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Tuesday, December 14, 2010

कहानी : मन्दिर


आज वह बहुत खुश था। एक सुंदर सुबह थी। वह नहा-धोकर मंदिर के लिए तैयार हो चुका था। उसके मुहल्ले में एक नया मन्दिर बन गया है और उसमें आज मूर्ति की स्थापना की जानी है। इसके बाद मंदिर में पूजा-पाठ का काम आरंभ हो जाएगा यानी अब तो मौज ही मौज है! जब भी भगवान से कुछ मांगना होगा तो चार कदम चले और मांग लिया वरना मामूली सी डिमांड के लिए भी उसे दूसरे मुहल्ले में स्थित मंदिर में जाना पड़ता था। दरअसल अपनी चीज का मजा ही कुछ और है! जब जी चाहे ...!

अचानक उसे बाहर कुछ शोर सुनाई दिया। उसने दरवाजा खोला।

‘‘किशन बाबू, आपका लड़का ...!’’

‘‘क्या हुआ?’’

‘‘सड़क पर एक्सीडेंट।’’ एक ने आगे बढ़कर कहा। सुनते ही वह मुख्य सड़क की तरफ लपके। पीछे-पीछे उसकी पत्नी दौड़ी चली आ रही थी।

खून से लथपथ उनका 10 वर्षीय बच्चा सड़क पर अचेत पड़ा था। किशन की पत्नी ने आगे बढ़कर उसे बाहों में उठाकर भींच लिया।

‘‘मुन्ना! मुन्ना!’’

तब तक एम्बुलेंस आ गई थी। पति-पत्नी बच्चे को लेकर अस्पताल की ओर चल पड़े।

‘‘सरकारी अस्पताल?’’

‘‘नहीं-नहीं। प्राइवेट नर्सिंग होम।’’ पत्नी ने निर्णायक स्वर में कहा।

फर्स्ट एड के दौरान ही मुन्ना को होश आ गया।

‘‘मुन्ना!’’ किशन तड़पकर बोला।

‘‘पापा!’’ मुन्ना ने चारों तरफ नजर दौड़ाई और फिर बोला, ‘‘पापा मेरी टांग में ...?’’

‘‘क्या हुआ बेटा?’’ किशन ने मुन्ना के पैरों को छूते हुए पूछा।

‘‘लगता है कि आपके बच्चों के पैरों में चोट आई है। एक्स-रे करना पड़ेगा।’’ डॉक्टर ने कहा। एक्स-रे के लिए मुन्ना को अंदर केबिन में ले जाया गया।

‘‘सुनो जी, घर खुला पड़ा है।’’ किशन की पत्नी ने कहा।

‘‘हां! और मेरी जेब में इस वक्त पैसे भी नहीं हैं?’’ किशन ने चिंतित स्वर में जवाब दिया।

‘‘घर पर हैं पैसे। मैं अभी लाती हूं और घर को ताला भी लगा आती हूं।’’ कहकर पत्नी घर चली गई।

एक्स-रे देखते हुए डॉक्टर ने कहा, ‘‘आपके बेटे की दोनों टांगों में फ्रैक्चर है, इसलिए प्लास्टर करना होगा। तब तक आप ये दवाईयां बाजार से ले आइए।’’

मुन्ना को अस्पताल के कर्मचारियों ने एक बिस्तर पर लिटा दिया और डॉक्टर किशन को दवाईयों की पर्ची थमाकर दूसरे मरीज को देखने में व्यस्त हो गए। मुन्ना के पैरों पर पलस्तर करते-करते एक बज गया। पलस्तर करने के बाद डॉक्टर खाना खाने चले गए।

मुन्ना को अब नींद आ गई थी। किशन की पत्नी भी घर से रुपये लेकर आ गई और बोली, ‘‘आपने सुबह से कुछ नहीं खाया है, बाहर जाकर कुछ खा-पी आइए।’’

