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Monday, October 18, 2010

क्या पत्रकार का असहाय होना जुर्म है?


आज ना जाने क्यों अपने पत्रकार और ईमानदार होने पर पहली बार शर्म आ रही है। आज दिल चाह रहा है कि अपने सीनियर्स जिन्होंने हमको ईमानदार रहने के लिए शिक्षा दी उन पर मुकदमा कर दूं। साथ ही ये भी दिल चाह रहा है कि नई जनरेशन को बोल दूं कि ख़बर हो या ना हो, मगर ख़ुद को मजबूत करो।

कम से कम इतना मज़बूत तो कर ही लो कि अगर तु्म्हारी बेगुनाह माता जी को ही पुलिस किसी निजी द्वेश की वजह से ब्लैकमेल करते हुए थाने में बिठा ले तो मजबूर ना होना। थानेदार से लेकर सीओ, एसएसपी, डीआईजी, आईजी, डीजी समेत सूबे की मुखिया तक को उसकी औक़ात के हिसाब से ख़रीदते चले जाना। मगर मां के एक आंसू को भी थाने में मत गिरने देना। ये मैं इसलिए नहीं कह रहा कि तुम्हारी बेबसी से तुम्हारा अपमान हो जाएगा। बल्कि अगर अपमान की वजह से किसी बदनसीब की बेगुनाह की मां की आंख का एक क़तरा भी थाने में गिर गया तो यक़ीन मानना उस एक कतरे के सैलाब में कोई भी व्यवस्था बह जाएगी।

आज मेरे एक दोस्त की, बल्कि मेरी ही माता जी के उत्तर प्रदेश पुलिस के हाथों होने वाले अपमान की ख़बर मिली। ना जाने क्यों ऐसा लगा कि किसी ने मेरे पूरे बदन से कपड़े ही नोंच लिए हों । उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ीपुर की इस घटना के बारे में मैं सिर्फ इतना ही कहूंगा कि भले ही हर पत्रकार का अपना एक दायरा हो। उसकी जान पहचान बहुत लम्बी हो। उसके एक फोन पर लोग छोड़े और पक़डे जाते हों। मगर जिसकी मैं बात कर रहा हूं उसको देश का कोई ऐसा पत्रकार नहीं जो ना जानता हो। कई बड़े अखबारों में रह कर आज वो एक ऐसी संस्था चला रहा है जिसने देश की पत्रकारिता को एक नए अध्याय से जोडा है। सबसे ख़ास बात ये कि आज अगर भारत के पत्रकारों का कोई एक मंच है, तो वो उसका जनक है।

मैं निसंकोच बात कर रहा हूं यशवंत की। यानि मैं भ़ड़ास4मीडिया के सर्वेसर्वा की बात कर रहा हूं। अक्सर कई पत्रकार साथियों के साथ हुए मामलों पर यशवंत की बेबाकी और उसकी जुर्रत ने ये साबित किया कि कोई आवाज़ तो है जो पत्रकारों की बात करती है। मगर अफसोस उत्तर प्रदेश में उसी यशवंत की माता और पूरे परिवार को बंधक बना लिया गया। पुलिस के हाथो बंधक बनाये जाने के पीछे तर्क ये था कि तुम्हारे परिवार के कुछ लोगों ने गम्भीर अपराध किया है। उनको ले आओ और परिजनों को ले जाओ। तकरीबन 12 घंटे तक एक बेटा जो रोजी रोटी की तलाश मे देश की राजधानी में आया था, सैंकड़ों मील दूर थाने में बैठे अपने परिवार और माता जी को छुड़ाने के लिए अधिकारियों से लेकर अपने पत्रकार साथियों से गुहार लगाता रहा। आखिर वही हुआ। यानि आरोपी जब तक पुलिस के हत्थे नहीं लगे ये बेचारे वहां पर अपमान का घूंट पीते रहे।

ख़ास बात ये है कि एक दलित और महिला के राज में किसी बेबस महिला का पुलिस अपमान किस बूते पर कर सकती है। कौन सा क़ानून है जिसकी दम पर किसी दूसरे व्यक्ति के अपराध के लिए किसी दूसरे को बंधक बना कर ब्लैकमेल किया जा सके। पुलिस का तर्क था कि ऊपर से दबाव था। उत्तर प्रदेश प्रशासन के इस कारनामे को देख कर अनायास ही ख़्याल आया कि अगर कोई ये पूछे कि उत्तर प्रदेश भी भारत का ही हिस्सा है। तो आप या तो उसको पागल कहोगे या फिर सिर फिरा। लेकिन मुझे आपके इस पागल और सिरफिरे के सवाल में दम नज़र आ रहा है। उत्तर प्रदेश जहां के बारे में सिर्फ ख़बरे पढ़ कर ही नहीं बल्कि ख़ुद ख़बरें करके कई बार देखा है कि आजकल दिल्ली से चंद किलोमीटर दूर यहां की सीमाओं में घुसते ही ना जाने क्यों लगने लगता है कि कुछ बदला बदला सा है। कानून के रखवालों के नाम पर मानो खुद लुटेरों ने कमान सम्भाल ली हो। टूटी सड़के बता रही हैं कि ठेकेदार से लेकर अफसरों और बहन जी तक ठीक ठाक बंटवारा पहुचा दिया गया है। भले ही दलित भूख से मर जाएं मगर मूर्ति का साइज़ छोटा नहीं हो सकता।

