रहेंगे, उतने दिन की बिजली भी तो बचेगी। हां और तुम वो गीता वाली कसम के सहारे बिजली का बिल बढ़ाने वाले उपाय चलता छोड़कर तो नहीं जाओगी न!’’

पत्नी हंसने लगी, ‘‘नहीं! गीता की कसम तो मैंने बस यूं ही खाई थी, जैसे न्यायालय में गवाह अथवा अपराधी अदालती कार्यवाही के दौरान खा लेते हैं।’’ (एम सी एन)

श्री सुनील कुमार ‘सजल’ से सम्पर्क करना चाहें तो उनसे उनके मोबाइल नं. 9424915776 पर सम्पर्क कर सकते हैं।

जादुई चिमटा


एक दिन बाजार में एक आदमी तलवार बेच रहा था।

‘‘इसकी कीमत क्या है?’’ होजा ने पूछा।

‘‘सोने की पचास मोहरें!’’ आदमी ने जवाब दिया।

‘‘एक तलवार की कीमत सोने की पचास मोहरें?’’ होजा ने हैरान होते हुए पूछा।

‘‘यह जादुई तलवार है मियां!’’ उस आदमी ने जवाब देते हुए कहा, ‘‘जब आप इससे वार करेंगे, तब यह खुद ब खुद लंबी हो जाएगी और दुश्मन पर टूट पड़ेगी, चाहे वह आपसे कितनी भी दूरी पर हो!’’

उस व्यक्ति की बात सुनकर होजा लंबे-लंबे डग भरते हुए अपने घर जा पहुंचे और घर से एक बड़ा सा चिमटा लेकर वापस लौटे। फिर चिमटा उस आदमी को थमाते हुए बोले, ‘‘तुम इसे 100 सोने की मोहरों के बदले बेच दो।’’

‘‘लेकिन यह तो मामूली चिमटा है।’’ उस व्यक्ति ने एतराज करते हुए कहा।

‘‘यह चिमटा जादुई भी है दोस्त’’ होजा ने उत्तर दिया, ‘‘क्योंकि जब मेरी बीवी इसे मेरी तरफ फैंकती है तो यह हवा में उड़ता हुआ ठीक मुझे आ लगता है, चाहे मैं उससे कितनी भी दूर क्यों न होऊं!’’ (मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स)

अहंकारी राजा


एक सम्राट अपने आगे किसी को कुछ नहीं समझता था। वह अपने अहंकार और स्वार्थ के तहत यही समझता था कि वह जो कुछ भी कर रहा है, बिल्कुल ठीक कर रहा है। वह खुद को दुनिया का बेहतरीन सम्राट समझता था। नगरवासी उसे अपने पैरों की जूती के समान लगने लगे थे। किसी भी आयोजन के लिए आने वाले निमंत्रण पर वह अपने प्रतिनिधि के रूप में अपनी जूतियां ही भेज देता था।

प्रजा राजा के इस व्यवहार से बहुत परेशान थी। युवा वर्ग का मानना था कि राजा सठिया गया है तो ऐसे में हम उसे अपने आयोजनों में ही क्यों बुलायें किन्तु वृद्धजन, कोई नई मुसीबत उन्हें न घेर ले, इस डर से हमेशा राजा के पास न्यौता भेज देते। वे जानते थे कि विरोध किया तो किसी पिंजरे में बंद शेर की भांति मिमियाकर ही रह जाएंगे लेकिन कुछ समझदार लोग सम्राट को सबक सिखाने के लिए उचित अवसर की प्रतीक्षा कर रहे थे।

मौका भी शीघ्र आ गया। सम्राट ने अपने पुत्र के विवाह में सम्मिलित होने के लिए प्रजा को निमंत्रण दिया। सबने मिलकर विचार-विमर्श किया। सभी का एक ही जवाब था, ‘‘अब हम और बर्दाश्त नहीं कर सकते। यह स्वर्ण अवसर है और इस अवसर को हाथ से निकलने देना हमारी जिंदगी की सबसे बड़ी मूर्खता होगी।’’

हालांकि वृद्धजन इसके पक्ष में नहीं थे क्योंकि उन्हें लग रहा था कि राजा वैसे ही सनकी मिजाज के होते हैं, इसलिए कहीं उल्टा-सीधा फतवा जारी कर दिया तो जीवन के ही लाले पड़ जाएंगे पर युवा वर्ग के तर्कों और जिद के सामने उन्होंने हार मान ली।

