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Tuesday, December 14, 2010

लघुकथा : लाडली


- विक्की नरूला -

‘‘सुनो जी, मैं कहती हूं आपकी लाडली रीना के लिए कोई अच्छा सा लड़का देखकर इसके हाथ पीले कर देते हैं।’’ रश्मि ने अपने पति सागर से कहा।

‘‘अरे तुम पागल हो गई हो, अभी अपनी रीना की उम्र ही क्या है? अभी तो उसके खेलने खाने की उम्र है। उसने सिर्फ मैट्रिक पास की है। अभी तो उसे शहर के कॉलेज में पढ़ना है, आगे बढ़ना है। मैं उसे पढ़ा-लिखाकर एक काबिल डॉक्टर बनाकर ही उसकी शादी करूंगा।’’ सागर ने रश्मि को समझाया।

‘‘अजी रहने दो। शहर के कॉलेजों में माहौल बेहद खराब है। वहां अच्छे बुरे सब तरह के लड़के पढ़ते हैं। कहीं रीना के कदम बहक गए तो! जमाना बड़ा खराब है, इसलिए रीना को आगे मत पढ़ाओ।’’ रश्मि कहकर चुप हो गई।

‘‘रश्मि तुम भी गुजरे जमाने की बात कर रही हो। हमारी रीना बहुत अच्छी लड़की है। इसे हमारी इज्जत की चिन्ता है। इसे अच्छे-बुरे की भी पहचान है। तुम्हें नहीं पता, आज लड़कियां कहां सं कहां पहुंच गई हैं? वो हर क्षेत्र में लड़कों से आगे हैं। प्रतिभा पाटिल, सोनिया गांधी, सुनीता विलियम्स, कल्पना चावला सभी ने देश का नाम ऊंचा किया है। ये सभी लड़कियां ही तो थी। इसलिए मैं अपनी बेटी रीना को आगे पढ़ाऊंगा और एक डॉक्टर बनाऊंगा। फिर उसकी शादी के बारे में सोचूंगा।’’

अब रश्मि अपने पति से संतुष्ट थी। (एम सी एन)

(लेखक देश की तीन प्रतिष्ठित फीचर एजेंसियों के समूह ‘मीडिया केयर ग्रुप’ से जुड़े हैं)

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