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Monday, June 21, 2010

अहंकारी राजा


एक सम्राट अपने आगे किसी को कुछ नहीं समझता था। वह अपने अहंकार और स्वार्थ के तहत यही समझता था कि वह जो कुछ भी कर रहा है, बिल्कुल ठीक कर रहा है। वह खुद को दुनिया का बेहतरीन सम्राट समझता था। नगरवासी उसे अपने पैरों की जूती के समान लगने लगे थे। किसी भी आयोजन के लिए आने वाले निमंत्रण पर वह अपने प्रतिनिधि के रूप में अपनी जूतियां ही भेज देता था।

प्रजा राजा के इस व्यवहार से बहुत परेशान थी। युवा वर्ग का मानना था कि राजा सठिया गया है तो ऐसे में हम उसे अपने आयोजनों में ही क्यों बुलायें किन्तु वृद्धजन, कोई नई मुसीबत उन्हें न घेर ले, इस डर से हमेशा राजा के पास न्यौता भेज देते। वे जानते थे कि विरोध किया तो किसी पिंजरे में बंद शेर की भांति मिमियाकर ही रह जाएंगे लेकिन कुछ समझदार लोग सम्राट को सबक सिखाने के लिए उचित अवसर की प्रतीक्षा कर रहे थे।

मौका भी शीघ्र आ गया। सम्राट ने अपने पुत्र के विवाह में सम्मिलित होने के लिए प्रजा को निमंत्रण दिया। सबने मिलकर विचार-विमर्श किया। सभी का एक ही जवाब था, ‘‘अब हम और बर्दाश्त नहीं कर सकते। यह स्वर्ण अवसर है और इस अवसर को हाथ से निकलने देना हमारी जिंदगी की सबसे बड़ी मूर्खता होगी।’’

हालांकि वृद्धजन इसके पक्ष में नहीं थे क्योंकि उन्हें लग रहा था कि राजा वैसे ही सनकी मिजाज के होते हैं, इसलिए कहीं उल्टा-सीधा फतवा जारी कर दिया तो जीवन के ही लाले पड़ जाएंगे पर युवा वर्ग के तर्कों और जिद के सामने उन्होंने हार मान ली।

योजनानुसार सारे नगरवासियों ने मिलकर अपनी-अपनी जूतियां राजा के यहां भेज दी और साथ ही कहलवा दिया, ‘‘राजन्! हमें माफ करना, हमारे पास वक्त नहीं था, इसलिए अपनी जूतियां भेज रहे हैं। ये जूतियां ही हमारा प्रतिनिधित्व करेंगी।’’

इस घटना से राजा का अहम् एक ही क्षण में हिम की भांति गल गया। राजा की आंखें खुल गई। उसे आज महसूस हुआ कि जब वह स्वयं इस तरह लोगों के यहां अपनी जूतियां भेजता था तो उन्हें कैसा महसूस होता होगा? मैं जिस प्रजा के बल पर हूं, आज अगर वही प्रजा मेरे साथ नहीं है तो मैं किसका राजा हुआ? जमीन, महल, दीवारें किसी को राजा नहीं बनाती। प्रजा के बल पर ही राजा पराक्रमी और प्रतापी बनता है, जब प्रजा राजा का और राजा प्रजा का सम्मान करे। यह विचार कर राजा ने अपने अभी तक के किए व्यवहार के लिए प्रजा से माफी मांगी। (मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स)

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