योजनानुसार सारे नगरवासियों ने मिलकर अपनी-अपनी जूतियां राजा के यहां भेज दी और साथ ही कहलवा दिया, ‘‘राजन्! हमें माफ करना, हमारे पास वक्त नहीं था, इसलिए अपनी जूतियां भेज रहे हैं। ये जूतियां ही हमारा प्रतिनिधित्व करेंगी।’’

इस घटना से राजा का अहम् एक ही क्षण में हिम की भांति गल गया। राजा की आंखें खुल गई। उसे आज महसूस हुआ कि जब वह स्वयं इस तरह लोगों के यहां अपनी जूतियां भेजता था तो उन्हें कैसा महसूस होता होगा? मैं जिस प्रजा के बल पर हूं, आज अगर वही प्रजा मेरे साथ नहीं है तो मैं किसका राजा हुआ? जमीन, महल, दीवारें किसी को राजा नहीं बनाती। प्रजा के बल पर ही राजा पराक्रमी और प्रतापी बनता है, जब प्रजा राजा का और राजा प्रजा का सम्मान करे। यह विचार कर राजा ने अपने अभी तक के किए व्यवहार के लिए प्रजा से माफी मांगी। (मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स)

कम्प्यूटर की-बोर्ड बन रहे हैं जीवाणुओं का अड्डा

-- योगेश कुमार गोयल


होनोलुलु में ट्रिपलर आर्मी मेडिकल सेंटर के संक्रामक रोग विशेषज्ञों के एक दल ने आईयूसी (आपात चिकित्सा इकाई) के 10 कम्प्यूटर की-बोर्ड का दो महीने में 8 बार संवर्धन किया तो पाया कि करीब 25 प्रतिशत की-बोर्ड में स्टेफाइलोक्कोकस औरेस जीवाणु की मौजूदगी है, जिनमें कई की एंटीबायोटिक के प्रति प्रतिरोधकता विकसित हो गई थी। आईयूसी में रखे कम्प्यूटरों के की-बोर्ड में प्राणघातक गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल संक्रमण पैदा करने वाले एंटरोकोकस जीवाणु भी मिले। की-बोर्ड की जांच किसी महामारी के फैलने के कारण नहीं की गई थी बल्कि यह जानने के लिए की गई थी कि कहीं कम्प्यूटर की-बोर्ड भी हानिकारक बैक्टीरिया के भंडारक तो नहीं हैं। शोधकर्ताओं ने पाया कि कम्प्यूटर के की-बोर्ड भी खतरनाक जीवाणुओें के अड्डे बन गए हैं।

रक्तचाप घटाइए, याद्दाश्त बढ़ाइए
बढ़ते रक्तचाप का संबंध हृदय रोगों और हार्ट अटैक से माना जाता रहा है। इसी कारण यह मान्यता रही है कि यदि किसी व्यक्ति का रक्तचाप बढ़ा हो तो चिकित्सकीय परामर्श लेकर इसे कम करके हृदय रोगों और हृदयाघात से बचा जा सकता है लेकिन एक अध्ययन से यह तथ्य उभरकर सामने आया है कि रक्तचाप कम करके न सिर्फ हृदयाघात व हृदय संबंधी अन्य बीमारियों से बचा जा सकता है बल्कि रक्तचाप कम करके याद्दाश्त भी बढ़ाई जा सकती है। यह शोध लॉस एंजिल्स कॉलेज ऑफ यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने किया था। शोधकर्ताओं का कहना है कि उच्च रक्तचाप के कारण याद्दाश्त में कमी होने वाले व्यक्ति अपना रक्त दबाव कम करके स्मरण शक्ति में सुधार ला सकते हैं। यह शोध उच्च रक्तचाप से पीड़ित 66 व्यक्तियों पर किया गया था।

