आपकी उपयोगी रचनाओं एवं टिप्पणियों का स्वागत है.

उपयोगी सूचना

हिन्दी भाषा के समाचारपत्र तथा पत्रिकाएं यदि अपने प्रकाशनों के लिए ‘मीडिया केयर नेटवर्क’, ‘मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स’ तथा ‘मीडिया केयर न्यूज’ की सेवाएं नियमित प्राप्त करना चाहें तो हमसे ई-मेल द्वारा सम्पर्क करें। आपके अनुरोध पर सेवा शुल्क संबंधी तथा अन्य अपेक्षित जानकारियां उपलब्ध करा दी जाएंगी।

हम इन फीचर एजेंसियों के डिस्पैच में निम्नलिखित विषयों पर रचनाएं प्रसारित करते हैं तथा डिस्पैच कोरियर अथवा ई-मेल द्वारा उपलब्ध कराए जाते हैं:-

राजनीतिक लेख, रिपोर्ट एवं विश्लेषणात्मक टिप्पणी, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय चर्चा, सामयिक लेख, फिल्म लेख एवं स्टार इंटरव्यू, फिल्म गॉसिप, ज्ञानवर्द्धक एवं मनोरंजक लेख, रहस्य-रोमांच, घर परिवार, स्वास्थ्य, महिला जगत, युवा जगत, व्यंग्य, कथा-कहानी, मनोरंजन, कैरियर , खेल, हैल्थ अपडेट, खोज खबर, महत्वपूर्ण दिवस, त्यौहारों अथवा अवसरों पर लेख, बाल कहानी, बाल उपयोगी रचनाएं, रोचक जानकारियां इत्यादि।

लेखक तथा पत्रकार विभिन्न विषयों पर अपनी उपयोगी अप्रकाशित रचनाएं प्रकाशनार्थ ई-मेल द्वारा भेज सकते हैं।
Share/Bookmark

अभी तक यहां आए पाठक

Friday, December 24, 2010

शांति, प्रेम एवं भाईचारे का संदेश देता ‘क्रिसमस’ पर्व


-- योगेश कुमार गोयल (मीडिया केयर नेटवर्क)

प्रतिवर्ष 25 दिसम्बर को विश्वभर में मनाया जाने पर्व ‘क्रिसमस’ ईसाई समुदाय का सबसे बड़ा त्यौहार है और संभवतः सभी त्यौहारों में क्रिसमस ही एकमात्र ऐसा पर्व है, जो एक ही दिन दुनियाभर के हर कोने में पूरे उत्साह एवं उल्लास के साथ मनाया जाता है। हिन्दुओं में जो महत्व दीवाली का है, मुस्लिमों में जितना महत्व ईद का है, वही महत्व ईसाईयों में क्रिसमस का है। जिस प्रकार हिन्दुओं में दीवाली पर अपने घरों को सजाने की परम्परा है, उसी प्रकार ईसाई समुदाय के लोग क्रिसमस के अवसर पर अपने घरों को सजाते हैं। इस अवसर पर शंकु आकार के विशेष प्रकार के वृक्ष ‘क्रिसमस ट्री’ को सजाने की तो विशेष महत्ता होती है, जिसे रंग-बिरंगी रोशनियों से सजाया जाता है।

ऐसी मान्यता है कि करीब दो हजार साल पहले 25 दिसम्बर को ईसा मसीह ने समस्त मानव जाति का कल्याण करने के लिए पृथ्वी पर जन्म लिया था। उस समय पूरे रोम में मूर्तिपूजा व अन्य धार्मिक आडम्बर चारों ओर फैले थे, रोम शासक यहूदियों पर अत्याचार करते थे, धनाढ़य वर्ग विलासितापूर्ण जीवन व्यतीत करता था जबकि गरीबों की हालत अत्यंत दयनीय थी। मनुष्य अपने पापों के कारण परमेश्वर के मार्ग से हट चुका था, चारों ओर अशांति फैली थी, भाई भाई का शत्रु बन गया था, मंदिरों के पुजारी अपनी स्वार्थ सिद्धि में लगे थे, छोटे-बड़े, अमीर-गरीब और ऊंच-नीच के बीच भेदभाव की गहरी खाई बन चुकी थी। ऐसे विकट समय में पृथ्वी पर जन्म लिया था यीशु (ईसा मसीह) ने।

