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Monday, October 15, 2012

मलाला के जज्बे को सलाम!



-- श्रीगोपाल ‘नारसन’ (मीडिया केयर नेटवर्क)


इन दिनों नवरात्र चल रहे हैं। मां दुर्गा के सभी नौ रूपों की पूजा की जा रही है। देवी भक्त नौ दिनों तक लगातार उपवासरत रहकर देवी मां की अराधना कर रहे हैं और कन्याओं को देवी रूप मानकर उनकी पूजा अर्चना कर रहे हैं लेकिन पाकिस्तान में एक ऐसी देवी है, जिसने कट्टरपंथी तालिबान को धूल चटा दी है। मात्र 11 साल की आयु से इन कट्टरपंथी तालिबानियों से बिना किसी हथियार के लोहा लेने वाली इस देवी का नाम मलाला यूसुफजई है।
यूं तो मलाला यूसुफजई पाकिस्तान के स्वात जिले के मिंगोरा शहर की एक साधारण लड़की ही थी और एक स्कूल में पढ़ने जाया करती थी। उसे स्कूल और किताबों के सिवाय कुछ मालूम न था। तभी सन् 2007 में एक दिन जब वह रोजाना की तरह स्कूल गई तो उसे अपना स्कूल बंद मिला। जब उसने स्कूल बंद होने का कारण जानना चाहा तो उसे बताया गया कि तालिबान के फरमान से स्कूल हमेशा के लिए बंद कर दिया गया है।