मोबाइल फोन बना सकता है मनोरोगी

मोबाइल फोन के अधिक इस्तेमाल के स्वास्थ्य संबंधी दुप्रभावों के बारे में वैज्ञानिक कई रहस्योद्घाटन कर चुके हैं। अब वैज्ञानिकों का कहना है कि विज्ञान की नवीनतम खोज हासिल करने को आतुर बैठे व्यक्तियों को अब ऐसे अत्याधुनिक मोबाइल फोन, जिनमें इंटरनेट सेवाएं भी हैं, से सावधान रहना होगा। पश्चिमी जर्मनी की ओल्डनबर्ग यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्री उवे शिनेडविंड का कहना है कि हर समय अपने मोबाइल फोन से चिपके रहना मानसिक स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो सकता है। उनका कहना है कि पहले विक्रय प्रतिनिधि कार चलाते समय अपने क्लाइंट के साथ गर्मागर्म बहसों से बच जाया करते थे और इस दौरान उनका मस्तिष्क थोड़ा बहुत आराम कर लेता था किन्तु अब इस समय का उपयोग वह ई-मेल व फैक्स भेजने में करता है, जिससे मस्तिष्क को आराम नहीं मिल पाता। इससे तनाव और थकान बढ़ती है। शिनेडविंड का कहना है कि पहले लोग यह सोचकर मोबाइल फोन अपने पास रखते थे कि वे अपनों की पहुंच में रहेंगे परन्तु अब वे मोबाइल फोन में स्थित वाइस मेल बॉक्स विकल्प चालू कर देते हैं। इससे आराम करने के समय भी इसका उपयोग थकान बढ़ाने में कर लिया जाता है।

Monday, June 14, 2010

सुना आपने?


महिलाओं के मुकाबले कम सुनते हैं पुरूष

-- योगेश कुमार गोयल (मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स)

अमेरिकी वैज्ञानिकों की बात पर विश्वास करें तो पुरूष हमेशा महिलाओं से कम ही सुनते हैं क्योंकि वे सुनने के लिए दिमाग के सिर्फ एक ही हिस्से का इस्तेमाल करते हैं। इस निष्कर्ष के आधार पर वैज्ञानिक महिलाओं को अब यह सलाह दे रहे हैं कि यदि आपके पति या बड़े भाई अथवा परिवार का अन्य कोई पुरूष आपकी बात को अनसुना करते हुए टीवी पर क्रिकेट मैच देखने में मग्न हो तो आप निराश न हों क्योंकि महिलाओं के मुकाबले पुरूष वाकई कम सुनते हैं।

वैज्ञानिकों का कहना है कि सच तो यह है कि पुरूष सुनने के लिए अपने दिमाग का सिर्फ एक ही हिस्सा इस्तेमाल करते हैं जबकि महिलाएं मस्तिष्क के दोनों हिस्सों से सुनती हैं और शायद इसी वजह से बहुत सी महिलाओं को अपने पति बहरे नजर आते हैं। यह अजीबोगरीब निष्कर्ष कैलिफोनिया वि.वि. के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक शोध के बाद निकाला गया है। शोध द्वारा वैज्ञानिकों ने पता लगाया कि मस्तिष्क में ऐमिगडिला नामक एक छोटा सा हिस्सा होता है, जो भावनात्मक जानकारियों को संचालित करता है। महिलाएं और पुरूष ऐमिगडिला के अलग-अलग हिस्सों द्वारा यह जानकारी संचालित करते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि मस्तिष्क का ऐमिगडिला क्षेत्र मनोभाव और याद्दाश्त को नियंत्रित करता है। शोध में यह भी बताया गया कि पुरूष सुनने के लिए जहां अपने मस्तिष्क के एक ही हिस्से का उपयोग करते हैं, वहीं महिलाएं सुनने के अपने मस्तिष्क के दोनों हिस्सों का प्रयोग करती हैं। इस तथ्य को साबित करने के लिए डॉक्टर लैरी हिल ने 11 पुरूषों और 11 महिलाओं को डरावनी फिल्में दिखाई और पता लगाया कि महिलाएं और पुरूष फिल्म की कहानी को अलग-अलग तरीकों से ऐमिगडिला में स्टोर करते हैं। पुरूषों को फिल्म में दिखाई गई कारों के रंग साफ-साफ याद थे जबकि महिलाओं को कारों के रंग के बजाय अपराधी के बालों और कपड़ों का रंग ज्यादा अच्छी तरह से याद था।