ईसाई धर्म के लोग मानते हैं कि ईसा के जन्म के साथ ही समूचे विश्व में एक नए युग का शुभारंभ हुआ था, यही वजह है कि हजारों वर्ष बाद भी प्रभु यीशु के प्रति लोगों का वही उत्साह, वही श्रद्धा बरकरार है और 25 दिसम्बर की मध्य रात्रि को गिरिजाघरों के घड़ियाल बजते ही ‘हैप्पी क्रिसमस’ के उद्घोष के साथ जनसैलाब उमड़ पड़ता है, लोग एक-दूसरे को गले मिलकर बधाई देेते हैं और आतिशबाजी भी करते हैं।

हालांकि इस बात का कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता कि क्रिसमस का त्यौहार मनाने की परम्परा कब, कैसे और कहां से शुरू हुई थी लेकिन माना जाता है कि यह पर्व मनाने की शुरूआत रोमन सभ्यता के समय ईसा मसीह के शिष्यों ने ही की होगी। आज इस अवसर पर लोग गिरिजाघरों के अलावा अपने घरों में भी खुशी और उल्लास से ऐसे गीत गाते हैं, जिनमें ईसा मसीह द्वारा दिए गए शांति, प्रेम एवं भाईचारे के संदेश की महत्ता स्पष्ट परिलक्षित होती है। खुशी के इस अवसर पर लोग गिरिजाघरों में एकत्रित होते हैं और एक-दूसरे को बधाई देते हैं।

जिन प्रभु यीशु की पुण्य स्मृति में दुनिया भर के लोग क्रिसमस का त्यौहार मनाते हैं, उन प्रभु यीशु (ईसा मसीह) का जन्म अत्यंत विकट परिस्थितियों में हुआ था। दिसम्बर के महीने की हड्डियों तक को कंपा देने वाली कड़ाके की ठंड में इसराइल के येरूसलम से 8 कि.मी. दूर बेथलेहम नामक एक छोटे से गांव में आधी रात के वक्त खुले आसमान तले एक अस्तबल में एक गरीब यहूदी यूसुफ की पत्नी मरियम की कोख से जन्मे थे यीशु। उनके जन्म की शुभ सूचना भी सबसे पहले हेरोद जैसे क्रूर सम्राट को नहीं बल्कि गरीब चरवाहों को ही मिली थी। माना जाता है कि ये चरवाहे उसी क्षेत्र में अपनी भेड़ों के झुंड के साथ रहा करते थे और जिस रात ईसा ने धरती पर जन्म लिया, उस समय ये लोग खेतों में भेड़ों के झुंड की रखवाली करते हुए आग ताप रहे थे। तभी अचानक चारों ओर अलौकिक प्रकाश फैल गया और एक देवदूत प्रकट हुआ। अचानक हुए तेज प्रकाश से चरवाहे घबरा गए और भागने लगे किन्तु तभी उस देवदूत ने कहा कि तुम लोगों को डरने की जरूरत नहीं है बल्कि मैं तो तुम्हें इस समय बहुत आनंद का संदेश सुनाने आया हूं। तब देवदूत ने बताया कि आज दाऊद नगर में तुम्हारे मुक्तिदाता प्रभु ईसा मसीह का जन्म हुआ है, जो एक अस्तबल में घोड़ों के झुंड के बीच लेटे हुए हैं। डरते-डरते चरवाहे वहां पहुंचे और उन्होंने देवदूत के बताए अनुसार अस्तबल में ईसा तथा उनके माता-पिता के दर्शन किए तो खुद को धन्य मानते हुए उन्हें दण्डवत प्रणाम कर अपने झुंड की ओर लौट गए।

कहा जाता है कि मरियम जब गर्भवती थी तो एक रात गैबरियल नामक एक देवदूत मरियम के सामने प्रकट हुआ और उसने मरियम को बताया कि उन्हें ईश्वर के बेटे की मां बनने के लिए चुना गया है। उन दिनों जनगणना का कार्य चल रहा था और तब यह प्रथा थी कि जनगणना के समय पूरा परिवार अपने पूर्वजों के नगर में एकत्रित होता था और वहीं परिवार के सभी सदस्यों का नाम रजिस्टर में दर्ज कराता था।

