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Tuesday, December 14, 2010

खतरे में है ‘पहाड़ों की रानी’ मसूरी


- श्रीगोपाल ‘नारसन’ -

दिन के बजाय रात को अधिक चमकने वाली ‘पहाड़ों की रानी’ मसूरी धरती डोलने पर कभी भी ध्वस्त हो सकती है। वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक टैक्निकल जांच सर्वे में यह महत्वपूर्ण और सनसनीखेज खुलासा हुआ है कि मसूरी में करीब पौने दो शताब्दियों पहले बनी हैरिटेज इमारतें भूकम्प के खतरों को नहीं झेल पाएंगी, वहीं मसूरी में 94 प्रतिशत भवन ईंट व पत्थरों से बने होने के कारण भूकम्प के भारी झटकों में देखते ही देखते ध्वस्त हो सकते हैं, जिस कारण पहाड़ों की रानी मसूरी भी अब सुरक्षित नहीं रह गई है।

पर्वत श्रृंखलाओं पर बसी होने के कारण मसूरी में ऊंचे-नीचे रास्ते हैं, वहीं अधिकांश भवन भी पर्वत श्रृंखलाओं पर बने हैं परन्तु ये पर्वत श्रृंखलायें और उन पर बने भवन उतने मजबूत नहीं रह गए हैं, जो भूकम्प आपदा का सामना कर सकें। आईआईटी रूड़की एवं डीएमएमसी द्वारा संयुक्त रूप से किए गए इस सर्वे में कहा गया है कि मसूरी में भवन निर्माण के समय भूकम्परोधी उपायों की अनदेखी की गई है और मौजूदा समय में भी भूकम्परोधी तकनीक न अपनाए जाने से मसूरी खतरे की जद में आ गई है।

हाल ही में प्रकाशित इस सर्वे विषयक शोध पत्र में यह बताया गया है कि मौजूदा समय में मसूरी में 3344 मकान हैं, जिन्हें लेकर भूकम्पीय दृष्टि से तकनीकी अध्ययन किया गया। मसूरी की ऐतिहासिक विरासत खोजते हुए वैज्ञानिकों ने पाया कि मसूरी में सन् 1836 के बने घर भी मौजूद हैं जबकि एक अस्पताल सन् 1857 का बना हुआ है तथा एक स्कूल तो उससे भी पहले सन् 1845 का बना हुआ है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि सन् 1905 में भूकम्प का तगड़ा झटका झेल चुकी मसूरी में यदि फिर जलजला आता है तो शहर के आधे से भी अधिक भवन धराशायी या फिर बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो जाएंगे, जिससे करीब ढ़ाई सौ करोड़ रुपये का नुकसान मसूरी को झेलना पड़ सकता है।

इस समय मसूरी भले ही रात के समय बिजली की रंगीन रोशनी में और दिन के समय सुहावने मौसम और हरियाली से नहा रही हो, भले ही माल रोड़ पर देशी-विदेशी पर्यटकों का जमावड़ा लगा हुआ हो, भले ही मसूरी की झील और गनहिल की रौनक बरकरार हो, भले ही अठारहवीं सदी की लाइब्रेरी, आईएएस प्रशिक्षण अकादमी, लण्टोर बाजार, रमणीक लक्ष्मीनारायण मंदिर, अंग्रेजों के जमाने के चर्च के लिए मसूरी में आने को लोग आतुर रहते हों लेकिन यदि वैज्ञानिकों की भूकम्प आपदा आशंका सच हो गई तो पहाड़ों की रानी का अस्तित्व ही मिट जाएगा।

केन्द्रीय भवन अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक यादवेन्द्र पाण्डेय बताते हैं कि मसूरी तथा अन्य पर्वतीय शहरों और गांवों में भूकम्प रोधी तकनीक अपनाकर भवन निर्माण किए जाने की जरूरत है। साथ ही भू-स्खलन से भी भवनों को कम से कम नुकसान पहुंचे व जनहानि न हो, इसके लिए नई तकनीक के भवनों को अपनाए जाने की आवश्यकता है।

मसूरी के खतरे की जद में होने का कारण भूकम्प का कारण बनने वाली भूगर्भीय दरार का मसूरी के पास से गुजरना माना जा रहा है। वैज्ञानिकों की राय है कि भूकम्प कभी भी मसूरी के विनाश का कारण बन सकता है, जिससे बचाव के लिए अभी से ऐहतियात बरतने की जरूरत है, तभी पहाड़ों की रानी मसूरी को आने वाले भूकम्पीय खतरों से बचाया जा सकता है। (एम सी एन)

(लेखक देश की तीन प्रतिष्ठित फीचर एजेंसियों के समूह ‘मीडिया केयर ग्रुप’ से जुड़े टिप्पणीकार हैं)

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