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Tuesday, December 14, 2010

कैसे सुधरे हॉकी की सूरत?


- नरेन्द्र देवांगन -
सन् 1928 के ओलम्पिक गेम्स में भारत की हॉकी टीम पहली बार मैदान में उतरी थी और गोल्ड मैडल जीत लिया था। तब से 1956 के ओलम्पिक तक भारत की जीत का सिलसिला निर्बाध चलता रहा। भारत ने लगातार 6 गोल्ड मैडल जीते। सम्मोहक स्टिक वर्क, चतुर डॉज और ड्रिबल का लाजवाब हुनर ऐसा कि दर्शक वाह-वाह कर उठते थे। वर्ष 1956 के ओलम्पिक में इस हुनर का नाम ही ‘इंडियन ड्रिबल’ पड़ गया था। यह सुनहरा सिलसिला 1960 के रोम ओलम्पिक में खत्म हो गया, जब फाइनल में पाकिस्तान ने भारत को 1-0 से हरा दिया और लेस्ली क्लाडियस की टीम को सिल्वर मैडल से ही संतुष्ट होना पड़ा।

भारत फिर उभरा और 1964 के टोक्यो ओलम्पिक में स्वर्ण पदक हासिल कर लिया लेकिन भारतीय हॉकी को चुनौतियां मिलने लगी थी और उसका वर्चस्व समाप्ति के कगार पर था। फिर 1968 और 1972 में लगातार दो बार भारत को सिर्फ कांस्य पदक से ही संतोष करना पड़ा। मांट्रियल ओलम्पिक (1976) में तो भारत की बड़ी दुर्दशा हुई थी, जब टीम लुढ़ककर एकदम सातवें स्थान पर पहुंच गई थी। मास्को ओलम्पिक तो आधा अधूरा था क्योंकि आस्ट्रेलिया, यूरोप और अमेरिका सहित एशिया के कई देशों ने भी इसका बहिष्कार किया था। इसलिए भारत यहां आसानी से जीत गया था लेकिन स्वर्ण पदक में वो चमक और आभा नहीं थी क्योंकि जर्मनी, हॉलैंड और ग्रेट ब्रिटेन जैसे यूरोपीय देशों ने इसमें हिस्सा नहीं लिया था। तब से भारतीय हॉकी में लगातार गिरावट आती चली गई। भारतीय हॉकी टीम 2008 के बीजिंग ओलम्पिक स्पर्धा से ही बाहर हो गई।

भारतीय हॉकी की इस दुर्दशा के पीछे कहीं न कहीं हॉकी के प्रति सरकार की उदासीन नीति और भारतीय हॉकी महासंघ को ही उत्तरदायी माना जाएगा। हर हार के बाद खिलाडियों और कोच को जिम्मेदार ठहराया जाता है किन्तु हॉकी महासंघ के पदाधिकारी पाक-साफ बच जाते हैं। राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत, राष्ट्र चिन्ह आदि के प्रति यदि हम वाकई संवेदनशील हैं तो राष्ट्रीय खेल की उपेक्षा आखिर क्यों? कोई भी खेल किसी न किसी देश का प्रतिनिधित्व करता है। जब यह खेल हमारा राष्ट्रीय खेल है तो उसमें उम्दा प्रदर्शन करना तो हमारा कर्त्तव्य बनता है।

आज के समय में हॉकी में कई नई तकनीकों का समावेश हुआ है लेकिन भारतीय हॉकी में कहीं भी वह दिखाई नहीं देता। हम पहले जैसे परम्परागत खेल को अपनाए हुए हैं। हॉकी की बदली शैली और घास के मैदान के बजाय एस्ट्रो टर्फ के चलन से तालमेल बैठाने में विफल रहने के कारण भी हम पिछड़े हैं। आज हॉकी के मैदान में भारत के मुकाबले पाकिस्तान कहीं मजबूती से पैर जमाए हुए है। आधुनिक हॉकी में दक्षिण कोरिया हमारे लिए सबक होना चाहिए।

1970 के दशक के मध्य से भारतीय हॉकी में गिरावट आनी तब शुरू हो गई, जब एस्ट्रो टर्फ पर हॉकी खेली जाने लगी। उपमहाद्वीप के खिलाड़ी, जो घास के मैदान पर हॉकी के सुलतान थे, कृत्रिम मैदानों पर अपनी क्लासिक हॉकी का तारतम्य नहीं मिला सके। हॉकी के जो खिलाड़ी ध्यानचंद की परम्परा में ड्रिबलिंग के उस्ताद थे, तेज कृत्रिम मैदानों पर फिसलने और चोट खाकर अपमानित महसूस करने लगे। गेंद तेज रफ्तार में मैदान के एक सिरे से दूसरे सिरे तक पहुंचने लगी और वो इस रफ्तार से पीछे छूटने लगे। मैदान से घास क्या गायब हुई, कलात्मक हॉकी का गला ही घुट गया। हॉकी में फुटबॉल जैसा पावर प्ले शुरू हो गया। इसके साथ ही यूरोपीय स्टाइल की तेज और दनादन हिटों वाली हॉकी के समर्थन में खेल के नियम भी बदले जाने लगे। कई लोगों का कहना है कि भारतीय हॉकी और उसके प्रशासक इन परिवर्तनों व इनसे पैदा होने वाले अन्याय को चुपचाप स्वीकार करते चले गए।