यूसुफ दाऊद के कुटुम्ब तथा देश का था, इसलिए वह भी गर्भवती मरियम को साथ लेकर नाम लिखवाने अपने पूर्वजों की भूमि बेथलेहम पहुंचा। जनगणना की वजह से बेथलेहम में उस समय बहुत भीड़ थी। वहां पहुंचकर युसूफ ने एक सराय के मालिक से रूकने के लिए जगह मांगी लेकिन सराय में बहुत भीड़ होने के कारण उन्हें जगह नहीं मिल सकी। मरियम को गर्भवती देख सराय के मालिक को उस पर दया आई और उसने उन्हें घोड़ों के अस्तबल में ठहरा दिया। वहीं आधी रात के समय मरियम ने एक अति तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया और 7 दिन बाद उसका नामकरण संस्कार हुआ। बालक का नाम रखा गया ‘जीजस’, जिसे यीशु के नाम से भी जाना गया।

यहूदियों के इस देश में उस समय रोमन सम्राट हेरोद का शासन था, जो बहुत पापी और अत्याचारी था। हेरोद को जीजस के जन्म की सूचना मिली तो वह बहुत घबराया क्योंकि भविष्यवक्ताओं ने यह भविष्यवाणी की थी कि यहूदियों का राजा इसी वर्ष पैदा होगा और उसके बाद हेरोद राजा नहीं रह सकेगा। हेरोद ने जीजस की खोज में अपने सैनिकों की टुकड़ियां भेजी लेकिन वे जीजस के बारे में कुछ पता नहीं लगा सके।

घोर गरीबी के कारण जीजस की पढ़ाई-लिखाई की व्यवस्था तो नहीं हो पाई पर उन्हें बाल्यकाल से ही ज्ञान प्राप्त था। गरीबों, दुखियों व रोगियों की सेवा करना उन्हें बहुत अच्छा लगता था। इतना ही नहीं, बड़े-बड़े धार्मिक नेता भी उनके सवाल-जवाबों से अक्सर चकित हो जाते थे।

उन दिनों लोग मूर्तिपूजा किया करते थे और सर्वत्र धर्म के नाम पर आडम्बर फैला हुआ था। यीशु ने मूर्तिपूजा के स्थान पर एक निराकार ईश्वर की पूजा का मार्ग लोगों को बताया और उन्हें अपने हृदय में आविर्भूत ईश्वरीय ज्ञान का संदेश सुनाया। उनके उपदेशों से प्रभावित होकर उनके शिष्यों की संख्या दिनोंदिन बढ़ने लगी तथा उनकी दयालुता और परोपकारिता की प्रशंसा सर्वत्र फैल गई, जिससे यहूदियों के पुजारी और धर्म गुरू उनके घोर शत्रु बन गए।

एक बार यीशु प्रार्थना कर रहे थे तो उन्हें अपना शत्रु मान चुके यहूदियों के पुजारी व धर्मगुरू उनको पकड़कर ले गए। जब उन्हें न्यायालय में उपस्थित किए गया तो न्यायाधीश ने राजा और धर्मगुरूओं के दबाव में यीशु को प्राणदंड की सजा सुना दी। यहूदियों ने यीशु को कांटों का ताज पहनाया और फटे कपड़े पहनाकर उन्हें कोड़े मारते हुए पूरे नगर में घुमाया। फिर उनके हाथ-पांवों में कीलें ठोंककर उन्हें ‘क्रॉस’ पर लटका दिया गया लेकिन यह यीशु की महानता ही थी कि इतनी भीषण यातनाएं झेलने के बाद भी उन्होंने ईश्वर से उन लोगों के लिए क्षमायाचना ही की। सूली पर लटके हुए भी उनके मुंह से यही शब्द निकले, ‘‘हे ईश्वर! इन लोगों को माफ करना क्योंकि इन्हें नहीं पता कि ये क्या कर रहे हैं? ये अज्ञानवश ही ऐसा कर रहे हैं।’’ (एम सी एन)
(लेखक तीन प्रतिष्ठित फीचर एजेंसियों के समूह ‘मीडिया केयर ग्रुप’ के समूह सम्पादक हैं)

No comments:

समय बहुमूल्य है, अतः एक-एक पल का सदुपयोग सार्थक कार्यों में करें.