मलाला को स्कूल का अचानक यूं बंद होना बहुत बुरा लगा और वह घर लौटकर रात भर सो नहीं पाई। उसने अपने अब्बा से तालिबान की इस गलत हेकड़ी को लेकर लंबी चर्चा की। वह चाहती थी कि तालिबान की इस हरकत का सब विरोध करें लेकिन जब दूसरा कोई तैयार नहीं हुआ तो मलाला ने स्वयं ही तालिबान के खिलाफ मोर्चा तानने का फैसला कर लिया।
शुरू-शुरू में उसके अब्बा ने उसे समझाया भी कि बेटी अभी तुम्हारी उम्र बहुत कम है, तुम कैसे इन कट्टरपंथियों को सबक सिखा पाओगी लेकिन मलाला अपनी जिद पर अड़ी रही और उसने तालिबान को सीधी उसी के घर में चुनौती देते हुए अपनी हमउम्र लड़कियों को तालीम दिलाने का फैसला कर लिया। मलाला को तालीम की अहमियत का पता ही तब चला, जब तालिबानियों ने उसके स्कूल को जबरन बंद करा दिया। जबरन स्कूल बंदी से मलाला में कायम हुए प्रतिवाद के इस गजब के जज्बे ने उसे आगे बढ़ने का हौंसला दिया और वह तालिबानियों के फरमान के खिलाफ तालीम की लौ जलाने में कामयाब होती चली गई। तालिबान को छोड़कर सभी ने मलाला के इस हौंसले की दाद दी और उसके अब्बा, जो कि स्वयं भी एक शिक्षाविद् व जाने-माने शायर हैं, ने अपनी बेटी के इस गजब के हौंसले में उड़ान भरने के लिए पंख लगाए।
इस बालिका के समाज को बदलने और तालिबान की मनमानी रोकने की पहल से प्रभावित होकर बीबीसी उर्दू ने मलाला की दास्तां डायरी रूप में प्रसारित करनी शुरू की। हालांकि इस डायरी के प्रसारण में मलाला की पहचान छिपाते हुए उसे ‘गुल मकई’ नाम दिया गया। यह नाम मलाला और उसकी अम्मी को बहुत भाया। धीरे-धीरे आम जनमानस और कट्टरपंथी तालिबान को भी पता चल गया कि मलाला ही ‘गुल मकई’ है। बस फिर क्या था, पाकिस्तान समेत दुनियाभर के देशों में मलाला के हौंसले की तारीफ होने लगी। स्वयं पाकिस्तान सरकार ने मलाला के इस कदम को मुल्क की तरक्की में मील का पत्थर बताया और तालिबान से लोहा लेकर देश में अमन का नया रास्ता खोलने के एवज में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने सन् 2011 में मलाला को राष्ट्रीय युवा शांति पुरस्कार से नवाजा। शायद मलाला पाकिस्तान में सबसे कम उम्र की ऐसी लड़की है, जिसे यह राष्ट्रीय सम्मान हासिल हुआ।
लेकिन मलाला के हौंसले से घबराए तालिबान को जब अपना अस्तित्व ही खतरे में पड़ता नजर आया तो उन्होंने मलाला के माध्यम से पूरी कौम को चुनौती देने के लिए मलाला पर बीती 9 अक्तूबर को जानलेवा हमला कर दिया। यह हमला उस समय हुआ, जब मलाला स्कूल से घर वापस लौट रही थी। तालिबानियों ने उसके सिर पर गोली चलाई। गोली मलाला के सिर में लग गई और वह मौके पर ही बेहोश हो गई। इन दिनों मलाला अस्पताल में अपना इलाज करा रही है। पूरी दुनिया के लोगों ने मलाला के शीघ्र स्वस्थ होने की दुआएं मांगी। पाकिस्तान की नन्हीं-मुन्नी उन बच्चियों से लेकर, जिनके हकों की लड़ाई मलाला लड़ रही है, बड़ों-बड़ों तक ने मलाला पर हुए हमले को कायराना हरकत बताते हुए उसकी सलामती की दुआएं की हैं। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री मलाला को देखने के लिए स्वयं अस्पताल गए तो अमेरिका की विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन तक ने मलाला के हौंसले को सलाम किया और तालिबान की हरकत को निन्दनीय बताया।
लेकिन तालिबान अभी भी धमकी दे रहा है कि वह मलाला को जिन्दा नहीं छोड़ेगा। दरअसल यह पाकिस्तान सरकार की कमजोरी ही है, जो तालिबान बार-बार सिर उठा रहा है। अभी तक तालिबान जैसे हिंसावादी सगंठनों का उपयोग भारत के लिए करते रहे पाकिस्तान को भी अब उसी आग में झुलसना पड़ रहा है, जिस आग को फैलाकर अशान्ति पैदा करने में पाकिस्तान अव्वल रहा है लेकिन मलाला जैसी शख्सियत का बाल भी बांका न हो और वह फले-फूले, इसके लिए भारत ही नहीं, पूरी दुनिया तालिबानियों से टकराव मोल ले सकती है। हमें मलाला के जज्बे को सलाम करना चाहिए, जो मात्र 11 साल की उम्र से निहत्थी रहकर भी तालिबानियों के लिए चुनौती का सबब बनी है।
नवरात्र के दिनों में अगर देवी पूजा करने वाले सभी देवी भक्त मलाला जैसी देवी दुनिया के हर देश, हर शहर व हर गांव में पैदा होने दें तो वह दिन दूर नहीं, जब कन्या भ्रूण हत्या करने वालो को मलाला जैसी शख्सियत सलाखों के पीछे पहुंचाने में देर नहीं लगाएगी और आधी दुनिया यानी नारी जाति के सम्मान की सहजता के साथ रक्षा हो सकेगी। बस, अब जरूरत है तो इस बात की कि मलाला की जान की हर हाल में हिफाजत हो और वह फिर से तालिबान को उनके घर में ही नेस्तनाबूद कर स्त्री शिक्षा की दुनिया भर में संवाहक बने। तभी दुनिया से कट्टरपंथियों की शिक्षा विरोधी सोच का अन्त होगा और शिक्षा ही तरक्की का नया पैमाना बन सकेगी। (एम सी एन)
(‘मीडिया केयर ग्रुप’ की विशेष प्रस्तुति)

2 comments:

रविकर said...

वीर मलाला-

उगती जब नागफनी दिल में, मरुभूमि बबूल समूल सँभाला ।
बरसों बरसात नहीं पहुँची, धरती जलती अति दाहक ज्वाला ।
उठती जब गर्म हवा तल से, दस मंजिल हो भरमात कराला ।
पढ़ती तलिबान प्रशासन में, डरती लड़की नहिं वीर मलाला ।।

रविकर said...

उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।।

समय बहुमूल्य है, अतः एक-एक पल का सदुपयोग सार्थक कार्यों में करें.