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Sunday, March 28, 2010

जीव जंतुओं की अनोखी दुनिया-43


विश्व की सबसे महंगी मछली ‘बेलूगा’
दुनियाभर में गहरे साफ पानी में पाई जाने वाली व्हेल प्रजाति की एक विशेष प्रकार की मछली है ‘बेलूगा’, जो विश्व की सबसे कीमती मछली मानी जाती है। दरअसल करीब पांच मीटर लंबी और औसतन डेढ़ टन से भी अधिक वजनी यह मछली भोजन के स्वादिष्ट व्यंजन के रूप में दुनियाभर में खाई जाने वाली सबसे महंगी मछली है। इस मछली से विविध प्रकार के व्यंजन बनाने के लिए इसे साधारण पानी से ही नहीं धोया जाता बल्कि इसे धोने के लिए शराब अथवा सिरके का प्रयोग किया जाता है और उसके बाद इसे सुखाकर इस पर नमक लगाया जाता है। इसके अण्डों से तो एक बहुत ही स्वादिष्ट व्यंजन बनाया जाता है, जो ‘कैवियार’ के नाम से जाना जाता है। इसी व्यंजन के लिए अण्डे प्राप्त करने के लिए ही कुछ समय पूर्व तक बड़ी तादाद में बेलूगा मछलियों को मारा जाता रहा है क्योंकि एक बेलूगा मछली के शरीर में करीब 150 किलोग्राम तक अण्डे होते हैं और यही वजह रही कि यह अनोखी मछली ऐसे जीवों की श्रेणी में पहुंच गई, जिन पर विलुप्तता का खतरा मंडरा रहा है लेकिन अब इस अद्भुत प्रजाति की मछली को मछली फार्मों में बड़ी तादाद में पाला जा रहा है और इससे अण्डे प्राप्त करने के लिए इसे मारे बिना ही इसके शरीर से अण्डे निकालने की तरकीब भी खोज ली गई है। बेलूगा मछली सर्दी के मौसम में तथा वसंत ऋतु में प्रायः नदियों में रहती हैं जबकि गर्मी का सीजन शुरू होते ही गहरे समुद्र में चली जाती हैं। (एम सी एन)
प्रकृति का बल्ब ‘जुगनू’
खासकर बारिश के मौसम में रात के समय पेड़-पौधों तथा वनस्पतियों पर या उनके आसपास जगमग-जगमग करते नन्हे-नन्हे जुगनू भला किसे अच्छे नहीं लगते। आसमान के तारों की भांति हमारे आसपास टिमटिमाते जुगनूओं को ‘प्रकृति का बल्ब’ भी कहा जा सकता है। दक्षिण अमेरिका के हरे-भरे जंगलों में जब जुगनू किसी वृक्ष पर अपने विशाल समूह के साथ आराम करते हैं तो दूर से देखने पर ऐसा लगता है मानो किसी ने उस वृक्ष पर हजारों-लाखों बल्ब जलाकर लटका दिए हों। जुगनू यूं तो हर जगह मिल जाते हैं लेकिन प्रायः ऐसे स्थानों पर ही बहुतायत में मिलते हैं, जहां का भौगोलिक पर्यावरण नम होता है, जहां प्रचुर मात्रा में वर्षा होती है और हरी-भरी सघन वनस्पतियां मौजूद होती हैं। दरअसल जुगनू पूर्णतः शाकाहारी जीव है, जिसका जीवन वनस्पति पर ही निर्भर है।
भारत, भूटान, मलाया, दक्षिण अमेरिका, साइबेरिया, दक्षिण अफ्रीका, थाईलैंड इत्यादि देशों में अधिक प्रकाश देने वाले कुछ विशिष्ट प्रजाति के जुगनू भी पाए जाते हैं। दक्षिण अफ्रीका के जंगलों में तो ऐसे विचित्र जुगनू भी मिलते हैं, जो 300 ग्राम तक वजनी होते हैं। इन जुगनुओं से इतना अधिक प्रकाश निकलता है कि करीब 10 फुट के गोल घेरदार क्षेत्र में इतनी तेज रोशनी हो जाती है, जिसमें कोई व्यक्ति बड़े आराम से किताब भी पढ़ सकता है। इन जंगलों में शिकार के लिए आने वाले शिकारी पेड़ों की डाल पर ऊंचाई पर झूले डालकर बैठते हैं और 3-4 जुगनुओं को पकड़कर उन्हें एक पतली डोर से बांधकर पेड़ की किसी डाल पर लटका देते हैं, जिनकी तेज रोशनी के कारण कोई हिंसक पशु पेड़ के नजदीक नहीं आता। रात के समय उष्णकटिबंधीय जंगलों से गुजरने वाले लोग तो प्रायः किसी कांच के जार अथवा पात्र में जुगनुओं को एकत्र कर लालटेन के रूप में उनका इस्तेमाल करते हैं।
भारत में तो हिमालय की तलहटी और तराई में जुगनुओं की ऐसी अनेक किस्में भी पाई जाती हैं, जिनके शरीर से न केवल रंग-बिरंगी रोशनी निकलती है बल्कि अपने मुंह से ये मधुर संगीतमय आवाज भी निकालते हैं। क्यूबा तथा उष्णकटिबंधीय देशों में तो युवतियां रात के समय अपनी पोशाकों में सुई-धागे से ही जुगनुओं को टांग लेती हैं या उन्हें गले में माला की तरह पिरोकर पहनती हैं पर वे यह काम इतने ध्यान से और बड़े आराम से करती हैं कि कोई भी जुगनू दबकर मरने न पाए। फिर ये युवतियां जहां भी जाती हैं, जुगनुओं के प्रकाश के कारण इनके चारों ओर उजाला रहता है।
साइबेरिया में पाए जाने वाले जुगनू प्रायः हरे रंग के होते हैं। रात को इन जुगनुओं की रोशनी का लाभ उठाने के लिए यहां के आदिवासी हरे पेड़ों की टहनियों को थोड़ा-थोड़ा शहद लगा देते हैं, जिसकी गंध से सम्मोहित होकर जुगनू इन पेड़ों की ओर खिंचे चले आते हैं और रातभर इन पेड़ों के आसपास ही मंडराते रहते हैं, जिससे रातभर वहां पर्याप्त मात्रा में रोशनी रहती है। (एम सी एन)

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