इस शोध के नतीजों के आधार पर वैज्ञानिकों का मानना है कि ऐमिगडिला के दोनों हिस्से अलग-अलग जानकारियों को नियंत्रित करते हैं। 11 पुरूषों और 11 महिलाओं पर किए गए इस शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने पाया कि ऐमिगडिला का एक हिस्सा फिल्म की बारीकियों को इकट्ठा कर रहा था जबकि दूसरा हिस्सा मोटी जानकारियां एकत्रित कर रहा था। वैज्ञानिकों का कहना है कि महिलाओं और पुरूषों के अनुभव अलग-अलग होते हैं, इसलिए वे इन अनुभवों के मायने भी अलग-अलग तरीकों से ही तय करते हैं। (मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स)

Saturday, June 12, 2010

अति तनाव की दवा से दूर होगी नपुंसकता

प्रस्तुति: योगेश कुमार गोयल

डॉक्टर से सलाह लिए बगैर गलत दवा खा लेने से कई बार मरीज को दवा के साइड इफैक्ट्स का सामना करना पड़ता है, जिसका उसके स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है लेकिन कभी-कभी किसी दवा का साइड इफैक्ट भी मरीज के लिए उपयोगी हो जाता है। कुछ स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि हाइपरटेंशन यानी अति तनाव के समय ली जाने वाली दवा का साइड इफैक्ट खासतौर से पुरूषों के लिए उपयोगी होता है।

एक शोध के दौरान पाया गया कि लोसर्टन नामक एक दवा, जो तनाव कम करने के लिए ली जाती है, पुरूषों की सैक्स संबंधी समस्याओं का निवारण करने में बहुत उपयोगी साबित होती है। यह दवा सामान्यतः उच्च रक्तचाप के कारण पुरूषों में पैदा होने वाली नपुंसकता को दूर करने में काफी प्रभावकारी सिद्ध होती है। शोधकर्ताओं ने पाया कि हाइपरटेंशन के शिकार जिन लोगों ने लोसर्टन दवा का सेवन किया, उनमें से ज्यादातर की सैक्स संबंधी क्रियाओं में जबरदस्त सुधार हो गया और उन्होंने अपनी यौन संबंधी समस्याओं में काफी कमी पाई।
शोधकर्ताओं ने हाइपरटेंशन और यौन संबंधी गड़बड़ियों से परेशान 82 पुरूषों को करीब तीन माह तक इलाज के तौर पर केवल यही दवा खाने को दी और इस अवधि के बाद उन्होंने पाया कि इनमें से करीब 88 फीसदी पुरूषों की सैक्स लाइफ में काफी सुधार हो गया और नामर्द पुरूषों का प्रतिशत भी 75 प्रतिशत से घटकर सिर्फ 12 रह गया।
शोधकर्ताओं का कहना है कि अति तनाव अर्थात् हाइपरटेंशन की अन्य दवाओं की तुलना में इस दवा के कोई हानिकारक प्रभाव भी नहीं हैं बल्कि यह अति तनाव के कारण जननेन्द्रिय की कमजोर हो गई रक्त वाहिनियों को मजबूती प्रदान करती है, जिससे ऐसे व्यक्ति की नपुंसकता की समस्या भी धीरे-धीरे खत्म हो जाती है। (मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स)

सकारात्मक दृष्टिकोण रखें, स्वस्थ रहें

प्रस्तुति: योगेश कुमार गोयल

शोधकर्ताओं का कहना है कि शारीरिक कमियों और बीमारियों से जल्दी छुटकारा पाने में व्यक्ति का सकारात्मक दृष्टिकोण बहुत उपयोगी साबित होता है। उनका कहना है कि भले ही आप दिल की बीमारी से पीड़ित हों, आपका ऑपरेशन होने जा रहा हो या आप किसी पुरानी शारीरिक बीमारी से परेशान हों, इन तमाम तकलीफों से मुक्ति पाकर आप कितनी जल्दी चुस्त-दुरूस्त हो सकते हैं, यह तय करने में आपका दृष्टिकोण बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सकारात्मक विचारों से भरपूर व्यक्ति अपनी इच्छाशक्ति के दम पर बीमारी से लड़ने का हौंसला पैदा कर लेता है और सामान्य होने के लिए दवाएं जितनी महत्वपूर्ण होती हैं, उतना ही महत्वपूर्ण व्यक्ति का जीवन के प्रति सकारात्मक रवैया भी होता है।