घास पर खेली जाने वाली कलात्मक हॉकी के समर्थक आज भी कहते हैं कि टेनिस की ही तरह हॉकी को भी भिन्न-भिन्न प्रकार के मैदानों पर खेला जाना चाहिए। टेनिस सपाट चट मैदान पर, घास और एस्ट्रो टर्फ पर खेली जाती है। हॉकी को घास के मैदान से हटाकर उसके साथ बहुत बड़ी नाइंसाफी की गई है। हॉकी के मुरीदों का तर्क है कि चैम्पियन टीमें वो ही होंगी, जो सभी तरह के मैदानों पर अपने हुनर का कमाल दिखाएंगी। दूसरी तरफ हॉकी के आधुनिक समर्थकों का कहना है कि भारत को अंतर्राष्ट्रीय हॉकी में हो चुके नए परिवर्तनों के अनुसार खुद को ढ़ालना चाहिए और इस काम में विदेशी कोच ही उसे बेहतर बना सकते हैं। कहा जाता है कि हॉकी के आस्ट्रेलियाई जादूगर रिक चार्ल्सवर्थ, जो भारतीय हॉकी फेडरेशन के तकनीकी सलाहकार हैं, को भारतीय हॉकी टीम का कोच नियुक्त किया जाना चाहिए था।

अब परिदृश्य बहुत बदल चुका है। हॉकी अब कृत्रिम सतह पर खेली जाती है, जो कि पूर्व में मौजूद प्राकृतिक सतह से भिन्न होने के कारण प्रारम्भिक स्तर पर खेलने वाले युवाओं के लिए अजूबा ही बनी हुई है। एस्ट्रो टर्फ जहां बहुत खर्चीले हैं, वहीं उनका रखरखाव भी महंगा है। आज हमारे देश में मौजूद 600 जिलों में से 10 प्रतिशत अर्थात् 60 जिलों में भी एस्ट्रो टर्फ नहीं है। वहीं महंगी खेल सामग्री, स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षकों की सुविधाएं न होना आदि कुछ प्रमुख बिन्दु हैं, जिसके कारण हॉकी का जनाधार देश में घट रहा है।

उपरोक्त कारणों पर विचार करने पर यह बात सामने आती है कि प्रमुख रूप से अच्छे खेल मैदानों की कमी एवं प्रशिक्षण का अभाव हॉकी पर विपरीत प्रभाव डाल रहा है। राष्ट्रीय खेल होने के नाते हमारी खेल नीति में यह स्पष्ट कर दिया जाना चाहिए कि देश की समस्त शैक्षणिक संस्थाएं, चाहे वे स्कूल हों या कॉलेज, उनके यहां हॉकी का मैदान होना अनिवार्य हो। स्तरीय प्रशिक्षकों के अभाव में पूर्व खिलाड़ियों को प्रशिक्षण का भार सौंपकर प्रतिदिन अभ्यास कराया जाना चाहिए।

यदि हमें एस्ट्रो टर्फ पर होने वाली तेज हॉकी के लिए बच्चों को उसी अनुरूप तैयार करना है तो एस्ट्रो टर्फ के समान गति वाले, कम खर्च में और आसानी से हर जगह तैयार किए जा सकें, ऐसे मैदानों का निर्माण करना होगा। इसके लिए ठोस समतल धरातल पर अधिक मात्रा में रेत मिलाकर चट मैदान तैयार किया जा सकता है। इस तरह से तैयार मैदान पर खेलने के लिए एस्ट्रो टर्फ पर प्रयोग की जाने वाली गेंदों का उपयोग किया जाए तो खेल की गति कमोवेश वही होगी, जो एस्ट्रो टर्फ पर होती है। इस तरह से तैयार किए जाने वाले मैदानों की लागत स्थानीय स्तर पर ही उपलब्ध सामग्री के उपयोग होने से बहुत कम होगी। फलस्वरूप देश में हर जिले या तहसील स्तर में ऐसे मैदान अधिक संख्या में तैयार किए जा सकते हैं। साथ ही रखरखाव पर भी व्यय कम आने के कारण लंबे समय तक उपयोग भी किया जा सकेंगे। एस्ट्रो टर्फ पर प्रयोग की जाने वाली गेंद परम्परागत लेदर की गेंदों से सस्ती तथा अधिक समय तक चलने के कारण दैनिक अभ्यास व्यय भी कम हो जाएगा।

भारतीय हॉकी में कोच का जीवन बहुत ही छोटा होता है। जब भी टीम हारी तो कोच पर कुल्हाड़ा चल गया। भारतीय हॉकी के भविष्य की खातिर इंडियन हॉकी फेडरेशन को चाहिए कि वो क्लासिकल और आधुनिक हॉकी का सुंदर सम्मिश्रण लाने का प्रयास करें। (एम सी एन)
(लेखक देश की तीन प्रतिष्ठित फीचर एजेंसियों के समूह ‘मीडिया केयर ग्रुप’ से जुड़े हैं)

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