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Saturday, March 19, 2011

कहीं बरसें अंगार तो कहीं रंगों की बौछार

होली पर विशेष

. डा. अनिल शर्मा ‘अनिल’ (मीडिया केयर नेटवर्क)

फाल्गुन की मदमाती मस्त बयार और होली का रंगीला त्यौहार। वास्तव में इनके संगम में ऐसा उल्लास होता है, जिसकी मस्ती हर प्राणी के सिर चढ़कर बोलती है। भारतीय संस्कृति के अभिन्न अंग होली को मनाने की रोचक परम्पराएं भारत के हर प्रांत एवं क्षेत्र में अलग-अलग हैं। राजस्थान के हाड़ौती क्षेत्र की कोड़ामार होली, बादशाही होली, ब्रज क्षेत्र की लट्ठमार होली, बंगाल की डोल पूर्णिमा, धामपुर का होली हवन जुलूस और जयपुर की हाथियों पर बैठकर खेली जाने वाली होली की तो जगत प्रसिद्ध परम्पराएं हैं। होली के रंगीले अवसर पर मीडिया केयर नेटवर्क की खास पेशकश में ऐसी ही कुछ रोचक परम्पराओं की ऐसी झलक प्रस्तुत हैं, जिनसे होली की मस्ती-उमंग कई गुना बढ़ जाती हैं।

’ ब्रज क्षेत्र (उत्तर प्रदेश) की होली राधा-कृष्ण की होली मानी जाती है। नंदगांव बरसाने की लट्ठमार होली तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हो चुकी है।

’ इसी क्षेत्र के फालैन गांव की होली में पण्डा जलता होली के बीच से गुजरता है। इस दृश्य को देखने के लिए वहां भारी भीड़ जमा होती है।

’ राजस्थान के हाड़ौती क्षेत्र में कोड़ामार होली व बादशाही होली मनाई जाती है तो बाड़मेर क्षेत्र में पत्थरमार होली। यहां के महावीर मंदिर में भी लट्ठमार होली का आयोजन होता है।

’ जयपुर में होली पर हाथियों पर बैठकर खेली जाने वाली होली को देखने के लिए देश-विदेश से बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं।

’ गुजरात में होली को बुआ कहते हुए उसके पुतले जलाने के बाद प्रसाद भी बांटा जाता है। यहां इस त्यौहार को ‘हुलोसनी’ भी कहा जाता है।

’ महाराष्ट्र में जलती होली के चारों ओर नाच होता है। दिन में घर में झाडू की पूजा करने के बाद इन्हें जला देते हैं। इसे ‘शिमगा’ भी कहा जाता है। मान्यता है कि झाडू जला देने से आपदाएं नहीं आती।

’ असम, उड़ीसा, मणिपुर व बंगाल में होली पर्व पर राधा-कृष्ण संबंधी नृत्यों का आयोजन किया जाता है। इनमें इस पर्व को ‘डोलयात्रा’ के रूप में मनाते हुए राधा-कृष्ण की झांकी सजाकर शोभायात्रा निकालने की भी परम्परा है। उड़ीसा में इसे ‘तिग्या’ भी कहा जाता है।

’ गुजरात में मामा अपने नवजात भांजे को गोदी लेकर होली की परिक्रमा करता है। कहीं-कहीं नवविवाहित जोड़ा भी होली की फेरी (परिक्रमा) लेता है।

’ महाराष्ट्र में होलिका दहन की राख से कुवांरी कन्याएं दूसरे दिन गौरी मैया की तस्वीर बनाती हैं। ऐसा माना जाता है कि इस पूजा से प्रसन्न गौरी माता उन्हें मनचाहा वर प्राप्त करने का आशीर्वाद देती हैं।

’ धामपुर (उत्तर प्रदेश) में तो फागुन शुक्ल एकादशी से ही रंगों की बौछार शुरू हो जाती है, जो होलिका दहन के बाद निकलने वाले होली हवन जुलूस और रंगों की बौछार के साथ ही सम्पन्न होती है। इस बीच अन्य विविध आयोजन भी होते हैं।

’ काशी व वाराणसी की होली तो ठंडाई के बिना पूरी ही नहीं होती। यहां विभिन्न हास्य कवि गोष्ठियों व कार्यक्रमों के अलावा विशेष होली साहित्य के प्रकाशन की भी परम्परा है।

’ पंजाब में आनंदपुर का ‘होला मोहल्ला’ तो जगत प्रसिद्ध है। यहां कुश्तियों के दंगल होने के अलावा रंगों की बौछार भी जमकर होती है।

’ हिमाचल प्रदेश में होली पर ‘दंदोध’ नामक पौधे की पूजा की परम्परा है। होली की राख इस विश्वास के साथ खेतों में बिखेरी जाती है कि इस वर्ष फसल अच्छी होगी।

’ मालवा के लोग होली दहन के बाद एक दूसरे पर जलते अंगारे फैंकते हैं। ऐसी मान्यता है कि जलते अंगारों के डर से बुरी हवा / आत्मा भाग जाती है।

’ पश्चिम बंगाल में गधे पर एक व्यक्ति को बिठाकर ‘होली का राजा’ बनाने और हंसी-मजाक करने की परम्परा है।

’ कर्नाटक में तो ‘मदन दहन’ यानी ‘काम दहन’ के रूप में होली मनाने की परम्परा है। यहां एक सुंदर युवक को कामदेव बनाया जाता है और उसे लोग खूब दौड़ाते हैं, उसके पीछे भागते हैं। यह प्रथा कामदेव को भस्म करने का प्रतीक है।

’ बुन्देलखण्ड की गुड़ पाने की होली की प्रथा बहुत रोचक है। इसमें एक ऊंचे खम्भे पर गुड़ रखा जाता है। लोग गुड़ पाने के लिए खम्भे पर चढ़ते हैं और महिलाएं लाठी के वार करते हुए उन्हें खम्भे पर चढ़ने से रोकती हैं।

’ लबांदि जाति (तमिलनाडु) में तो होली के दिन पुरूष महिलाओं के हाथ से भोजन को छीनने का प्रयास करते हैं। छीना-झपटी के दौरान हंसी-मजाक चलता है और बाद में सहभोज होता है।

बहरहाल, प्रथाएं तो हर जगह की भिन्न-भिन्न हैं परन्तु उद्देश्य एक ही है - होली की मस्ती में मस्त होना। (एम सी एन)

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