‘‘छोड़ो जी!’’ किशन ने बेरूखी से कहा।

पत्नी ने बात करने की कोशिश करते हुए फिर से कहा, ‘‘आपको आज मंदिर में मूर्ति स्थापना समारोह में भी तो जाना था न! आप वहां हो आइए। मुन्ने के पास मैं बैठी ही हूं। वैसे भी अभी यह सो रहा है।’’

‘‘मेडिकल स्टोर से दवाईयां लानी हैं। लाओ रुपये मुझे दो।’’ किशन ने बात बदलते हुए कहा और वह पत्नी से रुपये लेकर दवाईयां लाने चला गया।

वापस आया, तब तक मुन्ना जाग गया था और अब वह अपनी मां से बातें कर रहा था। किशन ने दवाईयां उसके सिरहाने रखी और मुन्ना से बातें करने लगा। तब तक डॉक्टर भी खाना खाकर वापस आ गए। डॉक्टर ने दवाईयां देखी और नर्स को एक खुराक दवाई देने की हिदायत देकर अपने काम में व्यस्त हो गए।

शाम के पांच बज चुके थे। मुन्ना की हालत में अब काफी सुधार नजर आ रहा था। इसलिए किशन ने डॉक्टर से मुन्ना को अपने साथ घर ले जाने की इजाजत मांगी। डॉक्टर ने मुन्ना का चैकअप करने के बाद उसको डिस्चार्ज करने की अनुमति दे दी और किशन के हाथ में पांच हजार रुपये का बिल बनाकर थमा दिया और मुन्ना की देखरेख संबंधी कुछ जरूरी हिदायतें भी उसे दी।

घर पहुंचकर किशन ने बड़े आराम से मुन्ना को बिस्तर पर लिटा दिया। थोड़ी ही देर में मुन्ना को नींद आ गई। थोड़ी सी फुर्सत मिली तो दिन-भर के भूखे प्यासे किशन व उसकी पत्नी मुन्ना के पास बैठकर चाय पीने लगे।

तभी दरवाजे पर दस्तक हुई। किशन ने दरवाजा खोला। सामने मंदिर के पुजारी जी और मुहल्ले के लोग खड़े थे।

‘‘आइए, आइए ...।’’ किशन ने उन सभी का स्वागत करते हुए कहा।

‘‘किशन भैया, हमें पता चल गया था कि आपके बच्चे का एक्सीडेंट ...। कैसी तबीयत है अब उसकी?’’ एक पड़ोसी ने बात शुरू करते हुए कहा।

‘‘जी, अब ठीक है। पलस्तर हो गया है। वह देखो। अभी-अभी सोया है।’’ किशन ने कहा।

सब लोग कमरे में ही बैठ गए। पुजारी जी ने बच्चे के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘वाह किशन बाबू, बच्चा बिल्कुल आप ही की मूर्त है।’’

‘‘अरे, कुछ चाय-पानी का प्रबंध करो।’’ किशन ने पत्नी की तरफ मुड़कर कहा।

‘‘अरे नहीं-नहीं किशन बाबू! इसकी कोई जरूरत नहीं है।’’ पुजारी जी ने उन्हें बैठे रहने का संकेत करते हुए कहा।

‘‘आहा! आपका घर तो वाकई मंदिर है!’’ पुजारी जी किशन के कंधे को छूते हुए बोले।

‘‘अरे हां!’’ अचानक किशन को याद आया तो वह चौंककर बोला, ‘‘पंडित जी, माफ करना, मैं आज मंदिर में मूर्ति स्थापना के समय नहीं आ पाया।’’

‘‘आपको वहां आने की क्या आवश्यकता थी! दिनभर आप जिस कार्य में व्यस्त रहे, वह किसी पूजा-पाठ या मंदिर में मूर्ति स्थापना से कम नहीं था।’’ पुजारी जी ने कहा। (एम सी एन)

(लेखक देश की तीन प्रतिष्ठित फीचर एजेंसियों के समूह ‘मीडिया केयर ग्रुप’ से जुड़े हैं)

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