इतना ही नहीं सूचना के अधिकार अधिनियम में भी कांट छांट की अगर किसी ने हिम्मत की है तो सिर्फ उत्तर प्रदेश की मौजूदा सरकार ने। इतना ही नहीं मेरे पास मौजूद दर्जनों फाइलों में कैद दस्तावेज ये साबित करने के लिए काफी हैं कि यहां क़ानून तक का मज़ाक़ उड़ाना प्रशासन के बाएं हाथ का खेल है। यानि कुल मिला कर अगर कहा जाए कि जो क़ानून देस भर में या किसी भी अन्य प्रदेश मे पूरी तरह से प्रभावी है तो वो उत्तर प्रदेश में बेबस सा नज़र आता है। ऐसे में किसी कमज़ोर पत्रकार की माता जी और परिवार को पुलिस 12 घंटे तक मानसिक प्रताड़ना देती रहे तो कोई ताज्जुब नहीं।

लेकिन धन्य है वो माता जिसने अपने पत्रकार बेटे को एक ऐसी स्टोरी मुहय्या करा दी जिससे उत्तर प्रदेश के पूरे तंत्र को ही नहीं बल्कि उन तमाम लोगों को भी बेनक़ाब कर दिया है जो बात तो करते हैं जनता की मगर महज़ वोटों की हद तक। उत्तर प्रदेश सरकार की आलोचना करने वाले कांग्रेसियों को बुरा ना लगे तो एक बात कहूं। वो महज़ राजनीति में बीच वाले की हैसियत से सिर्फ हथेलियां बजा कर काम चलाना चाहते हैं। काग्रेस के रंग रूप को देखकर किन्नर और भी सम्मानित नज़र आने लगते हैं। जनता को बयानों से बहकाने वाली काग्रेस अगर सूबे की सत्ता में नहीं है तो क्या वो जनता को बेबस तड़पते देखने को ही राजनीति मानती है। या फिर राजनीतिक अवसर वाद के तहत किसी समझौते पर अमल किया जा रहा है।

उधर लोहिया के क़ाग़ज़ी शेर भी बहन जी के नाम से दुम दबा कर बैठे हैं। जनता की कमाई लुट रही है। और नेता जी को परिवार वाद से ही फुरसत नहीं। और केंद्र में विपक्ष के नाम पर राजनीतिक बुज़दिली का प्रतीक बन चुकी बीजेपी भले ही भगवानों के नाम पर बगले बजाती फिरे मगर आम जनता के हितों को लेकर शायद उसको किसी समझौता का आज भी इंतज़ार है। एक असहाय पत्रकार की माता जी का उत्तर प्रदेश पुलिस के हाथों अपमान भले ही टीआरपी के सौदागरों के लिए कोई बड़ी ख़बर ना हो मगर ये सवाल है उन लोगों से जो बाते तो करते हैं बड़ी बड़ी मगर उनकी सोच है बहुत ही छोटी। अगर आज इस सवाल पर बात ना की गई तो फिर मत कहना कि कोई पत्रकार किसी की लाश को महज़ इस डर से बेच रहा है कि पुलिस को देने के लिए पैसा ना हुए तो उसके साथ भी......!!!!!!!!!!!!!

--- आज़ाद ख़ालिद

(लेखक आज़ाद ख़ालिद चैनल 1 में बतौर न्यूज़ हैड जुड़े रहे और इस चैनल को लांच कराया. डीडी, आंखों देखी से होते हुए तकरीबन 6 साल तक सहारा टीवी में रहे. एक साप्ताहिक क्राइम शो तफ्तीश को बतौर एंकर और प्रोड्यूसर प्रस्तुत किया. इंडिया टीवी, एस1, आज़ाद न्यूज़ के बाद वीओआई बतौर एसआईटी हेड काम किया. इन दिनों खुद का एक साप्ताहिक हिंदी अख़बार 'दि मैन इ अपोज़िशन' और न्यूज वेबसाइट oppositionnews.com चला रहे हैं. )

2 comments:

honesty project democracy said...

निश्चय ही बृद्ध महिला को पुलिस द्वारा 12 घंटों तक बंधन बनाना एक गंभीर मामला है और इस मामले में दोषी पुलिस वालों को सजा होनी ही चाहिए...चाहे इसके लिए मायावती की सरकार कुछ भी करे...देश के हर वर्ग के लोगों को एक स्वर से इस मुद्दे को मजबूती प्रदान करने का प्रयास करना चाहिए...

Azad Khalid said...

good

समय बहुमूल्य है, अतः एक-एक पल का सदुपयोग सार्थक कार्यों में करें.