शोधकर्ता हालांकि यह बता पाने में असमर्थ हैं कि आखिर सकारात्मक विचार किस तरह बीमारियों से लड़कर दुरूस्त होने में मदद करते हैं। शोध टीम के प्रमुख डा. डोनाल्ड सी कोल ने इस विषय पर इससे पूर्व किए गए सभी शोधों का अध्ययन करने के बाद स्वयं भी मरीजों के विचारों, उनके स्वयं के ठीक होने या न होने के दृष्टिकोण तथा इलाज के बाद उनकी स्वास्थ्य रिपोर्टों का गहन अध्ययन किया। अध्ययन के दौरान उन्होंने पाया कि जिन लोगों का अपने ठीक होने के प्रति सकारात्मक रवैया था, उनके स्वास्थ्य परिणाम दूसरों की तुलना में ज्यादा बेहतर पाए गए और वे दूसरों की तुलना में जल्दी ठीक हो गए। डा. कोल का कहना है कि इस अध्ययन में इस बात के प्रमाण मिले हैं कि नकारात्मक मनोवृत्ति रखने वाले लोग इसके वशीभूत होकर स्वयं परेशानियों के सामने घुटने टेक देते हैं और वे उनसे डटकर मुकाबला करने का साहस जुटाने के बजाय यह मान बैठते हैं कि अब वे कभी सामान्य नहीं हो पाएंगे। मरीजों के ऐसे विचार ही उनके जल्दी ठीक हो जाने के अवसरों को कम करते हैं। डा. कोल का कहना है कि मरीज को उसके नकारात्मक दृष्टिकोण से उबारने में मनोवैज्ञानिक काफी सहयोग कर सकते हैं। (मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स)

कुछ रोचक बातें फिल्मों और फिल्म सितारों की

प्रस्तुति : मीडिया केयर नेटवर्क

’ पुणे फिल्म इंस्टीच्यूट से डिप्लोमा लेकर मुम्बई में जया बच्चन जुहू की उसी बिल्डिंग में रहती थी, जिसमें रेखा रहती थी। आगे चलकर दोनों ने खूब नाम कमाया और साथ में फिल्म ‘सिलसिला’ की।

’ अभिनेत्री माला सिन्हा का असली नाम उनकी बुआ आइडा से प्रेरित होकर एल्डा सिन्हा रखा गया था।

’ जब महात्मा गांधी ने मुम्बई के ग्वालिया टैक स्थित ‘क्रांति मैदान’ में क्रांति का नारा लगाया था तो उस सभा में पृथ्वीराज कपूर के साथ 6 वर्षीय शशि कपूर भी उपस्थित थे।

’ लीना चंद्रावरकर को शक्ति सांवत ने एक कांटेस्ट में फेल किया था, जिस कारण उन्हें धारवाड़ लौटना पड़ा था लेकिन आगे चलकर इसी लीना को सुनील दत्त ने अपनी फिल्म ‘मन का मीत’ में ब्रेक दिया।

’ पहलाज निहालानी की सुपरहिट फिल्म ‘आंखें’ में दिव्या भारती की मौत के बाद उनके स्थान पर रागेश्वरी को लिया गया था।

’ प्रसिद्ध निर्देशक महेश भट्ट ने कैरियर की शुरूआत राज खोसला के सहायक के रूप में की थी।

’ देवानंद की सिफारिश पर गुरूदत्त ने राज खोसला को अपना सहायक बनाया था और आगे चलकर देवानंद ने राज खोसला के निर्देशन में कई फिल्मों में अभिनय किया।

’ विमल कुमार की निर्मात्री पत्नी मनीषा विमल 1974 में बनी फिल्म ‘हम जंगली हैं’ में किरण कुमार की हीरोइन थी।

’ दीपक बलराज विज की फिल्म ‘बम ब्लास्ट’ का पूर्व शीर्षक ‘जान जानू जानम’ था।

’ 5 अगस्त 1974 को अभिनेत्री तनुजा ने एक पुत्री को जन्म दिया था। वह बच्ची ही आज बड़ी होकर काजोल के नाम से फिल्म इंडस्ट्री की टॉप हीरोइन बन चुकी है।

’ सोवियत संघ से अलग हुए राज्य उज्बेकिस्तान में आज भी राजकपूर और वैजयंती माला की फिल्मों को बड़े चाव से देखा जाता है।

