प्रस्तुति: मीडिया केयर नेटवर्क ब्यूरो हिन्दी फिल्में अभी तक अमूमन ‘रामायण’ को ही ध्यान में रखकर बनती थी। इस धार्मिक ग्रंथ के प्रति हमारे यहां के लोगों में खास श्रद्धा है। जनमानस की इसी श्रद्धा को भुनाने की गरज से हिन्दी फिल्मों के लेखकों ने प्रायः ऐसी कहानियां लिखी, जिनमें हीरो को आधुनिक राम और विलेन को रावण के रूप में चित्रित किया गया। कहानी में रोमांस डालने की चाहत में उन्होंने हीरोइन को सीता जैसी पत्नी बनाने के पहले आदर्श प्रेमिका के रूप में प्रस्तुत किया, जो अपने भावी जीवनसाथी के हर सुख-दुख की भागीदार बनी। समय बदला और फिर ऐसी भी कहानियां लिखी गई, जिनमें एक ही हीरोइन के पीछे दो हीरो मजनूं बने नजर आए या फिर एक नायक को पाने के लिए दो-दो नायिकाएं लैला बनी दिखी लेकिन इन सभी फिल्मों में एक बात जो कॉमन थी, वो थी फिल्म का सुखांत होना। तीन घंटे की फिल्म में हीरो-हीरोइन को भले ही तमाम मुसीबतों का सामना करना पड़ा हो मगर दि एंड के पांच मिनट पहले ही संकेत मिल जाता था कि अब इनके मिलन को कोई नहीं रोक पाएगा। हमारा फिल्मोद्योग यूं ‘महाभारत’ से भी ज्यादा प्रभावित नहीं रहा मगर एक जैसे क्लाइमैक्स स...