’ के. आसिफ की फिल्म ‘मुगले आजम’ में संगतराश की भूमिका निभाने वाले अभिनेता कुमार ने एम. कुमार के नाम से ‘धुन’, ‘देवर’ और ‘बहाना’ फिल्मों का निर्माण किया था।

’ हास्य अभिनेता महमूद ने अपने कैरियर की शुरूआत बतौर ड्राइवर की थी। वे प्रसिद्ध निर्माता निर्देशक पी. एल. संतोषी की कार चलाया करते थे।

’ हेमंत कुमार द्वारा निर्मित व बीरेन नाग द्वारा निर्देशित फिल्म ‘बीस साल बाद’ (वहीदा रहमान-विश्वजीत) की कहानी सुप्रसिद्ध ब्रिटिश उपन्यासकार कानन डायल के उपन्यास ‘दि भास्कर विला’ से प्रेरित थी।

’ अपने जमाने के प्रसिद्ध चरित्र अभिनेता एस. नजीर का निधन अपने पैतृक गांव जाते हुए उस समय हुआ, जब वे रास्ते में पड़ने वाले एक रेलवे स्टेशन पर पानी पीने के लिए उतरे। पुलिस तथा किसी अन्य व्यक्ति द्वारा पहचाने न जाने के कारण उनका अंतिम संस्कार एक लावारिस के तौर पर कर दिया गया।

’ आज की प्रसिद्ध टी.वी. आर्टिस्ट व संचालिका फरीदा जलाल ने अपने एक्टिंग कैरियर की शुरूआत फिल्म ‘बहारों की मंजिल’ (मीना कुमारी-धर्मेन्द्र) से की थी।

’ प्रसिद्ध गीतकार हसरत जयपुरी फिल्मों में आने से पूर्व बस कंडक्टरी किया करते थे।

’ निर्माता निर्देशक ए. आर. कारदार की फिल्म ‘जीवन ज्योति’ पहली ऐसी फिल्म थी, जिसे मुम्बई के ‘नाज’ और ‘लिबर्टी’ सिनेमाघरों में एक साथ रिलीज किया गया था।

’ अभिनेता प्राण ने अपने कैरियर की शुरूआत ‘आरसी’ और ‘आह’ जैसी भावनात्मक भूमिकाएं निभाकर की थी लेकिन सफलता न मिलने के कारण वे खलनायिकी करने लगे और डी. डी. कश्यप की फिल्म ‘बड़ी बहन’ से वे चोटी के खलनायक बन गए। (एम सी एन)

Wednesday, June 09, 2010

पेट में ही शहद का भण्डारण करती हैं मधु चींटियां


-- योगेश कुमार गोयल (मीडिया केयर नेटवर्क)

शहद की चींटियां, जिन्हें ‘मधु चींटियां’ कहा जाता है, प्रायः अफ्रीका, आस्ट्रेलिया, अमेरिका तथा न्यूगिनी में पाई जाती हैं। विश्वभर में पाई जाने वाली अन्य चींटियों की भांति ही मधु चींटियों में भी रानी चींटी अण्डे देती है और मजदूर चींटियां उन अण्डों को सेने का काम करती हैं। मधु चींटियां प्रायः छोटे-छोटे समूहों में ही रहती हैं और कीड़ों तथा कुछ विशेष प्रकार के पौधों की कोंपलों से रस चूस-चूसकर आपातकाल के लिए इकट्ठा करती हैं। इस तरल पदार्थ (शहद) का भण्डारण स्थल भी बड़ा विचित्र होता है। आपको जानकर हैरानी होगी कि इसका भण्डारण ये अन्य किसी स्थान पर नहीं करती बल्कि कुछ विशेष प्रकार की चींटियों का पेट ही यह भण्डारण स्थल होता है। अपने पेट में रखी शहद की इन बूंदों से ही ये चींटियां अपना भोजन भी प्राप्त करती रहती हैं। जब इनका पेट शहद से भर जाता है तो यह सुनहरे पीले रंग का हो जाता है। आपातकाल के समय या बाहर भोजन की आपूर्ति में कमी आने पर ये चींटियां अपने पेट से शहद की एक-एक बूंद बाहर उगल देती हैं। इससे छत्ते की मजदूर चींटियां अपना पेट भरती हैं। मधु चींटियों को विश्वभर के कई हिस्सों में लोग स्वादिष्ट व्यंजन के रूप में भी उपयोग करते हैं, खासकर मैक्सिको में तो इन चींटियों के घोंसलों को ऊंची कीमतों पर बेचा जाता है। वहां लोग शहद की चींटियां प्राप्त करने के लिए इनके घोंसलों को ढूंढ़ते रहते हैं। (एम सी एन)

40 साल में अण्डे से व्यस्क बनते हैं ‘ज्यूल बीटल’

-- योगेश कुमार गोयल (मीडिया केयर नेटवर्क)

समूचे यूरोप के जंगलों में पाए जाने वाले ‘ज्यूल बीटल’ नामक कीट अत्यंत दुर्लभ कीट माने जाते हैं। इन कीटों की शारीरिक चमक बड़ी अनूठी होती है। इस कीट की सबसे बड़ी विलक्षणता यह है कि अण्डे से व्यस्क बीटल बनने में बहुत लंबा समय लगता है। इस प्रक्रिया में प्रायः 40 वर्ष तक का समय भी लग जाता है। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस कीट का जीवनकाल कितना लंबा होता है। मादा बीटल किसी जीवित वृक्ष की छाल पर अपने अण्डे देती है और इन अण्डों से निकलने वाले लार्वे छाल के अंदर पेड़ में ही अपना भोजन तलाशते हैं। उस पेड़ को काटकर गिरा दिए जाने के बाद भी यह लार्वा उसी के भीतर रहकर अपना भोजन तब तक प्राप्त करते हैं, जब तक उन्हें प्राप्त होता रहे और एक पूर्ण विकसित बीटल के रूप में ही बाहर निकलते हैं। इस कीट को ‘स्पैंडर बीटल’ के नाम से भी जाना जाता है। आप यह भी जानना चाहेंगे कि इसे ‘ज्यूल बीटल’ क्यों कहा जाता है? इसका कारण यह है कि यूरोप के कटिबंधीय क्षेत्रों में इन बीटल्स को इनकी अनूठी चमक के कारण लोग अपने आभूषणों (ज्वैलरी) में भी जड़ते हैं, यही कारण है कि इन्हें ‘ज्यूल बीटल’ भी कहा जाने लगा। हालांकि यूरोप के कुछ देशों में इन्हें पकड़ने और मारने पर कानूनी प्रतिबंध लागू हैं। (एम सी एन)

टांगों से खून की पिचकारी छोड़ता है ‘लेडी बर्ड’

-- योगेश कुमार गोयल (मीडिया केयर नेटवर्क)

जी नहीं, ‘लेडी बर्ड’ अपने नाम के अनुरूप कोई मादा पक्षी नहीं है, न ही यह कोई नर पक्षी है बल्कि वास्तव में यह एक ऐसा आकर्षक रंग-बिरंगा भुनगा है, जो अपनी टांगों से खून की पिचकारी छोड़ने के लिए जाना जाता है। यह भुनगा अपनी टांगों से खून की पिचकारी बेवजह ही नहीं छोड़ता बल्कि जब यह किसी दूसरे जीव-जंतु को देखकर घबरा जाता है या भयभीत होता है, तभी अपनी टांगों से रक्त की पिचकारी छोड़ता है। सवाल यह है कि आखिर टांगों से इतना खून निकाल देने के बाद भी यह जीवित कैसे रहता है? इसका कारण यह है कि इस भुनगे के शरीर में सिर्फ रक्तवाहिनियों में ही रक्त नहीं रहता बल्कि इसके पूरे शरीर में रक्त भरा रहता है। सारे शरीर में भरा यह रक्त इसके सभी अंग-प्रत्यंगों को भिगोये रखता है। जब यह कोई खतरा भांपकर भयभीत अवस्था में रक्त की पिचकारी छोड़ना चाहता है, तब यह अपने पेट को दबाकर शरीर में रक्त दबाव बढ़ा लेता है। इस वजह से इसकी टांगों के जोड़ों की पतली त्वचा एकाएक फट जाती है और वहां से खून ऐसे निकल पड़ता है, मानो इसने खून की पिचकारी छोड़ी हो। (एम सी एन)

समय बहुमूल्य है, अतः एक-एक पल का सदुपयोग सार्थक कार्यों में करें.